Our Authors

सब कुछ देखें

Articles by अन्न हरिकीर्तन

माँ रिछ्नी की तरह

मुझे हमेशा कुत्तों से डर लगता था। लेकिन जब मैं छोटी थी, तो हमारे पड़ोसी के पास एक जर्मन शेफर्ड कुत्ता था जिसे मैं प्यार करने लगी थी l यह सबसे विनम्र कुत्ता था जिसे मैंने जाना था। लेकिन एक दिन, यह आक्रामक हो गया, गुर्राया, झपट्टा मारा और लोगों को घर के एक कमरे में आने नहीं दिया l यह देखकर मैं फिर से डर गयी, मेरे पड़ोसी ने समझाया कि कुत्ता अपने बच्चों की रक्षा के लिए ऐसा व्यवहार कर रही है।

जब मैं होशे 13:8 पढ़ती हूँ तो मुझे यही याद आता है। परमेश्वर खुद की तुलना एक माँ रीछनी से करता है जो अपने बच्चों को खोज रही है। यह परमेश्वर के न्याय की एक भयंकर छवि है। परमेश्वर इस्राएल और एप्रैम से नाराज़ था क्योंकि वे घमंडी हो गए थे और वह सब भूल गए थे जो परमेश्वर ने उनके लिए किया था (पद.6)। परमेश्वर को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने के बजाय, उन्होंने मूर्तियों की पूजा की, “पाप पर पाप” किया और यहाँ तक कि मानव बलि भी चढ़ाई (पद.1-4)। इस संदर्भ में, परमेश्वर ने कहा, “मैं बच्चे छीनी हुई रीछनी के समान बनकर उनको मिलूंगा, और उनके हृदय की झिल्ली को फाडूंगा” (पद.8)। परमेश्वर अपनी देखभाल में व्यक्तियों के लिए उत्साही है। एक माँ रीछनी की तरह, वह उनकी रक्षा करता है, उन्हें खिलाता है, उनकी देखभाल करता है और उनका नेतृत्व करता है (पद.4-8)।

जब हम कमज़ोर और असुरक्षित महसूस करते हैं, तो हम निश्चिंत हो सकते हैं कि परमेश्वर हमारे साथ होने वाले अन्याय को देखता है। वह मदद के लिए हमें देखता और हमारी पुकार सुनता है और हमारी रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप करता है, जैसे एक माँ अपने बच्चे की रक्षा करती है। जीवन के कठिन और कठोर समय में, हम परमेश्वर की सुरक्षात्मक भुजाओं में सुरक्षित रह सकते हैं (पद.13-14)। आइए हम अपने जीवन में परमेश्वर के देखभाल करने वाले हस्तक्षेप के लिए उसके आभारी रहें (पद.9)। साथ ही, आइए हम परमेश्वर और उसके घर में प्रेम और न्याय की उसकी इच्छा का सम्मान करें (होशे 12:6)। परमेश्वर की सहायता प्राप्त करने के बाद, हम भी उन लोगों की रक्षा करने के लिए उठ खड़े हों जिन्हें हमारी ज़रूरत है। —ऍन हरिकीर्तन

 

बहुरंगी दीवार

जब मेरी दोस्त ने मुझे एक जल-रंग(water-color) पेंटिंग दिखाई, जिस पर वह काम कर रही थी, तो मैंने कैनवास(canvas) पर उस छवि को वेल्लोर किले(Vellore Fort) की दीवार के रूप में पहचाना। मैं खुद एक चित्रकार नहीं हूँ, लेकिन मैंने कल्पना की कि अगर कोई दीवार को रंग रहा हो, तो वह पूरी चीज़ को एक ही रंग में रंग देगा। फिर भी, उसकी दीवार बेहद बहुरंगी थी। एक पत्थर गेरू था, दूसरा एम्बर(पीला और नारंगी रंग के बीच का रंग)। एक काईदार हरा और एक अनार के रंग का भी था। मोहित होकर मैंने पूछा, “दीवार इतनी अलग कैसे है?” उसने जवाब दिया, “क्योंकि प्रत्येक पत्थर एक चट्टान से आता है, और प्रत्येक का एक अलग रंग होता है।” तब से, जब भी मैं किसी पत्थर की दीवार को देखती हूँ, तो मैं उसके कई पत्थरों की बनावट, रंग और आकार को देखे बिना नहीं रह सकती।

पतरस हमें “जीवित पत्थर” कहता है (पद.5)। मेरी दोस्त की पेंटिंग में पत्थरों की तरह, हम में से प्रत्येक अद्वितीय है। हम अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं और हमारे पास अलग-अलग अनुभव हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अलग-थलग रहना चाहिए—प्रोजेक्ट से खारिज किए गए पत्थर की तरह। बल्कि, परमेश्वर ने हम में से प्रत्येक को चुना और हमें एक साथ लाया (पद.4)। जबकि एक पत्थर दीवार नहीं बना सकता, जब परमेश्वर हमें एक साथ लाता है, तो वह हमें “एक आत्मिक घर” बनाता है (पद.5)। कोने का पत्थर, यीशु द्वारा एकजुट होकर, हम “चुने हुए वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा” बन जाते हैं (पद.5-9)। जब हम कहीं भी फिट होने के लिए अस्वीकार या बहुत अलग महसूस करते हैं (पद.11-12), तो आइए याद रखें कि पतरस ने क्या कहा: “जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह किसी रीति से लज्जित नहीं होगा” (पद.6)। परमेश्वर ने हमें यीशु के द्वारा चुना है कि वह जो बना रहा है उसका हिस्सा बनें (पद.5)। हमारी विशिष्टता परमेश्वर के समुदाय में पूरी तरह से फिट बैठती है। ऍन हरिकीर्तन

 

जीवन, प्रेम और पोषण

मेरी नानी की मृत्यु की सालगिरह पर, मैं और मेरे पति उनकी कब्र पर गए और उनकी कब्र के पास गुलाब के फूल रखे। मेरे पति उनसे कभी नहीं मिले थे। इसलिए, जब उन्होंने मुझसे उनके बारे में पूछा, तो मैंने उनके पसंदीदा भजन संहिता गाए, उनके विस्तृत क्रिसमस भोजन के बारे में बात की और मुस्कुराते हुए बताया कि उन्हें जंगली मशरूम की तलाश करना आता था । भले ही वे अब हमारे साथ शारीरिक रूप से नहीं थीं, लेकिन उनकी कब्र पर जाना और उनकी कहानियाँ साझा करना मेरे मन में उनके प्यार, जीवन और भोजन की यादों से भरा हुआ है ।  
यीशु अपनी मृत्यु से पहले, अपने शिष्यों के साथ एक विस्तृत फसह का भोज साझा किया। उसने उनसे कहा कि वे जल्द ही दुःख उठाएंगे और मृत्यु सहेंगे (पद.15)। वास्तव में, उसकी गिरफ़्तारी उसी रात होगी (लूका 22:54)। इस स्थिति में, यीशु ने रोटी ली, परमेश्वर को धन्यवाद दिया, उसे तोड़ा और उन्हें देते हुए कहा, "यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिए दी जाती है; मेरे स्मरण में यही किया करो" (पद.19)। उन्होंने उन्हें दाखरस का प्याला भी देते हुए कहा, "यह प्याला मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नई वाचा है”(पद.20)।  
अगले दिन यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया गया। तीन दिन बाद वह जी उठा और अंततः स्वर्ग लौट गया l फिर भी, आज, हम, जो उसके शिष्य हैं, उसकी याद में रोटी तोड़ते हैं और दाखरस साझा करते हैं क्योंकि यह यीशु द्वारा स्वयं स्थापित एक सुंदर स्मारक है और उसके फिर से आने का एक शाश्वत प्रतिज्ञा है (पद.15-18)। हम यीशु को शारीरिक रूप से देख या छू नहीं सकते, लेकिन हम जानते हैं कि वह जीवित हैं और हर दिन हमारे साथ हैं और हमें अपने प्रेम, जीवन और पोषण से भर रहा है l जब हम रोटी तोड़ते हैं, तो हमें यीशु के वादे को याद रखना चाहिए और उन्हें हमारे अंदर काम करने देना चाहिए, हमें भीतर से उनके जैसा बनने के लिए रूपांतरित होने देना चाहिए।—ऍन हरिकीर्तन 

कार्य और सत्य

मेरे पति और मेरी शादी के बाद, मेरे मामा ने हमें मेरे परिवार का इतिहास बताया। उन्होंने बताया कि भले ही मेरे दादा एक स्कूल के प्रिंसिपल थे, लेकिन उनकी आय उनके सात बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। फिर भी, उन्होंने अपने बड़े बच्चों की उच्च शिक्षा में निवेश किया, जो कॉलेज जाने पर अक्सर अपने चाचा या चाची के साथ रहते थे। जब ये बड़े बच्चे कमाने लगे, तो उन्होंने अपने छोटे भाई-बहनों की शिक्षा का खर्च उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हम एक-दूसरे की मदद करते हैं, याद रखें कि अगर तुम लोगों को किसी चीज़ की ज़रूरत है तो हमारे पास आ सकते हो। साथ ही, जब दूसरों को ज़रूरत हो तो उनकी मदद करने के लिए तैयार रहो।”

अपनी पत्री में, यूहन्ना ने उन लोगों को भी ऐसी ही सलाह दी जिन्हें उसने “बालकों” कहा था। वह लिखता हैं, “हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करे”(पद.18)। वह हमें उस प्रेम की याद दिलाता हैं जो यीशु का हमसे था जब उसने कुछ भी नहीं रोका और हमारे लिए अपना जीवन दे दिया (पद.16)। वास्तव में, यूहन्ना कहता है कि यीशु ने वास्तविक प्रेम को दर्शाया (पद.16)। इस बात को ध्यान में रखते हुए, यूहन्ना ने विश्वासियों को एक दूसरे के साथ अपनी “भौतिक संपत्ति” साझा करने के लिए कहा (पद.17)। क्योंकि यदि कोई विश्वासी “अपने भाई [या बहन] को कंगाल देखकर उस पर तरस खाना न चाहे,” तो यूहन्ना पूछता है, “तो उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?”

संसार हमें बताती है कि अपने संसाधनों को जमा करना समझदारी है। लेकिन बाइबल हमें बताती है कि ये वरदान दूसरों की सेवा करने के लिए दिए गए हैं (1 पतरस 4:10)। यदि हम किसी को ज़रूरत में देखते हैं, चाहे वह रिश्तेदार हो, दोस्त हो, साथी शिष्य हो या अजनबी हो, तो आइए हम उनसे काम और सत्य से प्रेम करें। ऐसा करके, हम दूसरों के सामने परमेश्वर के प्रेम का प्रदर्शन करते हैं जो हमारे अंदर है। —ऍन हरिकीर्तन

प्रेम का प्यासा

बचपन में, मैं गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वेल्लोर में वेकेशन बाइबल स्कूल में जाती थी। तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता था। आसमान में बादल नहीं होते थे, पेड़ों पर एक पत्ता भी नहीं होता था, यहाँ तक कि हवा का भी नामोनिशान नहीं होता था। चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए हमें बस बोतलों में पानी और फलों के स्वाद वाला जूस मिलता था, जिसे स्वयंसेवक बाल्टियों में भरकर लाते थे। हम अपने हिस्से के एक मग जूस के लिए अपने कप लेकर कतार में खड़े हो जाते थे। हम इसे कितनी धीरे-धीरे पीते थे! फिर भी, हमारे कपों का जूस ख़त्म हो जाता था, और हमें और अधिक की प्यास लगती थी, शायद ही कभी दूसरा गिलास मिल पाता था।

जैसे दक्कन(भारत में नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक विशाल प्रायद्वीप) की गर्मियों में तरल पदार्थों की हमारी प्यास होती है, वैसे ही हम सभी इस विनाशकारी प्रेमहीन संसार में प्यार के प्यासे हैं। हम कई जगहों पर प्यार की तलाश करते हैं और पाते हैं कि अक्सर यह सीमित होता है और उदासीन हो जाता है या शर्तों पर होता है और इसे अर्जित करने की आवश्यकता होती है।

लेकिन बाइबल हमें सिखाती है कि “जीवित जल” का एक स्रोत है जो कभी नहीं सूखता है (यूहन्ना 4:13-14)। जीवित जल पवित्र आत्मा को संदर्भित करता है (यूहन्ना 7:39)। प्रेरित पौलुस हमें बताता है कि पवित्र आत्मा द्वारा, “परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है” (रोमियों 5:5)। यह नियंत्रित वितरण या हमारी योग्यता के अनुसार नहीं है। बल्कि, यह असीम और माप से परे है। यहाँ तक कि जब हम उसके विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे, तब भी परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु को हमारे लिए मरने के लिए भेजकर हमारे लिए अपना प्रेम प्रदर्शित किया (पद.8)। यीशु के बलिदान के कारण, हम उससे अलग होने के अकेलेपन से बच जाते हैं और हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कर लेते हैं जो अपना प्रेम उंडेलता है जो हमारे भीतर प्रेम का एक स्रोत बन जाता है (पद.10)। यदि आप प्रेम के प्यासे हैं, तो परमेश्वर के पास जाएँ। वह प्रेम है। ऍन हरिकीर्तन

 

पद जो अधिकृत नहीं है

संडे स्कूल में भाग लेने के बाद, मैं घर जाने के लिए बस में चढ़ी। पीछे एक आदमी बैठा था जिसे मैंने दक्षिण भारत के एक प्रमुख कॉलेज के नए निदेशक के रूप में पहचाना। मैं उन्हें कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थियों के बस में देखकर हैरान थी। उनके पद के ज़्यादातर लोगों के पास एक अलग कार और ड्राइवर होता है। इसलिए, मैंने उनसे पूछा, “आप बस से जा रहे हैं और कार में क्यों नहीं?” उन्होंने उत्तर दिया, “क्योंकि मैं हमेशा बस से यात्रा करता हैं।” उनके नए पद ने उनके सामान्य व्यवहार को नहीं बदला था। उन्होंने अपने पद के कारण खुद को हकदार महसूस नहीं होने दिया।

फिलिप्पी में चर्च को लिखे पत्र में, पौलुस विश्वासियों से विनम्र होने के लिए कहता है (पद.3)। वह कहता है कि उन्हें विरोध” या “झूठी बड़ाई”(पद 3) के साथ कुछ भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, एक-दूसरे के साथ अपने रिश्तों में, उन्हें “मसीह यीशु का स्वभाव” रखना चाहिए (पद.5)। यीशु के पास सर्वोच्च पद है। वह “परमेश्वर के स्वरूप में” था, फिर भी उसने “परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा”(पद.6)। उसने जो कुछ भी उसका अधिकार था, उसे अलग रख दिया और हमारे हितों का ध्यान रखा। उसने “दास का स्वरूप” धारण किया, और अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, मृत्यु भी सह ली(पद.7-8) l

जब हमें लगता है कि हम अपनी नौकरी, शिक्षा, उम्र या समाज में स्थिति के कारण एक निश्चित तरीके से व्यवहार किए जाने के लायक हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यीशु ने हमें दिखाया कि हमें अपनी उपाधियों और अधिकार की भावना को कैसे अलग रखना चाहिए। हालाँकि यह मुश्किल है, लेकिन हमें अपने फायदे के लिए जो कुछ भी हमारा है उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हुए साथी मनुष्यों के प्रति विनम्र होने की मानसिकता अपनानी चाहिए। ऍन हरिकीर्तन