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Articles by आदम अर होल्ज़

परमेश्वर केंद्रित

जब मैं सगाई की अंगूठियों की खरीदारी कर रहा था, तो मैंने बिल्कुल सही हीरे की तलाश में कई घंटे बिताए। मैं इस विचार से त्रस्त था, क्या होगा अगर मैं सबसे उत्तम पाने से चूक गया?

आर्थिक मनोवैज्ञानिक बैरी श्वार्ट्ज के अनुसार, मेरा ज़्यादातर अनिर्णय होना इशारा करता है कि मैं वह हूं जिसे वह "संतोषकर्ता" के विपरीत "अधिकतम" कहता है। एक संतोष करने वाला व्यक्ति इस आधार पर चुनाव करता है कि उसकी जरूरतों के लिए कुछ पर्याप्त है या नहीं। अधिकतमकर्ता? हमारी ज़रूरत हमेशा उत्तम चुनाव करने की रहती है (दोषी!)। हमारे सामने कई विकल्पों के कारण अनिर्णय का संभावित परिणाम? चिंता, अवसाद और असंतोष। वास्तव में, समाजशास्त्रियों ने इस घटना के लिए एक और वाक्यांश गढ़ा है: चूक जाने का डर।

हमें निश्चित रूप से पवित्रशास्त्र में अधिकतमकर्ता या संतोषकर्त्ता शब्द नहीं मिलेंगे। लेकिन हम इसी प्रकार का विचार ज़रूर पाते है। 1 तीमुथियुस में, पौलुस ने तीमुथियुस को चुनौती दी कि वह इस दुनिया की वस्तुओं के विपरीत परमेश्वर में मूल्य खोजें। दुनिया द्वारा पूरे होने के लिए किए गए वादे कभी भी भरपूरी से पूरे नहीं हो सकते। पौलुस चाहता था कि तीमुथियुस इसके बजाय अपनी पहचान को परमेश्वर में बढ्ने दे: "संतोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है" (6:6)। पौलुस एक संतुष्ट व्यक्ति की तरह लगता है जब वह आगे कहता है, "यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्हीं पर संतोष करना चाहिए" (पद 8)।

जब मैं उन असंख्य तरीकों के बारे में सोचता हूं, जिन्हें दुनिया पूरा करने का वादा करती है, तो मैं आमतौर पर बेचैन और असंतुष्ट हो जाता हूं। लेकिन जब मैं परमेश्वर पर ध्यान केंद्रित करता हूं और अधिकतम करने के लिए अपने बलपूर्वक आग्रह को त्याग देता हूं, तो मेरी आत्मा वास्तविक संतोष और शांति की ओर बढ़ती है।

हमारे लिए जगह तैयार करना

हमारा परिवार एक पिल्ला लाने की योजना बना रहा था, इसलिए मेरी ग्यारह वर्ष की बेटी ने महीनों तक खोज की। वह जानती थी कि कुत्ते को क्या खाना चाहिए और उसे एक नए घर में कैसे परिचित कराना है─असंख्य अन्य विवरणों के साथ।

उसने मुझसे कहा, पिल्लों को सबसे अच्छा लगता है अगर उन्हें एक समय में एक कमरे से परिचित किया जाए। इसलिए हमने सावधानी से एक अतिरिक्त कमरा तैयार किया। मुझे यकीन है कि हमारे नए पिल्ले को पालते हुए अन्य और आश्चर्य होंगे, लेकिन मेरी बेटी की खुशी से भरी तैयारी इससे अधिक गहन नहीं हो सकती थी।

जिस तरह से मेरी बेटी ने पिल्ले की आने की उत्सुकता अपनी प्रेम भरी तैयारी करके दिखाई, उसने मुझे मसीह की अपने लोगों के साथ जीवन साझा करने की लालसा और उनके लिए एक घर तैयार करने के उनके वादे की याद दिला दी। अपनी सांसारिक सेवकाई के अंत के निकट, यीशु ने अपने चेलों से उस पर भरोसा करने का आग्रह करते हुए कहा, "तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो; मुझ पर भी विश्वास करो" (यूहन्ना 14:1)। फिर उसने वादा किया कि “[उनके] लिए जगह तैयार करेंगे  . . . कि [वे] भी वहीं हों जहां [वह है]” (पद.3)।

चेलों को जल्द ही संकट का सामना करना था। लेकिन यीशु चाहता था कि वे जानें कि वह उन्हें अपने घर लाने के लिए काम पर लगा है।

मैं और कुछ तो नहीं पर अपनी बेटी की सचेत इरादे से भर कर हमारे नए पिल्ले के लिए तैयारियों में आनंद कर सकता था। लेकिन मैं केवल कल्पना कर सकता हूं कि हमारा उद्धारकर्ता अपने प्रत्येक जन के लिए जो उसके साथ अनन्त जीवन बिताएंगे अपनी विस्तृत तैयारी में कितना अधिक प्रसन्न होगा (पद.2)।

पलायन या शांति?

हॉट-टब दुकान का विज्ञापन-पट्ट कह रहा था "पलायन" । यह मेरा ध्यान आकर्षित करता है - और मुझे सोचने पर मजबूर करता है। मैंने और मेरी पत्नी ने हॉट टब लेने के बारे में बात की है . . .  किसी दिन। यह हमारे पिछवाड़े में एक छुट्टी की तरह होगा! सफाई के अलावा। और बिजली का बिल। और... अचानक, बचने-की-उम्मीद कुछ ऐसी लगने लगती है जिससे मुझे बचने की आवश्यकता हो।

फिर भी, यह शब्द इतने प्रभावशाली ढंग से लुभाता है क्योंकि यह कुछ ऐसा वादा करता है जो हम चाहते हैं : राहत। आराम। सुरक्षा। पलायन । यह कुछ ऐसा है जो हमारी संस्कृति हमें कई तरीकों से लुभाती और चिढ़ाती है। अब, आराम करने या किसी खूबसूरत जगह पर पलायन करने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन जीवन की कठिनाइयों से बचने और उनके साथ परमेश्वर पर भरोसा करने में अंतर है।

यूहन्ना 16 में, यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि उनके जीवन का अगला अध्याय उनके विश्वास की परीक्षा लेगा। "इस संसार में तुम्हें क्लेश होगा," वह अंत में सारांशित करता है। और फिर वह इस वादे को जोड़ता है, "परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (पद 33)। यीशु नहीं चाहता था कि उसके चेले निराशा के आगे झुकें। इसके बजाय, उसने उन्हें उस पर भरोसा करने के लिए आमंत्रित किया, बाकी को जानने के लिए जो वह प्रदान करता है : "मैंने तुम्हें ये बातें बताई हैं," उसने कहा, "ताकि मुझ में तुम्हें शांति मिले" (पद 33)।

यीशु ने हमें दर्द-मुक्त जीवन का वादा नहीं किया है। लेकिन वह वादा करता है कि जब हम उस पर भरोसा करते हैं और आराम करते हैं, तो हम एक ऐसी शांति का अनुभव कर सकते हैं जो दुनिया द्वारा हमें बेचने की कोशिश करने वाले किसी भी पलायन से अधिक गहरी और अधिक संतोषजनक है।

एक दिन क्रिसमस के करीब

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि क्रिसमस खत्म हो गया है," मेरी उदास बेटी ने कहा।

मुझे पता है कि वह कैसा महसूस करती है : क्रिसमस के बाद नीरस लग सकता है। उपहार खोल दिए गए हैं। क्रिसमस-पेड़ और बत्तियाँ हटानी है l उदासीन जनवरी──और, कई लोगों के लिए, छुटियों में बढ़े वजन को घटाने की जरूरत है। क्रिसमस──और इसके साथ आने वाली बेदम अपेक्षा──अचानक बहुत दूर महसूस होती है।

कुछ साल पहले, जब हम क्रिसमस की चीजों को रख रहे थे, मुझे एहसास हुआ : कैलेंडर चाहे जो भी कहे, हम हमेशा एक दिन अगले क्रिसमस के करीब होते हैं। यह कुछ ऐसा हो गया है जो मैं अक्सर कहता हूं।

लेकिन क्रिसमस के हमारे अस्थायी उत्सव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसके पीछे की आध्यात्मिक वास्तविकता है : यीशु ने हमारे संसार में जो उद्धार लाया और उसकी वापसी के लिए हमारी आशा। पवित्रशास्त्र बार-बार मसीह के दूसरे आगमन को देखने, प्रतीक्षा करने और लालसा करने के बारे में बात करता है। फिलिप्पियों 3:15-21 में पौलुस जो कहता है, मुझे वह पसंद है। वह दुनिया के जीने के तरीके की तुलना करता है - "पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं" (पद 19) के साथ - यीशु की वापसी में आशा द्वारा आकार की जीवन शैली के साथ : "हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बात जोह रहे हैं” (पद 20)।

यह वास्तविकता कि हमारी "नागरिकता स्वर्ग में है" सब कुछ बदल देती है, जिसमें हम क्या उम्मीद करते हैं और हम कैसे जीते हैं शामिल है। यह आशा इस ज्ञान से दृढ़ होती है कि हर गुजरते दिन के साथ, हम वास्तव में एक दिन यीशु की वापसी के करीब हैं।

दुर्बलताएँ(The Dwindles)

यह मेरे कंठ में एक सुरसुराहट की तरह शुरू हुआ l उह ओह, मैंने सोचा l वह सुरसुराहट इन्फ्लुएंजा निकला l और वह केवल श्वसनी पीड़ा (bronchial affliction) का आरम्भ था l इन्फ़्लुएन्ज़ा ने काली खांसी का रूप ले लिया──जी हाँ, वह काली खांसी──और वह निमोनिया में बदल गया l 

आठ सप्ताह तक शरीर को नाश करनेवाली खांसी ने──इसे यूँ ही काली खांसी नहीं कहा जाता है──मुझे विनीत कर दिया l मैं खुद को वृद्ध नहीं मानता l लेकिन मैं उस दिशा में आगे बढ़ने के विषय सोचना आरम्भ करने के लिए पर्याप्त उम्र का हूँ l चर्च में मेरे छोटे समूह के एक सदस्य के पास उन स्वास्थ्य मामलों के लिए जो हमारे उम्र में बढ़ने के साथ आक्रमण करते हैं एक मजेदार नाम है : “दुर्बलता(The Dwindles) l” लेकिन इन दुर्बलताओं के “कार्य करने” के विषय कुछ भी हास्यमय नहीं है l 

2 कुरिन्थियों 4 में, पौलुस ने भी──अपने तरीके से──“दुर्बलता” के बारे में लिखा l वह अध्याय उसके और उसके टीम के द्वारा सहे गए सताव का वर्णन करता है l अपने मिशन को पूरा करने में एक भारी कीमत चुकाना पड़ा था l हमारा “बाहरी मनुष्यत्व नष्ट होता” गया, उसने स्वीकार किया l लेकिन यद्यपि उसका शरीर विफल होता गया──उम्र, सताव, और कठोर स्थितियों के कारण──पौलुस थामने वाली अपनी आशा को मजबूती से पकड़ा रहा : “हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है” (पद.16) l उसने बल दिया, “हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश,” जो हमारे आगे है उसका मुकाबला नहीं कर सकता जो “हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और अनंत महिमा उत्पन्न करता जाता है” (पद.17) l 

यहाँ तक कि जब मैं आज रात को लिख रहा हूँ, दुर्बलता मेरे सीने पर पंजा मारती है l लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे जीवन में और या किस और के जो मसीह से लिपटा रहता है, अंतिम निर्णय उनका नहीं है l 

लिपट जाना

“डैडी, क्या आप मेरे लिए पढेंगे?” मेरी बेटी ने पूछा l किसी बच्चे के लिए माता-पिता से इस प्रकार का प्रश्न करना असामान्य नहीं है l लेकिन मेरी बेटी अब ग्यारह वर्ष की है l इन दिनों, इस तरह के अनुरोध उस समय से कम होते हैं जब वह छोटी थी l “हाँ,” मैंने खुशी से कहा, और वह सोफे पर मेरे बगल में सिमट कर बैठ गयी l

जब मैं उसके लिए पढ़ रहा था, वह मानो मुझ से लिपट गयी l माता-पिता के रूप में वह उन शानदार क्षणों में से एक था, जब हम शायद हमारे लिए हमारे पिता के सिद्ध प्यार को महसूस करते है और हमारे लिए उसकी गहरी इच्छा कि हम उसकी उपस्थिति और हमारे लिए उसके प्रेम में “समा जाएँ l”

मुझे उस पल एहसास हुआ कि मैं बहुत हद तक अपने ग्यारह साल के बच्चे की तरह हूँ l अधिकांश समय, मैं स्वतंत्र होने पर ध्यान केंद्रित करता हूँ l हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम के स्पर्श से दूर होना कितना सरल है, एक कोमल और सुरक्षात्मक प्रेम जिसका वर्णन भजन 116 “अनुग्रहकारी और धर्मी . . . दया करनेवाला” के रूप में करता है (पद.5) l यह एक प्यार है जहां, मेरी बेटी की तरह, मैं परमेश्वर की गोद में सिमट सकता हूँ, घर पर मेरे लिए उसकी खुशी में l

भजन 116:7 बताता है कि हमें नियमित रूप से अपने आप को परमेश्वर के अच्छे प्रेम की याद दिलाना पड़ सकता है, और फिर प्रतीक्षा कर रही उसकी बाहों में सिमट जाना : “हे मेरे प्राण, तू अपने विश्रामस्थान में लौट आ; क्योंकि यहोवा ने तेरा उपकार किया है l” और वास्तव  में, उसने किया है l

भय का तूफ़ान

हाल ही में मैंने एक टीवी विज्ञापन में देखा, एक महिला यूँ ही टीवी देखने वाले समूह में किसी से पूछती है, “मार्क, आप क्या खोज रहे हैं?” “खुद का एक संस्करण जो भय के आधार पर निर्णय नहीं लेता है,” वह सादगी से उत्तर देता है - यह एहसास नहीं करते हुए कि वह सिर्फ यह पूछ रही थी कि उसे टीवी पर क्या देखना पसंद है!
ठहरो, मैंने सोचा l मैं यह आशा नहीं कर रहा था कि एक टीवी विज्ञापन मुझपर इतनी गहराई से प्रहार करेगा! लेकिन मैं बेचारे मार्क से संबंधित था : कभी-कभी मैं भी उस तरह से शर्मिंदा महसूस करता हूँ जिस तरह कभी-कभी प्रतीत होता है कि डर मेरे जीवन को चला रहा है l
यीशु के शिष्यों ने भी डर की अथाह शक्ति का अनुभव किया l एक बार, जब वे गलील की झील के पार जा रहे थे (मरकुस 4:35), “तब बड़ी आँधी” आयी (पद.37) l डर ने उन्हें जकड़ लिया, और उन्होंने सुझाव दिया कि यीशु (जो सो रहा था!) शायद उनकी परवाह नहीं करेगा : “हे गुरु, क्या तुझे चिंता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?” (पद.38) l
डर ने शिष्यों की दृष्टि को विकृत कर दिया, जिसके कारण वे उनके लिए यीशु के अच्छे इरादों को देखने में असमर्थ हो गए l आंधी और लहरों को डांटने के बाद (पद.39), मसीह ने दो तीखे प्रश्नों के साथ चेलों का सामना किया : “तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?” (पद.40) l
तूफान हमारे जीवनों में भी उठते हैं, क्या ऐसा नहीं है? लेकिन यीशु के सवाल हमें अपने डर को परिप्रेक्ष्य में रखने में मदद कर सकते हैं l उनका पहला सवाल हमें अपने डर को नाम देने के लिए आमंत्रित करता है l दूसरा हमें उन विकृत भावनाओं को उसे सौंपने के लिए आमंत्रित करता है – उससे देखने वाली आँखें मांगता है कि वह जीवन के सबसे उग्र तूफानों में भी हमारा मार्गदर्शन कैसे करता है l

फलने-फूलने के लिए छाँटा गया

जब मैंने एक भौंरा को फूलों की झाड़ी पर हल्के से बैठते देखा, मैंने झाड़ी की हरी-भरी शाखाओं को रंगों से विस्फोटित होते देख अचम्भा किया l इसके चमकदार नीले रंग के फूल मेरी आंखों को तथा मधुमक्खियों को समान रूप से आकर्षित कर रहा था l यद्यपि पिछले शरद ऋतू में, मैं सोच रहा था कि क्या वे फिर से कभी खिलेंगे l जब मेरी पत्नी के माता-पिता ने पेरिवंकल पौधे (periwinkle plant) को ठूंठ तक छाँट दिया, तो मैंने सोचा कि उन्होंने इससे छुटकारा पाने का फैसला किया है l लेकिन अब मैं छांटने जो मुझे क्रूर लगा था के उज्ज्वल परिणाम को देख रहा था l
कठोरता से काटने का एक परिणाम आश्चर्यजनक सुन्दरता का एक कारण हो सकता है कि यीशु ने विश्वासियों के मध्य परमेश्वर के कार्य को समझाने के लिए छांटने की छवि का उपयोग करने का चुनाव किया l यूहन्ना 15 में, वह कहता है, “सच्ची दाखलता मैं हूँ, और मेरा पिता किसान है l जो डाली मुझ में है और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है . . . ताकि और फले” (पद.1-2) l
यीशु के शब्द हमें याद दिलाते हैं कि अच्छे और बुरे समय में, परमेश्वर हमेशा आध्यात्मिक नवीकरण और फलप्रदता की ओर काम करता जाता है (पद.5) l दुख या भावनात्मक बंजरता की “छंटाई” के मौसम के दौरान, हम सोच सकते हैं कि क्या हम फिर कभी पनपेंगे l लेकिन मसीह हमें उसके निकट रहना जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करता है : “जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते” (पद.4) l
जैसा कि हम लगातार यीशु से आध्यात्मिक पोषण प्राप्त करते हैं, परिणामस्वरूप हमारे जीवन में सुंदरता और परिपूर्णता (पद. 8) परमेश्वर की भलाई दिखेगा l

यीशु की गति से चलना

हाल ही में, मेरी कार में कुछ काम होना था l मेरे घर से करीब एक मील दूर मैकेनिक की दुकान थी । इसलिए मैंने पैदल ही घर जाने का फैसला किया । लेकिन जैसे ही मैं एक हलचल वाले सार्वजनिक मार्ग से होकर जाना चाहा,  मैंने कुछ देखा : अन्य हर कोई इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा था ।

यह रॉकेट विज्ञान नहीं है । पैदल चलने वालों की तुलना में कारें तेजी से आगे बढ़ती हैं । ज़िप, ज़िप, ज़िप! जब मैं धीमी गति से घर जा रहा था, मैंने कुछ अहसास किया : हम इतनी तेजी से आगे बढ़ने के आदी हैं l पूरे समय । फिर, एक और अहसास : मैं अक्सर ईश्वर से अपेक्षा करता हूं कि वह भी उतनी ही गति से काम करे l मैं चाहता हूं कि उसकी योजनाएं मेरे शीघ्र समय-सारिणी के अनुरूप हों ।

जब यीशु पृथ्वी पर था, तब उसकी कदाचित मंद गति कभी-कभी उसके मित्रों को निराश करती थी । यूहन्ना 11 में, मरियम और मार्था ने कहला भेजा कि उनका भाई, लाजर बीमार था । वे जानते थे कि यीशु मदद कर सकता था (पद.1-3) । लेकिन लाजर की मृत्यु के बाद, वह चार दिन बाद पहुँचा (पद.17) l मार्था ने यीशु से कहा, “हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता (पद.21) l अनुवाद : यीशु तेजी से आगे नहीं बढ़ा l लेकिन उसकी योजना और बड़ी थी : लाजर को मृत्यु से जिलाना (पद.38-44) l

क्या आप मार्था की हताशा से जुड़ सकते हैं?  मैं जुड़ सकता हूँ l कभी-कभी, मैं चाहता हूँ कि यीशु प्रार्थना का जवाब देने के लिए अधिक तेज़ी से आगे बढ़े l कभी-कभी, ऐसा लगता है कि वह विलंबित है l लेकिन यीशु का संप्रभु कार्यक्रम हमारे से अलग है । वह बचाने का अपना कार्य अपनी समय सारिणी पर करता है,  हमारी नहीं । और अंतिम परिणाम उसकी महिमा और अच्छाई को उन तरीकों से प्रदर्शित करता है जो हमारी योजनाओं से बहुत महान हैं l