भारत में बंधुआ मजदूरी को 1976 में कानूनी तौर पर समाप्त कर दिया गया था। लेकिन भारत के कई हिस्सों में यह प्रथा अभी भी जारी है। गुलामी का चक्र तब शुरू होता है जब लोग ऋण लेते हैं जिसे वे चुकाने में सक्षम नहीं होते हैं, अपने श्रम को सहायक के रूप में गिरवी रखते हैं। उनको कर्ज देनेवाले मांग करते हैं कि वे अपना कर्ज चुकाने के लिए काम करें लेकिन उन्हें बहुत कम भुगतान करते हैं l परिणामस्वरूप, मजदूर अपना बाकी जीवन कर्ज देनेवाले की संपत्ति की तरह बिताते हैं, कर्ज चुकाने की कोशिश करते हैं जो कभी-कभी पीढ़ियों तक चलता है। हालाँकि, वे कानून के अनुसार, स्वतंत्र होने और पुनर्वास के लिए पात्र हैं, लेकिन कई श्रमिकों को अपने अधिकारों के बारे में पता नहीं है। परिणामस्वरूप, हज़ारों लोग बंधन में रहते हैं।
कुएं पर सामरी स्त्री भी सामाजिक मानदंडों की गुलाम थी। वह अकेली आई थी, शायद इसलिए क्योंकि उसकी जीवनशैली के कारण उसके लोगों ने उसे बाहर कर दिया था। यहूदी दृष्टिकोण से यह और भी जटिल बन जाता है, एक सामरी होने के कारण, वह बहिष्कृत थी(पद.20) l लेकिन यीशु के साथ उसकी बातचीत ने उसे स्वीकृत और पुष्टि का अनुभव कराया। हालाँकि यीशु उसे बचाने के लिए आया था, लेकिन वह यह नहीं जानती थी। वह यीशु के असामान्य दृष्टिकोण और उससे पानी माँगने के कार्य से चकित थी। लेकिन जब उसे एहसास हुआ कि वह प्रतीक्षित मसीह था, तो वह खुशी-खुशी अपने गाँव के बाकी लोगों को यीशु के पास ले आई।
जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह बच जाता है (यूहन्ना 3:16)। हमारे पापों का कर्ज तब चुकाया गया जब यीशु हमारे लिए क्रूस पर मरा। उसने हमारी स्वतंत्रता के लिए मूल्य चुकाया और हमें हमेशा के लिए स्वतंत्र कर दिया। अब हमें अंधविश्वास, परंपरा या समाज की अपेक्षाओं के बोझ तले दबने की ज़रूरत नहीं है। हम तब स्वतंत्र होते हैं जब हम वह स्वीकार करते हैं जो वह प्रदान करता है।
अभी भी आप किससे बंधे हुए महसूस करते हैं? यह जानना आपके लिए क्या मायने
रखता है कि यीशु में आप अपनी स्वतंत्रता और जीवन की पूर्णता पा सकते हैं?
हे प्रभु, मुझे यह समझने में मदद करें कि आपने मुझे पाप से मुक्त करने
के लिए क्रूस पर अपनी जान दी। स्वतंत्रता के इस उपहार को संजोने में मेरी मदद करें।
