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Articles by आर्थर जैक्सन

अंत तक फलदायी

यद्यपि लेनोर डनलप चौरानवे वर्ष की युवा थी, उसका मस्तिष्क तेज़, उसकी मुस्कराहट उज्जवल, और यीशु के लिए उसके संक्रामक प्रेम को बहुतों ने महसूस किया था l हमारे चर्च के युवाओं की संगती में उसे खोजना असामान्य नहीं था; उसकी उपस्थिति और भागीदारी ख़ुशी और प्रोत्साहन के श्रोत थे l लेनोर का जीवन इतना जीवंत था कि उसकी मृत्यु ने हमारी असावधानी में हमें पकड़ लिया l एक शक्तिशाली धावक की तरह, वह जीवन भर समापन रेखा पर छाई रही l उसकी ऊर्जा और उसका उत्साह ऐसा था कि, अपनी मृत्यु के कुछ ही दिन पहले, उसने सोलह सप्ताह का एक पाठ्यक्रम पूरा क्या था, जिसमें यीशु के सन्देश को दुनिया के लोगों तक ले जाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया था l

लेनोर का फलदायी, परमेश्वर को आदर देनेवाला जीवन भजन 92:12-15 में वर्णित जीवन को दर्शाता है l यह भजन उन लोगों के नवोदित, प्रस्फुटित और फलदायी जीवन होने का वर्णन करता है, जिनका जीवन परमेश्वर के साथ एक सही संबंद में निहित (पद.12-13) l चित्रित किये गए दो पेड़ क्रमशः अपने फल और लकड़ी के लिए मूल्यवान थे; इनके साथ भजनकार जीवन शक्ति, समृद्धि और उपयोगिता की भावना को अधिकार में कर लेता है l जब हम प्रेम करने, साझा करने, मदद करने, और दूसरों को मसीह के पास लाने में अपने जीवन को उदीयमान् और फूलते हुए देखते हैं हमें आनंदित होना चाहिए l

यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिन्हें हम “वरिष्ठ” या “अनुभवी” मानते हैं, जड़वत और फलदायी होने में विलम्ब कभी नहीं होता है l लेनोर का जीवन यीशु के द्वारा परमेश्वर में गहराई से जड़वत था और इसकी और परमेश्वर की भलाई की गवाही देता है (पद.15) l हमारा जीवन भी ऐसा हो सकता है l

स्थायी प्रार्थना

“प्रार्थनाएं मृत्युहीन हैं l” ये ई.एम. बौंड्स (1835-1913) के ध्यान आकर्षित करनेवाले शब्द हैं, प्रार्थना के विषय जिनके उत्कृष्ट लेखन ने पीढ़ियों से लोगों को प्रेरित किया है l हमारी प्रार्थनाओं की शक्ति और स्थायी प्रकृति के बारे में उनकी टिप्पणियाँ इन शब्दों के साथ जारी हैं : जिन होठों ने उन्हें उच्चारित किया है मृत्यु उन्हें बंद कर देती हैं, जिस हृदय ने उन्हें महसूस किया वह धड़कना बंद कर दिया, परन्तु प्रार्थना परमेश्वर के सामने रहती हैं, और परमेश्वर का हृदय उनपर लगा हुआ होता है और प्रार्थनाएं उन लोगों के बाद भी जीवित रहती हैं जिन्होनें उन्हें उच्चारित किया था; वे पीढ़ियों के बाद भी जीवित रहती हैं, एक युग के बाद भी जीवित रहती हैं, एक जमाने के बाद भी जीवित रहती हैं l”

क्या आपने कभी विचार किया है कि आपकी प्रार्थनाएँ – विशेषकर जो परेशानी, दुःख, और पीड़ा में जन्मी हैं – कभी परमेश्वर के पास पहुँची होंगी? गहराई तक पहुंचने वाले बौंड्स के शब्द हमारी प्रार्थनाओं के महत्त्व को हमें याद दिलाते हैं और उसी प्रकार प्रकाशितवाक्य 8:1-5 भी l विन्यास स्वर्ग (पद.1), परमेश्वर का सिंहासन कक्ष और सृष्टि का नियंत्रण कक्ष है l स्वर्गदूत के समान सेवक परमेश्वर की उपस्थिति में खड़े हैं (पद.2) और एक स्वर्गदूत खड़े होकर, प्राचीन पुरोहितों की तरह, “[परमेश्वर के] पवित्र लोगों” की प्रार्थनाओं के साथ धूप चढ़ाता है (पद.3) l पृथ्वी पर की गयी प्रार्थनाओं का स्वर्ग में परमेश्वर तक पहुंचना कितनी आँखें खोलने वाली बात और प्रोत्साहित करनेवाली तस्वीर है (पद.4) l जब हम सोचते हैं कि हमारी प्रार्थनाएं मार्ग में खो गयी हैं अथवा भुला दी गयी हैं, तो हम यहाँ जो देखते हैं वह हमें सुकून देता है और हमें अपनी प्रार्थना में बने रहने के लिए मजबूर करता है, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के लिए अनमोल हैं!

वचन पर चलनेवाले बनो

ब्रायन को अपने भाई की शादी में स्वागतकर्ता बनना था, परन्तु वह कर्तव्य से भागनेवाला व्यक्ति था l सुस्पष्ट ढंग से, परिजनों के साथ उसकी बहन जैसमीन भी निराश थी जिसे उस अवसर पर बाइबल पढ़ना था l समारोह में बिना कोई गलती किये हुए उसने 1 कुरिन्थियों 13 से प्रेम के बिषय बाइबल का परिच्छेद पढ़ा l परन्तु विवाह के बाद जब पिता ने उससे ब्रायन को जन्मदिन का उपहार देने के लिए कहा, वह हिचकिचा गयी l उसने प्रेम के विषय शब्दों को पढ़ने से अधिक उसे व्यवहार में लाने को कठिन महसूस किया l रात आने से पूर्व, हालाँकि, उसने मन को बदलकर स्वीकार किया, “मैं खड़ी होकर प्रेम के विषय वचन पढूँ और उसका अभ्यास न करूँ, यह हो नहीं सकता है l

क्या कभी आपने वचन को पढ़ा हो या सुना हो और वचन द्वारा दोष भावना को महसूस किया हो या उसका अभ्यास करने में कठिनाई महसूस की हो? आप अकेले नहीं हैं l परमेश्वर के वचन को पढ़ना और सुनना उसका पालन करने की अपेक्षा सरल है l इसीलिए याकूब की चुनौती इतनी सटीक है : “वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं” (याकूब 1:22) l दर्पण वाला उसका उदाहरण हमें मुस्कुराने को विवश करता है क्योंकि हम जानते हैं कि अपने विषय कुछ बातों पर ध्यान देना जिस पर ध्यान देना अनिवार्य है का क्या अर्थ होता है l परन्तु हम धोखा खाते हैं यदि हम सोचते हैं कि ध्यान देना ही पर्याप्त है l जब याकूब हमसे “जी लगाकर [ध्यान] देने” और परमेश्वर की सच्चाई को “[निरंतर] पालन करने के लिए प्रेरित करता है (पद.25), वह हमें वही करने को उत्साहित करता है जो जैसमीन करने को विवश थी – जीने को विवश थी l परमेश्वर का वचन यह करने को बुलाता है, और वह इससे कम के योग्य नहीं है l

मेरे चारों ओर एक ढाल

जब आराधना का नेतृत्व करनेवाले कुशल सेवक, पॉल, की मृत्यु इकत्तीस वर्ष की उम्र में एक नाव दुर्घटना में हुयी, हमारी कलीसिया ने दुखद हानि का अनुभव किया l पॉल और उसकी पत्नी डूरोंडा, दुःख से अपरिचित नहीं थे; उन्होंने अनेक बच्चों को दफनाया था जो समय से पूर्व जन्म लेने के कारण मर गए थे l अब उन छोटे बच्चों के कब्रों के निकट एक और कब्र होने वाला था l इस परिवार ने जीवन को दमित करनेवाला जिस संकट का अनुभव किया उसने उनसे प्रेम करनेवालों के मस्तिष्क पर गहरा प्रहार किया l

दाऊद व्यक्तिगत और पारिवारिक संकट के प्रति अजनबी नहीं था l भजन 3 में, उसने खुद को अपने पुत्र अबशालोम के विरोध के कारण अभिभूत महसूस किया l ठहरकर युद्ध करने के बदले, उसने अपने घर और राजगद्दी को छोड़कर भाग जाने का चुनाव किया (2 शमूएल 15:13-23) l यद्यपि “बहुतों ने” उसे परमेश्वर द्वारा त्यागा हुआ माना (भजन 3:2), दाऊद बेहतर जानता था, उसने प्रभु को अपना सुरक्षा देनेवाले के रूप में देखा (पद.3), और उसने उसे उसी प्रकार पुकारा (पद.4) l और डूरोंडा भी l अपने शोक में, जब सैंकड़ों लोग उसके पति को स्मरण करने के लिए इकठ्ठा हुए थे, उसने अपनी मधुर, मृदु स्वर में गीत गाकर परमेश्वर में अपना भरोसा दर्शाया l

जब डॉक्टर का रिपोर्ट उत्साहवर्धक नहीं हो, जब आर्थिक तनाव थोड़ा भी कम न हो, जब संबंधों में मेल करने का प्रयास विफल हो जाए, जब मृत्यु ने उन लोगों के शवों को दफ़नाने के लिए छोड़ दिया हो जिनसे हम प्यार करते थे – काश हम भी कहने के लिए समर्थ हो जाएं, “परन्तु हे यहोवा, तू तो मेरे चारों ओर मेरी ढाल है, तू मेरी महिमा और मेरे मस्तक का ऊँचा करनेवाला है” (पद. 3) l

बड़ी बातें!

नवम्बर 9, 1989 को, संसार बर्लिन दीवार गिराए जाने के खबर से चकित रह गया l दीवार जिसने बर्लिन, जर्मनी, को विभाजित कर रखा था, गिर रहा था और वह शहर जो अट्ठाईस वर्षों से विभाजित था अब पुनः संयुक्त होने जा रहा था l यद्यपि आनंदोल्लास का भूगौलिक केंद्र जर्मनी था, दर्शक संसार इस उत्तेजना में सम्मिलित हुआ l कुछ बड़ी घटना हुयी थी!

लगभग सत्तर वर्षों तक निर्वासन में रहने के पश्चात जब 538 ई.पू. में इस्राएल अपने गृह राष्ट्र को लौटा, वह भी ऐतिहासिक था l भजन 126 अपने दृष्टिकोण से इस्राएल के इतिहास में आनंद से परिपूर्ण समय को देखता है l यह अवसर खिलखिलाहट, आनंददायक गायन, और अन्तेर्राष्ट्रीय स्वीकृति द्वारा चिन्हित था कि परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए बड़ा काम किया था (पद.2) l और उसके बचाने वाले करुणा को ग्रहण करनेवालों की प्रतिक्रिया क्या थी? परमेश्वर की ओर से बड़े बड़े काम का परिणाम हर्ष था (पद.3) l साथ ही साथ, अतीत में उसके काम वर्तमान के लिए नयी प्रार्थनाओं और भविष्य के लिए उज्ज्वल आशा का आधार बन गए (पद.4-6) l

आपको और हमें परमेश्वर की ओर से बड़ी बातों के उदाहरण खोजने के लिए अपने निजी अनुभवों में बहुत दूर देखने की ज़रूरत नहीं है, विशेषकर यदि हम उसके पुत्र, यीशु के द्वारा परमेश्वर में विश्वास करते हैं l उन्नीसवीं सदी की गीत लेखिका फैनी क्रोस्बी ने इस भाव को वश में कर ली थी जब उसने लिखा, “महान उसकी शिक्षा, अद्भुत उसके काम, उसी के द्वारा मिलता आनंद अपार, पर इन से भी गहरा होगा वह आनंद, आँखों से निहारूंगा ख्रिस्त तारणहार l” वाकई, ईश्वर तेरी जय हो, महान तेरा काम!

“चाहे”

2017 में, अमरीका में हरिकेन हार्वे (प्रचंड तूफ़ान) के बाद लोगों की सहायता करने का अवसर हममें से एक समूह को ह्यूस्टन पहुँचा दिया l हमारा लक्ष्य तूफ़ान से प्रभावित लोगों को उत्साहित करना था l इस प्रक्रिया में, हमारे खुद के विश्वास ने चुनौती का सामना करके  मजबूत हुआ जब हम उनके साथ उनके क्षतिग्रस्त चर्च इमारतों और घरों में खड़े थे l

हार्वे (प्रचंड तूफ़ान) के परिणामस्वरूप अनेक लोगों द्वारा दर्शाया गया दीप्तिमान विश्वास ही वह है जिसे हम हबक्कूक द्वारा ई.पू. सातवीं शताब्दी के अंत के नबूवत में पाते हैं l नबी ने नबूवत की कि कठिन समय आने वाला था(1:5-2:1); स्थिति बेहतर होने से पूर्व बदतर हो जाएगी l नबूवत का अंत उसे पृथ्वी की होनेवाली हानि पर विचार करते हुए पाटा है और शब्द चाहे तीन गुना दिखाई देता है : “चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगे . . .  जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए . . . , भेड़शालाओं में भेड़-बकरियां न रहें, और न थानों में गाय बैल हों” (3:17) l

किस प्रकार हम अपने को अकल्पनीय हानि जैसे अस्वस्थता या बेरोजगारी, किसी प्रिय की मृत्यु, या एक प्राकृतिक आपदा का सामना करते हुए पाते हैं? हबक्कूक का“ कठिन समय का गीत” हमें परमेश्वर, जो आज, कल, और सर्वदा हमारे उद्धार का श्रोत (पद.18), सामर्थ्य, और स्थिरता (पद.19), उसमें निश्चित विश्वास और भरोसा रखने का आह्वान देता है l आखिर में, जो उसपर भरोसा करते हैं कभी निराश नहीं होंगे l

नवीनीकरण के लिए तैयार

जर्मनी में सेना में रहते हुए, मैंने एक बिलकुल नयी 1969 मॉडल वोक्सवगेन बीटल(कार) खरीदी l कार सुन्दर थी! बाहरी गहरा हरा रंग आंतरिक भूरे रंग का पूरक था l परन्तु वर्षों के बीतने के साथ, परिवर्तन आरंभ हो गया, जिसमें एक दुर्घटना भी था जिसने पायदान और और एक दरवाजे को नष्ट कर दिया l और मैं अधिक कल्पना करके, सोच सकता था, “मेरी सबसे अच्छी कार नवीनीकरण की सही उम्मीदवार थी!” और अधिक पैसे के साथ, मैं उसे हटा भी सकता था l परन्तु ऐसा नहीं हो सका l

धन्यवाद हो कि सिद्ध परिकल्पना और असीमित श्रोतों का परमेश्वर इतनी आसानी से जीर्ण और टूटे लोगों के विषय हार नहीं मानता है l भजन 85 नवीनीकरण के लिए सही उम्मीदवारों का और योग्य परमेश्वर का वर्णन करता है जो नया कर सकता है l हालात संभवतः सत्तर वर्षों के निर्वासन(परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करने पर उनको प्राप्त दंड) के बाद इस्राएलियों के लौट आने के बाद की है l पीछे मुड़कर, वे उसका अनुग्रह देख पा रहे थे – जिसमें उसकी क्षमा भी थी (पद.1-3) l वे परमेश्वर से उसकी सहायता मांगने के लिए प्रेरित थे (पद.4-7) और उनको उससे अच्छी वस्तुओं की अपेक्षा थी (पद.8-13) l

हममें से कौन कभी-कभी प्रताड़ित, घायल, और टूटा हुआ महसूस नहीं करता है? और कभी-कभी हमारे द्वारा खुद की हानि करने के कारण ऐसा होता है l परन्तु इसलिए कि प्रभु नवीनीकरण और क्षमा का परमेश्वर है, उसके निकट दीनता से आनेवाले कभी भी आशाहीन नहीं हैं l खुली बाहों के साथ वह उसकी ओर लौटने वालों का स्वागत करता है, और ऐसा करनेवाले, उसकी बाहों में सुरक्षा पाते हैं l

दिव्य पथांतर

विशेषकर जब हम जान जाते हैं कि परमेश्वर ने हमारे लिए दूसरों की सेवा करने का द्वार खोल दिया है और हमसे कहा जाता है “नहीं” या “अभी नहीं” तो यह स्थिति कठिन हो सकती है l मेरी आरंभिक सेवा में, दो सुअवसर मेरे सामना आए जहां मैंने सोचा कि मेरे वरदान और कौशल कलीसियाओं की आवश्यकताओं के अनुकूल थे, परन्तु दोनों ही दरवाजे आखिरकार बंद हो गए l इन दो निराशाओं के बाद, एक और स्थिति आई, और मेरा चुनाव हो गया l उस सेवा की बुलाहट के बाद मुझे तेरह वर्षों का जीवन-स्पर्श करनेवाला पास्तरीए मेहनत की सेवा मिली l

प्रेरितों 16 में दो बार परमेश्वर ने पौलुस और सहयोगियों को पुनः प्रेषित किया l पहली बार, “पवित्र आत्मा ने उन्हें एशिया में वचन सुनाने से मना किया” (पद.6) l उसके बाद, “उन्होंने मूसिया के निकट पहुँचकर, बितूनिया में जाना चाहा; परन्तु यीशु के आत्मा ने उन्हें जाने न दिया” (पद.7) l उनको मालुम न था, कि परमेश्वर के पास दूसरी योजनाएं थीं जो उसके कार्य और सेवकों के लिए सही थीं l पूर्व योजनाओं के लिए उसके इनकार ने उन्हें उसकी सुनने और भरोसेमंद तौर से उसकी अगुवाई में ले गया (पद.9-10) l

हममें से किसने अपने आरंभिक विचार के विषय दुःख नहीं मनाया है जो एक दर्दनाक हानि साबित हुयी? जब हमें कोई ख़ास नौकरी नहीं मिली हम घायल महसूस किये, जब एक सेवा का अवसर मूर्तरूप नहीं ले सका, जब नए स्थान पर बसना सफल नहीं हुआ l यद्यपि ऐसी बातें कुछ पलों के लिए चिंताजनक हो सकती हैं, समय अक्सर प्रगट कर देता है कि ऐसे चक्करदार मार्ग वास्तव में दिव्य पथांतर हैं जो प्रभु दयालुता से हमें अपने इच्छित स्थान पर ले जाने के लिए लाता है, और हम इसके लिए अहसानमंद है l

आंधी में उपस्थित

हमारे चर्च के छः लोगों के एक परिवार के घर में भयानक आग लग गयी l यद्यपि पिता और पुत्र बच गए, पिता अभी भी अस्पताल में भर्ती थे जबकि उसकी पत्नी, माँ, और दो छोटे बच्चों की मृत्यु हो गयी l दुर्भाग्यवश, इस प्रकार की दिल दहला देनेवाली घटनाएं बार-बार होती रहती हैं l जब उनकी पुनरावृति होती है, उसी तरह वह पुराना प्रश्न भी है : अच्छे लोगों के साथ बुरी बातें क्यों होती हैं? और यह हमें चकित नहीं करता कि इस पुराने प्रश्न के नए उत्तर नहीं हैं l

फिर भी भजन 46 में भजनकार द्वारा बताया गया सच दोहराया गया है और उसका अभ्यास किया गया  है और बार-बार अपनाया गया है l “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक” (पद.1) l पद. 2-3 में वर्णित स्थिति विनाशकारी है – पृथ्वी और पहाड़ का समुद्र में डाल दिया जाना और समुद्र का गर्जना l जब हम आंधी में घिरे होने की कल्पना करते हैं हम भयभीत होते हैं जिसका वर्णन यहाँ पर काव्यात्मक रूप से किया गया है l किन्तु कभी-कभी हम ज़रूर अपने को वहाँ पाते हैं – लाइलाज बीमारी की बढ़ती पीड़ा में, विनाशकारी आर्थिक संकट के द्वारा उछाले जाने में,  प्रिय लोगों की मृत्यु द्वारा आहत और निस्तब्ध l

परेशानियों की उपस्थिति का अर्थ परमेश्वर की अनुपस्थितीत है पर तर्क संगत व्याख्या करना प्रलोभक है l परन्तु वचन का सच ऐसे विचारों का विरोध करता है l “सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है” (पद.7,11) l जब हमारी स्थितियां बर्दाश्त करने से बाहर होती है वह उपस्थित होता है, और हम उसके चरित्र में आराम पाते हैं : वह अच्छा, प्रेमी और विश्वासयोग्य है l