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Articles by डेविड मैकैसलैंड

सम्पूर्ण मन से!

कालिब “सम्पूर्ण मन” का व्यक्ति था l वह और यहोशू मूसा और लोगों को प्रतिज्ञात देश की छानबीन रिपोर्ट देनेवाले बारह-व्यक्तियों की टोह लेनेवाली टीम का हिस्सा थे l कालिब ने कहा, “हम अभी ... उस देश को अपना कर लें; क्योंकि निःसंदेह हम में ऐसा करने की शक्ति है” (गिनती 13:30) l किन्तु टीम के बाकी दस लोगों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बाद भी, इसे असंभव कहकर केवल बाधाएं देखीं (पद. 31-33) l

दस लोगों द्वारा लोगों को हताश करके परमेश्वर के विरुद्ध बड़बड़ाने से उन्हें निर्जन-स्थान में चालीस वर्ष भटकना पड़ा l किन्तु कालिब डटा रहा l परमेश्वर ने कहा, “इस कारण कि ... कालिब के साथ और ही आत्मा है, और उसने ... मेरा अनुसरण किया है, मैं उसको उस देश में ... पहुँचाऊँगा, और उसका वंश उस देश का अधिकारी होगा” (गिनती 14:24) l पैंतालिस वर्ष बाद परमेश्वर ने 85 वर्षीय कालिब को, हेब्रोन नगर दिया “क्योंकि वह इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का पूरी रीति से अनुगामी था” (यहोशू 14:14) l

शताब्दियों बाद एक व्यवस्थापक ने यीशु से पूछा, “कौन सी आज्ञा बड़ी है?” यीशु ने उत्तर दिया, “ ‘तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन ... सारे प्राण, ... सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख l’ बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है” (मत्ती 22:35-38) l

आज, कालिब हमारे मन के सम्पूर्ण प्रेम, भरोसा, और समर्पण के योग्य परमेश्वर में अपने भरोसे से हमें प्रेरित कर रहा है l

वाइरल सुसमाचार

बोस्टन के नार्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में वायरल विषय वस्तु प्रोजेक्ट यह अध्ययन कर रहें है कि 1800 के दशक में मुद्रित विषय अखबारों द्वारा-उस काल का सोशल मीडिया नेटवर्क-कैसे फैलता था l यदि एक लेख पुनः 50 से अधिक बार छपती थी, वे उसे उस ओद्योगिक काल में “वाइरल” मानते थे l स्मिथसोनियन  पत्रिका में लिखते हुए, ब्रिट पीटरसन ने पाया कि यीशु के किस अनुयायी की मृत्यु विश्वास के कारण कैसे हुई, एक उन्नीसवीं-शताब्दी के खबर लेख कम-से-कम 110 भिन्न प्रकाशनों में दिखाई दिया l

थिस्सलुनीके के मसीहियों को लिखते हुए प्रेरित पौलुस ने, उन्हें यीशु का साहसिक और आनंदित साक्षी बनने के लिए सराहाना की l  “तुम्हारे यहाँ से न केवल मकिदुनिया और अखया में प्रभु का वचन सुनाया गया, पर तुम्हारे विश्वास की जो परमेश्वर पर है, हर जगह ऐसी चर्चा फ़ैल गई है” (1 थिस्स.1:8) l यीशु मसीह द्वारा रूपांतरित इन लोगों के जीवन द्वारा सुसमाचार वायरल हो गया l कठिनाई और सताव के बावजूद, वे शांत न रह सके l

हम प्रभु को जाननेवाले करुणामय हृदयों, मददगार हाथों, और ईमानदार शब्दों द्वारा मसीह में क्षमा और अनंत जीवन को फैलाते हैं l सुसमाचार हमें और हमसे मिलने वालों के जीवन रूपांतरित करता है l

आज भी हम सभों द्वारा सुसमाचार फैलता जाए!

कबाड़खाना निपुण

नोआ प्युरिफोय ने “संग्रह” कलाकार के रूप में लॉस एंजेल्स के वाट्स क्षेत्र में 1965 के

दंगे के बाद इकट्ठी की गई तीन टन मलबा से अपना कार्य आरंभ किया l साइकिल के टूटे पहिये और फेंकने योग्य गेंद से लेकर अलग किये गए टायर्स और ख़राब टी.वी.-अनुपयोगी वस्तुएं-उसने  और उसके सहयोगी ने आधुनिक समाज में ठुकराए हुए लोगों के साथ व्यवहार के विषय सशक्त सन्देश देने वाली प्रतिमाएँ बनाईं l एक संवाददाता ने श्री पुरिफोय को “कबाड़खाना निपुण” संबोधित किया l

यीशु के काल में बीमार और शारीरिक समस्याओं से ग्रस्त लोग परमेश्वर द्वारा दण्डित पापी माने जाते थे l उनको अस्वीकृत और उपेक्षित माना जाता था l किन्तु यीशु और उसके शिष्यों के जन्म से दृष्टिहीन एक व्यक्ति से मुलाकात के बाद, यीशु ने बताया कि उसकी स्थिति पाप का परिणाम नहीं है, किन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य देखने का एक अवसर l “जब तक मैं जगत में हूँ , तब तक जगत की ज्योति हूँ” (यूहन्ना 9:5) l यीशु के निर्देशों के अनुसरण पश्चात, दृष्टिहीन देखने लगा l

धार्मिक अधिकारीयों के प्रश्न करने पर, उस व्यक्ति ने सरलता से जवाब दिया, “मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अँधा था और अब देखता हूँ”(पद.25) l

यीशु आज भी संसार में  “कबाड़खाना निपुण” है l हम सब पाप द्वारा बिगड़े हुए हैं, किन्तु वह हमारे टूटे जीवन को नयी सृष्टि बनाता है l

क्या यह आनंद देता है?

व्यवस्था एवं संगठन विषय पर एक युवा जापानी स्त्री की पुस्तक की लाखों प्रतियां संसार में बिक गयीं l मारी कोंडो का मुख्य सन्देश घरों और आलमारियों में अनावश्यक वस्तुएँ- जो वस्तुएं उनके लिए बोझ हैं-को हटाने में लोगों को मदद करना है l वह कहती हैं, “हर एक को ऊपर उठाकर पूछिये, “क्या यह आनंद देता है?” यदि उत्तर हाँ है, रख लीजिये l यदि नहीं, तो हटा दीजिये l

प्रेरित पौलुस फिलिप्पी के मसीहियों को मसीह के साथ सम्बन्ध में आनंद खोजने को कहा l “प्रभु में सदा आनंदित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनंदित रहो” (फ़िलि. 4:4) l चिंता ग्रस्त जीवन के बदले, उसने उनको हर बात के लिए प्रार्थना करने को कहा और तब परमेश्वर की शांति उनके हृदय एवं विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी (पद.6-7) l

हमारे दैनिक कार्यों एवं जिम्मेदारियों में, सब कुछ आनंदायक नहीं है l किन्तु हम पूछ सकते हैं, “यह किस तरह परमेश्वर और मेरे हृदय में आनंद उत्पन्न कर सकता है? काम करने के कारण में परिवर्तन उनके विषय हमारे अहसास को रूपांतरित कर सकता है l

इसलिए हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, ... आदरणीय हैं, ... उचित हैं, ...पवित्र हैं, ... सुहावनी हैं, ... मनभावनी हैं,  अर्थात् जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो l (पद.8) l

पौलुस के अंतिम शब्द विचार के लिए भोजन और आनंद का नुसखा है l

हमेशा उसकी देखभाल में

जिस दिन मेरी बेटी म्युनिक से बार्सिलोना विमान यात्रा कर रही थी, मैंने अपने पसंदीदा विमान खोज वेबसाइट पर उसकी यात्रा देखना चाहा l वेबसाइट पर विमान संख्या डालने पर, कंप्यूटर ने बताया कि उसका विमान ऑस्ट्रिया को पार कर उत्तरी इटली के ऊपर से जा रहा था l उसके बाद विमान को भूमध्यसागर, फ्रांस के उष्ण तटीय क्षेत्र से होकर समय से पहुंचना था l मुझे केवल ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे नहीं मालूम था कि उसे दिन के भोजन में क्या परोसा जा रहा था!

मैं अपनी बेटी के ठिकाने और स्थिति की चिंता क्यों कर रहा था? क्योंकि मैं उसे प्यार करता हूँ l वह कौन है, क्या कर रही है और वह जीवन में कहाँ जा रही है के विषय मैं चिंता करता हूँ l

भजन 32 में, दाऊद हमारे लिए परमेश्वर की क्षमा, मार्गदर्शन, और चिंता का उत्सव मनाता है l एक मानव पिता से हटकर, परमेश्वर हमारे जीवनों का हर अंश और हमारे हृदयों की स्थायी ज़रूरतें जानता है l प्रभु की प्रतिज्ञा है, “मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूँगा; मैं तुझ पर कृपादृष्टि रखूँगा और सम्मति दिया करूँगा” (पद.8) l

हम आज अपनी हर परिस्थिति में, परमेश्वर की उपस्थिति और देखभाल में भरोसा कर सकते हैं क्योंकि “जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करुणा से घिरा रहेगा” (पद.10) l

पुनर्निर्माण

अनेक वर्षों के बाद, एडवर्ड ली बर्लिन लौटकर, याद किया कि जिसे वह याद और प्रेम करता था, जो अब नहीं था l उसके साथ, वह शहर भी पूर्णरूपेण बदल गया था l हेमिसफीयर्स  पत्रिका में उसने लिखा, “एक शहर जिसे आप प्यार करते थे  संयोग का प्रस्ताव लगता है . . . जिसे छोड़ देना चाहिए l” अपने अतीत के स्थान पर जाना दुःख और हानि के भाव उत्पन्न करता है l हम उस समय की तरह वही व्यक्ति नहीं हैं, न ही वह स्थान हमारे जीवन में पहले जैसा  महत्वपूर्ण है l

नहेम्याह इस्राएल देश से अनेक वर्षों तक निर्वासन में था जब उसने अपने लोगों की दयनीय दशा और यरूशलेम शहर के विनाश के विषय सुना l उसने फारस के राजा, अर्तक्षत्र से दीवारों के पुनःनिर्माण के लिए अनुमति मांगी l एक रात स्थिति की टोह लेने के बाद (नहे. 2:13-15), नहेम्याह ने शहरवासियों से कहा, “हम कैसी दुर्दशा में हैं, कि यरूशलेम उजाड़ पड़ा है और उसके फाटक जले हुए हैं l आओ, हम यरूशलेम की शहरपनाह बनाएं, कि भविष्य में हमारी नामधराई न रहे” (पद.17) l

नहेम्याह यादें तरोताज़ा करने नहीं किन्तु पुनःनिर्माण करने लौटा l यह हमारे अतीत के ध्वस्त भागों को ठीक करने की सशक्त ताकीद है l यह मसीह में हमारा विश्वास और उसकी सामर्थ्य ही है जो हमें आगे देखकर, बढ़ने और पुनःनिर्माण करने की ताकत देता है l

व्यर्थ नहीं

मेरा परिचित एक वित्तीय सलाहकार इस तरह पैसा निवेश की सच्चाई का वर्णन करता है, “सर्वोत्तम की आशा करें और सबसे अधिक नुक्सान के लिए तैयार रहें l” जीवन में हमारे प्रत्येक निर्णय में परिणाम के विषय अनिश्चितता है l फिर भी हम एक मार्ग का अनुसरण हर परिस्थिति में कर सकते हैं, हम जानते हैं कि हमारी मेहनत व्यर्थ नहीं होगी l

नैतिक भ्रष्टाचार के लिए प्रसिद्ध शहर, कुरिन्थुस में, प्रेरित पौलुस, यीशु के अनुयायियों के संग एक वर्ष बिताया l अपने जाने के बाद, कार्य की निरंतरता में उसने उनको लिखा कि  वे  न निराश हों और न ही मसीह के लिए अपनी साक्षी को व्यर्थ समझें l उसने उनको आश्वस्त किया कि एक दिन आनेवाला है जब प्रभु आएगा और मृत्यु  भी जय द्वारा पराजित होगी (1 कुरिन्थियों 15:52-55) l

यीशु के प्रति ईमानदार रहना, कठिन, निराश करनेवाला, और खतरनाक भी हो सकता है, किन्तु यह व्यर्थ और बेकार नहीं है l प्रभु के संग चलकर उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य का साक्षी बनकर, हमारे जीवन व्यर्थ नहीं हैं! हम इससे आश्वस्त हों l

कुछ छिपा नहीं

2015 में एक अंतर्राष्ट्रीय शोध कंपनी का कथन था कि पूरे विश्व में दो करोड़ पैंतालिस लाख निगरानी कैमरे लगे हुए हैं, और इनकी संख्या प्रतिवर्ष 15 फीसदी की दर से बढ़ रहा है l इसके अलावा, करोड़ों लोग अपने स्मार्टफोन से हर दिन, जन्मदिन उत्सव से लेकर बैंक डकैती तक की तस्वीर खींचते हैं l चाहे हम बढ़ी हुई सुरक्षा की सराहना करें या क्षीण एकान्तता की निंदा करें, हम वैश्विक, कैमरा-सर्वत्र समाज में रहते हैं l

नये नियम की पुस्तक इब्रानियों के अनुसार परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में, हम कैमरे की आँख की चौकसी की तुलना में खुलासा और जबाबदेही का बृहद स्तर अनुभव करते हैं l दो धारी तलवार की तरह, उसका वचन, हमारे व्यक्तित्व के गहराई को बेधता है जहाँ वह “मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है l सृष्टि की कोई वस्तु उससे छिपी नहीं है वरन् जिस से हमें काम है, उसकी आँखों के सामने सब वस्तुएँ खुली और प्रगट हैं” (इब्रा. 4:12-13) l

क्योंकि हमारा उद्धारकर्ता यीशु बिना पाप किये हमारी निर्बलताओं और परीक्षाओं का अनुभव किया, हम “अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बांधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (पद. 15-16) l हमें उससे डरने की ज़रूरत नहीं किन्तु उसके निकट आने पर अनुग्रह हेतु आश्वस्त रहें l

पूर्ण उपहार

अमरीका में क्रिसमस के बाद के सप्ताह वर्ष का सबसे व्यस्त समय व्यवसाय के पुनः आरंभ होने का समय जब लोग अनचाहे उपहारों का लेन-देन वास्तविक ज़रुरतों की वस्तुओं से करते हैं l फिर भी शायद आप पूर्ण उपहार देनेवालों को जानते होंगे l उनको कैसे मालूम दूसरे व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण और अवसर के लिए उचित क्या है? सही उपहार देना दूसरों को सुनने और व्यक्ति की रुचि जानने से होती है कि वह किसमें आनंदित और प्रसन्नचित होते हैं l

यह परिवार और मित्रों के साथ सही है l किन्तु परमेश्वर के साथ क्या? क्या परमेश्वर को भेट करने के लिए कुछ अर्थपूर्ण और विशेष है? क्या कुछ है जो उसके पास नहीं है?

 रोमियों 11:33-36, परमेश्वर की महान बुद्धिमत्ता, ज्ञान, और महिमा के लिए प्रशंसा के गीत पश्चात उसके प्रति हमारे समर्पण की बुलाहट है l ”इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ l यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है” (पद. 12:1) l अपने चारो ओर के संसार के सदृश न बनकर, हमारे “मन के नए हो जाने से [हमारा] चालचलन भी बदलता जाए” (पद.2) l

आज हम कौन सा सर्वोत्तम उपहार परमेश्वर को दे सकते हैं? हम धन्यवाद, दीनता, और प्रेम में सम्पूर्ण रूप से अपने को दें-हृदय,मन,और इच्छा l प्रभु यही हमसे चाहता है l

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अदृश्यता की अंगूठी

यूनानी दार्शनिक प्लेटो (c. 427-c. 348 ई.पु.) मानव हृदय के अँधेरे भाग पर ज्योति चमकाने का काल्पनिक तरीका खोज लिया था l उसने एक चरवाहे की कहानी बतायी जिसे अचानक भूमि की गहराई में दबी एक सोने की अंगूठी मिली l एक दिन भूकंप से पहाड़ के निकट एक कब्र खुल गई और अंगूठी चरवाहे को दिखाई दी l संयोग से उसे यह भी ज्ञात हुआ कि उस जादुई अंगूठी को पहननेवाला इच्छा से अदृश्य हो सकता था l अदृश्यता पर विचार करते हुए, प्लेटो ने एक प्रश्न किया : यदि लोग को पकड़े जाने और दंड पाने का भय नहीं होता, क्या वे गलत करने से परहेज करते?

यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु इस विचार को एक भिन्न दिशा में ले जाता है l वहां पर, अच्छा चरवाहा, यीशु, ऐसे हृदयों की बात करता है जो अँधेरे की आड़ में अपने कार्यों को छिपाते हैं (यूहन्ना 3:19-20) l वह हमारे छिपाने की इच्छा पर हमारा ध्यान हमें दोषी ठहराने के लिए नहीं करता है, किन्तु उसके द्वारा उद्धार पाने के लिए (पद.17) l हृदयों का चरवाहा होकर, वह हमारे मानव स्वभाव के सबसे ख़राब हिस्से को भी प्रगट करके हमें बताता है कि परमेश्वर हमसे कितना अधिक प्रेम करता है (पद.16) l

परमेश्वर अपनी करुणा में हमें अंधकार से निकलकर ज्योति में उसका अनुसरण करने के लिए आमंत्रित करता है l

सम्पूर्ण पहुँच

कुछ वर्ष पूर्व, मेरा एक मित्र मुझे प्रथम गोल्फ प्रतियोगिता देखने के लिए आमंत्रित किया l पहली बार देखने के कारण, मेरी अपेक्षाएं शून्य थीं l वहाँ पहुँचकर, मैं उपहार, सूचना, और गोल्फ के मैदान का नक्शा पाकर चकित हुआ l लेकिन सबसे अच्छी बात यह थी कि हमें 18 वीं ग्रीन (गोल्फ खेल में एक विशेष बिंदु/स्थान) के पीछे विशिष्ट दीर्घा में पहुँच मिली, जहाँ मुफ्त भोजन और बैठने का स्थान था l यद्यपि मैं इस आतिथ्य दीर्घा में स्वयं नहीं पहुँच सकता था l मुख्य व्यक्ति मेरा मित्र था; केवल उसके द्वारा मुझे पूर्ण पहुँच मिली l

खुद पर भरोसे से हम, नाउम्मीदी में परमेश्वर से दूर रहते l किन्तु यीशु, हमारा दंड लेकर, अपना जीवन और परमेश्वर तक पहुँच देता है l प्रेरित पौलुस ने लिखा, “[परमेश्वर की इच्छा थी कि] अब कलीसिया के द्वारा, परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान ... प्रगट किया जाए” (इफि. 3:10) l इस ज्ञान ने यहूदी और गैरयहूदी का मसीह में मेल कराया, जिसने हमारे लिए परमेश्वर पिता तक पहुँच दी l “[यीशु पर] विश्वास करने से साहस और भरोसे के साथ परमेश्वर के निकट आने का अधिकार है” (पद.12) l

यीशु में भरोसा करने पर, हमें सबसे महान पहुँच मिलती है-परमेश्वर तक पहुँच जो हमसे प्रेम करता है और हमसे सम्बन्ध रखना चाहता है l

सम्पूर्ण मन से!

कालिब “सम्पूर्ण मन” का व्यक्ति था l वह और यहोशू मूसा और लोगों को प्रतिज्ञात देश की छानबीन रिपोर्ट देनेवाले बारह-व्यक्तियों की टोह लेनेवाली टीम का हिस्सा थे l कालिब ने कहा, “हम अभी ... उस देश को अपना कर लें; क्योंकि निःसंदेह हम में ऐसा करने की शक्ति है” (गिनती 13:30) l किन्तु टीम के बाकी दस लोगों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बाद भी, इसे असंभव कहकर केवल बाधाएं देखीं (पद. 31-33) l

दस लोगों द्वारा लोगों को हताश करके परमेश्वर के विरुद्ध बड़बड़ाने से उन्हें निर्जन-स्थान में चालीस वर्ष भटकना पड़ा l किन्तु कालिब डटा रहा l परमेश्वर ने कहा, “इस कारण कि ... कालिब के साथ और ही आत्मा है, और उसने ... मेरा अनुसरण किया है, मैं उसको उस देश में ... पहुँचाऊँगा, और उसका वंश उस देश का अधिकारी होगा” (गिनती 14:24) l पैंतालिस वर्ष बाद परमेश्वर ने 85 वर्षीय कालिब को, हेब्रोन नगर दिया “क्योंकि वह इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का पूरी रीति से अनुगामी था” (यहोशू 14:14) l

शताब्दियों बाद एक व्यवस्थापक ने यीशु से पूछा, “कौन सी आज्ञा बड़ी है?” यीशु ने उत्तर दिया, “ ‘तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन ... सारे प्राण, ... सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख l’ बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है” (मत्ती 22:35-38) l

आज, कालिब हमारे मन के सम्पूर्ण प्रेम, भरोसा, और समर्पण के योग्य परमेश्वर में अपने भरोसे से हमें प्रेरित कर रहा है l