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Articles by आर्थर जैक्सन

छोटों से सीखना

जब एक मित्र और मैं केन्या, नैरोबी के एक झुग्गी झोपड़ी में गए, वहां की निर्धनता को देख कर हमारे हृदय बहुत अधिक नम्र किये गए। हालाँकि, उसी दृश्य में, हमारे अन्दर - भिन्न भावनाएँ - ताज़े जल के समान हलचल मचा दिए जब हमने छोटे बच्चों को दौड़ते और चिल्लाते हुए देखा, “म्चुन्गजी, मचुन्गजी!”(स्वाहिली भाषा में पास्टर)। हमारे साथ वाहन में अपने आध्यात्मिक अगुआ को देख कर उनकी प्रतिक्रिया ख़ुशी से भरी हुई थी। इन कोमल चीखों के साथ, छोटे बच्चों ने उनकी देखभाल और चिंता करने वाले का स्वागत किया।
जैसे ही यीशु एक गधे पर सवार होकर यरूशलेम पहुंचा, आनंदित बच्चे उनमें से थे जिन्होंने उसका उत्सव मनाया। “धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है! . . . दाऊद के संतान को होशाना” (मत्ती 21:9,15)। लेकिन यीशु के लिए प्रशंसा हवा में केवल ध्वनियाँ नहीं थीं। कोई भी व्यक्ति भागते, पैसा कमाने वाले व्यापारियों के शोर की कल्पना कर सकता है जो यीशु को देख कर भाग खड़े हुए (पद.12-13)। इसके अलावा, धार्मिक अगुवे जिन्होंने उसकी दया को व्यवहार में देखा था “क्रोधित हुए” (पद.14-15)। उन्होंने बच्चों की प्रशंसा पर नाराजगी दर्शायी (पद.16) और इस प्रकार अपने खुद के हृदयों की निर्धनता को प्रगट किया।
हम सभी उम्र और स्थानों के परमेश्वर के बच्चों के विश्वास से सीख सकते हैं जो यीशु को संसार के उद्धारकर्ता कर रूप में पहचानते हैं। यह वही है जो हमारी प्रशंसा सुनता है और रोता है, और हमारी देखभाल करता है और बचाता है जब हम बच्चों की तरह भरोसा से उसके पास आते हैं।

वास्तव में स्वतंत्र

अंग्रेजी फिल्म एमिस्टैड (Amistad) 1839 में पश्चिम अफ़्रीकी गुलामों की कहानी बताती है जो उन्हें ले जाने वाली नाव पर कब्ज़ा कर लेते हैं और कप्तान और चालक दल के कुछ सदस्यों को मृत्यु के घाट उतार देते हैं l आखिरकार उन्हें पुनः पकड़ लिया जाता है, और उन पर मुकदमा चलता है l एक अविस्मरणीय कोर्ट रूम दृश्य में गुलामों का अगुआ दिखाई देता है जो स्वतंत्रता के लिए भाव प्रवणता से गुहार लगा रहा होता है l जंजीरों से बंधा हुआ एक व्यक्ति टूटी हुयी अंग्रेजी में बढ़ते बल के साथ तीन सरल शब्दों को दोहराता है “हमें आज़ादी दो!” न्याय दिया गया और पुरुषों को मुक्त कर दिया गया l 

आज ज्यादातर लोग शारीरिक रूप से बंधे होने के खतरे में नहीं हैं, फिर भी पाप के आध्यात्मिक बंधन से सच्ची मुक्ति मायावी है l यूहन्ना 8:36 में यीशु के वचन सुखद राहत देते हैं : इसलिए यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तो तुम वास्तव में स्वतंत्र हो जाओगे l” यीशु ने स्वयं को सच्चे उद्धार के श्रोत के रूप में इंगित किया क्योंकि वह किसी को भी क्षमा प्रदान करता है जो उस पर विश्वास करता है l हालाँकि, मसीह के कुछ दर्शकों ने स्वतंत्रता (पद.33) का दावा किया, उनके शब्द, दृष्टिकोण और यीशु के विषय उनके कार्य उनके दावे को धोखा दे रहे थे l 

यीशु उन लोगों को सुनने के लिए तरसता है जो उस दलील को दोहराएंगे और कहेंगे, हमें आज़ादी दो!” करुणा के साथ वह उन लोगों के रोने का इंतज़ार करता है जो अविश्वास या भय या असफलता से बंधे हुए हैं l स्वतंत्रता दिल की बात है l ऐसी स्वतंत्रता उन लोगों के लिए आरक्षित है जो विश्वास करते हैं कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है जिसे संसार में हमारे ऊपर पाप की पकड़ की सामर्थ्य को उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा तोड़ने के लिए भेजा गया l  

सहायता करने के योग्य

जो की उसकी नौकरी से आठ सप्ताह की “छुट्टी प्राकृतिक आपदा के शिकार लोगों की मदद करने के कारण,छुट्टी नहीं थी l उसके शब्दों में, यह “फिर से बेघर लोगों के बीचरहना था, उनमें से एक बनना था, याद करना था कि भूखा रहना, थका रहना, और भुला दिया जाना कैसा होता था l” सड़कों पर जो का पहला कार्यकाल नौ साल पहले आया था जब वह शहर में बिना नौकरी या रहने की जगह पहुंचा था l तेरह दिनों तक वह कम भोजन या नींद के साथ सड़कों पर रहा l इसी तरह परमेश्वर ने उसे दशकों तक ज़रुरतमंदों लोगों की सेवा के लिए तैयार किया l

जब यीशु धरती पर आया, तो उसने उन लोगों के अनुभवों को साझा करने का भी चुनाव किया, जिन्हें वह बचाने आया था l “इसलिए जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उनके समान उनका सहभागी हो गया, ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान” (इब्रानियों 2:14) l जन्म से मृत्यु तक, मसीह के मानवीय अनुभव से कुछ भी नहीं अछूता नहीं था – पाप को छोड़कर (4:15) l क्योंकि उसने पाप पर विजय पा ली, जब हम पाप करने की परीक्षा में पड़ते हैं, वह हमारी मदद कर सकता है l 

और यीशु को हमारी सांसारिक परवाह करने की आवश्यकता नहीं है l जो हमें बचाता है वह हमसे जुड़ा रहता है और हममें गहरी दिलचस्पी रखता है l जीवन जो भी लाता है, हमें आश्वासन मिलता है कि जिसने हमें हमारे सबसे बड़े दुश्मन से बचाया है, अर्थात् शैतान (2:14), हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत के समय में हमारी मदद करने के लिए तैयार है l 

जीवन से भी उत्तम

यद्यपि मेरी यीशु से प्यार करती थी – जीवन कठिन था, बहुत कठिन l दो बेटों के साथ दो पोतों की मृत्यु हो चुकी थी दोनों ही गोली के शिकार हुए थे l और मेरी को खुद अशक्त करनेवाला दिल का दौरा पड़ा जिससे वह एक ओर लकवाग्रस्त हो गयी थी l फिर भी, जैसे ही वह सक्षम हुयी उसने चर्च की आराधनाओं में जाने के लिए अपना रास्ता बना लिया जहाँ यह उसके लिए असामान्य नहीं था – खंडित बोली के साथ – प्रभु की प्रशंसा करने के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग, “मेरी आत्मा यीशु से प्यार करती हैं; उसका नाम धन्य हो!”

मेरी द्वारा परमेश्वर की प्रशंसा करने से बहुत पहले, दाऊद ने भजन 63 के शब्दों को कलमबद्ध किया था l भजन का शीर्षलेख बताता है कि दाऊद ने लिखा था कि “जब वह यहूदा के जंगल में था l” यद्यपि वह एक कम चाहनेयोग्य – निराशाजनक भी – स्थिति में था, वह निराश नहीं हुआ क्योंकि उसकी आशा परमेश्वर में थी l “हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढूँगा; . . . सुखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है” (पद.1) l 

शायद आप खुद को बिना सही दिशा और अपर्याप्त संसाधन के साथ, कठिनाई के स्थान में पाते हैं l असुविधाजनक परिस्थितियाँ हमें भ्रमित कर सकती हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे हमें पटरी से उतार दे, जब हम उससे चिपके रहते हैं जो हमसे प्रेम करता है (पद.3), हमें को संतुष्ट करता है (पद.5), हमारी सहायता करता है (पद.7), और जिसका दाहिना हाथ हमें थामता है (पद.8) l क्योंकि परमेश्वर का प्रेम जीवन से उत्तम है, मेरी और दाऊद के समान, हम परमेश्वर की प्रशंसा और सम्मान करने वाले होंठों के द्वारा संतुष्टि व्यक्त कर सकते हैं (पद.3-5) l 

यीशु द्वारा स्वतंत्र

“मैं अपनी माँ के साथ इतने लम्बे समय तक रहा कि वह दूसरी जगह रहने चली गयी!” वे पीटर के शब्द थे, जिसका यीशु के प्रति संयम और आत्मसमर्पण करने से पहले का जीवन बहुत अच्छा नहीं था l वह खुलकर स्वीकार करता है कि वह चोरी करके – अपने प्रिय जनों से भी - अपने नशीले पदार्थ के सेवन की आदत का समर्थन करता था l वह अब अपना पुराना जीवन छोड़ चुका है और वह निर्मल होने के वर्षों, महीनों और दिनों को ध्यान में रखते हुए इसका अभ्यास करता है l जब पीटर और मैं नियमित रूप से एक साथ परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने के लिए बैठते हैं, तो मैं एक बदले हुए व्यक्ति को देख रहा होता हूँ l 

मरकुस 5:15 एक पूर्व दुष्टात्माग्रस्त व्यक्ति की बात बताता है जो परिवर्तित हो गया था l उसकी चंगाई से पहले, असहाय, आशाहीन, और आततायी वे शब्द हैं जो उसके लिए उपयुक्त लगते हैं (पद.3-5) l लेकिन यीशु द्वारा उसे मुक्त करने के बाद यह सब बदल गया (पद.13) l लेकिन, जैसे पीटर के साथ, यीशु के सामने उसका जीवन सामान्य से बहुत दूर था l उसकी आंतरिक उथल-पुथल जो उसने बाहरी रूप से व्यक्त की थी, आज लोगों के अनुभव के विपरीत नहीं है l कुछ आहात लोग परित्यक्त इमारतों, वाहनों, या अन्य स्थानों में रहते हैं; कुछ अपने घरों में रहते हैं लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले हैं l अदृश्य जंजीरें दिलों-दिमाग को इस तरह जकड़ देती हैं कि वे दूसरों से दूरी बना लेते हैं l  

यीशु में, हमारे पास वह व्यक्तित्व है जिस पर हमारे दर्द और अतीत और वर्तमान की शर्म के साथ भरोसा किया जा सकता है l और, जिस तरह दुष्टात्माग्रस्त व्यक्ति और पीटर के साथ, वह उन सभी के लिए दया की खुली बाहों के साथ इंतज़ार करता है जो आज उसके पास आते हैं (पद.19) l 

साथ में

1994 में दो महीने की अवधि के दौरान, हुतु जनजाति के सदस्यों द्वारा अपने साथी देशवासियों को मारने पर तुला रवांडा में दस लाख तुत्सी(नस्ली जाति) मारे गए थे l इस भयावह नरसंहार के मद्देनज़र, बिशप जेफ़री रुबुसिसी ने अपनी पत्नी से उन महिलाओं तक पहुँचने के बारे में संपर्क किया, जिनके प्रियजन मारे गए थे l मेरी का जवाब था, “मैं केवल रोना चाहती हूँ l” उसने भी अपने परिवार के सदस्यों को खोया था l बिशप की प्रतिक्रिया एक बुद्धिमान अगुआ और देखभाल करनेवाले पति की थी : “मेरी, महिलाओं को एक साथ इकठ्ठा करो और उनके साथ रोओ l” उन्हें पता था कि उनकी पत्नी के दर्द ने उन्हें दूसरों के दर्द में विशिष्ट रूप से भागीदारी करने के लिए तैयार किया था l 

कलीसिया, परमेश्वर का परिवार है, जहाँ जीवन की सभी बातें साझा की जा सकती हैं – अच्छी और जो बहुत अच्छी नहीं हैं l नए नियम का शब्द “परस्पर” का उपयोग एक दूसरे पर हमारी निर्भरता को हथियाने के लिए किया गया है l “भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो . . . आपस में एक सा मन रखो” (रोमियों 12:10, 16) l हमारी संयुक्तता की सीमा पद 15 में व्यक्त की गयी है : “आनंद करनेवालों के साथ आनंद करो, और रोनेवालों के साथ रोओ l”

जबकि नरसंहार से प्रभावित लोगों की तुलना में हमारे दर्द की गहराई और गुंजाइश कम हो सकती है, फिर भी यह व्यक्तिगत और वास्तविक है l और, जैसा कि मेरी के दर्द के साथ था, इसलिए कि परमेश्वर ने हमारे लिए जो किया है उसे गले लगाया जा सकता है और दूसरों के दिलासा और भलाई के लिए साझा किया जा सकता है l 

अंत में अनुग्रह

कलाकार डौग मर्के की उत्कृष्ट मूर्तिकला रुथलेस ट्रस्ट(Ruthless Trust) में एक कांस्य मानव आकृति अति मायूसी से अखरोट की लकड़ी के बने क्रूस से लिपटा हुआ है l वह लिखता है, “यह जीवन के लिए हमारे निरंतर और उचित आसन की एक बहुत ही सरल अभिव्यक्ति है – मसीह और सुसमाचार के साथ और उनके ऊपर सम्पूर्ण, बंधनमुक्त अंतरंगता l”

हम इस प्रकार का भरोसा मरकुस 5:25-34 में अनाम स्त्री की क्रिया और शब्दों में व्यक्त होते देखते हैं l बारह वर्षों तक उसका जीवन जर्जर अवस्था में रहा (पद.25) l “उसने बहुत वैद्यों से बड़ा दुःख उठाया, और अपना सब माल व्यय करने पर भी उसे कुछ लाभ न हुआ था, परन्तु और भी रोगी हो गयी थी” (पद.26) l लेकिन यीशु के विषय सुनकर उसने उसके निकट पहुँचने का मार्ग बना लिया, और उसे स्पर्श किया, और अपनी “बीमारी से मुक्त” हो गयी (पद.27-29) l

क्या आप अपने आप के अंत तक पहुँच गए हैं? क्या आपने अपने सभी संसाधनों को ख़त्म कर दिया है? चिंताग्रस्त, निराश, खोए हुए, परेशान लोगों को हताश होने की ज़रूरत नहीं है l प्रभु यीशु आज भी मायूस लोगों के विश्वास का प्रत्युतर देता है – जिस प्रकार इस पीड़ित स्त्री द्वारा दर्शाया गया और मर्के की मूर्तिकला में चित्रांकित किया गया l इस प्रकार का विश्वास गीत लेखक चार्ल्स वेस्ली के शब्दों में दर्शाया गया है : “पिता मैं हाथ बढ़ाता हूँ, मुझे तू थामे रह, सहायक दूसरा है नहीं l” उस प्रकार का विश्वास नहीं है? परमेश्वर से उस पर भरोसा करने के लिए मदद मांगे l वेस्ली अपने गीत को एक प्रार्थना से समाप्त करता है : “विश्वास के कर्ता, मैं अपनी थकी, लालसा से भरी आँखें उठता हूँ; काश मैं उस उपहार को प्राप्त कर सकूँ! मेरी आत्मा उसके बिना मर जाएगी l”

अंत तक फलदायी

यद्यपि लेनोर डनलप चौरानवे वर्ष की युवा थी, उसका मस्तिष्क तेज़, उसकी मुस्कराहट उज्जवल, और यीशु के लिए उसके संक्रामक प्रेम को बहुतों ने महसूस किया था l हमारे चर्च के युवाओं की संगती में उसे खोजना असामान्य नहीं था; उसकी उपस्थिति और भागीदारी ख़ुशी और प्रोत्साहन के श्रोत थे l लेनोर का जीवन इतना जीवंत था कि उसकी मृत्यु ने हमारी असावधानी में हमें पकड़ लिया l एक शक्तिशाली धावक की तरह, वह जीवन भर समापन रेखा पर छाई रही l उसकी ऊर्जा और उसका उत्साह ऐसा था कि, अपनी मृत्यु के कुछ ही दिन पहले, उसने सोलह सप्ताह का एक पाठ्यक्रम पूरा क्या था, जिसमें यीशु के सन्देश को दुनिया के लोगों तक ले जाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया था l

लेनोर का फलदायी, परमेश्वर को आदर देनेवाला जीवन भजन 92:12-15 में वर्णित जीवन को दर्शाता है l यह भजन उन लोगों के नवोदित, प्रस्फुटित और फलदायी जीवन होने का वर्णन करता है, जिनका जीवन परमेश्वर के साथ एक सही संबंद में निहित (पद.12-13) l चित्रित किये गए दो पेड़ क्रमशः अपने फल और लकड़ी के लिए मूल्यवान थे; इनके साथ भजनकार जीवन शक्ति, समृद्धि और उपयोगिता की भावना को अधिकार में कर लेता है l जब हम प्रेम करने, साझा करने, मदद करने, और दूसरों को मसीह के पास लाने में अपने जीवन को उदीयमान् और फूलते हुए देखते हैं हमें आनंदित होना चाहिए l

यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिन्हें हम “वरिष्ठ” या “अनुभवी” मानते हैं, जड़वत और फलदायी होने में विलम्ब कभी नहीं होता है l लेनोर का जीवन यीशु के द्वारा परमेश्वर में गहराई से जड़वत था और इसकी और परमेश्वर की भलाई की गवाही देता है (पद.15) l हमारा जीवन भी ऐसा हो सकता है l

स्थायी प्रार्थना

“प्रार्थनाएं मृत्युहीन हैं l” ये ई.एम. बौंड्स (1835-1913) के ध्यान आकर्षित करनेवाले शब्द हैं, प्रार्थना के विषय जिनके उत्कृष्ट लेखन ने पीढ़ियों से लोगों को प्रेरित किया है l हमारी प्रार्थनाओं की शक्ति और स्थायी प्रकृति के बारे में उनकी टिप्पणियाँ इन शब्दों के साथ जारी हैं : जिन होठों ने उन्हें उच्चारित किया है मृत्यु उन्हें बंद कर देती हैं, जिस हृदय ने उन्हें महसूस किया वह धड़कना बंद कर दिया, परन्तु प्रार्थना परमेश्वर के सामने रहती हैं, और परमेश्वर का हृदय उनपर लगा हुआ होता है और प्रार्थनाएं उन लोगों के बाद भी जीवित रहती हैं जिन्होनें उन्हें उच्चारित किया था; वे पीढ़ियों के बाद भी जीवित रहती हैं, एक युग के बाद भी जीवित रहती हैं, एक जमाने के बाद भी जीवित रहती हैं l”

क्या आपने कभी विचार किया है कि आपकी प्रार्थनाएँ – विशेषकर जो परेशानी, दुःख, और पीड़ा में जन्मी हैं – कभी परमेश्वर के पास पहुँची होंगी? गहराई तक पहुंचने वाले बौंड्स के शब्द हमारी प्रार्थनाओं के महत्त्व को हमें याद दिलाते हैं और उसी प्रकार प्रकाशितवाक्य 8:1-5 भी l विन्यास स्वर्ग (पद.1), परमेश्वर का सिंहासन कक्ष और सृष्टि का नियंत्रण कक्ष है l स्वर्गदूत के समान सेवक परमेश्वर की उपस्थिति में खड़े हैं (पद.2) और एक स्वर्गदूत खड़े होकर, प्राचीन पुरोहितों की तरह, “[परमेश्वर के] पवित्र लोगों” की प्रार्थनाओं के साथ धूप चढ़ाता है (पद.3) l पृथ्वी पर की गयी प्रार्थनाओं का स्वर्ग में परमेश्वर तक पहुंचना कितनी आँखें खोलने वाली बात और प्रोत्साहित करनेवाली तस्वीर है (पद.4) l जब हम सोचते हैं कि हमारी प्रार्थनाएं मार्ग में खो गयी हैं अथवा भुला दी गयी हैं, तो हम यहाँ जो देखते हैं वह हमें सुकून देता है और हमें अपनी प्रार्थना में बने रहने के लिए मजबूर करता है, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के लिए अनमोल हैं!