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मधुर संगति

नर्सिंग होम में वह वृद्ध महिला किसी से बातचीत नहीं करती थी अथवा किसी से कुछ नहीं मांगती थी l ऐसा लगता था मानों वह अपनी जर्जर पुरानी कुर्सी में झूलती हुई, महज जीवित थी l उससे मिलनेवाले कम ही थे, लिहाजा एक जवान नर्स अपने अवकाश के समय उसके कमरे में अक्सर जाती थी l उस महिला से बातचीत आरंभ न करने की इच्छा से प्रश्न न पूछकर, वह एक और कुर्सी खींचकर उसके साथ झूलने लगी l कुछ महीनों के बाद, उस वृद्ध महिला ने उससे कहा, “मेरे साथ झूलने के लिए धन्यवाद l” वह संगति के लिए धन्यवादी थी l

स्वर्ग जाने से पहले, यीशु ने अपने शिष्यों के साथ निरंतर रहनेवाला एक सहायक भेजने की प्रतिज्ञा की l उसने उनसे कहा कि वह उन्हें अकेले नहीं छोड़ेगा किन्तु उनके संग रहने के लिए पवित्र आत्मा भेजेगा (यूहन्ना 14:17) l वह प्रतिज्ञा आज भी यीशु के विश्वासियों के लिए सच है l यीशु ने कहा कि त्रियेक परमेश्वर हममें अपना “घर” बनाएगा (पद.23) l

हमारे सम्पूर्ण जीवन में प्रभु हमारा निकट और विश्वासयोग्य सहयोगी है l वह हमारे कठिनतम संघर्षों में मार्गदर्शन करेगा, हमारे पाप क्षमा करेगा, प्रत्येक शांत प्रार्थना सुनेगा, और उन बोझों को उठाएगा जो हमारे लिए उठाना कठिन है l

आज हम उसकी मधुर संगति का आनंद उठा सकते हैं l

गहराई में से

समस्या के संकेत की चेतावनी पर मैंने जल की बारीकी से जांच की l मैंने जीवन-रक्षक की छः घंटे की शिफ्ट ड्यूटी में, तरणताल के किनारे से तैरनेवालों की सुरक्षा पर ध्यान देता रहा l अपनी जगह छोड़ना, अथवा अपनी सावधानी में ढीला होना, तरणताल में तैरनेवालों के लिए भयानक परिणाम ला सकता था l किसी तैराक की चोट या कौशल की कमी के कारण उसके डूबने की आशंका में, उसे तरणताल के बाहर निकलना मेरी जिम्मेदारी थी l

पलिश्तियों के विरुद्ध युद्ध में परमेश्वर की सहायता अनुभव करने के बाद (2 शमूएल 21:15-22), दाऊद अपने बचाव की तुलना “गहरे जल” (22:17) में से खींचकर बाहर निकाले जाने से करता है l स्वयं दाऊद का-और उसके लोगों का जीवन-उसके शत्रुओं के गंभीर खतरे में थी l परमेश्वर ने मुसीबत में डूबते हुए दाऊद के जीवन को बाहर निकाल लिया l जबकि तैरनेवालों की सुरक्षा के लिए जीवन-रक्षकों को भुगतान किया जाता है, अपितु, परमेश्वर, दाऊद से प्रसन्न  होकर उसे बचाया ([पद. 20) l मेरा हृदय यह जानकार अति आनंदित है कि परमेश्वर बाध्यता के कारण नहीं किन्तु अपनी इच्छा  से मेरी सुरक्षा करता है l

जीवन की समस्याओं से अभिभूत होने पर, हम इस ज्ञान में विश्राम पा सकते हैं कि परमेश्वर हमारा जीवन-रक्षक है, हमारे संघर्ष को जानता है और, अपनी प्रसन्नता के कारण हमारी सुरक्षा करता है l

जो हम वापस लाते हैं

जॉन एफ. बर्न्स विश्व घटनाओं पर 40 वर्षों तक द न्यू यॉर्क टाइम्स  के लिए लिखते रहे l 2015 में बर्न्स सेवानिवृति पश्चात् एक लेख में, कैंसर पीड़ित घनिष्ठ मित्र और संगी-पत्रकार के शब्द याद किये l “कभी न भूलना,” सहकर्मी ने कहा, “यह महत्वपूर्ण नहीं आपने कितनी लम्बी यात्रा की है; आप क्या वापस लाए हैं महत्वपूर्ण है l”

भजन 37 दाऊद की चरवाहा से सैनिक से राजा तक की जीवन यात्रा से “वापस लायी हुई बातों” की सूची हो सकती है l भजन 37 दुष्ट का धर्मी से तुलना, और प्रभु में भरोसा करनेवालों की पुष्टि करनेवाले दोहा श्रृंखला है l

“कुकर्मियों से मत कुढ़, कुटिल काम करनेवालों के विषय डाह न कर ! क्योंकि वे घास के समान ... मुरझा जाएँगे” (पद.1-2) l

“मनुष्य की गति यहोवा की ओर से दृढ़ होती है, ... चाहे वह गिरे तौभी पड़ा न रह जाएगा, क्योंकि यहोवा उसका हाथ थामे रहता है” (पद.23-24) l

“मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूँ; परन्तु न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ, और न उसके वंश को टुकड़े माँगते देखा है” (पद.25) l

परमेश्वर ने हमें, हमारे जीवन के अनुभवों से क्या सिखाया है? हमने कैसे उसकी विश्वासयोग्यता और प्रेम का अनुभव् किया है? किस तरह परमेश्वर के प्रेम ने हमारे जीवनों को गढ़ा है?

महत्वपूर्ण यह नहीं हम जीवन में कितनी दूर चले हैं, किन्तु जो हम वापस लेकर आये हैं l