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Articles by अन्न हरिकीर्तन

कार्य और सत्य

मेरे पति और मेरी शादी के बाद, मेरे मामा ने हमें मेरे परिवार का इतिहास बताया। उन्होंने बताया कि भले ही मेरे दादा एक स्कूल के प्रिंसिपल थे, लेकिन उनकी आय उनके सात बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। फिर भी, उन्होंने अपने बड़े बच्चों की उच्च शिक्षा में निवेश किया, जो कॉलेज जाने पर अक्सर अपने चाचा या चाची के साथ रहते थे। जब ये बड़े बच्चे कमाने लगे, तो उन्होंने अपने छोटे भाई-बहनों की शिक्षा का खर्च उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हम एक-दूसरे की मदद करते हैं, याद रखें कि अगर तुम लोगों को किसी चीज़ की ज़रूरत है तो हमारे पास आ सकते हो। साथ ही, जब दूसरों को ज़रूरत हो तो उनकी मदद करने के लिए तैयार रहो।”

अपनी पत्री में, यूहन्ना ने उन लोगों को भी ऐसी ही सलाह दी जिन्हें उसने “बालकों” कहा था। वह लिखता हैं, “हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करे”(पद.18)। वह हमें उस प्रेम की याद दिलाता हैं जो यीशु का हमसे था जब उसने कुछ भी नहीं रोका और हमारे लिए अपना जीवन दे दिया (पद.16)। वास्तव में, यूहन्ना कहता है कि यीशु ने वास्तविक प्रेम को दर्शाया (पद.16)। इस बात को ध्यान में रखते हुए, यूहन्ना ने विश्वासियों को एक दूसरे के साथ अपनी “भौतिक संपत्ति” साझा करने के लिए कहा (पद.17)। क्योंकि यदि कोई विश्वासी “अपने भाई [या बहन] को कंगाल देखकर उस पर तरस खाना न चाहे,” तो यूहन्ना पूछता है, “तो उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?”

संसार हमें बताती है कि अपने संसाधनों को जमा करना समझदारी है। लेकिन बाइबल हमें बताती है कि ये वरदान दूसरों की सेवा करने के लिए दिए गए हैं (1 पतरस 4:10)। यदि हम किसी को ज़रूरत में देखते हैं, चाहे वह रिश्तेदार हो, दोस्त हो, साथी शिष्य हो या अजनबी हो, तो आइए हम उनसे काम और सत्य से प्रेम करें। ऐसा करके, हम दूसरों के सामने परमेश्वर के प्रेम का प्रदर्शन करते हैं जो हमारे अंदर है। —ऍन हरिकीर्तन

प्रेम का प्यासा

बचपन में, मैं गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वेल्लोर में वेकेशन बाइबल स्कूल में जाती थी। तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता था। आसमान में बादल नहीं होते थे, पेड़ों पर एक पत्ता भी नहीं होता था, यहाँ तक कि हवा का भी नामोनिशान नहीं होता था। चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए हमें बस बोतलों में पानी और फलों के स्वाद वाला जूस मिलता था, जिसे स्वयंसेवक बाल्टियों में भरकर लाते थे। हम अपने हिस्से के एक मग जूस के लिए अपने कप लेकर कतार में खड़े हो जाते थे। हम इसे कितनी धीरे-धीरे पीते थे! फिर भी, हमारे कपों का जूस ख़त्म हो जाता था, और हमें और अधिक की प्यास लगती थी, शायद ही कभी दूसरा गिलास मिल पाता था।

जैसे दक्कन(भारत में नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक विशाल प्रायद्वीप) की गर्मियों में तरल पदार्थों की हमारी प्यास होती है, वैसे ही हम सभी इस विनाशकारी प्रेमहीन संसार में प्यार के प्यासे हैं। हम कई जगहों पर प्यार की तलाश करते हैं और पाते हैं कि अक्सर यह सीमित होता है और उदासीन हो जाता है या शर्तों पर होता है और इसे अर्जित करने की आवश्यकता होती है।

लेकिन बाइबल हमें सिखाती है कि “जीवित जल” का एक स्रोत है जो कभी नहीं सूखता है (यूहन्ना 4:13-14)। जीवित जल पवित्र आत्मा को संदर्भित करता है (यूहन्ना 7:39)। प्रेरित पौलुस हमें बताता है कि पवित्र आत्मा द्वारा, “परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है” (रोमियों 5:5)। यह नियंत्रित वितरण या हमारी योग्यता के अनुसार नहीं है। बल्कि, यह असीम और माप से परे है। यहाँ तक कि जब हम उसके विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे, तब भी परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु को हमारे लिए मरने के लिए भेजकर हमारे लिए अपना प्रेम प्रदर्शित किया (पद.8)। यीशु के बलिदान के कारण, हम उससे अलग होने के अकेलेपन से बच जाते हैं और हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कर लेते हैं जो अपना प्रेम उंडेलता है जो हमारे भीतर प्रेम का एक स्रोत बन जाता है (पद.10)। यदि आप प्रेम के प्यासे हैं, तो परमेश्वर के पास जाएँ। वह प्रेम है। ऍन हरिकीर्तन

 

पद जो अधिकृत नहीं है

संडे स्कूल में भाग लेने के बाद, मैं घर जाने के लिए बस में चढ़ी। पीछे एक आदमी बैठा था जिसे मैंने दक्षिण भारत के एक प्रमुख कॉलेज के नए निदेशक के रूप में पहचाना। मैं उन्हें कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थियों के बस में देखकर हैरान थी। उनके पद के ज़्यादातर लोगों के पास एक अलग कार और ड्राइवर होता है। इसलिए, मैंने उनसे पूछा, “आप बस से जा रहे हैं और कार में क्यों नहीं?” उन्होंने उत्तर दिया, “क्योंकि मैं हमेशा बस से यात्रा करता हैं।” उनके नए पद ने उनके सामान्य व्यवहार को नहीं बदला था। उन्होंने अपने पद के कारण खुद को हकदार महसूस नहीं होने दिया।

फिलिप्पी में चर्च को लिखे पत्र में, पौलुस विश्वासियों से विनम्र होने के लिए कहता है (पद.3)। वह कहता है कि उन्हें विरोध” या “झूठी बड़ाई”(पद 3) के साथ कुछ भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, एक-दूसरे के साथ अपने रिश्तों में, उन्हें “मसीह यीशु का स्वभाव” रखना चाहिए (पद.5)। यीशु के पास सर्वोच्च पद है। वह “परमेश्वर के स्वरूप में” था, फिर भी उसने “परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा”(पद.6)। उसने जो कुछ भी उसका अधिकार था, उसे अलग रख दिया और हमारे हितों का ध्यान रखा। उसने “दास का स्वरूप” धारण किया, और अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, मृत्यु भी सह ली(पद.7-8) l

जब हमें लगता है कि हम अपनी नौकरी, शिक्षा, उम्र या समाज में स्थिति के कारण एक निश्चित तरीके से व्यवहार किए जाने के लायक हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यीशु ने हमें दिखाया कि हमें अपनी उपाधियों और अधिकार की भावना को कैसे अलग रखना चाहिए। हालाँकि यह मुश्किल है, लेकिन हमें अपने फायदे के लिए जो कुछ भी हमारा है उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हुए साथी मनुष्यों के प्रति विनम्र होने की मानसिकता अपनानी चाहिए। ऍन हरिकीर्तन