लूका 2:42-52
42 जब यीशु बारह वर्ष का हुआ, तो वे पर्व की रीति के अनुसार यरूशलेम को गए l 43 जब वे उन दिनों को पूरा करके लौटने लगे, तो बालक यीशु यरूशलेम में रह गया; और यह उसके माता-पिता नहीं जानते थे l 44 वे यह समझकर कि वह अन्य यात्रियों के साथ होगा, एक दिन का पड़ाव निकल गए : और उसे अपने कुटुम्बियों और जान-पहचान वालों में ढूँढ़ने लगे l 45 पर जब नहीं मिला, तो ढूँढ़ते-ढूँढ़ते यरूशलेम को फिर लौट गए, 46 और तीन दिन के बाद उन्होंने उसे मंदिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया l 47 जितने उसकी सुन रहे थे, वे सब उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित थे l 48 तब वे उसे देखकर चकित हुए और उसकी माता ने उससे कहा, “हे पुत्र, तू ने हम से क्यों ऐसा व्यवहार किया? देख, तेरा पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूँढ़ते थे?”
49 उसने उनसे कहा, “तुम मुझे क्यों ढूँढ़ते थे? क्या नहीं जानते थे कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?” 50 परन्तु जो बात उसने उनसे कही, उन्होंने उसे नहीं समझा l
51 तब वह उनके साथ गया, और नासरत में आया, और उनके वश में रहा; और उसकी माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं l 52 और यीशु बुद्धि और डील-डौल में, और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया l
परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करों” मरकुस 1:15
बाइबल में लगभग हर बार जब कोई स्वर्गदूत प्रकट होता है, तो उसके पहले शब्द होते हैं, “डरो मत!” इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। जब कोई अलौकिक शक्ति पृथ्वी ग्रह से संपर्क करती है, तो आमतौर पर देखनेवाले मनुष्य भय से मुँह के बल गिर पड़ते हैं। लेकिन लूका परमेश्वर के ऐसे रूप में प्रकट होने के बारे में बताता है जो भयभीत नहीं करता। यीशु में, जो पशुओं के मध्य जन्म लिया और चरनी में रखा गया, परमेश्वर एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाता है जिससे हमें डरने की ज़रूरत नहीं है। एक नवजात बालक से कम डरावना क्या हो सकता है?
पृथ्वी पर यीशु परमेश्वर और मनुष्य दोनों है। परमेश्वर के रूप में, वे आश्चर्यकर्म कर सकता है, पापों को क्षमा कर सकता है, मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है और भविष्यवाणी कर सकता है। लेकिन यहूदियों के लिए, जो परमेश्वर की छवियों को एक चमकीले बादल या अग्नि स्तंभ के रूप में देखने के आदी हैं, यीशु बहुत भ्रम भी पैदा करता है। बैतलहम का एक बालक, एक बढ़ई का बेटा, नासरत का एक व्यक्ति, परमेश्वर का मसीह(Messiah) कैसे हो सकता है?
परमेश्वर ने क्यों मनुष्य रूप धारण किया? बारह वर्षीय यीशु का मंदिर में रब्बियों से बहस करने का दृश्य एक संकेत देता है। लूका हमें बताता है, “जितने उसकी सुन रहे थे, वे सब उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित थे” (लूका 2:47)। पहली बार, साधारण लोग प्रत्यक्ष रूप में परमेश्वर से बातचीत कर सकते थे।
यीशु किसी से भी बात कर सकता है——अपने माता-पिता से, किसी रब्बी से, किसी गरीब विधवा से——बिना यह कहे कि “डरो मत!” यीशु में, परमेश्वर निकट आता है। फिलिप येन्सी
आपको यह मानने से क्या रोकता है कि परमेश्वर ने स्वयं को आपके लिए सुलभ और सुगम बनाया है? आज विश्वास के साथ उसके सामने आना आपके लिए कैसा लगेगा?
हे स्वर्गीय पिता, हम क्रिसमस पर रुककर याद करते हैं कि कैसे आपका पुत्र एक असहाय बालक के रूप में हमारे पास आया . . . और हम विस्मय और आश्चर्य में आराधना करते हैं कि परमेश्वर हमारे निकट आया।