यूहन्ना 17:14-26
14 मैं ने तेरा वचन उन्हें पहुँचा दिया है है; और संसार ने उनसे बैर किया, क्योंकि जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं l मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख l 15 मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें जगत से उठा ले; परन्तु यह कि तू उन्हें दुष्ट से बचाए रख l 16 जैसे मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं l 17 सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है l 18 जैसे तू ने मुझे जगत में भेजा, वैसे ही मैं ने भी उन्हें जगत में भेजा: 19 और उनके लिए मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किये जाएँ l
20 “मैं केवल इन्हीं के लिए विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, 21 कि वे सब एक हों; जैसा तू हे पिता मुझ में है, और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में हों, जिससे संसार विशवस करे कि तू ही ने मुझे भेजा है l 22 वह महिमा जो तू ने मुझे दी मैं ने उन्हें दी है, कि वैसे ही एक हों जैसे कि हम एक हैं, 23 मैं उन में और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएँ, और संसार जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तू ने मुझ से प्रेम रखा वैसा ही उनमें प्रेम रखा l 24 हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तू ने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ वहाँ वे सभी मेरे साथ हों, कि वे मेरी उस महिमा को देखें जो तू ने मुझे दी है, क्योंकि तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझ से प्रेम रखा l 25 हे धार्मिक पिता, संसार ने मुझे नहीं जाना, परन्तु मैं ने तुझे जाना, और इन्होंने भी जाना कि तू ही ने मुझे भेजा है l 26 मैं ने तेरा नाम उनको बताया और बताता रहूँगा कि जो प्रेम तुझको मुझ से था वह उनमें रहे, और मैं उनमें रहूँ l”
जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं l यूहन्ना 17:14
कई साल पहले, मैं एक अफ़्रीकी देश में ब्रिटिश सरकार के सलाहकार के तौर पर काम करता था। परिणामस्वरूप, मुझे उच्चायोग के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया। प्रवासी और सरकारी अधिकारियों से घिरा हुआ——अक्सर निजी स्कूलों में शिक्षा और विदेश में रहने के अनुभव के साथ——मैं खुद को बहुत असहज महसूस करता था, और वहाँ से अति शीघ्र जाना चाहता था। फिर भी मैंने वहाँ उपस्थिति दी क्योंकि मुझे अपनी संस्था का प्रतिनिधित्व करना था।
मसीहियों के लिए असहज महसूस करना बिल्कुल सामान्य है। जैसे-जैसे क्रूस निकट आ रहा था, यीशु ने अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना की, “जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं” (यूहन्ना 17:14)। शारीरिक रूप से, शिष्य एक ऐसे संसार में रहते थे जो उनका असली घर नहीं था, लेकिन फिर भी, यीशु को प्रकट करना उनका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। उसने “उनके लिए भी [विनती] की जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे” (पद 20)।
जिस तरह हमने उस संदेश पर विश्वास किया है, उसी तरह आज हम इस धरती पर हैं ताकि परमेश्वर के मार्गदर्शन में उसे आगे बढ़ा सकें। यह उद्देश्य संसार को ज़्यादा सहज महसूस नहीं कराएगा, लेकिन यह हमें कठिन दिनों में एक दृष्टि दे सकता है कि : “संसार जाने कि तू ही ने मुझे भेजा [है]” (पद 23)।
जब हमें लगता है कि हम इस ग्रह पर पूरी तरह से फिट नहीं बैठते; तो हमें आश्चर्यचकित होने की ज़रूरत नहीं है; कि कुछ और पाने की लालसा है। हमारा उद्धारकर्ता इस संसार का नहीं है, और इसलिए हम उसके प्रतिनिधि भी नहीं हैं। लेकिन हर चीज़ में मसीह हमारे साथ है (पद 26)। एड्रियन स्मिथ
आप कहाँ असहज महसूस करते हैं? आपको क्या लगता है कि यीशु ने आपको उन जगहों पर क्या उद्देश्य दिया है?
प्रिय यीशु, मुझे अपने लिए स्वीकार करने के लिए इस दुनिया में आने के लिए धन्यवाद। कृपया मुझे अपना सुसमाचार साझा करने के लिए उपयोग करें।