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Articles by जोशील डिक्सन

सबसे बड़ा उपहार

वर्षों से मेरी सहेली बारबरा ने मुझे अनगिनत (उत्साहवर्धक) कार्ड्स और विचारशील उपहार दिए हैं। जब मैंने उसे बताया कि मैंने यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार कर लिया है तो उसने मुझे अब तक का सबसे बड़ा उपहार दिया-मेरी पहली बाइबल। उसने कहा. “परमेश्वर से प्रतिदिन मिलने, पवित्रशास्त्र पढ़ने, प्रार्थना करने और उस पर भरोसा रखने और उसकी आज्ञा का पालन करने के द्वारा तुम परमेश्वर की नज़दीकी और आत्मिक परिपक्वता में बढ़ती जाओगी।” मेरा जीवन बदल गया जब बारबरा ने मुझे परमेश्वर को और अच्छे से जानने के लिए आमन्त्रित किया।

बारबरा मुझे प्रेरित फिलिप्पुस की याद दिलाती है। यीशु के फिलिप्पुस को उनके पीछे चलने के लिए आमन्त्रित करने के पश्चात (यूहन्ना 1:43), उस प्रेरित ने तुरन्त अपने मित्र नतनएल को बताया कि “जिस का वर्णन मूसा ने व्यवस्था में और भविष्यद्वक्‍ताओं ने किया है, वह हम को मिल गया; वह यूसुफ का पुत्र, यीशु नासरी है।” (पद 45) । जब नतनएल ने सन्देह किया, तो फिलिप्पुस से वाद-विवाद, आलोचना नहीं की या अपने मित्र के लिए हार नहीं मान ली। उसने अब उसे यीशु से साक्षात रूप में मिलने के लिए आमन्त्रित किया। उसने उससे कहा “चलकर देख ले।”  

मैं फिलिप्पुस के आनन्द की कल्पना कर सकती हूँ, जब उसने नतनएल को यह कहते हुए सुना कि यीशु “परमेश्वर का पुत्र” और “इस्राएल का राजा” है (पद 49) । यह जानना कितनी बड़ी आशीष है कि उसका मित्र “बड़े बड़े कामों” को देखने से चूकेगा नहीं, जिनकी प्रतिज्ञा यीशु ने की थी कि वे उन्हें देखेंगे (पद 50-51)।

पवित्र आत्मा परमेश्वर के साथ हमारे घनिष्ठ सम्बन्ध का आरम्भ करते हैं और फिर उन सब में वास करते हैं, जो विश्वास के साथ उत्तर देते हैं। वह हमें उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानने और अपने आत्मा और पवित्रशास्त्र के द्वारा प्रतिदिन उनसे मिलने के योग्य करते हैं। यीशु को और अच्छे से जानने का आमन्त्रण देने और लेने के लिए सबसे बड़ा उपहार है।

विलाप से आराधना की ओर

किम ने 2013 में स्तन कैंसर के साथ संघर्ष करना आरम्भ किया था। उसके उपचार के समाप्त होने के चार दिनों के पश्चात, चिकित्सकों ने उसे लगातार बढ़ रहे फेफड़ों के रोग से ग्रस्त बताया और उसे तीन से पाँच साल और जीने का समय दिया। वह बहुत दुखी हुई और पहले साल अपनी भावनाओं के साथ उसने रो-रोकर परमेश्वर से प्रार्थना की। 2015 में जब मेरी मुलाकात किम के साथ हुई, तब तक उसने अपनी परिस्थिति को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया था और दूसरों पर असर डालने वाला आनन्द और शान्ति प्राप्त कर ली थी। यद्यपि कुछ दिन बहुत ही कठिन होते हैं, फिर भी जब वह दूसरों को प्रोत्साहित करती थी तो परमेश्वर उसके दिल दहला देने वाले दुःख को आशा से भरी हुई स्तुति की सुन्दर गवाही में बदलते रहे।   

यद्यपि जब हम भयानक परिस्थितियों में होते हैं, परमेश्वर हमारे विलाप को आनन्द के नृत्य में बदल सकता है। यद्यपि उनकी चंगाई सर्वदा दिखाई या अनुभव नहीं होती, जिसकी हम आशा करते हैं, परन्तु फिर भी हम परमेश्वर के कार्यों पर दृढ विश्वास कर सकते हैं (भजन संहिता 30:1–3) । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारा मार्ग कितना भी ऊबड़-खाबड़ प्रतीत हो, हमारे पास उनकी स्तुति करने के अनगिनत कारण हैं (पद  4)। हम परमेश्वर में आनन्द मना सकते हैं, जब वह हमारे विश्वास को स्थिर रखता है (पद 5–7) । हम उसकी दया के लिए दोहाई दे सकते हैं (पद 8–10), और उस आशा से आनन्द मना सकते हैं जो वह अनेक विलाप करते आराधकों के लिए ले कर आता है। मात्र परमेश्वर ही निराशा के विलाप को गुंजायमान आनन्द में बदल सकता है, जो किसी परिस्थिति पर निर्भर नहीं होता है (पद 11–12)।

जब हमारा करुणामयी परमेश्वर हमारे दुःख में हमें आराम प्रदान करता है, तो वह हमें शान्ति से भर देता है और हमें अपने आप और दूसरों के लिए दया दिखाने की सामर्थ प्रदान करता है। हमारा प्रेमी और विश्वासयोग्य प्रभु हमारे विलाप को आराधना में बदल सकता और बदलता है, जो हमारे दिल को गहन भरोसे, स्तुति या आनन्द से परिपूर्ण नृत्य में बदल सकता है।

प्रेम हमें बदलता है

मेरे यीशु से मिलने से पहले, मुझे इतनी गहरी चोट लगी थी कि मैं और आहत होने के भय से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने से बचती थी। मेरी माँ मेरी सबसे घनिष्ठ मित्र रही, जब तक मैंने ऐलन से विवाह नहीं कर लिया। सात साल बाद और तलाक के कगार पर मैंने कलीसिया की एक सभा में मेरे किंडरगार्टनर, ज़ेवियर, से सहायता माँगनी चाही। मैं बाहर जाने के दरवाज़े के निकट बैठ गई, मैं किसी पर भरोसा करने के लिए डरी हुई थी, परन्तु मैं सहायता के लिए बेचैन भी थी।

मैं धन्यवाद देती हूँ कि विश्वासी लोग आगे आए और हमारे परिवार के लिए प्रार्थना की और मुझे सिखाया कि प्रार्थना और बाइबल अध्ययन के साथ परमेश्वर के साथ एक सम्बन्ध कैसे कायम करना है। समय के साथ-साथ मसीह और उसके अनुगामियों के प्रेम ने मुझे बदल दिया।

कलीसिया की उस पहली सभा के दो साल बाद ऐलन, ज़ेवियर और मैंने कुछ समय के बाद बपतिस्मा लेने के लिए कहा, हमारी हफ्ते में होने वाली एक वार्तालाप के दौरान मेरी माँ ने पूछा, “तुम अलग सी लग रही हो। मुझे यीशु के बारे में और बताओ।” कुछ महीने बीत गए और उन्होंने भी मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार कर लिया।

यीशु जीवनों को रूपान्तरित करता है...शाऊल जैसे जीवनों को, जिससे कलीसिया के उत्पीड़कों में सबसे अधिक भय रखा गया था, जब तक उसकी मुठभेड़ मसीह के साथ नहीं हुई थी (प्रेरितों के काम 9:1-5) । दूसरे लोगों ने शाऊल की यीशु के बारे में और सीखने में सहायता की (पद 17-19) । उसके प्रबल रूपांतरण ने उसकी आत्मा की सामर्थ से भरी हुई शिक्षा को और निखार दिया (पद 20-22) ।

मसीह के साथ हमारी भेंट शाऊल जैसी नाटकीय नहीं हो सकती। हमारे जीवन का रूपांतरण उतना तीव्र और प्रबल भी नहीं हो सकता। फिर भी, जब लोग ध्यान देते हैं कि समय के साथ-साथ मसीह का प्रेम हमें किस प्रकार बदल रहा है, तब हमारे पास दूसरों को यह बताने का सुअवसर होता है कि उसने हमारे लिए क्या किया है।

केंकड़े की दूर्दशा

जब मेरे चचेरे भाई ने मुझे क्रेफिश पकड़ने में उसके साथ चलने के लिए आमन्त्रित किया, मैं और कुछ सहायता तो नहीं कर सका, परन्तु उत्तेजित हो गयाl मैंने अपने दांत पीस लिए जब उसने मुझे एक प्लास्टिक का बर्तन पकड़ायाl “जिसपर कोई ढक्कन नहीं था?”

“तुम्हें उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी,” मछली पकड़ने की डोरियों और मुर्गियों के टुकड़ों के एक छोटे थैले, जिसे हम चारे के रूप में प्रयोग करने वाले थे, को उठाते हुए उसने कहाl

बाद में, जब मैंने उन मछलियों को लगभग आधी बाल्टी में एक दूसरे पर चढ़ कर निकलने का असफल प्रयास करते हुए देखा, तब मुझे अहसास हुआ कि हमें ढक्कन की ज़रूरत क्यों नहीं पड़ेगीl जब भी एक क्रेफिश ऊपर तक पहुँचती थी, दूसरी उसे नीचे खींच लेती थीl

क्रेफिश की दुर्दशा मुझे याद दिलाती है कि सम्पूर्ण समुदाय के लाभ के स्थान पर मात्र अपने ही लाभ की चिन्ता करना कितना विनाशकारी हो सकता हैl पौलुस ऊपर उठाने वाले परस्पर सम्बन्ध को समझ गया था, जब उसने थिस्सलुनिका के विश्वासियों के लिए पत्र लिखाl उसने उनसे आग्रह किया, “जो ठीक चाल नहीं चलते उनको समझाओ कायरों को ढाढस दो, निर्बलों को सम्भालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओl” (1 थिस्सलुनीकियों 5:14)l

उनके देखभाल करने वाले समुदाय की सराहना करते हुए (पद 11), पौलुस ने उन्हें और प्रेमी और शांतिपूर्ण सम्बन्धों के लिए प्रेरित किया (पद 13-15)l क्षमा, करुणा और दया की एक संस्कृति का निर्माण करने के प्रयास के द्वारा परमेश्वर और अन्य लोगों के साथ उनका सम्बन्ध मज़बूत होगा (पद 15, 23)l

इस प्रकार की प्रेम से भरी हुई एकता के द्वारा कलीसिया बढ़ोत्तरी और मसीह की गवाही दे सकती हैl जब विश्वासी दूसरों को नीचे खींचने के स्थान पर दूसरों को ऊपर उठाने के लिए समर्पित होने के द्वारा परमेश्वर का सम्मान करते हैं, तो हम और हमारे समुदाय फलते-फूलते हैंl

आपके व्यक्तित्व के लिए धन्यवाद!

जब मैं एक कैंसर केंद्र में रहकर अपनी माँ की देखभाल करती थी, मेरा परिचय एक और देखभाल करनेवाली महिला, लॉरी से हुआ जो हमारे घर के आगेवाले गलियारे में अपने पति के साथ रहती थी l मैं सामान्य स्थान पर लॉरी के साथ बातचीत करती थी, हँसती थी, अपने दिल की बात बताती थी और प्रार्थना करती थी l अपने प्रियों की सेवा करते वक्त हम एक दूसरे का सहयोग करने का आनंद उठाते थे l

एक दिन, किराना का सामान खरीदने के लिए निवासियों को ले जानेवाला वाहन मुझसे छूट गया l देर शाम लॉरी ने मुझे वहाँ ले जाने की पेशकश की l कृतज्ञ हृदय से, मैंने उसकी पेशकश स्वीकार कर ली l मैंने कहा, “ तुम्हारे व्यक्तित्व के लिए धन्यवाद l” जैसी वह थी मैंने केवल एक मित्र के रूप में मेरी मदद करने के लिए ही नहीं, किन्तु सच्चाई से उसके व्यक्तित्व की सराहना की l

भजन 100 परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व की सराहना है, केवल उसके काम की नहीं l भजनकार “सारी पृथ्वी के लोगों [को](पद.1) निश्चित रूप से जानने के लिए “कि यहोवा ही परमेश्वर है” (पद.3) . . . आनंद से यहोवा की आराधना [करने के लिए]” (पद.2) नेवता देता है l हमारा सृष्टिकर्ता हमें “[उसको] धन्यवाद [देने] और [उसकी] स्तुति [करने के लिए]” (पद.4) अपनी उपस्थिति में बुलाता है l वास्तव में, हमारा प्रभु निरंतर हमारे कृतज्ञता का हकदार है क्योंकि वह “भला है,” उसकी करुणा सदा की है,” और उसकी “सच्चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है” (पद.5) l

परमेश्वर हमेशा इस जगत का सृष्टिकर्ता और पालक और हमारा घनिष्ठ प्रेमी पिता रहेगा l वह हमारे असली ख़ुशी से पूर्ण कृतज्ञता के योग्य है l

जो हम कर सकते हैं

अपने बिस्तर तक सीमित होने के बावजूद, 92 वर्षीय मोरी बुगार्ट मिशिगन के बेघर लोगों के लिए टोपियाँ बनाता था l ख़बरों की माने तो उसने पंद्रह वर्षों में 8,000 से अधिक टोपियाँ बनायीं l अपने स्वास्थ्य या सीमाओं पर केन्द्रित न होकर, श्री बूगर्ट ने खुद के बाहर देखा और अपनी ज़रूरतों के ऊपर ज़रुरतमंदों की ज़रूरतों को महत्त्व दिया l उसने प्रगट किया कि उसका काम उसे अच्छा लगता है और उसे एक उद्देश्य देता है l उसने कहा, “मैं यह काम प्रभु के पास उसके घर जाने तक करूँगा”-जो फरवरी 2018 में हुआ l यद्यपि उसकी बनायी हुयी टोपियाँ प्राप्त करनेवाले उसकी कहानी नहीं जान पाएंगे या हर एक टोपी बनाने के लिए उसने कितना त्याग किया, मोरी के प्रेम को संरक्षित रखने का सरल कार्य संसार के लोगों को प्रेरित कर रहा था l
हम भी अपने संघर्ष के परे देख सकते हैं, दूसरों को अपने आगे रख सकते हैं, और अपने दयालु उद्धारकर्ता, यीशु मसीह का अनुसरण कर सकते हैं (फिलिप्पियों 2:1-5) l देहधारित परमेश्वर - राजाओं का राजा - वास्तविक दीनता में “दास का स्वरुप धारण किया (पद.6-7) l अपने जीवन को देकर - अंतिम बलिदान - उसने क्रूस पर हमारा स्थान लिया (पद.8) l यीशु ने हमारे लिए सब कुछ दे दिया . . . परमेश्वर पिता की महिमा के लिए सब कुछ (पद.9-11) l
यीशु में विश्वासी होने के कारण, दयालुता के कार्यों के द्वारा दूसरों को प्रेम दिखाना और उनकी परवाह करना हमारा सौभाग्य है l यदि हम विचार न भी करें हमारे पास देने के लिए बहुत है, हम सेवक का स्वभाव अपना सकते हैं l हम जो कर सकते हैं उसके द्वारा  क्रियाशीलता से अवसर ढूढ़ कर लोगों के जीवनों में अंतर ला सकते हैं l  

धन्यवाद की समझ

पुरानी दर्द और निराशाओं के कारण वर्षों की थकान के साथ सीमित गतिशीलता ने आखिरकार मुझे अपनी पकड़ में ले लिया था l अपने असंतोष में, मैं अत्यधिक रौब जमानेवाली और कृतघ्न हो गयी l मेरे पति की मेरी देखभाल करने के कौशल के विषय मैं शिकायत करने लगी थी l घर की सफाई के उसके तरीके से मैं नाखुश हुयी l यद्यपि मैं जानती हूँ कि वह सबसे अच्छा भोजन बनाता है, मैं भोजन की विविधता की कमी पर कोलाहल मचाने लगी थी l अंततः उसके बताने पर कि मेरा कुड़कुड़ाना उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं, मैं क्रोधित हो गयी l आखिरकार, परमेश्वर ने मुझे अपनी गलतियाँ समझने में मेरी मदद की, और मैंने अपने परमेश्वर और पति से क्षमा मांग ली l
भिन्न परिस्थितियों की इच्छा करना हमें शिकायत, और सम्बन्ध बिगाड़ने वाले आत्म-केन्द्रितता की ओर ले जाता है l इस्राएली इस दुविधा से परिचित थे l ऐसा महसूस होता है मानो वह हमेशा असंतुष्ट रहते थे और परमेश्वर के प्रबंध के लिए कभी भी धन्यवादी नहीं थे (निर्गमन 17:1-3) l यद्यपि प्रभु ने “आकाश से भोजन वस्तु” (16:4) देकर बियाबान में अपने लोगों की देखभाल की थी, वह अन्य प्रकार का भोजन खाना चाहते थे (गिनती 11:4) l इस्राएली परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और प्रेमपूर्ण देखभाल के दैनिक आश्चकर्म के लिए आनंदित होने के बदले, और भी कुछ चाहते थे, कुछ बेहतर, कुछ भिन्न, या कुछ जो पहले खाते थे (पद.4-6) l वे अपनी कुण्ठा मूसा पर निकालते थे (पद.10-14) l
परमेश्वर की भलाई और विश्वासयोग्यता पर भरोसा रखने से धन्यवाद की समझ बढ़ती है l आज हम उसकी असंख्य देखभाल के लिए उसे धन्यवाद दे सकते हैं l

मेरा वास्विक रूप

अतीत में धर्मनिष्ठ जीवन से निम्न आचरण के कारण अयोग्यता और लज्जा की भावनाएं, वर्षों तक, मेरे जीवन के प्रत्येक भाग पर विपरीत प्रभाव डालती रहीं l मेरे कलंकित नेकनामी की सीमा को यदि दूसरे जान जाते तो क्या होता? यद्यपि परमेश्वर ने मुझे साहस दिया जिससे मैं एक सेवा अगुवा(महिला) को दोपहर भोजन पर आमंत्रित कर सकी l मैंने सिद्ध दिखाई देने का  प्रयास किया l मैंने अपने घर को साफ़ किया, तीन प्रकार का भोजन तैयार किया, और सबसे अच्छे वस्त्र पहने l
मैंने सामने के प्रांगन का फव्वारा(sprinkler) बंद कर दिया l रिसती हुयी टोंटी को बंद करते समय, अचानक पानी की तेज़ धार से पूरी तौर से भीगने पर मैं चिल्ला उठी l अपने बालों को तौलिये से लपेटकर और बिगड़े मेकअप के साथ, मैंने अपने कपड़े बदल लिए l और उसी समय दरवाजे की घंटी बजी l खीज कर, मैंने सुबह की अपनी सारी बेतुकी हरकत और उद्देश्य बताए l मेरी नयी सहेली ने अपने अतीत के पराजय से उत्पन्न दोष की भावना के कारण भय और असुरक्षा के साथ अपना संघर्ष बांटा l प्रार्थना करने के बाद, उसने परमेश्वर के अपूर्ण सेविकाओं की अपनी टीम में मेरा स्वागत किया l
प्रेरित पौलुस मसीह में अपने नए जीवन को स्वीकार किया, अपने अतीत का इनकार नहीं किया अथवा प्रभु की सेवा करने में उसे आड़े नहीं आने दिया (1 तीमुथियुस 1:12-14) l क्योंकि पौलुस जानता था कि क्रूस पर यीशु के कार्य ने उसे अर्थात् सबसे अधम पापी को  बचाया और रूपांतरित किया था, इसलिए उसने परमेश्वर की प्रशंसा की और दूसरों को उसका आदर करने और आज्ञा मानने के लिए उत्साहित किया (पद.15-17) l
जब हम परमेश्वर का अनुग्रह और क्षमा स्वीकार करते हैं, हम अपने अतीत से स्वतंत्र हो जाते हैं l हम दोषपूर्ण हैं किन्तु तीक्ष्णता से प्रेम किए गए हैं, और जब हम परमेश्वर से प्राप्त अपने  वरदानों द्वारा दूसरों की सेवा करते हैं, हमें अपने वास्तविक रूप से लज्जित होने की ज़रूरत नहीं है l 

प्रार्थना करने का सही तरीका

मैं उन लोगों की प्रशंसा करती हूँ जो उन दैनिकी में प्रार्थना निवेदन लिखते हैं जो दैनिक उपयोग से फट जाते हैं, जो प्रत्येक प्रार्थना निवेदन और प्रशंसा का रिकॉर्ड रखते हुए विश्वासयोग्यता से अपनी सूची को अपडेट/सुव्यवस्थित रखते हैं l मैं उनसे प्रेरित हूँ जो दूसरों के साथ प्रार्थना के लिए इकठ्ठा होते हैं और जिनके झुके हुए घुटनों से उनके पलंग के निकट रखी दरी घिस जाती हैं l वर्षों से, मैंने उनकी शैली अपनाने का, सिद्ध प्रार्थना जीवन का अनुसरण करने का और लोगों से कहीं अधिक स्पष्टता से वाक्पटुता की नकल करने की कोशिश की है l मैंने प्रार्थना करने का सही तरीका सीखने की इच्छा रखते हुए, जो मेरे विचार से रहस्य था उसको समझने का प्रयास किया l

अंततः, मैंने सीख लिया है कि हमारा प्रभु ऐसी प्रार्थना चाहता है जिसका आरंभ और अंत दीनता है (मत्ती 6:5) l वह हमें घनिष्ट संवाद के लिए आमंत्रित करके हमारी सुनने का वादा करता है (पद.7) l वह हमें निश्चित करता है कि प्रार्थना एक वरदान है, उसके ऐश्वर्य का आदर करने का अवसर (पद.9-10), उसके प्रबंध में भरोसा करने का प्रदर्शन (पद.11), और उसकी क्षमा और मार्गदर्शन में हमारी सुरक्षा की निश्चयता (पद.12-13) l

परमेश्वर हमें भरोसा देता है कि वह हमारी प्रार्थनाओं में उच्चारित और अनुच्चारित हर एक शब्द के साथ-साथ, जो प्रार्थनाएँ आँसुओं के रूप में दिखाई देती हैं, उनको भी सुनता और उनकी भी चिंता करता है l जब हम परमेश्वर और हमारे लिए उसके प्रेम में अपना भरोसा जताते हैं, हम दीन हृदय से प्रार्थना करने के विषय निश्चित होते हैं जो उसके प्रति समर्पित है और उस पर निर्भर है और जो हमेशा प्रार्थना करने का सही  तरीका है l