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Articles by ऐनी सिटास

मैं केवल यही देखता हूँ

सर्दियों के एक जमा देने वाले दिन क्रिस्टा खड़ी हो कर झील के साथ ही बने हुए बर्फ से ढके सुन्दर लाईटहाउस को देख रही थी। जैसे ही उसने फोटो लेने के लिए अपने फोन को बाहर निकाला, उसके चश्मे के शीशों पर धुंध जम गई। वह कुछ भी नहीं देख पाई, तो उसने अपने कैमरे को लाईटहाउस की ओर करने का निर्णय किया और अलग-अलग कोणों से तीन-चार तस्वीरें खींच ली। बाद में देखने पर उसे पता चला कि कैमरा तो “सेल्फी” लेने के लिए सैट किया हुआ था और उसने हंसते हुए कहा, “मेरा केन्द्र तो मैं और मैं और मैं ही थी।” क्रिस्टा की तस्वीरों ने मुझे ऐसी ही एक गलती को याद दिलाया: कि हम इतने आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं कि हम परमेश्वर की बड़ी योजना को अपनी दृष्टि से ओझल कर देते हैं।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     यीशु का चचेरा भाई यूहन्ना स्पष्ट रीति से जानता था कि उसका केन्द्र वह स्वयं नहीं था। आरम्भ से ही उसने पहचान लिया था कि उसका स्थान या बुलाहट परमेश्वर के पुत्र यीशु की ओर संकेत करने की थी । जब उसने यीशु को उसके और उसके शिष्यों की ओर आते हुए देखा, तो उसने कहा, “देखो परमेश्वर का मेमना!” (यूहन्ना 1:29)। उसने कहना जारी रखा, “मैं जल से बपतिस्मा देता हुआ आया कि वह इस्राएल पर प्रगट हो जाए। (पद 31)। जब कुछ समय बाद यूहन्ना के शिष्यों ने सूचना दी कि यीशु के शिष्य बन रहे हैं, यूहन्ना ने कहा, “तुम तो आप ही मेरे गवाह हो कि मैं ने कहा, ‘मैं मसीह नहीं, परन्तु उसके आगे भेजा गया हूँ।...अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।” (यूहन्ना 3:28-30)।

परमेश्वर करे कि हमारे जीवनों का केन्द्र बिन्दु यीशु और उसे अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करना हो। 

वह किस प्रकार का उद्धारकर्ता है?

पिछले वर्ष, कुछ मित्रों ने और मैंने तीन महिलाओं की चंगाई के लिए प्रार्थना की, जो कैंसर के साथ संघर्ष कर रही थींl हम जानते थे कि परमेश्वर में ऐसा करने की सामर्थ थी और हम ने उससे ऐसा करने के लिए प्रतिदिन प्रार्थना कीl हम ने बीते समय में उसे कार्य करते हुए देखा था और हमें विश्वास था कि वह ऐसा फिर से कर सकता थाl हम में से प्रत्येक के संघर्ष में ऐसे दिन आए, जिनमें ऐसा लगा कि चंगाई वास्तविकता में बदल गई है और हम सभी ने खुशी मनाईl परन्तु उस पतझड़ में उन सभी की मृत्यु हो गईl कुछ लोगों ने कहा कि यही “अन्तिम चंगाई” थी और एक तरह से यह थी भीl परन्तु फिर भी उस हानि ने हमें गहरा दुःख पहुँचायाl हम चाहते थे वह उन सभी को-यहीं और अभी-चंगा कर दे, परन्तु क्या कारण रहे यह हम कभी भी नहीं समझ पाए, कि कोई चमत्कार नहीं हुआl   

कुछ लोग उन चमत्कारों के कारण, जो उसने किए और अपनी आवश्यकताओं को पूरा करवाने के लिए यीशु के पीछे आए (यूहन्ना 6:2, 26)l कुछ लोगों ने उसे बस एक बढ़ई के पुत्र के रूप में देखा (मत्ती 13:55-58), और कुछ लोगों ने उससे उनके राजनीतिक अगुवे होने की आशा की (लूका 19:37-38)l कुछ लोगों ने उसे एक महान शिक्षक माना (मत्ती 7:28-29), जबकि कुछ लोगों ने उसके पीछे आना समाप्त कर दिया क्योंकि उसकी शिक्षा समझने में कठिन थी (यूहन्ना 6:66)l

यीशु अब भी हमारी उन सब अपेक्षाओं को हमेशा पूरा नहीं करता जो हम उससे रखते हैंl तौभी, वह हमारी कल्पना से बहुत बढ़कर हैl वह अनन्त जीवन प्रदान करने वाला है (पद 47-48) l वह भला और बुद्धिमान है; और वह प्रेम करता है, क्षमा करता है, हमारे निकट रहता है और हमें आराम प्रदान करता हैl ऐसा हो हम यीशु में जैसा वह है, वैसे में ही आराम प्राप्त करें और उसके पीछे चलते रहेंl

जहाँ हमें आशा मिलती है

एलिज़ाबेथ बहुत समय से ड्रग की लत से संघर्ष कर रही थी, और उससे छुटने के बाद अब उसके बदले दूसरों को मदद करना चाहती थी l इसलिए वह नाम रहित छोटे-छोटे पर्चे लिखकर अपने शहर में यहाँ-वहां रखने लगी l एलीजाबेथ इनको कारों की विंडशील्ड वाइपर के नीचे दबा देती है और पार्कों में खम्बों पर लगा देती है l पहले वह खुद आशा के संकेत खोजती थी; अब वह इन संकेतों को दूसरों के लिए छोड़ देती है l उनके एक पर्चे के अंत में यह लिखा था : “अत्यधिक प्रेम l आशा भेजी गयी l”

प्रेम के साथ आशा – यही तो यीशु देता है l वह प्रतिदिन हमारे लिए अपना प्रेम लाता है और अपनी आशा से हमें सामर्थी बनता है l उसका प्रेम सीमित नहीं है किन्तु बहुतायत से उसके हृदय से हमारे हृदयों में उदारतापूर्वक उंडेला जाता है l “हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे कितना प्रेम करता हैं, क्योंकि उसने हमारे हृदयों को अपने प्रेम से परिपूर्ण करने के लिए हमें पवित्र आत्मा दिया है” (रोमियों 5:5) l वह कठिन समयों का उपयोग हममें धीरज और चरित्र विकसित करने और संतुष्ट और आशा से परिपूर्ण जीवन देने के लिए करता है (पद. 3-4) l और जब हम उससे दूर होते हैं, उस समय भी, वह हमसे प्रेम करता है (पद.6-8) l

क्या आप आशा के संकेत ढूंढ़ रहे हैं? प्रभु हमें उसके साथ सम्बन्ध विकसित करने के लिए निमंत्रण देकर प्रेम से आशा देता है l  परिपूर्ण जीवन के लिए हमारी आशा उसके अपराजित प्रेम में स्थिर है l

क्रूस का दृष्टिकोण

मेरे सहकर्मी टॉम के डेस्क पर 8 इंच चौड़ा और 12 इंच लम्बा क्रूस रखा हुआ है l उसका मित्र, फिल ने जो कैंसर के रोग से बच गया, उसे यह इसलिए दिया ताकि टॉम सब कुछ को “क्रूस के दृष्टिकोण” से ही देख सके l कांच का वह क्रूस परमेश्वर के प्रेम का और उसके लिए उसकी भली इच्छा का ताकीद है l

मसीह में यह सभी विश्वासियों के लिए चुनौतीपूर्ण विचार है, विशेषकर कठिन दिनों में l परमेश्वर के प्रेम की अपेक्षा अपनी समस्याओं पर केन्द्रित होना अधिक सरल है l

प्रेरित पौलुस का जीवन अवश्य ही क्रूस का दृष्टिकोण रखनेवाला एक उदहारण था l सताव के समय उसने खुद के विषय कहा कि “सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते, गिराए तो ज़ाते हैं, पर नष्ट नहीं होते” (2 कुरिं. 4:9) l उसका विश्वास था कि कठिन दिनों में, परमेश्वर काम करता है, “हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और अनंत महिमा उत्पन्न करता जाता है; और हम तो देखी हुई वस्तुओं पर नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं” (पद.17-18) l

अनदेखी वस्तुओं को देखते” रहने का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी समस्याओं को घटाते हैं l पॉल बर्नेट अपनी टीका में इस परिच्छेद की व्याख्या इस तरह करते हैं, “[हमारे लिए] परमेश्वर के उद्देश्य की सच्चाई पर आधारित, भरोसा होना चाहिए . . . दूसरी ओर, एक गंभीर मान्यता कि हम आशा के साथ कराहते हैं जिसमें पीड़ा भी है l”

यीशु ने हमारे लिए अपने जीवन की आहुति दे दी l उसका प्रेम गहरा और बलिदानी है l जब हम जीवन को “क्रूस के दृष्टिकोण” से देखते हैं, हम उसका प्रेम और विश्वासयोग्यता देखते हैं l और उसमें हमारा भरोसा बढ़ता है l

एक साल में बाइबल

सीरिया की एक स्त्री, रीमा जो अमरीका में आकर रहने लगी थी, ने अपने शिक्षक को हाथों के इशारों और सीमित अंग्रेजी भाषा की सहायता से बताने का प्रयास किया कि वह परेशान है l उसके आँसू बह रहे थे जब वह खूबसूरती से एक थाली में फतेयर (गोश्त, पनीर, और पालक से बना व्यंजन) लेकर आयी l तब उसने कहा, “एक व्यक्ति,” और उसने लम्बी साँस की आवाज़ निकलते हुए दरवाज़े से कमरे की ओर और कमरे से दरवाज़े की ओर इशारा किया l शिक्षक ने उसकी बातों को समझाया कि निकट के चर्च से बहुत से लोगों को कुछ उपहार लेकर रीमा और उसके परिवार से मिलने आना था l लेकिन केवल एक ही व्यक्ति आया l वह आकर अपने उपहार रखकर तुरन्त लौट गया l वह व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त था, जबकि रीमा और उसका परिवार अकेलापन महसूस कर रहे थे और समुदाय की सहभागिता चाहते थे और अपने नए मित्रों के संग अपना नया व्यंजन फतेयर  बांटना चाहते थे l

यीशु हमेशा लोगों को समय देता था l उसने समारोहों में भाग लिया, भीड़ को शिक्षा दी, और समय निकलकर व्यक्तियों से बातचीत की l वह एक कर अधिकारी, जक्कई के घर का मेहमान भी बना, जो पेड़ पर चढ़ कर उसे देखना चाहता था l यीशु उसे देखकर उससे बोला था, “झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अबश्य है” (लूका 19:1-5) l और जक्कई का जीवन हमेशा के लिए बदल गया था l

अन्य जिम्मेदारियों के कारण, हम हमेशा समय नहीं दे सकते हैं l किन्तु जब समय निकलते हैं, हमारे पास दूसरों के साथ संगती करने का और यह देखने का अद्भुत समय होगा कि परमेश्वर हमारे द्वारा कार्य कर रहा है l

यह स्वभाव में है

रेजिना के दिन का आरम्भ, एक दुखद खबर से हुआ था, फिर सहकर्मियों के साथ मीटिंग्स थीं जिनमें उसके सभी आईडिया अस्वीकृत हो गए। लौटते समय उसने एक केयर सेंटर में किसी बुजुर्ग मित्र के पास फूल ले जाकर उसे सरप्राइज देने का निर्णय लिया। मरिया के यह बताने पर कि परमेश्वर उसके लिए कितने भले हैं, उसकी आत्मा तरोताज़ा हो गई। उसने कहा, "मेरा अपना बिस्तर और अपनी कुर्सी हैं, तीन समय का भोजन और नर्सों की मदद है। और कभी किसी अपने को परमेश्वर मेरे पास भेज देते हैं क्योकि वे जानते हैं कि मैं उन से प्यार करती हूँ और वह स्वयं मुझ से प्यार करते हैं।"

स्वभाव। दृष्टिकोण। कहावत है, "10 प्रतिशत जीवन उससे बना है जो हमारे साथ घटता है, और 90 प्रतिशत उसपर हमारी प्रतिक्रिया से।" याकूब ने उनके नाम पत्र लिख था जो सताव के कारण तित्तर बित्तर हो गए थे, और उनसे परख के समय अपने दृष्टिकोण पर गौर करने को कहा। उसने उन्हें इन शब्दों से चुनौती दी: “इसको पूरे आनन्द की बात समझो...”। (याकूब 1:2)

आनंद से भरे होने का यह दृष्टिकोण तब उत्पन्न होता जब हम यह देखना सीख लेते हैं कि परमेश्वर संघर्षों का उपयोग हमारे विश्वास में परिपक्वता लाने के लिए करते हैं।

कीड़ा से लड़ाई तक

10 वर्ष का क्लेओ पहली बार मछली पकड़ते समय चारे के डिब्बे में झांककर हिचकिचाया l आखिरकार उसने मेरे पति से कहा, “मेरी मदद करें, मैं कीड़ा से डरता हूँ l उसके भय ने उसे काम करने से रोका l

भय वयस्कों को भी पंगु कर देता है l गिदोन भी भयभीत हुआ होगा जब परमेश्वर का स्वर्गदूत उससे मिलने आया जब वह मिद्यानी शत्रुओं से छिपकर गेहूँ साफ़ कर रहा था (न्यायियों 6:11) l स्वर्गदूत ने उससे कहा कि वह युद्ध में परमेश्वर के लोगों की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर द्वारा चुना गया था (पद.12-14) l

गिदोन का प्रतुत्तर? “हे मेरे प्रभु, विनती सुन, मैं इस्राएल को कैसे छुड़ाऊँ? देख, मेरा कुल मनश्शे में सब से कंगाल है, फिर मैं अपने पिता के घराने में सब से छोटा हूँ” (पद.15) l परमेश्वर की उपस्थिति की निश्चितता के बाद भी, गिदोन भयभीत था और चिन्ह माँगा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा अनुसार इस्राएल को बचाने के लिए उसे उपयोग करेगा (पद.36-40) l और परमेश्वर ने उसके निवेदन का उत्तर दिया l इस्राएली यूद्ध में सफल रहे और 40 वर्षों तक शांति का आनंद उठाया l

हम सब भी अनेक तरह से भयभीत होते हैं-कीड़ों से लड़ाई तक l गिदोन की कहानी हमें सिखाती है कि हम इसमें निश्चित रहें : यदि परमेश्वर हमसे कुछ करने को कहता है, वह उसे करने के लिए सामर्थ्य और ताकत देगा l

परमेश्वर कुछ नया करता है

हाल ही में एक समूह में भागीदारी करते समय अगुए ने प्रश्न किया “क्या परमेश्वर आपके जीवन में कुछ नया कर रहा है?” कुछ कठिन स्थितियों से जूझ रही मेरी सहेली, मिंडी ने उत्तर दिया l उसने अपने वृद्ध माता-पिता के साथ धीरज, अपने अस्वस्थ पति के लिए ताकत, और बच्चों की समझ शक्ति और नाती-पोतों के विषय बताया जिन्होंने यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण नहीं किया था l तब उसने हमारी स्वाभाविक सोच के विपरीत गहरी पहुँच वाली टिप्पणी की : “मैं मानती हूँ परमेश्वर मेरे प्रेम करने और अवसर की सीमा को बढ़ाने का नया कार्य कर रहा है l”

थिस्सलुनीके के नए विश्वासियों के लिए पौलुस की प्रार्थना यहाँ ठीक बैठती है : “तुम्हारा प्रेम भी आपस में और सब मनुष्यों के साथ बढ़े, और उन्नति करता जाए” (1 थिस्स. 3:12) l उसने उनको यीशु के विषय शिक्षा दी थी किन्तु दंगे के कारण उसे अचानक जाना पड़ा था (प्रेरितों 17:1-9) l अब अपनी पत्री में वह उनको अपने विश्वास में स्थिर रहने को कहा (1 थिस्स. 3:7-8) l और उसकी प्रार्थना थी कि प्रभु उनके प्रेम को सबके लिए बढ़ाए l

कठिनाईयों में हम अक्सर शिकायत करते और पूछते हैं, “क्यों?  या सोचते है, मैं क्यों?  ऐसी स्थितियों में दूसरों से प्रेम करने के नए अवसरों के लिए प्रभु से प्रेम को बढ़ाने और सहायता करने की ताकत मांगे l

मधुर संगति

नर्सिंग होम में वह वृद्ध महिला किसी से बातचीत नहीं करती थी अथवा किसी से कुछ नहीं मांगती थी l ऐसा लगता था मानों वह अपनी जर्जर पुरानी कुर्सी में झूलती हुई, महज जीवित थी l उससे मिलनेवाले कम ही थे, लिहाजा एक जवान नर्स अपने अवकाश के समय उसके कमरे में अक्सर जाती थी l उस महिला से बातचीत आरंभ न करने की इच्छा से प्रश्न न पूछकर, वह एक और कुर्सी खींचकर उसके साथ झूलने लगी l कुछ महीनों के बाद, उस वृद्ध महिला ने उससे कहा, “मेरे साथ झूलने के लिए धन्यवाद l” वह संगति के लिए धन्यवादी थी l

स्वर्ग जाने से पहले, यीशु ने अपने शिष्यों के साथ निरंतर रहनेवाला एक सहायक भेजने की प्रतिज्ञा की l उसने उनसे कहा कि वह उन्हें अकेले नहीं छोड़ेगा किन्तु उनके संग रहने के लिए पवित्र आत्मा भेजेगा (यूहन्ना 14:17) l वह प्रतिज्ञा आज भी यीशु के विश्वासियों के लिए सच है l यीशु ने कहा कि त्रियेक परमेश्वर हममें अपना “घर” बनाएगा (पद.23) l

हमारे सम्पूर्ण जीवन में प्रभु हमारा निकट और विश्वासयोग्य सहयोगी है l वह हमारे कठिनतम संघर्षों में मार्गदर्शन करेगा, हमारे पाप क्षमा करेगा, प्रत्येक शांत प्रार्थना सुनेगा, और उन बोझों को उठाएगा जो हमारे लिए उठाना कठिन है l

आज हम उसकी मधुर संगति का आनंद उठा सकते हैं l