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Articles by एडम हॉल्ज़

आप किस ओर जा रहे हैं?

जीवन में हमारी दिशा कौन निर्धारित करता है? एकबार मैंने एक आश्चर्यजनक स्थान: मोटरसाईकिल प्रशिक्षण कोर्स, पर इस प्रश्न का उत्तर सुना। मेरे कुछ मित्र और मैं मोटरसाईकिल चलाना चाहते थे, इसलिए यह सीखने के लिए कि यह कैसे करते हैं हम ने एक क्लास ली। हमारे प्रशिक्षण के एक हिस्से को लक्ष्य निर्धारित करना कहते थे।  

“आखिरकार” हमारे निर्देशक ने कहा, “आप एक अनपेक्षित बाधा का सामना करोगे। यदि आप इसकी ओर देखते रहोगे-यदि तुम ने लक्ष्य निर्धारित किया है-तो तुम ठीक उसकी ओर जाओगे। परन्तु यदि आप ऊपर या इससे दूर देखोगे, जहाँ तुम्हें जाना है, तो तुम समान्यत: इससे बच सकते हो।” इसके बाद उसने कहा, “जिस दिशा की ओर आप देख रहे हो आप उसी ओर जाओगे।”

वह साधारण परन्तु प्रगाढ़ सिद्धांत हमारे आत्मिक जीवन पर भी लागू होता है। जब हम एक लक्ष्य को निर्धारित करते हैं-अपनी समस्याओं या संघर्षों पर केन्द्रित हो जाते हैं-तो हम अपने जीवनों को लगभग उन्हीं के चारों ओर घुमाते रहते हैं।

परन्तु पवित्रशास्त्र हमें अपनी कठिनाइयों से दूर उस व्यक्ति की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो उनमें हमारी सहायता कर सकता है। भजन संहिता 121:1 में हम पढ़ते हैं, “मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा, मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी?” फिर भजन संहिता उत्तर देती है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है...यहोवा आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (पद 2, 8)। 

कई बार हमारी बाधाएँ अजेय प्रतीत होती हैं। परन्तु परमेश्वर हमें हमारी कठिनाइयों को हमारे नजरिये पर अधिकार रखने के स्थान पर उनसे दूर देखने में हमारी सहायता करने के लिए आमन्त्रित करता है।

आशा हमारी रणनीति

मेरे यह लिखते समय मेरी पसंदीदा फुटबॉल टीम लगातार आठ मैच हार चुकी थी l हर एक हार के साथ, उनका इस मौसम में जीत पाने की आशा क्षीण होती दिखाई दे रही थी l कोच ने हर सप्ताह परिवर्तन किये किन्तु यह जीत में परिवर्तित नहीं हो सकी l अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करते हुए मैंने मज़ाक किया कि केवल एक भिन्न परिणाम की आशा गारंटी नहीं है l “आशा एक रणनीति नहीं है,” मैंने ताना मारा l

यह फुटबॉल में सही है l लेकिन हमारे आत्मिक जीवनों में, यह बिलकुल विपरीत है l परमेश्वर में आशा उत्पन्न करना एक रणनीति ही नहीं है, किन्तु विश्वास और भरोसे में उससे लिपटे रहना ही एकमात्र रणनीति है l संसार अक्सर हमें निराश करता है, किन्तु परमेश्वर की सच्चाई में आशा हमारी लंगर और अशांत समय में सामर्थ्य है l

मीका ने इस सच्चाई को समझ लिया था l इस्राएल के परमेश्वर से मुह मोड़ लेने के कारण मीका का हृदय टूट चुका था l “हाय मुझ पर ! . . . भक्त लोग पृथ्वी पर से नष्ट हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा” (7:1-2) l लेकिन उसी समय वह सच्ची आशा पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है : “परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूँगा, मैं अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर की बात जोहता रहूँगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा” (पद.7) l

कठिन समय में आशा किस तरह स्थिर रखी जा सकती है? मीका हमें दिखाता है : बाट जोहकर l इंतज़ार करके l प्रार्थना करके l याद करके l अभिभूत करनेवाली हमारी परिस्थितियों में भी परमेश्वर सुनता है l इन क्षणों में, परमेश्वर में अपनी आशा में लिपटे रहना और उसके प्रतिउत्तर में काम करना ही हमारी रणनीति है, केवल एक रणनीति जो जीवन के तूफानों को शांत कर सकता है l

आप किस ओर जा रहे हैं?

जीवन में हमारी दिशा कौन निर्धारित करता है? एकबार मैंने एक आश्चर्यजनक स्थान: मोटरसाईकिल प्रशिक्षण कोर्स, पर इस प्रश्न का उत्तर सुना। मेरे कुछ मित्र और मैं मोटरसाईकिल चलाना चाहते थे, इसलिए यह सीखने के लिए कि यह कैसे करते हैं हम ने एक क्लास ली। हमारे प्रशिक्षण के एक हिस्से को लक्ष्य निर्धारित करना कहते थे।  

“आखिरकार” हमारे निर्देशक ने कहा, “आप एक अनपेक्षित बाधा का सामना करोगे। यदि आप इसकी ओर देखते रहोगे-यदि तुम ने लक्ष्य निर्धारित किया है-तो तुम ठीक उसकी ओर जाओगे। परन्तु यदि आप ऊपर या इससे दूर देखोगे, जहाँ तुम्हें जाना है, तो तुम समान्यत: इससे बच सकते हो।” इसके बाद उसने कहा, “जिस दिशा की ओर आप देख रहे हो आप उसी ओर जाओगे।”

वह साधारण परन्तु प्रगाढ़ सिद्धांत हमारे आत्मिक जीवन पर भी लागू होता है। जब हम एक लक्ष्य को निर्धारित करते हैं-अपनी समस्याओं या संघर्षों पर केन्द्रित हो जाते हैं-तो हम अपने जीवनों को लगभग उन्हीं के चारों ओर घुमाते रहते हैं।

परन्तु पवित्रशास्त्र हमें अपनी कठिनाइयों से दूर उस व्यक्ति की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो उनमें हमारी सहायता कर सकता है। भजन संहिता 121:1 में हम पढ़ते हैं, “मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा, मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी?” फिर भजन संहिता उत्तर देती है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है...यहोवा आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (पद 2, 8)। 

कई बार हमारी बाधाएँ अजेय प्रतीत होती हैं। परन्तु परमेश्वर हमें हमारी कठिनाइयों को हमारे नजरिये पर अधिकार रखने के स्थान पर उनसे दूर देखने में हमारी सहायता करने के लिए आमन्त्रित करता है।

दन्त चिकित्सक के पास पिता

हे मेरे पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा  नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो l मत्ती 26:39
मैंने दन्त चिकित्सक के क्लिनिक में पिता के हृदय के विषय किसी गंभीर पाठ की अपेक्षा नहीं की थी-किन्तु मुझे एक मिल गयी l मैं अपने दस वर्षीय बेटे के साथ वहां था l उसके मूंह में दूध के एक दांत की जगह जो अभी टूटा नहीं थे स्थायी दांत निकल रहा था l दूध के दांत को हटना ही था l और कोई तरीका नहीं था l
मेरा बेटा रोते हुए मुझसे आग्रह करने लगा : “पापा, कोई और तरीका नहीं है क्या? क्या हम ठहर नहीं सकते? पापा, कृपया, मैं इस दांत को निकलवाना नहीं चाहता हूँ!” मुझे दुःख हुआ, किन्तु मैंने उससे कहा, “बेटा, इसे निकालना ही होगा l मुझे दुःख है l और कोई रास्ता नहीं है l” मैंने उसके हाथ को पकड़ लिया जब वह छटपटा रहा था और परेशान हो रहा था, और  दांत के डॉक्टर ने उसकी सख्त दाढ़ को निकाल दिया l उस समय मेरे आँखों में भी आँसू थे l मैं उसके दर्द को ले नहीं सकता था; उसके लिए मेरी उपस्थिति ही सबसे अच्छी बात थी l
उस क्षण, मैंने याद किया गतसमनी के बगीचे में यीशु को, वह अपने पिता से कोई और मार्ग बताने के लिए प्रार्थना कर रहा था l अपने पुत्र को ऐसी पीड़ा में देखकर पिता का हृदय किस तरह टूटा होगा! किन्तु अपने लोगों की सेवा करने के लिए और कोई मार्ग नहीं था l
हमारे जीवनों में, हम भी कभी-कभी अपरिहार्य किन्तु पीड़ादायक क्षणों का सामना करते हैं-जैसे मेरे बेटे ने सहा l किन्तु उसकी आत्मा के द्वारा हमारे लिए यीशु के कार्य के कारण, हमारे सबसे अंधकारमय क्षणों में भी हमारा प्रेमी पिता हमेशा हमारे साथ उपस्थित रहता है (मत्ती 28:20) l

चुभनेवाला काँटा

काँटा मेरी तर्जनी(Index finger) में चुभ गया, जिससे खून निकल आया l मैं जोर से चिल्लाया और फिर कराहते हुए सहज-ज्ञान से अपनी उँगली पीछे खींच ली l किन्तु मुझे चकित होना नहीं चाहिए था : जो कुछ हुआ वह बाग़बानी दास्तान पहने बगैर एक कटीली झाड़ी को काटने का परिणाम था l
मेरी उँगली में दर्द और उसमें से खून बहना की ओर ध्यान देना ज़रूरी था l और पट्टी खोजते समय, मैं अचानक अपने उद्धारकर्ता के विषय सोचने लगा l आखिरकार, सिपाहियों ने यीशु को काँटों का एक मुकुट पहनने को विवश किया (यूहन्ना 19:1-3) l अगर एक काँटे से इतनी तकलीफ़ होती है, मैंने सोचा, तो पूरे काँटों के एक ताज से कितना दर्द हुआ होगा? और यह शारीरिक दुःख का केवल एक छोटा सा भाग था l उसकी पीठ पर कोड़े मारे गए l कीलें उसकी हथेली और पैरों में ठोंके गए l एक भाला उसके पंजर में बेधा गया l
किन्तु यीशु आत्मिक दुःख भी सहा l यशायाह 53 का पद 5 हमसे कहता है, “परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शांति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी l ”जिस “शांति” की बात यशायाह यहाँ करता है वह क्षमा ही है l यीशु ने खुद को बेधने दिया-एक तलवार से, कीलों से, काँटों के ताज से-ताकि हम परमेश्वर की ओर से आत्मिक शांति पा सकें l वह बलिदान, हमारे पक्ष में उसके मरने की इच्छा, पिता के साथ सम्बन्ध बनाने का मार्ग तैयार कर दिया l और वचन कहता है कि उसने ऐसा किया मेरे लिए, आपके लिए l

हमारा गानेवाला पिता

तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे बीच में है, वह उद्धार करने में पराक्रमी है; वह तेरे कारण आनंद से मगन होगा, वह अपने प्रेम के मारे चुपका रहेगा; फिर ऊँचे स्वर से गाता हुआ तेरे कारण मगन होगा l सपन्याह 3:17
गीत गाना कितना विशेष है, हमारे परिवार में बच्चों के जन्म से पूर्व किसी ने हमें यह नहीं बताया l अब मेरे बच्चे छः, आठ, और दस वर्ष के हैं l किन्तु उन सभी को छोटी उम्र में नींद की समस्या थी l प्रति रात्रि, बारी-बारी से हम दोनों पति-पत्नी अपने छोटे बच्चों को अपनी बाहों में डोलाते थे और प्रार्थना करते थे कि वे सो जाएँ l मैंने इस आशा से कि वे जल्दी सो जाएँ उनको सैंकड़ों घंटे अपनी बाहों में डोलाया है और लोरियाँ सुनायी है l किन्तु हर रात्रि में बच्चों को लोरियाँ सुनाते समय कुछ आश्चर्यजनक हुआ : मेरी कल्पना से अधिक मेरा प्रेम और आनंद उनके प्रति गहरा होता गया l
क्या आप जानते हैं कि वचन स्वर्गिक पिता का अपने बच्चों के लिए गीत गाने का वर्णन करता है? जिस प्रकार मैं गीत गाकर अपने बच्चों को शांत कर रहा था, उसी प्रकार सपन्याह स्वर्गिक पिता को अपने लोगों के लिए गाने वाले के रूप को दर्शा कर अपने पुस्तक का अंत  करता है : “वह तेरे कारण आनंद से मगन होगा, वह अपने प्रेम के मारे . . . ऊँचे स्वर से गाता हुआ तेरे कारण मगन होगा” (3:17) l
सपन्याह की भविष्यसूचक पुस्तक का अधिक भाग परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले लोगों को आसन्न न्याय की चेतावनी देता है l किन्तु पुस्तक वहां पर समाप्त नहीं होता l सपन्याह आसन्न न्याय के साथ समाप्त नहीं करता है किन्तु अपने लोगों को उनके दुःख से बचाने के साथ-साथ (पद.19-20) गीत गाकर कोमल प्रेम और आनंद प्रगट करते हुए समाप्त करता है (पद.17) l
हमारा परमेश्वर केवल “उद्धार करने में पराक्रमी” (पद.17) नहीं है किन्तु एक प्रेमी पिता है जो हमारे लिए कोमलता से प्रेम गीत भी गाता है l

परमेश्वर के मार्ग पर चलना

“हम इस  रास्ते जा रहे हैं,” भीड़ में अपनी पत्नी और बेटियों के साथ चलते हुए मैंने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर उसे उनके पीछे चलने को कहा l मनोरंजन पार्क में अपने परिवार के साथ घूमते हुए मैंने कई बार ऐसा किया था l मेरा बेटा थक चुका था और आसानी से विचलित हो रहा था l वह क्यों नहीं उनके पीछे चलता है?  मैंने सोचा l

तब मुझे याद आया : कितनी बार मैं भी ऐसा ही करता हूँ? कितनी बार अनाज्ञाकारिता के कारण मैं परमेश्वर के विमुख हो जाता हूँ, परीक्षाओं से वशीभूत होकर उसकी इच्छा से दूर भागता हूँ?

इस्राएल के परमेश्वर की ओर से यशायाह के शब्दों पर विचार करें : “जब कभी तुम दाहिनी या बाईं ओर मुड़ने लगो, तब तुम्हारे पीछे से यह वचन तुम्हारे कानों में पड़ेगा, “मार्ग यही है, इसी पर चलो” (30:21) l इस अध्याय के आरम्भ में, परमेश्वर ने अपने लोगों को ढिठाई के लिए ताड़ित किया था l किन्तु यदि वे अपने मार्ग की बजाए उसकी सामर्थ्य पर भरोसा करते (पद.15), वह अनुग्रह और दया दिखाने की प्रतिज्ञा करता है (पद.18) l

परमेश्वर के अनुग्रह का एक प्रगटीकरण पवित्र आत्मा द्वारा हमारा मार्गदर्शन करने की प्रतिज्ञा है l यह तब होता है जब हम उससे अपनी इच्छाओं के विषय बातचीत करते हैं और प्रार्थना में अपने लिए उसकी इच्छा पूछते हैं l मैं धन्यवादित हूँ कि जब हम परमेश्वर पर भरोसा करके उसकी आवाज़ सुनते हैं, वह प्रतिदिन, हर कदम पर हमारा मार्गदर्शन करता है l

कार्य प्रगति पर या सम्पन्न?

हर महीने "कार्य प्रगति पर" से "कार्य सम्पन्न” तक मेरी जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं। मुझे कार्य “सम्पन्न” का बटन दबाना पसंद है। सोचता हूँ, काश इतने ही सहज रूप से मैं अपने विश्वास की खामियों पर भी विजय पा सकता! मसीही जीवन प्रगति पर होता है, सम्पन्न नहीं।

"क्योंकि उस ने... (इब्रानियों 10:14)”। अर्थात एक मायने में, "कार्य सम्पन्न बटन" दबा दिया गया है । यीशु की मृत्यु ने हमारे लिए वह किया जिसे हम स्वयं के लिए नहीं कर सकते थे: जब हम उन पर विश्वास करते हैं वह हमें परमेश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य बनाते हैं। “पूरा हुआ”, जैसा कि यीशु ने कहा (यूहन्ना 19:30)। विडंबना यह है कि भले ही उनका बलिदान पूर्ण और सम्पन्न है, हमें अपना जीवन इस आत्मिक वास्तविकता में जीना होता है कि "हम पवित्र किए जाते हैं"।

यह समझना जटिल है कि, जिस कार्य को यीशु ने पूरा किया उसका सम्पन्न होना हमारे जीवन में अब भी प्रगति पर है। अपने आत्मिक संघर्ष में यह याद रखना उत्साहजनक है कि मेरे लिए और आपके लिए यीशु का बलिदान- पूरा हो चुका है...भले ही जीवन-भर `उसके सम्पन्न होने का कार्य प्रगति पर रहे’। परमेश्वर के प्रयोजनों के अंततः पूरा होने तक: हम उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश कर बदलते जाते हैं (2 कुरिन्थियों 3:18 देखें )।   

वह मुस्कुराता हुआ व्यक्ति

किराने की दुकान पर जाना मुझे पसन्द नहीं पर रोजमर्रा के जीवन में–यह करना पड़ता है।

मुझे फ्रेड की लाइन में बिलिंग करवाने का इंतजार रहता है। फ्रेड, बिलिंग के कारम को शो-टाइम बना देता है। वह अद्भुत फुर्ती से, होठों पर हमेशा मुस्कुराहट के साथ नाचते-गाते और उछालते हुए सामान को एक प्लास्टिक बैग में डालता है। वह ऐसा काम अनन्दित होकर करता है जिसे सबसे ग़ैरदिलचस्प समझा जाता है। पलभर के लिए ही सही, उसका उत्साह भले ही, लोगों के मन को आनन्दित कर देता है।

काम करने के इस अंदाज से फ्रेड ने मेरे सम्मान और प्रशंसा को जीत लिया है। उसका खुशनुमा आचरण, सेवा की इच्छा, और छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना कुलुस्सियों 3:23 में प्रेरित पौलुस की सलाह के अनुरूप है, कि काम के प्रति हमारा क्या व्यवहार होना चाहिए: "और जो कुछ...।"

जब हमारा संबंध यीशु के साथ हो, तो जो भी काम हमें करना पड़े, वह हमें अपने जीवन में उनकी उपस्थिति को प्रतिबिंबित करने का अवसर देता है। कोई काम बहुत छोटा या बहुत बड़ा नहीं होता! अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए-चाहे वे जो भी हों-आनंदात्मक, रचनात्मकता और उत्कृष्ट तरीके से काम करने से हमें अपने आसपास के लोगों को प्रभावित करने का मौका मिलता है, चाहे हमारा काम जो भी हो।