यूहन्ना 11:17-27, 34-44
17 वहाँ पहुँचने पर यीशु को यह मालूम हुआ कि लाज़र को कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं l 18 बैतनिय्याह यरूशलेम के समीप कोई दो मील की दूरी पर था l 19 बहुत से यहूदी मार्था और मरियम के पास उनके भाई की मृत्यु पर शांति देने के लिए आए थे l 20 जब मार्था ने यीशु के आने का समाचार सुना तो उससे भेंट करने को गयी, परन्तु परियम घर में बैठी रही l 21 मार्था ने यीशु से कहा, “हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता l 22 और अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्वर से माँगेगा, परमेश्वर तुझे देगा l” 23 यीशु ने उससे कहा, “तेरा भाई फिर जी उठेगा l” 24 मार्था ने उससे कहा, “मैं जानती हूँ कि अंतिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा l” 25 यीशु ने उससे कहा, “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझे पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, 26 और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंतकाल तक न मरेगा l क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?” 27 उसने उससे कहा, “हाँ, हे प्रभु, मैं विश्वास करती हूँ कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है l”
34 और कहा, “तुम ने उसे कहाँ रखा है?” 35 उन्होंने उससे कहा, “हे प्रभु, चलकर देख ले l” 35 यीशु रोया l 36 तब यहूदी कहने लगे, “देखो, वह उससे कितना प्रेम रखता था l” 37 परन्तु उनमें से कुछ ने कहा, “क्या यह जिसने अंधे की आँखें खोली, यह भी न कर सका कि यह मनुष्य न मरता?” 38 यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया l वह एक गुफा थी और एक पत्थर उस पर रखा था l 39 यीशु ने कहा, “पत्थर हटाओ l” उस मरे हुए की बहिन मार्था उससे कहने लगी, “हे प्रभु, उसमें से अब तो दिर्गंध आती है, क्योंकि उसे मरे चार दिन हो चुके हैं l” 40 यीशु ने उससे कहा, “क्या मैं ने तुझ से नहीं कहा था की यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी l” 41 तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया l यीशु ने आखें उठाकर कहा, “हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उनके कारण मैं ने यह कहा, जिससे कि वे विश्वास करें कि तू ने मुझे भेजा है l” 43 यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, “हे लाज़र, निकल आ l” 44 जो मर गया था वह कफ़न से हाथ पाँव बंधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अंगोछे से लिपटा हुआ था l यीशु ने उनसे कहा, “उसे खोल दो और जाने दो l”
जब यीशु ने उसको . . . रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ l यूहन्ना 11:33
मेरे भाई की हाल ही में हुई मृत्यु——मानवीय दृष्टिकोण से, बहुत जल्दी——ने मेरे हृदय में अत्यधिक दुःख पहुँचाया है। मृत्यु कष्टदायक होती है।
दुःख किसी भी चीज़ या व्यक्ति के प्रति एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जिसे हम प्रिय मानते हैं । फिर भी, यह कितना सान्त्वना देने वाला है कि परमेश्वर हमारे जीवन के विभिन्न ‘कब्रिस्तानों’ में हमारे साथ खड़ा है।
आज के पाठ में लाज़र की मृत्यु दर्शाती है कि आमतौर पर उन अनेक घरों में क्या होता है जो हानि का अनुभव कर रहे हैं। यह सब वहाँ मौजूद है : बीमारी का वृत्तांत (यूहन्ना 11:1); चंगाई की तीव्र चिंता (पद 3); अनुत्तरित प्रतीत होने वाली प्रार्थना पर निराशा——“यदि तू यहाँ होता,” मार्था यीशु को चुनौती देती है, “तो मेरा भाई कदापि न मरता” (पद 21)। और मृत्यु की अंतिम स्थिति : “लाज़र को कब्र में रखे चार दिन हो [गए थे]” (पद 17)। इससे ज़्यादा कुछ नहीं किया जा सकता!
फिर भी यीशु पूछता है कि कब्रिस्तान कहाँ है (पद 34)। और यहीं——अपने दो मित्रों के सबसे गहरे दुःख के स्थान पर——यीशु रोता है। उसे पता था कि वह लाज़र को फिर जिला देगा, तो फिर उसके आँसू क्यों? हालाँकि इसके कई कारण हो सकते हैं, हमने पहले सीखा था कि “यीशु मार्था और उसकी बहन और लाज़र से प्रेम करता था” (पद 5)। दुःख प्रेम की कीमत है। उनका दुःख उसका दुःख बन गया। कब्रिस्तान में खड़े होकर, यीशु ने अपनी मानवता के द्वारा उनके टूटे हुए हृदयों को पहचाना, और फिर उन्हें, और हमें, दिखाया कि मृत्यु अंत नहीं है।
हाल ही में किस बात ने आपको दुःख पहुँचाया है? कब्रिस्तान में यीशु की यह तस्वीर आपको कैसे प्रोत्साहित करती है?
हे स्वर्गिक पिता, उन स्थानों पर मेरे साथ खड़े होने के लिए धन्यवाद जहाँ सब कुछ खोया हुआ लगता है। मुझे यह समझने में मदद करें कि मेरे लिए यीशु के प्रेम का अर्थ है कि चाहे मेरे दुःख का कारण कुछ भी हो, मुझे अकेले शोक करने की ज़रूरत नहीं है। आमीन।