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Articles by एडम हॉल्ज़

पिताजी, आप कहाँ हैं?

“पिताजी ! आप कहाँ हैं?”

मैं अपने घर के उपमार्ग पर अपनी गाड़ी ले जा रहा था जब घबरायी हुयी मेरी बेटी ने, मुझे मोबाइल फोन पर बुलाया l मुझे उसे खेलने का अभ्यास करवाने के लिए 6.00 बजे तक घर पर होना ज़रूरी था; और मैं समय पर पहुँच गया l हालाँकि, मेरी बेटी की आवाज़ ने उसके भरोसे की कमी को जता दिया l पिछली बात पर ध्यान देते हुए, मैंने प्रतुत्तर दिया : “मैं यहाँ हूँ l तुम मुझ पर भरोसा क्यों नहीं करती हो?”

परन्तु जैसे ही मैंने उन शब्दों को बोला, मैंने सोचा, कितनी बार मेरा स्वर्गिक पिता मुझसे यह पूछ सकता है? तनावपूर्ण क्षणों में, मैं भी अधीर होता हूँ l मैं भी भरोसा करने में संघर्ष करता हूँ, कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरी करेगा l इसलिए मैं पुकारता हूँ : “पिता, आप कहाँ हैं?”

तनाव और अनिश्चितता के मध्य, मैं कभी-कभी परमेश्वर की उपस्थिति, या यहाँ तक कि मेरे लिए उसकी अच्छाई और उद्देश्यों पर संदेह करता हूँ l इस्राएलियों ने भी किया l व्यवस्थाविवरण 31 में, वे प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने की तयारी कर रहे थे, जानते हुए कि उनका अगुआ मूसा पीछे रह जाएगा l मूसा ने परमेश्वर के लोगों से यह बोलकर उनको  पुनः आश्वस्त करने की कोशिश की, “तेरे आगे आगे चलने वाला यहोवा है; वह तेरे संग राहेगा, और न तो तुझे धोखा देगा और न छोड़ देगा; इसलिए मत डर और तेरा मन कच्चा न हो” (पद.8) l

यह प्रतिज्ञा – कि परमेश्वर सदा हमारे साथ है – आज भी हमारे विश्वास की आधारशिला है (देखें मत्ती 1:23; इब्रानियों 13:5) l वास्तव में, प्रकाशितवाक्य 21:3 इन शब्दों के साथ समाप्त होता है : “देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है, वह उनके साथ डेरा करेगा l”

परमेश्वर कहाँ है? वह यहां पर है, अभी, ठीक हमारे साथ – हमेशा हमारी प्रार्थना सुनने के लिये तैयार l

निश्चिन्त रहें

हाल ही में मेरे ससुर अठत्तर वर्ष के हो गए, और उनको सम्मानित करने के लिए हमारे पारिवारिक सहभागिता में, किसी ने उनसे पुछा, “आपने अपने अब तक जीवन में कौन सी सबसे महत्वपूर्ण बात सीखी है?" उन्होंने उत्तर दिया, “निश्चिन्त रहें l”

निश्चिन्त रहें l उन शब्दों को एकपक्षीय कहकर अस्वीकार करना प्रलोभक हो सकता है l परन्तु मेरे ससुर अँधा आशावाद या सकरात्मक सोच को बढ़ावा नहीं दे रहे थे l वह अपने लगभग आठ दशकों में कठिन समयों को सहन किये थे l आगे बढ़ने का उनका दृढ़ निश्चय किसी धुंधली आशा में जड़वत नहीं था कि बातें बेहतर अच्छी हो सकती हैं, परन्तु उनके जीवन में मसीह के कार्य पर आधारित था l

“निश्चिन्त रहें” – बाइबल जिसे अटलता/दृढ़ता कहती है – केवल इच्छाशक्ति से संभव नहीं है l हम दृढ़ रहते हैं क्योंकि परमेश्वर ने बार-बार इसकी प्रतिज्ञा दी है, कि वह हमारे साथ है, कि वह हमें सामर्थ्य देगा, और कि वह हमारे जीवनों में अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा l यही वह सन्देश था जो उसने यशायाह के द्वारा इस्राएलियों से दिया था : “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ; मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे संभाले रहूँगा” (यशायाह 41:10) l

कैसे “निश्चिन्त रहें”? यशायाह के अनुसार, परमेश्वर का चरित्र आशा के लिए बुनियाद है l यह जानना कि परमेश्वर की भलाई भय पर हमारी पकड़ को हमें ढीला करने की अनुमति देता है, हम पिता और उसकी प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं कि वह हमारे लिए दैनिक प्रबंध करेगा : सामर्थ्य, सहायता, और परमेश्वर की आराम देनेवाली, समर्थ करनेवाला, और थामनेवाली उपस्थिति l

जब हम विजेता को जानते हैं

मेरा सुपरवाइजर किसी कॉलेज बास्केटबॉल टीम का बहुत बड़ा प्रशंसक है l इस वर्ष, उन्होंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीत ली, इसलिए एक अन्य सहकर्मी ने उसे बधाई दी l केवल एक समस्या थी कि मेरे बॉस को अभी था फाइनल मैच देखने का अवसर नहीं मिला था! उन्होंने कहा कि वे पहले से ही परिणाम जानकार निराश थे l परन्तु, उन्होंने स्वीकार किया कि, कम से कम जब वे खेल देख रहे थे वे घबराए हुए नहीं थे जब अंक(score) अंत के करीब आया l उनको मालूम था कौन जीता!

कल क्या होगा हम वास्तव में कभी नहीं जानते हैं l कुछ दिन नीरस और थकाऊ महसूस होते हैं, जबकि दूसरे दिन आनंद से भरे हुए होते हैं l और भी अन्य समयों में, जीवन लम्बे समय के लिए दुष्कर, अत्यंत दुखदायी हो सकता है l

परन्तु जीवन के अप्रत्याशित उत्तार-चढ़ाव के बावजूद, हम परमेश्वर की शांति में मजबूती से जड़वत रह सकते हैं l क्योंकि, मेरे सुपरवाइजर के समान, हम कहानी का अंत जानते हैं l हम जानते हैं कौन “जीतता है l”

बाइबल की अंतिम पुस्तक, प्रकाशितवाक्य, इस भव्य समापन के विषय पर्दा उठाता है l मृत्यु और बुराई की अंतिम हार के बाद (20:10,14), युहन्ना एक खुबसूरत विजय दृश्य का वर्णन करता है (21:1-3) जहां परमेश्वर अपने लोगों के साथ निवास करता है (पद.3) और “उनकी आँखों से आँसू पोंछ [डालता है]” ऐसे संसार में जहां “मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी” (पद.4) l

कठिन दिनों में, हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं l और कोई हानि या विलाप नहीं l क्या-होगा-यदि या टूटे हृदय अब और नहीं l इसके बदले, हम अपने उद्धारकर्ता के साथ अनंत बिताएँगे l वह कितना महिमामयी उत्सव होता!

बुलडॉग और फव्वारा

ज्यादातर गर्मियों की सुबह में, हमारे घर के पीछे पार्क में एक दिलचस्प नाटक दिखाई देता है l इसमें एक फव्वारा शामिल है l और एक बुलडॉग l लगभग 6.30 बजे, फव्वारे चालू हो जाते हैं l उसके थोड़े समय बाद, बुलडॉग फिफि(हमारे परिवार द्वारा दिया गया नाम) वहां आ जाती है l

फिफि का मालिक उसका पट्टा खोल देता है l बुलडॉग अपनी पूरी ताकत से निकटतम फव्वारे की ओर दौड़ती है, पानी के धार पर आक्रमण करती है जब वह उसके चेहरे को भिगोता है l यदि फिफि उस फव्वारे को खा पाती, मेरी समझ से वह उसे खा लेती l यह उल्लास का निरा चित्र है उस द्रव्य द्वारा पूरी तौर से भीगने की फिफि की कदाचित अनंत इच्छा जिसे वह इच्छा भर नहीं प्राप्त कर सकती है l

बाइबल में बुलडॉग, या फव्वारे नहीं हैं l फिर भी, एक तरीके से, इफिसियों 3 में पौलुस की प्रार्थना मुझे फिफि की याद दिलाती है l वहां पर, पौलुस प्रार्थना करता है कि इफिसुस के विश्वासी परमेश्वर के प्रेम से भर जाएं और “सब पवित्र लोगों के साथ भली-बहती समझने की शक्ति [पाएं] कि उसकी चौड़ाई, और लम्बाई, और ऊँचाई, और गहराई कितनी हैं, और मसीह के उस प्रेम को जान [सकें] जो ज्ञान से परे है l” उसकी प्रार्थना थी कि हम “परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण [हो जाएं]” (पद.18-19) l

आज भी, हम एक ऐसे परमेश्वर को अनुभव करने के लिए आमंत्रित किये जाते हैं जिसका अनंत प्रेम हमारी सम्पूर्ण समझ से परे है, ताकि हम भी पूरी रीति से भीग जाएं, संतृप्त हो जाएं, और उसकी भलाई से बिलकुल संतुष्ट हो जाएं l हम बेफिक्री, उत्साह, और ख़ुशी से उसके साथ सम्बन्ध में गोता लगाने के लिए स्वतंत्र है केवल वही हमारे हृदयों और जीवनों को अपने प्रेम, अर्थ, और उद्देश्य से भर सकता है l

और दौड़ने/भागने की ज़रूरत नहीं

जुलाई 18, 1983 को, एक अमरीकी एयर फ़ोर्स कप्तान न्यू मेक्सिको के एबुकर्की से लापता हो गया, जिसका सुराग नहीं मिला l पैतीस वर्षों के बाद, वह अधिकारियों को कैलिफोर्निया में मिला l न्यूयॉर्क टाइम्स  अखबार बताता है कि, वह “अपने काम से निराश होकर,” यूँ ही भाग गया था l

परन्तु मुझे भी स्वीकार करना होगा, मैं भी कुछ-कुछ “बचने की स्थिति” के विषय जानता हूँ l नहीं, मैंने अचानक से शारीरिक रूप से कभी भी अपने जीवन में बचने की कोशिश नहीं की है l परन्तु कभी-कभी मुझे ज्ञात है कि कुछ है जो परमेश्वर चाहता है कि मैं करूँ, कुछ जिसका मैं सामना करूँ या अंगीकार करूँ l मैं उसे करना नहीं चाहता l और इसलिए, मैं भी  अपने तरीके से बचना चाहता हूँ l

योना नबी, वस्तुतः नीनवे नगर में परमेश्वर के प्रचार करने के निदेश से बचने के लिए बदनाम है (देखें योना 1:1-3) l परन्तु, वास्तव में, वह परमेश्वर से आगे नहीं निकल सकता था l शायद आपने सुना होगा कि क्या हुआ (पद.4,17) : एक आंधी l एक महामच्छ l निगला जाना l और उस प्राणी के पेट में, हिसाब-किताब, जिसमें योना ने अपने कार्यो का सामना किया और परमेश्वर से सहायता मांगी (2:2) l

योना एक सिद्ध नबी नहीं था l परन्तु में उसकी अद्भुत कहानी में आराम पाता हूँ, क्योंकि, योना के ढिठाई के बावजूद, परमेश्वर ने उसे अपने से दूर जाने नहीं दिया l प्रभु ने फिर भी उस मनुष्य की हताश प्रार्थना सुन ली, अपने अनिच्छुक सेवक को अनुग्रह से पुनर्स्थापित कर दिया (पद.2) – जैसा वह हमारे साथ करता हैं l

हमें जाननेवाला उद्धारकर्ता

मेरे बेटे ने पीछे की सीट से पूछा, “पापा, क्या समय है?” “अभी 5.30 बजा है” मैं जानता था वह आगे क्या कहेगा l “नहीं, अभी 5.28 बजा है!” मैंने उसके चेहरे पर चमक देखी l ठीक है! उसकी चमकती मुस्कराहट बोल पड़ी l मैं भी आनंदित हुआ – ऐसा आनंद जो एक माता-पिता को अपने बच्चे को जानने से मिलती है l

किसी सचेत माता-पिता की तरह, मैं अपने बच्चों को जानता हूँ l मुझे मालूम है कि मेरे उनको जगाने पर वे किस प्रकार उत्तर देंगे l मैं जानता हूँ उनको दोपहर के भोजन में क्या चाहिए l मैं उनके अनगणित रुचियों, इच्छाओं, और पसंद को जानता हूँ l

परन्तु उन सबके लिए, मैं उनको पूर्ण रूप से नहीं जान पाउँगा, अन्दर से बाहर, जिस तरह प्रभु हमें जानता है l

हम यूहन्ना 1 में घनिष्ट ज्ञान के प्रकार की झलक पाते हैं जो यीशु का अपने लोगों के लिए है l जैसे नतनएल, जिसे फिलिप्पुस ने यीशु से मुलाकात करने के लिए आग्रह किया था, यीशु की ओर गया l यीशु ने स्पष्ट किया, “देखो यह सचमुच इस्राएली है : इसमें कपट नहीं है” (पद.47) l आश्चर्यचकित होकर नतनएल ने उत्तर दिया, “ तू मुझे कैसे जानता है?” कुछ सहस्यमय तरीके से, यीशु ने उत्तर दिया कि उसने उसे अंजीर के पेड़ तले देखा था (पद.48) l

शायद हम नहीं जान पाएंगे क्यों यीशु ने इस ख़ास वर्णन को साझा किया, परन्तु ऐसा महसूस होता है नतनएल ने किया! अभिभूत होकर, उसने उत्तर दिया, “हे रब्बी, तू परमेश्वर का पुत्र है” (पद.49) l

यीशु हम में से हर एक को इसी प्रकार जानता है : बहुत निकट से, पूर्ण रूप से, और सिद्धता से – जैसे हम चाहते है कि हम जाने जाएँ l और वे हमें सम्पूर्ण रूप से स्वीकार करता है – केवल हमें अपने अनुगामियों के रूप में नहीं, परन्तु अपने अतिप्रिय मित्रों की तरह (यूहन्ना 15:15) l

आईना में वस्तुएँ

“ज़रूरी l आगे बढ़ें l और तेज़ गति से l” 1993 की फिल्म जुरासिक पार्क के पसंदीदा दृश्य में उपरोक्त शब्द जेफ़ गोल्डबल्म द्वारा अभिनीत, डॉ. आयान मैलकोम के हैं जब वे और दो अन्य चरित्र एक जीप में घातक दैत्यसरट(tyrannosaurus/ दो पावों वाला मांसाहारी डायनासोर) से भाग रहे होते हैं l जब चालाक पीछे की चीजों को देखनेवाले आईने में देखता है, उसे आईने पर लिखे शब्द, “आईने में दिखाई देनेवाली वास्तुएँ अपनी वास्तविक दूरी से निकट हो सकती हैं” के ठीक ऊपर - रेंगनेवाले प्रबल जंतु के जबड़े दिखाई देते हैं l

यह दृश्य उग्रता और भयानक परिहास का कुशल मिश्रण है l परन्तु कभी-कभी हमारे अतीत के “राक्षस” ऐसे महसूस होते हैं जैसे वे हमारा पीछा करना नहीं छोड़ेंगे l हम अपने जीवन के “आईने” में देखते हैं और हम उन गलतियों को हमें दोष या लज्जा से भस्म करने के लिए डराते हुए, उसी स्थान पर मंडराते देखते हैं l  

प्रेरित पौलुस अतीत की पंगु बनाने वाली संभव शक्ति को समझता था l उसने मसीह से अलग रहकर सम्पूर्ण/सिद्ध जीवन बिताने में वर्षों तक प्रयास किया, और मसीहियों को भी सताया (फिलिप्पियों 3:1-9) l अतीत पर पछतावा उसे सरलता से पंगु बना सकता था l

परन्तु पौलुस ने मसीह के साथ अपने सम्बन्ध में इतनी खूबसूरती और सामर्थ्य का अहसास किया कि वह अपने पुराने जीवन को छोड़ने पर विवश हुआ (पद.8-9) l इस बात ने उसे पछतावे के भय में पीछे देखने के स्थान पर विश्वास में आगे देखने के लिए स्वतंत्र किया : “परन्तु केवल यह एक काम करता हूँ कि जो बातें पीछे रह गयी हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ” (पद.13-14) l

मसीह में हमारा छुटकारा हमें उसके साथ रहने के लिए स्वतंत्र कर दिया है l जब हम आगे बढ़ते हैं हम “(अपने) आईने में उन बातों को” हमारी दिशा निर्धारित करने न दें l

विरूपित मीनार

अनुभव से यह जाना गया है कि चर्च के झुकी हुयी मीनार लोगों को घबरा देती हैं l जब हम कुछ मित्रों से मिलें, उन्होंने हमारे साथ साझा किया कैसे, एक भयंकर आंधी के बाद, उनकी चर्च ईमारत की शानदार मीनार विरूपित हो गयी, और भय उत्पन्न कर दी l

अवश्य ही, चर्च ने शीघ्र ही उस गिरती हुए कमजोर मीनार…

नूतन हृदय चाहिए?

समाचार भयानक था l

मेरे पिता के सीने में दर्द हो रहा था, इसलिए डॉक्टर ने उनके हृदय की जांच-पड़ताल करने  के लिए जांच का आदेश दिया l परिणाम? तीन रक्तवाहनियों में अवरोध(blockages) l

फरवरी 14 के लिए तिहरा-बाईपास सर्जरी निर्धारित किया गया l यद्यपि मेरे पिता घबराए हुए थे, उन्होंने उस दिन को एक आशापूर्ण संकेत की तरह देखा l “वैलेंटाइन डे के लिए मुझे एक नया हृदय मिलनेवाला है!” और उन्हें मिला! सर्जरी बिलकुल सफल रही, और उनके पीड़ादायक हृदय में जीवन-दायक रक्त प्रवाह पुनःस्थापित हो गया-उनका “नया” हृदय l

मेरे पिता की सर्जरी ने मुझे याद दिलाया कि परमेश्वर हमें भी नया जीवन देता है l इसलिए कि पाप हमारे आत्मिक “रक्तवाहनियों को अवरुद्ध कर देता है-परमेश्वर के साथ सम्बन्ध जोड़ने की हमारी योग्यता-हमें उनको साफ़ करने के लिए आत्मिक “सर्जरी” की ज़रूरत है l

यहेजकेल 36:26 में परमेश्वर अपने लोगों के लिए इसी की प्रतिज्ञा करता है l वह इस्राएलियों को आश्वास्त करता है, “मैं तुम को नया मन दूँगा. . . और तुम्हारी देह में से पत्धर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूँगा l” उसने यह भी प्रतिज्ञा किया, “मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता . . . से शुद्ध करूँगा” (पद.25) और “अपना आत्मा तुम्हारे भीतर [दूँगा](पद.27) l ऐसे लोगों को जो आशाहीन हो गए हे, परमेश्वर ने उनके जीवनों को पुनः नूतन बनाने वाले के रूप में उनको एक नयी शुरुआत की प्रतिज्ञा दी l

वह प्रतिज्ञा आखिरकार यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा पूरी हुयी l जब हम उसपर विश्वास करते हैं, हम एक नया आत्मिक हृदय पाते हैं, ऐसा हृदय जो हमारे पाप और निराशा से शुद्ध हो चुका है l मसीह की आत्मा से भरपूर, परमेश्वर की आत्मिक जीवनशक्ति के साथ हमारा नया हृदय धड़कता है, कि “उसी तरह हम भी एक नया जीवन जीयें” (रोमियों 6:4 हिंदी C.L.) l