न् २००४ में जब श्रीलंका और अन्य एशियाई देश भयंकर सुनामी द्वारा प्रभावित हुए, अजीत फरनानडो, जो उस समय पर राष्ट्रीय युवा मसीही संघ के डायरेक्टर थे, उन्होंने उस सुनामी के कारण आए अत्यधिक दुःख और पीड़ा को देखते हुए, एक मूल पुस्तिका लिखी थी जिसका शीर्षक था “सुनामी के बाद”। बाद में इसे अनुकूलित और इस्तेमाल किया गया अमेरिका के खाड़ी तट पर आए तूफान कैटरीना और रीटा से हुए दुष्परिणाम के लिए।

इसका संदेश उन लोगों के लिए शाश्वत है जो अकथनीय आपदाओं और त्रासदियों के साथ समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए, हमने महसूस किया कि हमें कोविड-१९ के इस दुखद समय के दौरान आवश्यकतानुसार इसे अनुकूलित करना चाहिए और पुन: प्रस्तुत करना चाहिए।

हम प्रार्थना करते हैं कि यह आपके लिए आशीषमय हो जैसे हजारों के लिए भी पूरे विश्व भर में है।

~नोवेल बर्मन

कुछ शब्द लेखक द्वारा

जब शहर, राष्ट्र, या यहाँ तक कि महामारी जैसी वैश्विक आपदाएँ हमें प्रभावित करती हैं, तो मसीहियों को शक्ति और मार्गदर्शन के लिए बाइबल की ओर देखना चाहिए और पीड़ित लोगों तक मसीह के प्रेम के साथ पहुँचना चाहिए। इस पुस्तिका के माध्यम से यह मेरा प्रयास है कि मैं बाइबल के अनुसार यह दर्शाऊ कि मसीह के अनुयायियों को आपदाओं से पहले और उसके बाद क्या करना चाहिए। यह मेरी इच्छा है कि यह गहरे संकट का सामना करने वाले किसी भी व्यक्ति की सहायता कर पाए।

~अजीत फर्नांडो

शक्ति और मार्गदर्शन के लिए बाइबल की ओर देखना चाहिए।

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बाइबल कहती है “रोने का समय है और हंसने का भी समय है; छाती पीटने का समय है और नाचने का भी समय है” (सभोपदेशक ३:४)। आपदा के बाद का समय निश्चित रूप से रोने और शोक करने का समय है।

बाइबल में ऐसे महत्वपूर्ण भाग हैं जिन्हें विलाप कहा जाता है जहाँ परमेश्वर के विश्वासयोग्य लोग जिस अनुभव से वे गुज़र रहे है उस पर शोक मनाते हैं और परमेश्वर से सवाल करते हैं कि उसने उनके साथ ऐसा क्यों होने दिया। कुछ विलाप ऐसे लोगों के है जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से कष्ट उठाया। दूसरे ऐसे लोग हैं जो अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं और देश पर आयी पीड़ा पर शोक मनाते हैं। बाइबिल में एक पूरी पुस्तक है, विलापगीत, जो राष्ट्र पर आयी पीड़ा के कारण शोक मनाने के लिए समर्पित है ।

यिर्मयाह पुकारता है, “भला होता मेरा सिर जल ही जल और मेरी आंखें आंसुओं का सोता होती कि मैं रात दिन अपने मरे हुए लोगों के लिए रोता रहता!” (यिर्मयाह ९:१)। वह रोना चाहता था क्योंकि उसकी आत्मा शोकित थी। उस कथन के बाद यिर्मयाह के शब्द दिखाते हैं कि रोना उसके शोकित ह्रदय को चंगा/शांत करता है।

जब हम अपने परिवार, समुदाय या राष्ट्र के लिए दर्द से जूझते हैं, तो अपना दुख व्यक्त करने से दबाव कम करने में मदद मिलती है और जो हमें अपने आस-पास के लोगों के लिए अधिक उपयोगी बना देता है ।

नहेमायाह के साथ यही हुआ। जब उसने यरूशलेम की बुरी स्थिति के बारे में सुना, वह रोया, विलाप किया, उपवास किया, और कई दिनों तक प्रार्थना की जब तक कि राजा ने इस बात पर गौर किया कि उसके चेहरे पर गहरे दुख के लक्षण है। किंतु शोक का समय बीतने के पश्चात, वह तुरंत काम में लग गया और एक राष्ट्रीय नायक बन गया, जिसकी प्रतिभाशाली नेतृत्व का ढंग एक महान उदाहरण है और लगभग २,५०० साल बाद भी इसका उपयोग किया जाता है।

बाइबल में, हम ऐसे कई तरीके पाते हैं जिससे लोग अपना शोक व्यक्त करते हैं, जैसे उपवास (२ शमूएल १: १२) और टाट ओढ़ना (उत्पत्ति ३७:३४; २ शमूएल ३:३१) और राख पर बैठना (एस्तेर ४: १-३; यिर्मयाह ६ :२६; २५:३४)। हमें शोक व्यक्त करने के ऐसे तरीके खोजने चाहिए जो हमारी अपनी संस्कृति के अनुसार हों।

निश्चित रूप से, एक परिवार, कलीसिया, समुदाय या राष्ट्र के लिए उपवास और प्रार्थना करना त्रासदी के समय में सबसे अधिक इच्छित होता है। श्रीलंका में सुनामी के बाद लोगों ने सफेद झंडा फहरा कर अपने शोक को प्रकट किया। सभी संस्कृति में सभी के अपने खास तरीके होते हैं दुख को अभिव्यक्त करने के।

जब दोरकास की मृत्यु हुई और पतरस उसके घर गया, “सब विधवाएं रोती हुई उसके पास आ खड़ी हुई, और जो कुरते और कपड़े दोरकास ने उनके साथ रहते हुए बनाए थे, दिखाने लगी” (प्रेरितों के काम ९:३९)। इस तरह के दृश्य काफी सामान्य है पवित्र शास्त्र में।

हमें इस बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है कि हम किस प्रकार अपनी संस्कृति के अनुसार शोक व्यक्त करने के तरीके को अपनी कलीसिया में ला सकते है जो बाइबिल में मिलने वाले विलाप करने के विषय में ज्ञान के समानांतर हो।

हमें शोक व्यक्त करने के ऐसे तरीके खोजने चाहिए जो हमारी अपनी संस्कृति के अनुसार हों।

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GRAPPLING WITH GOD’S SOVEREIGNTY

यह सवाल करना कि ये कठिन परिस्थिति क्यों आयी ,बाइबिल में मिलने वाले विलाप का एक पहलू है। अय्यूब, यिर्मयाह और भजनकर्त्ता जैसे महान संतों का उदाहरण देकर बाइबल हमें इस प्रश्न से निपटने के लिए प्रोत्साहित करती है। अय्यूब ने अपने आसपास क्या हो रहा था, यह समझने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। आमतौर पर ऐसे समय से जूझने के अंत में, परमेश्वर के लोग यह मानते हैं कि, क्योंकि परमेश्वर संप्रभु है और जानता है कि क्या हो रहा है, सबसे बुद्धिमानी की बात यह है कि उस पर भरोसा करते रहें। हम इसे अक्सर भजन संहिता में देखते हैं (उदाहरण के लिए, भजन. ७३ )।

संघर्ष के बीच में परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास रखना, हमें दुखद घड़ी में आशाहीन होने से बचाता है। हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना चाहिए कि भयानक त्रासदी में भी वह उनके लिए सब बातों में भलाई ही उत्पन्न करेगा जो उससे प्रेम करते हैं (रोमियों ८ :२८)। हो सकता है कि परमेश्वर की संप्रभुता का यह दृष्टिकोण तुरंत न आए। कभी-कभी हमारे लिए इस पर परमेश्वर से मल्लयुद्ध करना आवश्यक हो जाता है। प्रार्थना और उसके वचन पर मनन करना ऐसे समय में मदद करता है (भजन २७ )। हम आपदा के बीच में हो सकते हैं या उन लोगों की सेवा में लगे हो सकते है जो इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हो। लेकिन हमें परमेश्वर और उसके वचन के साथ बिताने के लिए समय निकालना आवश्यक है।

संघर्ष के बीच में परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास रखना, हमें दुखद घड़ी में आशाहीन होने से बचाता है।

यही कारण है कि परमेश्वर के लोगों को हमेशा एक समुदाय के रूप में उसकी आराधना करना जारी रखना चाहिए, भले ही वह ऑनलाइन हो, भले ही स्थिति कितनी भी गंभीर क्यों न हो। जब हम एक साथ आराधना करते हैं, तो हम उन अनंतकाल की वास्तविकताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो हमें परमेश्वर की संप्रभुता की याद दिलाती हैं।

इन सच्चाइयों को जानने के द्वारा, जो उदासी हमे घेरे हुए है उन्हें दूर करने में मदद और उस पर भरोसा रखने की सामर्थ मिलती है कि वह हमारी देखभाल करेगा। परमेश्वर और उसके वचन से शांति पाने के बाद, हमें ऐसी शक्ति मिलती है कि हम खुद को दुख में पड़े लोगों की सेवा के लिए बलिदानसहित अर्पित कर पाए।

सृष्टि के साथ कराहना

हमें यह याद रखना ज़रूरी है कि जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया, पाप ने संसार में प्रवेश किया और ब्रह्मांड असंतुलित हो गया। बाइबल दर्शाती है सृष्टि अब अभिशाप के अंतर्गत है (उत्पत्ति ३:१७; रोमियो ८:२॰)। अतः, प्राकृतिक आपदाएं आती रहेंगी जब तक परमेश्वर एक नए स्वर्ग और पृथ्वी की रचना नहीं कर लेता (२ पतरस ३:१३; प्रकाशितवाक्य २१:१)। पौलुस कहता है, “क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है” (रोमियो ८:२२)। फिर उसने कहा कि जो यीशु मसीह को जानते है, वह भी इस कराहने में जुड़ते है(v.२३)। २००४ की सुनामी जैसी घटनाओं के परिणामों के दौरान या महामारी के दौरान, हमने सृष्टि और परमेश्वर के लोगों की कराह को स्पष्ट रूप से देखा है। मसीहियों को सीखना ज़रूरी है की उन्हें किस प्रकार कराहना है। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो जब उस स्थान पर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जहाँ परमेश्वर ने हमें सेवा करने के लिए रखा है, तो हम परमेश्वर की इच्छा से दूर भागने और सुरक्षित स्थान पर जाने की परीक्षा में पड़ सकते है। कराहना हमें कठिन परिस्थितियों से निपटने में मदद करता है।

रोमियों ८ में जिस कराह के बारे में बात की गई है उसे बच्चे के जन्म के दर्द के रूप में वर्णित किया गया है (व.२२ )। जो महिलाएं कष्टदायी प्रसव पीड़ा का अनुभव करती हैं, वे इसे सहन करने में सक्षम होती हैं क्योंकि वे उस महिमित क्षण की प्रतीक्षा कर रही होती हैं जब वे बच्चे को जन्म देंगी ।
इसी तरह, हमारा कराहना हमें उस महिमित अंत की याद दिलाता है जो निश्चित रूप से आ रहा है (देखें २ कुरि० ५ :२ -४ )। यह हमारी सहायता करता है कि हम उन कठिन परिस्थितियों से दूर न भागे जिनमें परमेश्वर हमें डालता है। हम दुख सह सकते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि स्वर्ग में स्थायी, अनन्त छुटकारा निश्चित रूप से मिलेगा ।

हमें परमेश्वर और उसके लोगों की उपस्थिति में कराहना सीखना चाहिए और इसे भीतर बंद नहीं रखना चाहिए।

कराहना हमारे दर्दमय अनुभव के कारण हमारे भीतर उत्पन्न हुई कड़वाहट को हटा देता है। हमें परमेश्वर और उसके लोगों की उपस्थिति में कराहना सीखना चाहिए और उसे अंदर ही अंदर बंद नहीं करना चाहिए। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम अपने दर्द को व्यक्त करते हैं और हम उस दबाव को छोड़ देते हैं जो हमारे दर्दनाक अनुभव पर बना है। तब कड़वाहट का बढ़ना मुश्किल हो जाता है। हमारा कराहना परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से या हमारे दोस्तों के माध्यम से हमें आराम भी देने देता है। जब हमें वास्तव में आराम मिलता है, तो हम कड़वे नहीं हो सकते, क्योंकि हम एक ऐसे प्रेम का अनुभव करते हैं जो उस क्रोध को दूर कर देता है जो हमारे हृदय की गहराइयों में कड़वाहट के रूप में था। इसलिए, जब हम व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से कराहते हैं, तो हम अपने कराहने के एक भाग में परमेश्वर से सवाल करते है कि ऐसा क्यों हुआ, भले ही हमारे भीतर की गहरायी में हमे इस बात का भरोसा है की परमेश्वर का उसके संसार के ऊपर नियंत्रण है।

ऐसा परमेश्वर जो कराहता है

परमेश्वर के बारे में सबसे अद्भुत बाइबिल शिक्षाओं में से एक यह है कि जब हम कराहते हैं, तो वह हमारे साथ कराहता है (रोमियों ८ :२६)। परमेश्वर जानता है कि हम किस परिस्थिति से गुजर रहे हैं, वह हमारे दर्द को महसूस करता है।

बाइबल कहती है कि जब इस्राएल कष्ट में था, तब परमेश्वर भी कष्ट में था (यशायाह ६३:९)। वास्तव में, वह उन लोगों के लिए विलाप और शोक करता है जो उसे स्वीकार भी नहीं करते हैं (यशायाह १६:११; यिर्मयाह ४८:३१)। यह उस सामान्य विचार से बिलकुल अलग है कि परमेश्वर दूर है और इसमें शामिल नहीं है।
परमेश्वर के कराहने से हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम पाते हैं कि जब यीशु (जो परमेश्वर हैं) पृथ्वी पर रहे , वह भी इस संसार की पीड़ा पर कराहए। वह यरूशलेम के हठ और उन पर आने वाले दण्ड के कारण रोया (लूका १९:४१-४५) ।

वह अपने मित्र लाजर की कब्र पर भी रोया था औरों के साथ जो वहां रो रहे थे (यूहन्ना ११:३३-३५)। इस तरह हम या निष्कर्ष निकाल सकते हैं परमेश्वर उनके साथ भी रो रहे हैं जो महामारी से हुए नुकसान या हानि के कारण रो रहे हैं।
परमेश्वर का रोना हमें मजबूत कारण देता है कि हम रोने के लिए अनिच्छुक न हो। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि जब हमें इस बात का एहसास होता है कि परमेश्वर हमारे साथ कराहता है, तो हमारे साथ जो हुआ है उस पर उससे नाराज होना मुश्किल हो जाता है। यह इस बात को भी आसान कर देता है कि जब हम उलझन में हो तो हम परमेश्वर के पास उससे शांति पाने के लिए जाए।

क्या यह दण्ड की आज्ञा है ?

एक सवाल जो अक्सर पूछा जाता है कि क्या इस हालिया महामारी जैसी आपदाएं परमेश्वर का न्याय हैं। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि यह पापी मनुष्यों के विरुद्ध परमेश्वर के कार्य है। पर ऐसे दावों पर एक गंभीर शंका तब उत्पन्न होती है जब हम यह देखते है की हज़ारो अद्भुत मसीही लोग भी संसार के अन्य लोगो के समान इससे प्रभावित हुए है।

जब यीशु इस पृथ्वी पर थे, उन्होंने भी उसी प्रकार दुखों का अनुभव किया जैसे अन्य लोग करते थे। यह मानवता के साथ उसकी पहचान का एक प्रमुख पहलू था। उसी तरह, हम में से जो यीशु का अनुसरण करते हैं, उन्हें भी संकट में पड़े लोगों के साथ दुख उठाने के लिए बुलाया गया है। आपदा से उबरने से हम सभी को ऐसा करने का अवसर मिलता है। एक मसीही होने के नाते यह हमारा सौभाग्य है कि हम उन लोगों में से हैं जिन्होंने एक भयानक आपदा का सामना किया है। हमें उनके दुख में उनके साथ एक होना है।

यीशु ने अपने दिनों में हुई दो विपत्तियों के बारे में जो टिप्पणियाँ कीं, उन पर ध्यान करना हमारे लिए मददकारी है। वह न्याय के विषय में बात ही कर रहा था, और कुछ लोगों ने उसे एक घटना याद दिलाई जिसमें पिलातुस ने कुछ गलीलियों को मार डाला जब वे अपना बलिदान चढ़ा रहे थे। शायद वे इस त्रासदी का उल्लेख परमेश्वर के न्याय के उदाहरण के रूप में कर रहे थे। यीशु उनके तर्क के साथ नहीं गया। इसके बजाय उसने कहा, “मैं तुमसे कहता हूं, नहीं; परन्तु जब तक तुम मन न फिराओगे, तो तुम सब भी इसी रीति से नष्ट होगे ” (लूका १३:३)।

फिर यीशु ने एक और घटना के विषय में बताया जिसमें एक मीनार गिर गई और १८ लोग मारे गए। और फिर से उसने इस बात को दोहराया कि जब तक वे पश्चाताप नहीं करेंगे, वे “सब इसी प्रकार नाश होंगे” (व.५)। पद ३ और ५ में जो एक ही चेतावनी दोहराई गयी है यह दिखती है कि इस चेतावनी को तुरंत और गंभीरता से मानना आवश्यक है।

यीशु के कहने का यह अर्थ था कि ऐसी त्रासदियां या घटनाएं हमारे लिए चेतावनी है कि यदि हम पश्चाताप नहीं करते, तो हम और अधिक गंभीर परिणामों का सामना करेंगे। उसी तरह, इस तरह की घटनाएं हम सभी के लिए चेतावनी हैं। ये हमे सचेत करे और याद दिलाये की हम कितने कमजोर हैं। क्या हम मृत्यु और उसके बाद आने वाले न्याय के लिए तैयार हैं? ऐसी घटनाएं हमे परमेश्वर के, जो सब पर प्रभुता करता है यहाँ तक की प्रकृति के ऊपर भी, उसके सम्मुख और अधिक नम्रता के साथ झुकने में सहायता करे।

इस तरह की घटनाएं…. हमे सचेत करे और याद दिलाये की हम कितने कमजोर हैं।

हमें यह याद रखना है कि बाइबल में न्याय के बारे में अधिकांश बातें परमेश्वर के लोगों के लिए हैं। केवल कुछ ही है जो परमेश्वर की वाचा किये हुए लोगों से अलग लोगों के लिए हैं। हम जानते हैं कि लोगों का न्याय परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोह के लिए किया जाएगा। और हमें उन्हें यह दिखाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए कि उन्हें उस न्याय से कैसे बचाया जा सकता है। लेकिन हमारे लिए यह कहना खतरनाक होगा कि कोई एक विशेष घटना परमेश्वर का न्याय या दंड है। यिर्मयाह ने भविष्यवाणी की थी कि यहूदियों को परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोह के लिए दंडित किया जाएगा। और उन्होंने इसके लिए उसे सताया। परन्तु जब उन्हें दण्ड दिया गया, तब उस ने आनन्द से यह नहीं कहा, कि मैंने तुम से पहले ही ऐसा कहा था। उसने अपने लोगों के लिए विलाप किया (यिर्म० ९ :१ )। दरअसल, न्याय होने से पहले ही, वह जानता था कि अगर उन्होंने पश्चाताप नहीं किया तो वह दुःख से भर जाएगा। उसने कहा, “और यदि तुम इसे न सुनो, तो मैं अकेले में तुम्हारे गर्व के कारण रोऊंगा, और मेरी आंखों से आंसुओं की धारा बहती रहेगी, क्योंकि यहोवा की भेड़ें बंधुआ कर ली गई हैं” (यिर्मयाह १३:१७)।

हम यिर्मयाह की तरह ही वह सब कुछ करे जो हमे करना चाहिए जिससे लोग आने वाले न्याय के दिन अपने सृष्टिकर्ता के सामने खड़े हो सके।

जब इस तरह की आपदाएँ आती हैं, तो लोग दुसरो पर दोष लगाने लगते है । वे इस तरह के सवाल पूछते हैं: क्या सरकार के सभी स्तरों के अधिकारियों को महामारी के संभावित विनाशकारी प्रभावों के बारे में पता नहीं था? सक्रिय रूप से कुछ क्यों नहीं किया गया? और वायरस से प्रभावित लोगों को संभावित जीवन रक्षक चिकित्सा सहायता प्राप्त करने में इतना समय क्यों लगा?

जब हम इस बात को समझने पाते है कि हमारा दुःख उठाना परमेश्वर के लिए है, तो इससे हमारा दुःख कम और हमारी नाराज़गी दूर हो जाती है।

ऐसे और इन्ही प्रकार के सवालो के जवाब मिलने में सालो लग सकते है , पर हम जो परमेश्वर के लोग है, परमेश्वर के आने वाले न्याय के बारे में हर जगह लोगों को चेतावनी देने के विषय में दोषी न रहे। और हम उनकी शारीरिक और आत्मिक संकट को समझने में तेज़ी दिखाए तथा तत्परता से उनकी सहायता करे उनके संकट से निकलने में।

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हर एक मसीही के लिए , ऐसी आपदाये एक बुलाहट है कि वें काम में लग जाये। और क्योंकि हम परमेश्वर के प्रेम (2 कुरिं. ५:१४ ) और उसकी आत्मा के द्वारा सशक्त किए गए हैं (प्रेरितों १:८ ), हम पीड़ित लोगों पर एक बड़ा प्रभाव डालने के लिए अद्वितीय रूप से सुसज्जित हैं। जब कोई आपदा आती है, तो मसीहियों को तुरंत काम पर लगना चाहिए। जब पहली सदी के मसीहियों को अपने समुदाय की जरूरतों के बारे में पता चला, तो वे तुरंत उन जरूरतों को पूरा करने में लग गए (प्रेरितों के काम ४:३४-३७ )। जब अन्ताकिया की युवा कलीसिया ने यरूशलेम में अकाल के बारे में सुना, तो वे तुरंत मदद के लिए कोई रास्ता तलाशने लगे (११:२८-३० )। इस प्रथा को ध्यान में रखते हुए, पूरे इतिहास में मसीही लोग राहत कार्यों में सबसे आगे रहे हैं। इसी तरह हमें भी सुरक्षित रहकर पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। एक सरल उदाहरण यह है कि बेघर और दैनिक वेतन भोगियों जिनको रोजगार नहीं मिल रहा , उनके लिए भोजन तैयार करना और बाटना। अन्य लोग अपनी मासिक किराने का सामान उन लोगों के साथ बाँट रहे हैं जो इस समय खरीद नहीं पा रहे है।

मसीही लोग पूरी इतिहास में हमेशा सबसे आगे पाए जाते हैं किसी भी राहत ऑपरेशन में।

मेरा मानना है कि जब भी हम खुद को अत्यधिक आवश्यकता की स्थिति में पाते हैं तब २ तीमुथियुस २ में मसीही सेवा के बारे में पौलुस द्वारा लिखी गयी सीख को समझाना उपयुक्त है। आइए इस इस वचन भाग को देखे और अपनी परिस्थिति पर लागू करे।

पौलुस लिखता है, “मसीह यीशु के अच्छे योद्धा के सामान मेरे साथ दुःख उठा” (व.३ ईएसवी) । वह तीमुथियुस की सेवा को कष्ट उठाने के समान बताता है। पौलुस के इस बात से हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि सुसमाचार के लिए कष्ट उठाना उसके दैनिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा था (देखें १ कुरिन्थियों १५:३०-३१; कुलुस्सियों १:२४-२९)।

या एक बुलाहट है उन मसीहियों के लिए जो इस पीड़ा के मध्य में है- एक बुलाहट अपने देश की सेवा करते हुए इस पीड़ा में।

विश्वासयोग्य मसीही विभिन्न तरीकों से दुःख उठाते है जब वे परमेश्वर और अपने राष्ट्र की सेवा करना चाहते हैं। कभी-कभी दुःख हल्का होता है। उदाहरण के लिए, एक पत्नी को अपने पति को बाहर जाने देना पड़ता है ताकि वह एक स्वास्थय कर्मी होने के नाते अपना कर्तव्य पूरा करे। यह आमतौर पर विवाह और परिवार पर एक दबाव है, और इसके परिणामस्वरूप पत्नी के लिए यह बोझ को और बड़ा सकता है। लेकिन जब हम यह समझते है कि हम यह दुःख परमेश्वर के लिए उठा रहे है, तो यह हमारे दर्द और नाराज़गी को कम करने में सहायता करेगा।
इस समय में दूसरों की सेवा करते हुए, हो सकता है कि हमें उन चीज़ों को भी त्यागना पड़े जिसे दूसरे लोग मूलभूत जरूरत समझते हो। चरम परिस्थितियों को चरम समाधानों की ज़रूरत होती है। हम सबके परिवारों से कहा जा सकता है कि यदि किसी संकट के समय हम अपने देश की सेवा करेंगे तो हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। अन्य कुछ दुःख उठाने के तरीके ऐसे है जिन्हें हम साफ़ देख पाते है- जैसे थकावट, नींद की कमी और हमारी मंषा और सेवा करने के तरीके पर आलोचना का सामना करना। ३ पद से आगे के पदों में, पौलुस ने इस बात को समझाया है कि किस प्रकार से तीमुथियुस को अपने हिस्से की पीड़ा उठानी है। उसने कहा, “कोई योद्धा अपने आप को संसार के कामों में नहीं फॅसाता”।

बेशक, पारिवारिक जीवन महत्वपूर्ण है। हमारे परिवारों का पालन-पोषण एक ऐसी चीज है जिसका हमेशा हमे ध्यान रखना है । लेकिन हमारे सामने वर्त्तमान स्थिति में आया संकट, हमे चीज़ों को अलग तरीक़े से करने पर मज़बूर कर सकता है।
पौलुस के अनुसार दुःख उठाने का एक और पहलू है, एक किसान की तरह कड़ी मेहनत करना(२ तीमु. २:६ )। एक जगह उसने लिखा है, “मैं उसके उसकी शक्ति के अनुसार जो मुझ में सामर्थ के साथ प्रभाव डालती है तन मन लगाकर परिश्रम भी करता हूं(कुलुस्सियों १:२९)। यह समझते हुए की हमारी एक गंभीर बुलाहट है जिसमें हमें इस मृत्यु की ओर जाते संसार का मसीह के साथ मेल कराना है, हमें इस संसार में रहते हुए हमेशा कड़ी मेहनत के साथ परमेश्वर की सेवा करनी होगी ।एक दिन हम अपने सारे परिश्रम से विश्राम पाएंगे जब हम स्वर्ग पहुँचेंगे (प्रकाशितवाक्य १४:१३)। पर अभी कड़ी मेहनत करने का समय है। भारत में त्यागे हुए बच्चों के लिए एक महान मिशनरी एमी कारमाइकल ने कहा, “हमारे पास अपनी जीत का उत्सव या जश्न मनाने के लिए अनंतकाल है, पर सूर्यास्त से पहले जीत को हासिल करने के लिए कुछ ही समय है।” हमारे लिए यह समय है कि हम उन लोगों के लिए कष्ट उठाए जो अत्यंत आवश्यकता में है, कड़ी मेहनत करे और ऐसी कुछ चीज़ों को जिनकी हमे आदत है उन्हें छोड़कर दूसरों को देकर उनकी मदद करे। अगर हम मदद ना करे तो यह एक बहुत गंभीर भूल होगी। भविष्यद्वक्ता आमोस ने उन लोगों पर हाय जताई जो आराम से रह रहे थे और मज़े कर रहे थे जब उनका राष्ट्र संकट में था (आमोस ६ :१ -६ )।

“हमारे पास अपनी जीत का उत्सव या जश्न मनाने के लिए अनंतकाल है, पर सूर्यास्त से पहले जीत को हासिल करने के लिए कुछ ही समय है।”
– Amy Carmichael

क्योंकि दाऊद घर पर रहा जबकि उस समय सभी राजा युद्ध के लिए बाहर गए थे, वह पाप में गिर गया।(२ शमू. ११ :१)

२ तीमुथियुस २ के पद ८ -१३ में, पौलुस ने तीमुथियुस को उन आशीषों के बारे में बताया जो परमेश्वर की सेवा में दुख उठाने पर प्राप्त होंगी। पद ११ और १२ को देखें: “यदि हम उसके साथ मर गए, तो उसके साथ जीवित भी रहेंगे। यदि हम धीरज धरते हैं, तो उसके साथ राज्य भी करेंगे।” लेकिन एक चेतावनी भी है:

यह समय है कि हम उन लोगों के लिए कष्ट उठाए जो अत्यंत आवश्यकता में है, कड़ी मेहनत करे और ऐसी कुछ चीज़ों को जिनकी हमे आदत है उन्हें छोड़कर ऐसो को दे जिनके पास नहीं है ताकि उनकी मदद हो सके।

“यदि हम उसका इन्कार करेंगे, तो वह भी हमारा इन्कार करेगा। यदि हम अविश्वासी भी होंगे, तो भी वह विश्वासयोग्य रहता है; क्योंकि वह आप अपने इन्कार नहीं कर सकता” (२तीमु० २:१२-१३)।
यह पद हमें याद दिलाते हैं कि आने वाला न्याय एक भयानक वास्तविकता है। सेवा के लिए ईनाम है लेकिन आज्ञा न मानने के लिए सजा है। यह सच्चाई जीवन के प्रति मसीही दृष्टिकोण का वह हिस्सा है जो हमारे हर कार्य को प्रभावित करता है। एक दिन हम देखेंगे कि हमारे द्वारा किए गए सभी व्यक्तिगत बलिदान मूल्यवान थे। इसलिए जब हमारे द्वारा किये गए काम का श्रेय दूसरों को मिले, तो हमें परेशान नहीं होना चाहिए।

यही कारण है कि हमें उन चीजों को करने के लिए तैयार रहना चाहिए जिनका हमें पृथ्वी पर कोई प्रतिफल नहीं मिलता है।

आपदाएं मसीही प्रेम दिखाने के अवसर हैं।

हमारे लिए कोई काम छोटा नहीं है, क्योंकि परमेश्वर से हमें उसके सेवक बनने की शक्ति मिलेगी। आपदाएं मसीही प्रेम दिखाने के अवसर हैं।

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एक मसीही जो सबसे शक्तिशाली कार्य कर सकता है वह है प्रार्थना।

पौलुस के अनुसार, प्रभावी मध्यस्थता प्रार्थना कठिन परिश्रम है (कुलु० ४:१२-१३ )। पुराने नियम के समय में जब राष्ट्र पर संकट आता था, ईश्वरीय अगुवे समस्त राष्ट्र को प्रार्थना और ज्यादातर उपवास सहित प्रार्थना करने को कहते थे। उपवास राष्ट्रीय आपदाओं के समय किया गया (२ शमू.१:१२)। जब एक महान परदेशी आक्रमणकारियों की भीड़ राजा यहोशापात के विरुद्ध आई, वह डर गया। परन्तु उसकी तत्काल प्रतिक्रिया थी “प्रभु की खोज में लग जाना, और सारे यहूदा में उपवास रखवाना” (२ इतहास २०:३ )। हम उम्मीद करते है कि ऐसे समय पर वह अपनी सेना को इकट्ठा करके युद्ध के लिए तैयार करेगा। पर इसके बजाय उसने उपवास की घोषणा की और प्रार्थना करने के लिए राष्ट्र को इकट्ठा किया। नतीजा यह हुआ कि परमेश्वर खुद बीच में आए और उसे एक अद्भुत जीत दिलाई।

हम कितने भी व्यस्त क्यों न हों, व्यक्तिगत और सामूहिक प्रार्थना हमारे राहत कार्यों का एक महत्वपूर्ण पहलू होना चाहिए।

हम कितने भी व्यस्त क्यों न हों, व्यक्तिगत और सामूहिक प्रार्थना हमारे राहत कार्यों का एक महत्वपूर्ण पहलू होना चाहिए। और प्रार्थना की सुंदरता यह है कि इसे हर मसीही कर सकता है -जवान और बूढ़े, शारीरिक रूप से स्वस्थ और जो अपने बिछौने पर सीमित है।

जब राष्ट्रीय या स्थानीय संकट होते हैं, मसीही अगुवों को अपने लोगों को प्रार्थना और उपवास के विशेष समय के लिए बुलाना चाहिए। यहाँ कुछ बातें हैं जिनके लिए हमें प्रार्थना करनी चाहिए:

  • परमेश्वर का अनुग्रह उन पर हो जो अपने प्रियजनों को खोकर दुःख उठा रहे है;
  • जिन लोगों ने अपना रोजगार खो दिया है, परमेश्वर उनके लिए रोजगार का प्रयोजन करे।
  • कि जो लोग गहरे सदमे में हैं उनके बीच सेवा हो सके, और जो लोग अस्पतालों या होम क्वारंटाइन में हैं, उन्हें चंगाई मिले।
  • कि जो लोग संक्रमित हैं उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिले और सभी को दवा, ऑक्सीजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध हो सके ।
  • कि मसीही लोग आगे बढ़ कर बलिदान के साथ सेवा करने में और उदारता के साथ देने में शामिल हो;
  • कि कलीसिया हमारे कार्यों और मसीह के लिए हमारी गवाही के द्वारा परमेश्वर की महिमा करने के लिए पुनर्जीवित हो;
  • कि परमेश्वर हम में से प्रत्येक का मार्गदर्शन करे कि हम कैसे पूरी चंगाई की प्रक्रिया में अपने आप को शामिल कर पाए;

एक मसीही जो सबसे शक्तिशाली कार्य कर सकता है वह है प्रार्थना।

  • डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मचारियों, डिलीवरी कर्मियों, कोरोनर्स और अन्य लोगों के लिए जो सबसे नज़दीकी से इस घातक वायरस का सामना करते है, उनकी सुरक्षा के लिए।
  • कि भ्रष्टाचार, बर्बादी, योजना की कमी, और कुछ भी जो चिकित्सा के काम में बाधा उत्पन्न कर सकता है उसे दूर किया जाये ;
  • हमारे राजनीतिक नेताओं के लिए की परमेश्वर उन्हें अच्छी बुद्धि और ज्ञान दे स्वास्थ्य नीतियां बनाने में ;
  • कि चिकित्सा संसाधन उपलब्ध कराने जैसे विशाल कार्य के लिए पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति और धन हो।
  • कि इस त्रासदी के माध्यम से, संसार मसीह के प्रेम को देख पाए
  • उनके अनुयायियों के द्वारा जरूरतमंद लोगों के लिए;
  • कि परमेश्वर की महिमा संसार में इस तरह चमके जैसे पहले कभी न चमकी हो , जिसके परिणामस्वरूप लोग परमेश्वर को खोजे और उद्धार पाए ।

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जब अगबुस ने अन्ताकिया की कलीसिया के सामने भविष्यवाणी की कि यरूशलेम में अकाल आने वाला है, तो इस युवा कलीसिया ने तुरंत अपनी अपनी पूंजी अनुसार कुछ भेट यरूशलेम में भेजी (प्रेरितों के काम ११:२७-३० )। बाद में, पौलुस ने यरूशलेम की कलीसिया की सहायता के लिए इस्राएल के बाहर की अन्य कई कलीसियाओं द्वारा कुछ धन इकट्ठा किया (2 कुरिं० ८-९ )। जरूरतमंदों को देना मसीहत का एक महत्वपूर्ण पहलू है (व्यवस्ताविवरण १५:७-११; मत्ती ५:४२; १९:२१; लूका १२:३३; गला० २:१०; १ तीमु० ६:१८; इब्र. १३ :१६ )।

विपत्ति के समय में, परमेश्वर के लोगों को अपनी संपत्ति में से देना चाहिए ताकि पीड़ित लोगों की सहायता की जा सके।

विपत्ति के समय में, परमेश्वर के लोगों को अपनी संपत्ति में से देना चाहिए ताकि पीड़ित लोगों की सहायता की जा सके। पौलुस कहता है कि हमारे आत्मिक परिवार के सदस्यों के प्रति “विश्वास के घराने” के प्रति हमारी विशेष जिम्मेदारी है (गला० ६:१० )। तो हमारी पहली जिम्मेदारी मसीह में हमारे भाइयों और बहनों के प्रति है। लेकिन हमारा देना इससे आगे बढ़कर अन्य दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए भी होना चाहिए। हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करना है, एक ऐसी आज्ञा जो नए नियम में सात बार प्रकट होती है (मत्ती १९:१९; २२:३९; मरकुस १२:३१; लूका १०:२७; रोम १३:९; गलतियों ५:१४; याकूब २:८)।

चूंकि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओ से बड़ी मात्रा में धन और आपूर्ति आ रही होती है, हम यह निष्कर्ष निकालने में गलती कर सकते हैं कि हमें स्वयं देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे द्वारा की जाने वाली सहायता तुलना में कम होगी । लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि भेट की शक्ति दी गई राशि पर निर्भर नहीं करती। यीशु की कहानी उस विधवा ने जो दान दिया उससे यही सिखाती है। हालाँकि विधवा ने मंदिर की भेंट के लिए केवल थोड़ी सी राशि दी, पर यीशु ने कहा, मैं तुमसे सच कहता हूं कि मंदिर के भंडार में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है (मरकुस १२:४३)।

हमें यह याद रखना चाहिए कि भेट की शक्ति दी गई राशि पर निर्भर नहीं करती।

मसीही अगुवों को अपनी कलीसियाओं को देने के लिए प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है, उन्हें सिखाते हुए कि उनके द्वारा दी गयी छोटी सी भेट भी बहुत सामर्थी हो सकती है जब परमेश्वर उनके द्वारा काम करेगा। हमें इस बारे में विशेष निर्देश देने की जरूरत है कि लोग कैसे, कहां और कब दे सकते हैं।

कुरिन्थियों को पौलुस की दूसरी पत्री में, उसने उनसे यरूशलेम की सहायता के लिए योगदान के विषय में एक सही ढंग से आग्रह किया। (2 कुरिं८-९ )। उसने इस बारे में कुछ स्पष्ट योजनाएँ भी प्रस्तुत कीं कि कैसे दान करना है और किस प्रकार से एकत्रित किये धन का संचालन होगा (1 कुरिं. १६:१-४ )।

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पहला कुरिन्थियों १६:१-४ दिखाता है कि दान लेना और देना बेतरतीब नहीं होना चाहिए। यह सिद्धांत संसाधनों के वितरण पर भी लागू होता है। नीतिवचन कहता है कि युक्ति के साथ युद्ध लड़ना चाहिए ताकि सबसे बुद्धिमान रणनीति अपनाई जा सके (नीतिवचन २०:१८, २४:६ )। यह लोगों की जरूरतों पर “युद्ध” पर लागू होता है। योजना की कमी के कारण बहुत समय, ऊर्जा और संसाधन बर्बाद हो सकते हैं। बहुत से ज़रूरतमंद लोग उस सहायता से चूक सकते हैं जो उन्हें मिलनी चाहिए और कुछ को ज़रूरत से ज़्यादा मिल सकती है—सब कुछ खराब योजना के कारण।

योजना की विशेष रूप से आवश्यकता तब पड़ती है जब हम आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने से पुनर्निर्माण प्रक्रिया शुरू करने की ओर बढ़ते हैं। छोटे समूहों के लिए दूसरों के साथ साझेदारी करना बुद्धिमानी है। जब हम

अन्य कलीसियाओं और समूहों के साथ जुड़ते हैं, तो हमारे पास हमारी उस एकता को प्रदर्शित करने का एक अद्भुत अवसर होता है जो मसीह में है ।

कलीसियाएँ अक्सर इच्छुक और सक्षम लोगों से आशीषित होती है। यह एक महत्वपूर्ण संसाधन बन सकता है उन विशेषज्ञ समूह के लिए जिनके पास धन ,राहत के लिए विशेषज्ञता और पुनर्वास तो है पर पर्याप्त लोग नहीं है। यह उन स्थितियों में से एक है जिसमें सभोपदेशक ४:९ का सिद्धांत लागू होता है: “एक से दो अच्छे हैं, क्योंकि उनके परिश्रम का अच्छा प्रतिफल उन्हें मिलता है।” हम में से अधिकांश अपने दम पर सबसे प्रभावी काम करने के लिए सुसज्जित या ज्ञानवान नहीं हैं। इसलिए हमारे लिए दूसरों के साथ साझेदारी करना बुद्धिमानी है।

यह हमारे लिए उन अन्य समूहों की मदद करने के द्वारा जरूरतमंद लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता या विश्वास दिखाने का भी समय हो सकता है जो कलीसिया से जुड़े नहीं हैं। हम दो संसार के नागरिक हैं। इसलिए जो कुछ हम दोनों संसार में करते हैं, हम परमेश्वर और उसकी महिमा के लिए करते हैं (1 कुरि० १०:३१ )। जो दुनियावी नौकरी हम करते हैं, वह हमें मुख्य रूप से परमेश्वर के लिए करनी है। हम अपनी नौकरी को महत्वपूर्ण मान सकते हैं क्योंकि यह उस समुदाय की सेवा करने के लिए है जहां परमेश्वर ने हमें अपने गवाह के रूप में रखा है। यही सिद्धांत तब भी लागू होता है जब हम समुदाय की सेवा विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से करते है जो हमारे अड़ोस-पड़ोस या सरकार द्वारा आयोजित होती है। हमें अपने पड़ोसियों के साथ उनकी परियोजनाओं में शामिल होने के अवसरों की तलाश करनी चाहिए ताकि हम मसीह को प्रकट कर सके।

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२ तीमुथियुस २ में, जहाँ पौलुस ने तीमुथियुस को कष्ट सहने और कड़ी मेहनत करने का आग्रह किया, उसने उसे एक खिलाड़ी की तरह बनने का भी आग्रह किया जो “नियमों के अनुसार प्रतिस्पर्धा करता है” (व.५ )। जब आप बहुत तेज़ी से भाग रहे होते हैं, तो ठोकर खाना और गिरना आसान होता है। अफसोस की बात है कि इस अवधि के दौरान बहुत से लोग कुछ बुनियादी नियमों को तोड़ते हैं जिन्हें कभी नहीं तोड़ा जाना चाहिए। इसलिए, सेवा करते समय, हमें मसीहत और मसीही सेवा के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करना सुनिश्चित करना चाहिए।

उदाहरण के लिए, एक विपत्ति के बाद हम खुद को भारी स्थिति में पा सकते हैं, हम परमेश्वर के साथ अकेले रहने या अपने जीवनसाथी और बच्चों के साथ रहने के लिए समय निकालना भूल सकते हैं। लेकिन इस तरह की चूक को ज्यादा देर तक नहीं चलने देना चाहिए। यदि हम परमेश्वर के साथ अपने समय की उपेक्षा करते हैं, तो हम अपना आत्मिक स्वास्थ्य ख़राब कर देंगे। यदि हम अपने पति या पत्नी और परिवार के सदस्यों के साथ अपने समय की उपेक्षा करते हैं, तो हमारा परिवार अस्वस्थ हो जाएगा। यदि हम कम नींद लेते है और बिना आराम के काम करते रहते हैं, तो हमारे शरीर और हमारी भावनाएं गंभीर रूप से प्रभावित होंगी, जिससे हम अपने व्यवहार में कमजोर और अनिश्चित हो जाएंगे।

यदि हम परमेश्वर के साथ अपने समय की उपेक्षा करते हैं, तो हम अपना आत्मिक स्वास्थ्य ख़राब कर देंगे।

किसी आपात स्थिति के तुरंत बाद, हमें ज्यादा आराम किए बिना खुद को एक सीमा तक धकेलना पड़ सकता है। लेकिन जल्द ही हमें व्यस्त गतिविधि के बीच अपनी दिनचर्या में आराम और भक्ति के लिए समय निकालने की आवश्यकता होगी। इसमें सब्त के विश्राम के सिद्धांत के अनुसार सप्ताह में एक दिन विश्राम करना शामिल हो सकता है। यह उन सब लोगों के लिए लागू होता है जो कष्टों को कम करने के काम में लगे है। उदाहरण के लिए, जो लोग बीमार प्रियजनों की पूरे समय देखभाल करते हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे आराम करने और प्रभु के साथ समय बिताने का समय निकाले। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो वे चिड़चिड़े हो सकते हैं और देखभाल करने वालों के रूप में अपनी प्रभावशीलता भी खो सकते हैं।

बिना रुके काम करते रहना जहाँ आराम और आत्मिक पोषण न मिले, इसका परिणाम आनंदित न रहना, चिड़चिड़ापन और यहाँ तक की डिप्रेशन भी हो सकता है। अपनी पुस्तक द न्यू टेस्टामेंट इमेज ऑफ़ द मिनिस्ट्री (ग्रैंड रैपिड्स: बेकर, १९७४, पृष्ठ १३३) में, डब्ल्यू. टी. पर्किसर ने एक व्यक्ति का उद्धरण दिया जो की एक सलाहकारी था, जिसने कहा कि उसने कभी भी डिप्रेशन के एक मामले को नहीं देखा है जो थकान से शुरू न हुआ हो।

बिना रुके काम करते रहना जहाँ आराम और आत्मिक पोषण न मिले, इसका परिणाम आनंदित न रहना, चिड़चिड़ापन और यहाँ तक की डिप्रेशन भी हो सकता है।

क्योंकि आनंद एक आत्मा से भरे मसीही के सबसे बुनियादी गुणों में से एक है (गला. ५:२२ ), जब लोग अपना आनंद खो देते हैं तो वे एक मसीही की तरह व्यवहार करना बंद कर देते हैं। यह आनंद ही हमें शक्ति देता है (नहे. ८:१० )। चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न हों, यह उत्साहपूर्वक परमेश्वर की सेवा करते रहने में हमारी मदद करता है।

कभी-कभी जो हुआ है उसके दुख के कारण हम रो रहे होते है, लेकिन हमारे भीतर कही प्रभु का आनंद हमारे जीवन में होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस दुख के बीच, हम उसके साथ संगति का आनंद ले रहे हैं जो हमसे प्रेम करता है और जिससे हम बहुत प्रेम करते है।

राहत कार्य के इतिहास के दुखद सच्चाईयो में से एक यह है कि इसके कई कार्यकर्ता गंभीर पाप में पड़ गए हैं और अपने परिवारों और प्रियजनों के साथ अपने संबंधों को खराब कर दिया। और कई सेवा करने वाले ख़राब हो गए और फिर कभी ऐसे काम करने का उन्होंने प्रयास नहीं किया।

यह वैसा ही है जैसा हम उन परिवारों में देखते हैं जहाँ एक बच्चा गंभीर रूप से बीमार हो जाता है। लंबे समय तक संकट झेलने के बाद पति-पत्नी अक्सर तलाक ले लेते है । वे बच्चे की देखभाल के कठिन काम में इस कदर उलझे होते है कि उन्होंने अपने वैवाहिक संबंधों को पोषित करने के लिए समय ही नहीं निकाला होता। वे अपने बच्चे की बीमारी के दौरान एक साथ कड़ी मेहनत करने में लगे होते है, लेकिन बच्चे की मृत्यु हो जाने के बाद उन्हें यह एहसास होता है की वह तो एक दूसरे से अलग हो गए है।

आपातकालीन स्थितियों में, ध्यान रखे कि “अपने आप पर कड़ी नजर रखनी है “(1 तीमु. ४:१६ ईएसवी)। जब हम थक जाते हैं तो हम लापरवाह हो जाते हैं। ऐसे समय में हम आसानी से चकमे में आ सकते हैं। इसलिए जब हम थक जाते हैं तो हमें अपने निजी जीवन के बारे में विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। हमें अपने व्यवसायी जीवन के व्यवहार के बारे में भी सावधान रहने की जरूरत है। पौलुस चेतावनी देता है कि यदि हम ऐसे तरीके से काम करते हैं जो परमेश्वर को अप्रसन्न करते हैं, तो हमारा काम परमेश्वर के द्वारा बेकार समझा जाएगा और अंतिम न्याय के समय जला दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा (1 कुरि० ३:१२-१५ )।

पौलुस चेतावनी देता है कि यदि हम ऐसे तरीके से काम करते हैं जो परमेश्वर को अप्रसन्न करते हैं, तो हमारा काम परमेश्वर के द्वारा बेकार समझा जाएगा और अंतिम न्याय के समय जला दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा।

यहां कुछ व्यवसायी से सम्भंदित कमियाँ दी गई हैं जिनसे हमें सावधान रहने की आवश्यकता है:

  • हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं उसके बारे में बढ़ा-चढ़ा कर न कहे या अपनी रिपोर्टिंग का उपयोग खुद की महिमा करने के लिए न करें। हम जो करते हैं उससे सिर्फ परमेश्वर की महिमा हो (भजन ११५:१; यशा० ४८:११)। हमें उन कार्यों में भटकने की संभावना के प्रति लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता है जिनका उद्देश्य मुख्य रूप से खुद को और अपने संगठनों को बढ़ा बनाना या महिमा देनी है।
  • हमें प्राप्त होने वाले धन का उपयोग करने के तरीके के बारे में भी सावधान रहना चाहिए। यद्यपि बहुत से अत्यावश्यक काम होते है करने के लिए, पर हमें हिसाब देने के सिद्धांत को नहीं तोडना चाहिए। दुख की बात है कि राहत कार्यों के दौरान कई धोखाधड़ी की जाती है। और इनमें से कुछ कुछ की शुरआत प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण होती है वह भी नेकनीयत व्यक्तियों द्वारा।
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    पौलुस ने परमेश्वर को “सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर के रूप में वर्णित किया, जो हमें हमारे सारे क्लेश में शांति देता है, कि हम उन लोगों को शान्ति दे सकें जो किसी भी परेशानी में हैं, उस शांति के द्वारा जो खुद हमें परमेश्वर से मिली है ” (2 कुरिं १:३-४ )। कई लोग जो सदमे में है, दुखी है और आव्यशकता में है कि कोई उसकी सुने, जिन्होंने परमेश्वर के शांति को पाया है वह ऐसे लोगों के लिए बहुत कुछ कर सकते है और उनकी चंगाई का कारण बन सकते है।

    मुझे लगता है कि समाज ने आपदाओं से भावनात्मक और मानसिक रूप से प्रभावित लोगों की सेवा करने के महत्व को सीखा है। अब पेशेवर सलाहकार उन जगहों पर भागे जाते है जहां आपदाएं आयी हो। जबकि इसकी आवश्यकता है, विशेषज्ञ यह भी महसूस करते हैं कि आम लोगों की मित्रता का बहुत मोल है जिनसे प्रभावित लोग परिचित है। ये वे लोग हैं जो एक लम्बे समय तक अधिक वास्तविक या सहज रूप से दूसरों की सेवा कर सकते है।

    कई लोग जो सदमे में है, दुखी है और आव्यशकता में है कि कोई उसकी सुने, जिन्होंने परमेश्वर के शांति को पाया है वह ऐसे लोगों के लिए बहुत कुछ कर सकते है और उनकी चंगाई का कारण बन सकते है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि प्रभावित लोगों को, जितना संभव हो सके, वापस लौटना है, जिसे वे त्रासदी से पहले एक सामान्य जीवन मानते थे। एक सबसे महत्वपूर्ण नौकरी या काम जो विशेषज्ञ कर सकता है वह है लोगों को उनके परिवारों, दोस्तों, सहकर्मियों और पड़ोसियों के साथ उनके “सामान्य” संबंधों में वापस लाना। यह वें संबंध है जिनमें उन्हें शक्ति मिलेगी। पीड़ित लोगों की मदद करने में हमारी भूमिका बस उनके साथ रहने और उनकी बात सुनने की हो सकती है। लेकिन उन्हें सामान्य जीवन में वापस लाने की अत्यावश्यकता के कारण अक्सर उनसे बात करना भी ज़रूरी होता है। केवल सुनना ही काफी नहीं होगा।

    Our role in helping traumatized people may simple be one of being with them and listening to them.

    विशेषज्ञों ने पाया है कि कुछ चीजें जो सामान्य सलहा देने की स्थिति में काफी आम हैं, उन लोगों के साथ नहीं की जानी चाहिए जो गंभीर आघात से गुजरे हो । उदाहरण के लिए, परामर्श में यह सामान्य तरीका है कि आहत लोगों को उनके दर्द और इसके कारण के बारे में बात करने के लिए कहा जाता है। लेकिन गंभीर आघात सलहकारी के समय, यह तभी किया जाना चाहिए जब व्यक्ति तैयार हो, जिसमें बहुत समय लग सकता है। समय से पहले आघात के बारे में बात करना भावनाओं को जगा देगा जिन्हें संभालना मुश्किल हो सकता है।

    त्रासदी के समय, कुछ प्रतिक्रियाएँ जैसे -अत्यंत भय , डिप्रेशन, पीछे हटना और चुप रहना, गुस्सा, नींद न आना, सदमा, बुरे सपने और रोना सामन्य प्रतिक्रियाएँ है किसी भी मनुष्य की। ज्यादातर मामलों में, ये लक्षण समय के साथ गुजर जाते है। इसलिए हमें उनके व्यवहार के बारे में जल्दी से कोई निर्णय लेने के लिए समझने और खुद को रोकने का प्रयास करना चाहिए। इस तरह से सेवकाई करना मसीह के आदर्श पर आधारित है, जिसने स्वर्ग छोड़ दिया, हमारे पास आया, और हमारे जीवन को हमसे बेहतर तरीके से समझा।

    श्रीलंका में २००४ की सुनामी के बाद, मेरे मित्र डॉ. अरुल अंकटेल, जो अब एक चिकित्सा चिकित्सक हैं और चिकित्सा क्षेत्र में अन्य लोगों के साथ पुरे समय की सेवा कर रहे हैं, एक शरणार्थी शिविर में उनका एक बूढ़े व्यक्ति से सामना हुआ। उनको दिल के दौरे के गंभीर लक्षण थे। अरुल ने एक और डॉक्टर को बुलाया और जांच करने पर उन्हें पता चला कि वह किसी भी रीती से दिल के दौरे से नहीं गुज़र रहे।

    त्रासदी के समय, कुछ प्रतिक्रियाएँ जैसे -अत्यंत भय , डिप्रेशन, पीछे हटना और चुप रहना, गुस्सा, नींद न आना, सदमा, बुरे सपने और रोना सामन्य प्रतिक्रियाएँ है किसी भी मनुष्य की।

    इस व्यक्ति ने सूनामी में अपने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया था। उन्होंने उसके साथ बात की और प्रार्थना की और जल्द ही पाया कि वह न केवल अपने लक्षणों से मुक्त हो गए, बल्कि उस परमेश्वर के बारे में जानना चाहते थे, जिससे डॉक्टरों ने प्रार्थना करी थी। मैं उन बच्चों के बारे में जानता हूं जो सुनामी के बाद से पानी को छूने से डरते हैं। मैं एक स्कूल गया जहाँ एक शिक्षक ने मुझसे कहा कि वे जल्द ही फिर से स्कूल को खोलना चाहेंगे। लेकिन माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते थे क्योंकि यह समुद्र के काफी करीब है, और क्योंकि वे उनसे अलग नहीं होना चाहते हैं- यहां तक कि थोड़े समय के लिए भी वे स्कूल में होंगे। ऐसी स्थितियों के लिए बहुत समझ और कौशल की आवश्यकता होती है।

    यहां तक कि राहत कर्मियों को भी आराम की जरूरत पड़ जाती है। जो उन्होंने अनुभव किया होता है वो भावनात्मक रूप से थकाने वाला होता है। जब मैं पहली बार सुनामी से गंभीर रूप से प्रभावित स्थानों में से एक में गया था, तो मैं रोना चाहता था क्योंकि इसका मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा था। ऐसे ही स्थान पर मेरा एक सहकर्मी गया और उसने अपने सामने शवों और अविश्वसनीय तबाही को देखा। उसे अपनी वैन में जाने में ज्यादा समय नहीं लगा ताकि वह अकेले में रो सके।

    अविश्वसनीय तभाई को देखना हमारे विचारों और भावनाओं में काफी गहरा प्रभाव डालता है। यह एक बुला हट है जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता के देखभाल करने वालों की। इनको हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।

    तबाही के संपर्क में आने से हमारे मन और भावनाओं पर गहरा असर पड़ सकता है। यह देखभाल करने वालों की जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता का आह्वान करता है। उन्हें यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वह दूसरों के साथ अपने दर्द को साझा करें और मसीही लोगों द्वारा और परमेश्वर द्वारा शांति पा सके।

    मुझे लगता है जो मसीही चोट खाए लोगों की सेवा करते है उनके लिए यह सबसे बड़ा सच्च है कि जब परमेश्वर मनुष्य रूप में था, उसने भी इसी प्रकार के कई कष्टों का सामना किया था जैसा त्रासदी से पीड़ित लोग करते है। जब यीशु बालक थे, वह एक हिंसक मौत से बाल-बाल बचे, और उनके परिवार को अपनी मातृभूमि छोड़कर भागना पड़ा और एक परदेशी जगह पर शरणार्थी बनना पड़ा। वह उन लोगों द्वारा अस्वीकार किये गए जिनकी वह मदद करने आये थे । उसके सांसारिक पिता की मृत्यु शायद तब हुई जब वह छोटे ही थे , और क्योंकि उसके कम से कम चार छोटे भाई और बहनें(जिनकी गिनती हम नहीं जानते) थी, जिनका पालन-पोषण करना था (मरकुस ६:३ ), उसने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की। यही कारण था कि धार्मिक अधिकारियों ने यीशु को अशिक्षित माना (यूहन्ना ७:१५ )। यह ऐसी कठिनाईयाँ है जिसका सामना आज कई बच्चों को करना पड़ता है जब उनके परिवार के साथ कोई त्रासदी होती है।

    यीशु जानता था कि दोष लगाने, अन्‍याय या गलत रीती से दोषी ठहराए जाने और एक अपराधी बनाकर मानवजाति द्वारा आविष्कार किया गया सबसे क्रूल दंड हो मिलने का क्या दर्द होता है। जब मैं १० साल से कम की आयु का था, एक बहुत ही संकोच जनक बात मेरे साथ हुई। मेरी बेसबर स्थिति में, जो सबसे पहले शब्द मेरे दिमाग में आए वह यह थे, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ा ?” कई समय बाद मुझे लगा कि मैं इन शब्दों को जानता था क्योंकि ये देहधारी परमेश्वर, स्वयं यीशु द्वारा बोले गए थे (मत्ती २७:४६)। वह उस दर्द से गुजरा जिससे हम गुजरते हैं। वास्तव में वह एक ऐसा परमेश्वर है जिसके साथ ये कष्टों को उठा रही मानवता अपनी पहचान कर सकती है।

    लोगों की सबसे बड़ी आवश्यकता है “सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर” के साथ एक व्यक्तिगत रिश्ता (2 कुरि० १:३ )। राहत प्रयासों की अपनी व्यस्तता में, हम यह कभी न भूले कि लोगों को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है । हालाँकि, हमें यह याद रखना है कि परमेश्वर कभी भी लोगों को अपने संदेश को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करता। वह लोगों के साथ अपने उद्धार के मार्ग के बारे में तर्क करता है (यशा. १:१८ )। इसलिए हमें यह सुनिश्चित करने के लिए सावधान रहना चाहिए कि लोग मसीह को केवल इसलिए स्वीकार न करें क्योंकि उन्हें मसीहियों द्वारा सहायता मिली। वें उसे स्वीकार करे क्योंकि वें अपने मन और दिमाग से इस बात पर विश्वास करते है कि यीशु के द्वारा परमेश्वर ने उनकी सबसे गहरी ज़रूरतों का जवाब उन्हें दिया है।

    आपदा का समय हमें ऐसे अद्भुत अवसर देता है की हम मसीहत का आचरण कर सके। जब कोई आपदा आती है, तो मसीहियों को यह पूछने की ज़रूरत है कि, “इस समय मुझे क्या सोचना चाहिए? और किस तरह मैं इस संकट का एक मसीही तरीके से प्रतिउत्तर दूँ ?”