Our Authors

सब कुछ देखें

Articles by मोनिका ब्रांड्स

उकसानेवालों को बढ़ावा न दें

क्या आपने कभी यह उक्ति सुनी है, “उकसानेवालों को बढ़ावा न दें” (Don’t feed the trolls”) l “ट्रोल्स” आज के डिजिटल संसार में एक नयी समस्या की ओर इशारा करता है – ऑनलाइन यूजर जो ख़बरों या सोशल मीडिया चर्चा समिति के बारे में बार-बार इरादतन विद्रोहजनक और हानिकारक टिप्पणियाँ पोस्ट करते रहते हैं l परन्तु ऐसे टिप्पणियों को नज़रंदाज़ करना – उकसानेवालों को बढ़ावा न देना – उनके लिए किसी संवाद को पटरी से उतारना कठिन बना देता है l

अवश्य ही, ऐसे लोगों का सामना करना कोई नयी बात नहीं है जो असलियत में उत्पादक संवाद में रूचि नहीं रखते हैं l “उकसानेवालों को बढ़ावा न दें” नीतिवचन 26:4 का आधुनिक समतुल्य हो सकता है, जो चेतावनी देता है कि अभिमानी, ग्रहण न करनेवाले के साथ बहस करना, उनके स्तर तक नीचे उतरने का जोखिम है l

और इसके बावजूद . . . सबसे अड़ियल दिखाई देने वाला व्यक्ति भी परमेश्वर की छवि का अमूल्य धारक है l यदि हम दूसरों को ख़ारिज करने में जल्दबाज़ है, हम अभिमानी और परमेश्वर के अनुग्रह को अस्वीकार करनेवाले बन जाने के खतरे में हो सकते हैं (देखें मत्ती 5:22) l 

वह, कुछ हद तक स्पष्ट करता है क्यों नीतिवचन 26:5 बिलकुल विपरीत मार्गदर्शन पेश करता है l यह हर एक स्थिति में सर्वश्रेष्ठ तौर से प्रेम प्रगट करने का निर्णय है क्योंकि यह परमेश्वर पर दीन, प्रार्थनामय भरोसा से ही संभव है (देखें कुलुस्सियों 4:5-6) l कभी हम जोर से बोलते हैं, और दूसरे समयों में, शांत रहना ही उत्तम है l

परन्तु हर एक स्थिति में, हम यह जानने में शांति पाते हैं कि वही परमेश्वर जो हमें अपने निकट लाया जब हम उसके प्रति कठोर विरोधी थे (रोमियों 5:6) हर एक व्यक्ति के हृदय में सामर्थी रूप से कार्य कर सकता है l जब हम मसीह के प्रेम को साझा करने का प्रयास करते हैं हम उसकी बुद्धिमत्ता में विश्राम करें l

आपको आराम करना होगा!

“आपको आराम करना होगा,” चिकित्सक कठोरता से डिज़नी के रेस्क्यूवर्स डाउन अंडर (साहसिक एनिमेटेड फिल्म) में एक अनिच्छुक घायल मरीज़ एल्बेट्रोस(एक बड़ा समुद्री पक्षी) विल्बर से कहता है l “आराम करूँ? मैं आरामदेह हूँ!” स्पष्ट रूप से आरामदेह नहीं दिखाई देनेवाला विल्बर, जैसे-जैसे उसकी घबराहट बढ़ती है वह व्यंगात्मक रूप से प्रतिउत्तर देता है l “यदि मैं और अधिक आरामदेह होऊंगा, मैं मर जाऊँगा!”

क्या आप वर्णन कर सकते हैं? चिकित्सक के संदेहात्मक तरीकों (आरा की मदद से “चर्म उत्तक नष्ट करना”) के प्रकाश में, विल्बर की आशंका उचित दिखाई दे रही थी l किन्तु दृश्य हास्यास्पद है क्योंकि इसमें हमारी घबराहट के समय की भावनाएँ प्रगट हैं – चाहे या नहीं जिसका हम सामना करते हैं वह वास्तव में खतरनाक है l

जब हम डरे होते हैं, आराम करने का बढ़ावा मूर्खतापूर्ण महसूस होता है l मैं जानता हूँ जब मैं जीवन के भय को अपने चारों ओर बढ़ते हुए महसूस करता हूँ, और जब पीड़ादायक “मृत्यु की रस्सियाँ” (भजन 116:3) मेरे पेट को गाठों की तरह बाँध देती हैं, मेरा हर एक सहज-ज्ञान उससे लड़ने को प्रवृत करता है न कि आराम करने को l

और इसके बावजूद . . . नहीं की अपेक्षा ज़्यादातर, घबराहट में लड़ने के मेरे प्रयास घबराहट की बुरी-पकड़ को केवल जकड़कर, मुझे भय से पंगु बना देती हैं l परन्तु जब मैं, अगरचे हिचकिचाते हुए, पीड़ा महसूस करते हुए उसे परमेश्वर के पास ले जाता हूँ (पद.4), कुछ आश्चर्यजनक होता है l मेरे अन्दर का गाँठ थोड़ा ढीला पड़ जाता है (पद.7), और मेरी समझ से परे एक शांति मेरे अन्दर दौड़ जाती है l

और जब आत्मा की आराम देनेवाली उपस्थिति मुझे घेर लेती है, मैं सुसमाचार की वास्तविक सच्चाई को और अधिक समझ पाता हूँ : कि हम श्रेष्ठ तरीके से तब लड़ते हैं जब हम परमेश्वर की सामर्थी बाहों में खुद को समर्पित कर देते हैं (1 पतरस 5:6-7) l

मूल्यवान

“माई प्रेशियस (My Precious-काल्पनिक फिल्म) . . . l” अपने सनकी जुनून में “शक्ति के प्रेशियस/मूल्यवान अंगूठी के साथ” दुर्बल प्राणी गोल्लुम की छवि को टोलकिंस के लार्ड ऑफ़ द रिंग्स नाटकत्रय में सबसे पहले दिखाया गया था, जो आज लालच, जुनून, और पागलपन का भी चिन्हात्मक प्रारूप है l

यह कठिनाई से बताने योग्य एक छवि है l अंगूठी और खुद के साथ अपने प्रेम-घृणा के उत्पीड़ित सम्बन्ध में, गोल्लुम की आवाज़ हमारे अपने हृदयों की भूख की प्रतिध्वनि है l चाहे वह ख़ास तौर पर एक वस्तु की ओर निर्देशित हो, अथवा “और अधिक” की धुंधली लालसा ही हो हम निश्चित हैं कि हम आखिरकार अपना “प्रेशियस/मूल्यवान प्राप्त करने के बाद ही संतुष्ट होंगे l परन्तु इसके बदले, हमें सम्पूर्ण बनाने की हमारी सोच हमें पहले से अधिक खाली महसूस कराती है l

जीने का एक बेहतर तरीका है l जिस प्रकार भजन 16 में दाऊद व्यक्त करता है, जब हमारे हृदयों की लालसा हमें संतुष्टता की निराशाजनक, व्यर्थ खोज में पहुंचाने के लिए डराती हैं (पद.4), हम आश्रय के लिए परमेश्वर की ओर मुड़ना याद रखें (पद.1), खुद को याद दिलाते हुए कि उसके सिवा हमारे पास कुछ नहीं है (पद.2) l

और जब हमारी आँखें “वहां पर” संतुष्टता के लिए देखना बंद करके बदले में परमेश्वर की सुन्दरता पर टकटकी लगा ले (पद.8), हम अपने को आखिरकार सच्ची संतुष्टता का स्वाद चखते पाएंगे – [परमेश्वर की] उपस्थिति का आनंद उठाने वाला जीवन, “जीवन के मार्ग” में उसके साथ हर क्षण चलना – अभी और हमेशा तक (पद.11) l

प्रेम और शान्ति

यह मुझे सर्वदा ही आश्चर्यचकित करता है कि शान्ति-सामर्थी और समझाई न जा सकने योग्य शान्ति (फिलिप्पियों 4:7)-हमारे गहनतम दुःख में भी हमारे हृदयों को आपूर्त कर सकती है। मैंने यह हाल ही में अपने) पिता की मेमोरियल सर्विस में अनुभव किया। सांत्वना देने वाले लोगों की लम्बी कतार में अपनी हाई स्कूल के एक मित्र को देखकर मुझे बहुत आराम मिला। बिना कुछ कहे उसने मुझे जोर से गले लगा लिया। उस संकट भरे दिन के दुःख में उसकी मूक समझ ने मुझे लबालब भर दिया, इस सशक्त याद दिलाने वाले अहसास ने मुझे याद दिलाया कि मैं उतनी अकेली भी नहीं थी, जितना मुझे लग रहा था।   

जैसे भजन संहिता 16 में दाऊद उल्लेख करता है, कि जिस प्रकार की शान्ति और आनन्द परमेश्वर हमारे जीवनों में ले कर आता है यह कठिन समयों में पीड़ा को भावहीन ढंग (से) दबाने के लिए एक चुनाव के द्वारा नहीं आया है; परन्तु यह तो एक उपहार के समान है, जिसमें हम कुछ नहीं कर सकते, परन्तु हम इसे तभी अनुभव कर सकते हैं, जब हम अपने भले परमेश्वर में शरण लेते हैं (पद 1-2) ।

हम उस पीड़ा को जवाब दे सकते हैं जो मृत्यु हमें पथभ्रष्ट करने के द्वारा ले कर आती है, शायद यह सोचकर कि इन अन्य “ईश्वरों” की ओर मुड़ जाना पीड़ा को दूर रखेगा। परन्तु जल्द ही या थोड़े समय बाद हम पाएँगे कि दुःख से बचना तो बस हमारे लिए और गहन पीड़ा ही ले कर आता है (पद 4) ।

या हम परमेश्वर की ओर मुड़ सकते हैं, यह भरोसा करते हुए कि जब हम यह नहीं समझ सकते, कि जो जीवन वह हमें पहले से ही दे चुका है-इसकी पीड़ा में भी-वह खुबसूरत और भला है (पद 6-8) । और हम अपने आप को उसकी प्रेम से भरी बाँहों के अधीन कर सकते हैं जो हमारी पीड़ा से आराम के साथ हमें एक शान्ति और आनन्द में ले जाती हैं, जिसे मृत्यु भी कभी कम नहीं कर सकती है (पद 11) ।

रात्रिकाल में एक गीत

मेरे पिता का जीवन लालसा रखने का जीवन था, उन्होंने सम्पूर्णता की लालसा रखी, जब पार्किन्सन की बीमारी ने उनके मस्तिष्क और शरीर को धीरे धीरे और अधिक अपंग बना दियाl उन्होंने शान्ति की लालसा की, परन्तु वह गहन उदासी की पीड़ा से पीड़ित रहेl उन्होंने प्रेम और दुलार की लालसा की, परन्तु प्राय: अकेला ही महसूस कियाl

उन्होंने अपने आप को कम अकेला महसूस किया जब उन्होंने भजन संहिता 42, उनके पसन्दीदा भजन को पढ़ा, भजनकार एक गहन लालसा और चंगाई के लिए एक अनबुझी प्यास को जानता था (पद 1-2)l उनके समान भजनकार एक उदासी को जानता था, जिसका ऐसा अहसास होता था कि वह कभी गई ही नहीं (पद 3), जिसने भरपूर आनन्द के समय को एक बहुत दूर की याद बना दिया था (पद 6)l मेरे पिता के समान, जब गड़बड़ी और पीड़ा की लहरों ने उन्हें डूबा दिया (पद 7), भजनकार ने अपने आप को परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया महसूस किया और पूछा “क्यों?” (पद 9)l

और जब भजन संहिता के शब्दों ने उन्हें प्रेरित किया और आश्वासन दिलाया कि वह अकेले नहीं थे, तब मेरे पिता ने अपनी पीड़ा में एक शान्ति के आरम्भ का अहसास कियाl उन्होंने अपने आस-पास एक मध्यम आवाज़ को सुना, एक आवाज़ जो उन्हें आश्वासन दिला रही थी कि यद्यपि उनके पास जवाब नहीं थे, यद्यपि लहरें उन्हें अभी भी डुबा रही थीं, फिर भी उन्हें स्नेह के साथ दुलारा जा रहा था (पद 8)l

और एक तरह से रात में उस मध्यम गीत को सुनना पर्याप्त थाl मेरे पिता के लिए चुपचाप आशा, प्रेम, और आनन्द की किरणों से जुड़े रहने के लिएl और यह उनके लिए उस दिन की प्रतीक्षा करने के लिए पर्याप्त था जब एक दिन उनकी अभी लालसाएँ पूरी कर दी जाएँगी (पद 5,11)l

भयानक और खूबसूरत बातें

भय हमें स्तंभित कर सकता है l हम सब भयभीत होने के कारण जानते हैं-सबकुछ जिसने अतीत में हमें हानि पहुंचायी है, और सबकुछ जो आसानी से पुनः हमें नुक्सान पहुँचा सकती है l इसलिए कभी-कभी हम अटक जाते हैं-लौटने में असमर्थ, आगे बढ़ने में अत्यधिक भयभीत l मैं बिलकुल असमर्थ हूँ l मैं इतना तीव्र बुद्धि वाला नहीं हूँ, इतना ताकतवर नहीं हूँ, अथवा मैं पुनः इस तरह की हानि को नहीं संभाल सकता हूँ l
लेखक फ्रेडरिक बुएच्नेर जिस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह का वर्णन करते हैं उससे मैं मुग्द हूँ :
“एक धीमी आवाज़ जो कहती है, “यहाँ यह संसार है l भयानक और खूबसूरत बातें होंगी l भयभीत न होना l मैं तुम्हारे साथ हूँ l”
भयानक बातें होंगीं l  हमारे संसार में, चोटिल लोग दूसरों को चोट पहुंचाते हैं, कभी-कभी अत्यधिक चोट l भजनकार दाऊद की तरह, हमारे चारोंओर की बुराइयों की हमारी अपनी कहानियाँ हैं, जब, “सिंहों,” की तरह अन्य लोग हमें हानि पहुंचाते हैं (भजन 57:4) l और इसलिए हम दुखित होते हैं; हम पुकारते हैं (पद.1-2) l
किन्तु इसलिए कि परमेश्वर हमारे साथ है, हमारे साथ खूबसूरत बातें भी होंगी l जब हम अपनी चोट और भय के साथ उसके निकट जाते हैं, हम खुद को ऐसे महान प्रेम से घिरा हुआ  पाते हैं जहां कोई भी ताकत हमारी हानि नहीं कर सकती(पद.1-3), ऐसी करुणा जो स्वर्ग तक है (पद.10) l विनाश के हमारे चारों ओर होने के बावजूद, उसका प्रेम हमारे हृदयों के लिए स्थिर आश्रय है (पद.1,7) l उस दिन तक जब हम नूतन साहस प्राप्त करके, उसकी विश्वासयोग्यता का गीत गाकर उस दिन का स्वागत करेंगे (पद.8-10) l

हमारे मित्रों के लिए

एमिली ब्रोंट के उपन्यास वुथरिंग हाइट्स(Wuthering Heights) में, एक चिड़चिड़ा व्यक्ति जो अक्सर दूसरों की आलोचना करने के लिए बाइबल का सन्दर्भ देता था, उसे यादगार ढंग से “सबसे उबाऊ स्व-धर्मी फरीसी बताया गया है जिसने कभी खुद पर लागू करने और अपने पड़ोसियों को श्रापित करने के लिए बाइबल को लूटा हो l”
यह एक हास्य पंक्ति है; और खास लोगों की याद दिला सकता है l लेकिन क्या हम सब  कुछ इस तरह के नहीं है-खुद की असफलताओं के लिए बहाने बनाते हुए दूसरों की आलोचना करने के लिए तैयार रहते हैं?
वचन में कुछ लोगों ने आश्चर्यजनक रूप से ठीक इसके विपरीत किया; उन्होंने उनके लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से खुद को वंचित करने और दूसरों को बचाने के लिए श्रापित होना स्वीकार्य किया l मूसा पर विचार करें, जिसने इस्राएलियों को क्षमा दिलाने के लिए परमेश्वर के पुस्तक से अपना नाम भी हटवाने के लिए तैयार था (निर्गमन 32:32) l अथवा पौलुस, जिसने कहा कि मैं यहाँ तक चाहता हूँ कि मैं स्वयं ही मसीह से शापित हो [जाऊं] “यदि इसके परिणामस्वरुप उसके लोग परमेश्वर को जान जाएँ” (रोमियों 9:3) l  
स्व-धर्मी जो हम स्वाभाविक रूप से हैं भी, वचन खुद से अधिक दूसरों को प्रेम करनेवालों को चिन्हांकित करता है l
क्योंकि आख़िरकार ऐसा प्रेम यीशु की ओर इशारा करता है l यीशु ने कहा, “इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे” (यूहन्ना 15:13) l इससे पहले कि हम यीशु को जानते, उसने “अंत तक” (13:1) हमसे प्रेम किया-हमें जीवन देने के लिए मृत्यु का चुनाव किया l
अब हमें प्रेम करने और ऐसा ही प्रेम पाने के लिए परमेश्वर के परिवार में आमंत्रित किया गया है (15:9-12) l और जब हम मसीह के अकल्पनीय प्रेम को दूसरों में उंडेलेंगे, संसार उसका झलक पाएगा l

चंगाई की वर्षा

तूफान मुझे हमेशा से पसंद रहा है। बचपन में तेज़ बारिश में अपने भाई-बहनों समेत घर के बाहर जमा पानी में छलांग लगाना, फिसलना, और पूरी तरह से भीगना रोमांचकारी होता था। उस समय यह कहना कठिन था कि हमें मज़ा आ रहा है या डर लग रहा है।

वचन परमेश्वर के पुनरुद्धार की तुलना उस निर्जल देश से करता है जिसमें जल के ताल भर जाएँ, उदाहरण के लिए भजन संहिता 107 को लें। जो रेगिस्तान को जल के ताल में बदल दे वह एक मंद वर्षा नहीं वरन घनघोर बारिश होगी जिससे बंजर भूमि की दरारों में नया जीवन भर जाएगा।  

क्या हम ऐसे ही पुनरुद्धार की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं?  जब चंगे होने के भूखे-प्यासे हम लक्ष्यहीन भटकने लगते हैं (पद 4-5), तब हमें एक ज़रा सी तस्सली भर से बढ़कर कुछ और पाने की लालसा होती है। जब पाप की जड़ें हमें घोर अंधकार के बन्धनों में जकड़ती हैं (पद 10-11 ) तब हमें मात्र अपनी दशा में परिवर्तन से बढ़कर कुछ और पाने की लालसा होती है।

ऐसा परिवर्तन परमेश्वर ला सकते हैं (पद 20)। अपने डर और शर्म को परमेश्वर के पास लाने में देर नहीं हुई है, जो हमें पाप के अंधकार से निकालकर अपने प्रकाश में लाने से बढ़कर करने में सक्षम हैं।

सिद्ध अपूर्णता

मेरे कॉलेज के एक प्रोफेसर ने मुझमें आदर्शवाद-प्रेरित विलम्ब(टालमटोल) को देखते हुए मुझे कुछ बुद्धिमान सलाह दी l “सिद्धता को अच्छे का शत्रु मत बनाओ,” उसने कहा, सिद्ध प्रदर्शन का प्रयास उन्नत्ति के लिए आवश्यक जोखिम उठाने से रोकता है l स्वीकार करते हुए कि मेरे काम हमेशा अपूर्ण रहेंगे मुझे उन्नत्ति करने की स्वतंत्रता मिलेंगी l

प्रेरित पौलुस ने खुद को सिद्ध बनाने में अपने प्रयास को त्यागने का एक और ख़ास कारण समझाया : मसीह हमारी ज़रूरत है, यह हमें इसके प्रति अँधा कर सकता है l

पौलुस ने इस सच को कठिन तरीके से सीखा था l कई वर्षों तक परमेश्वर की व्यवस्था को सिद्धता से पालन करने के प्रयास में, जब यीशु से मुलाकात हुई सब कुछ बदल गया  (गलातियों 1:11-16) l पौलुस ने समझ लिया कि यदि परमेश्वर के साथ पूर्ण और सही होने के लिए उसके प्रयास काफी हैं, “तो मसीह का मरना व्यर्थ होता” (2:21) l केवल खुद का इनकार ही, खुद पर भरोसा करना त्यागकर ही,  वह यीशु को अपने जीवन में जीवित महसूस कर सकता था (पद.20) l अपनी अपूर्णता में वह परमेश्वर की पूर्ण सामर्थ्य अनुभव कर सकता था l

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम पाप का सामना न करें (पद.17); किन्तु इसका अर्थ यह ज़रूर है कि हम आत्मिक उन्नत्ति के लिए अपनी सामर्थ्य पर भरोसा करना छोड़ दें (पद.20) l

इस जीवन में, हम प्रगति करने वाले बने रहेंगे l किन्तु जब हमारे हृदय सिद्ध परमेश्वर की ज़रूरत के लिए नम्र बने रहेंगे, यीशु वहां निवास करेगा (इफिसियों 3:17) l हम उसमें जड़वत रहकर, उस ज्ञान से परे प्रेम में और गहराई से बढ़ते जाएंगे (पद.19) l