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Articles by बिल क्राऊडर

एक छोटी आग

सितम्बर में एक रविवार की रात, जब सब लोग सो रहे थे, पुडिंग लेन पर थॉमस फेरिनर की बेकरी में छोटी सी आग लगी l जल्द ही आग एक घर से दूसरे घर में फ़ैल गयी और लन्दन 1966 के भयानक आग में घिर गया l इस आग से 70,000 से अधिक लोग बेघर हो गए  जिसने शहर के चार बटे पाँच हिस्से को अपने चपेट में ले लिया l एक छोटी सी आग से कितना अधिक विनाश!

बाइबिल हमें एक और छोटी किन्तु विनाशक अग्नि के विषय चिताती है l याकूब यह लिखते समय, “जीभ भी एक छोटा सा अंग है और वह बड़ी-बड़ी डींगें मारती है l देखो, थोड़ी से आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है” (याकूब 3:5) l

किन्तु हमारे शब्द रचनात्मक  भी हो सकते हैं l नीतिवचन 16:24 ताकीद देता है, “मनभावने वचन मधुभारे छत्ते के सामान प्राणों को मीठे लगते, और हड्डियों को हरी-भरी करते हैं l” प्रेरित पौलुस कहता है, “तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो कि तुम्हें हर महुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए” (कुलु. 4:6) l जैसे नमक भोजन को स्वादिष्ट करता है, हमारे अनुग्रही शब्द दूसरों का निर्माण करते हैं l

पवित्र आत्मा की सहायता से हमारे शब्द दुखित लोगों को, विश्वास में बढ़ने को इच्छित, अथवा जिन्हें उद्धारकर्ता के निकट आना ज़रूरी है, को उत्साहित करते हैं l हमारे शब्द आग उत्पन्न करने की जगह आग बुझा सकते हैं l

तस्वीर बनाना

इंग्लैंड, लन्दन में नेशनल पोर्ट्रेट दीर्घा में सदियों के ढेर सारे तस्वीर हैं, जिसमें विंस्टन चर्चिल के 166, विलियम शेक्सपियर की 94, और जॉर्ज वाशिंगटन की 20 तस्वीरें हैं l पुरानी तस्वीरों को देखकर हम सोचेंगे : क्या ये लोग वास्तव में ऐसे ही दिखाई देते थे?

जैसे, स्कॉटलैंड के देश-प्रेमी विलियम वालस (c. 1270-1305) के 8 चित्र हैं, किन्तु हमारे पास इनसे तुलना करने के लिए शायद ही चित्र हैं l हम कैसे जाने कि चित्रकार ने वाल्स का सही चित्र बनाया?

कुछ ऐसा ही यीशु की समानता के साथ भी हो सकता है l बिना जाने, यीशु में विश्वास करनेवाले दूसरों पर उसकी छाप छोड़ रहे हैं l चित्रकारी ब्रश और रंग से नहीं, किन्तु आचरण, कार्य, और संबंधों के द्वारा l

क्या हम उसके हृदय की समानता का चित्र प्रदर्शित कर रहे हैं? प्रेरित पौलुस की यही चिंता थी l “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलि. 2:5) l हमारे प्रभु को उचित रूप में प्रदर्शित करने की इच्छा के साथ, उसने यीशु के अनुयायियों को दूसरों तक उसकी दीनता, आत्म-बलिदान और करुणा दर्शाने का आग्रह किया l

ऐसा कहा गया है, “हम ही केवल वह यीशु हैं जिसे कुछ लोग कभी देखेंगे l” हम “दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा [समझकर] (पद.3), संसार को स्वयं यीशु का हृदय दिखाएँगे l

सम्पूर्ण पहुँच

कुछ वर्ष पूर्व, मेरा एक मित्र मुझे प्रथम गोल्फ प्रतियोगिता देखने के लिए आमंत्रित किया l पहली बार देखने के कारण, मेरी अपेक्षाएं शून्य थीं l वहाँ पहुँचकर, मैं उपहार, सूचना, और गोल्फ के मैदान का नक्शा पाकर चकित हुआ l लेकिन सबसे अच्छी बात यह थी कि हमें 18 वीं ग्रीन (गोल्फ खेल में एक विशेष बिंदु/स्थान) के पीछे विशिष्ट दीर्घा में पहुँच मिली, जहाँ मुफ्त भोजन और बैठने का स्थान था l यद्यपि मैं इस आतिथ्य दीर्घा में स्वयं नहीं पहुँच सकता था l मुख्य व्यक्ति मेरा मित्र था; केवल उसके द्वारा मुझे पूर्ण पहुँच मिली l

खुद पर भरोसे से हम, नाउम्मीदी में परमेश्वर से दूर रहते l किन्तु यीशु, हमारा दंड लेकर, अपना जीवन और परमेश्वर तक पहुँच देता है l प्रेरित पौलुस ने लिखा, “[परमेश्वर की इच्छा थी कि] अब कलीसिया के द्वारा, परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान ... प्रगट किया जाए” (इफि. 3:10) l इस ज्ञान ने यहूदी और गैरयहूदी का मसीह में मेल कराया, जिसने हमारे लिए परमेश्वर पिता तक पहुँच दी l “[यीशु पर] विश्वास करने से साहस और भरोसे के साथ परमेश्वर के निकट आने का अधिकार है” (पद.12) l

यीशु में भरोसा करने पर, हमें सबसे महान पहुँच मिलती है-परमेश्वर तक पहुँच जो हमसे प्रेम करता है और हमसे सम्बन्ध रखना चाहता है l

कल की ओर दृष्टि

मुझे खुला नीला आसमान देखना पसंद है l आसमान हमारे महान सृष्टिकर्ता की श्रेष्ठ कृति का एक सुन्दर भाग है l कल्पना करें पायलट इस दृश्य को कितना पसंद करते होंगे l वे उड़ान भरने के लिए खुले आसमान का वर्णन करने के लिए अनेक वैमानिक शब्दों का उपयोग करते हैं, किन्तु मेरा पसंदीदा है, “कल की ओर दृष्टि l”

“कल की ओर दृष्टि” हमारे देखने से परे है l हम कभी-कभी आज क्या होगा भी जानने अथवा समझने में संघर्ष करते हैं l बाइबिल कहती है, “और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा ... जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के सामान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है” (याकूब 4:14) l

किन्तु हमारी सीमित दृष्टि निराशा का कारण नहीं l इसके बिल्कुल विपरीत l हमारा विश्वास हमारे कल को पूरी तौर से देखने वाले परमेश्वर पर है-और हमारे भविष्य की चुनौतियों की ज़रूरतों को जाननेवाला l प्रेरित पौलुस यह जानता था l इसलिए पौलुस आशापूर्ण शब्दों से उत्साहित करता है, “हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं” (2 कुरिन्थियों 5:7) l

जब हम अपने आज और आनेवाले कल के लिए परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, हम अपने जीवन में आनेवाली किसी बात के लिए चिंतित नहीं होते l हम भविष्य जानने वाले के साथ चलते हैं l वह भविष्य को सँभालने में सामर्थी और बुद्धिमान है l

मैं सब जानता हूँ

निमोनिया और अत्यधिक खाँसी के कारण मेरे पुत्र और बहु मेरे पौत्र, कैमेरोन को हॉस्पिटल ले जाना ज़रूरी समझे l उन्होंने हमसे उनके पाँच-वर्षीय बेटे, नेथन को स्कूल से घर ले जाने का आग्रह किया जिसे हमदोनों करने में खुश थे l

मार्लिन ने नेथन से कार में पूछा, “क्या तुम चकित हो कि आज हम तुम्हें लेने आए?” वह बोला, “नहीं!” पूछने पर कि क्यों नहीं, उसने उत्तर दिया, “क्योंकि मैं सब जानता हूँ!”

एक पाँच-वर्षीय बच्चा सब कुछ जाने का दावा करता है, किन्तु हम बड़े उम्र वाले उससे कुछ बेहतर जानते हैं l हमारे पास अक्सर उत्तर से अधिक प्रश्न होते हैं l हम जीवन के क्यों, कब, और कैसे पर सोचते हैं-अक्सर यह भूलकर कि यद्यपि हम सब कुछ नहीं जानते, हम सर्वज्ञानी परमेश्वर को जानते हैं l

भजन 139:1,3 सर्वज्ञानी परमेश्वर का हमें घेरनेवाला और अतिनिकट प्रेम के विषय बताता है l दाऊद कहता है, “तू ने मुझे जांचकर जान लिया है ... मेरे चलने और लेटने की तू भली-भांति छानबीन करता है, और मेरे पूरे चालचलन के भेद जानता है l” परमेश्वर हमसे सम्पूर्ण प्रेम करता है, आज हम किसका सामना करेंगे पूर्णरूपेण जानता है, और हमारे जीवन की हर परिस्थिति में हमारी पूर्ण मदद करना जानता है l यह जानना कितना आरामदायक है l

हमारा ज्ञान सदा सीमित रहेगा, किन्तु परमेश्वर को जानना ही सर्वाधिक अर्थपूर्ण है l हम उस पर भरोसा रख सकते हैं l

अनंत उद्धारकर्ता

जेरलिन टैली की मृत्यु 2015 में विश्व के सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति-116 वर्ष की उम्र में हुई  l 1995 में, यरूशलेम शहर अपना 3,000 वां वर्षगाँठ मनाया l एक व्यक्ति के लिए एक सौ सोलह वर्ष, और एक शहर के लिए 3,000 बहुत है, किन्तु कैलिफोर्निया की श्वेत पहाड़ियों के देवदार वृक्षों की उम्र 4,800 वर्ष से भी अधिक होती है यानी कुलपति अब्राहम से भी 800 वर्ष बड़े!

यहूदी नेतृत्व द्वारा यीशु के व्यक्तित्व के विषय चुनौती देने पर, यीशु ने भी खुद को अब्राहम से पहले बताया l यीशु ने कहा, “पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ” (यूहन्ना 8:58) l उसके दृढ़कथन से उसका सामना करनेवाले चकित होकर उसे पत्थरवाह करना चाहा l उनको ज्ञात था कि वह कालानुक्रमिक उम्र की बात नहीं किन्तु परमेश्वर का प्राचीन नाम “मैं हूँ” (निर्ग. 3:14) द्वारा वास्तव में अनंत होने का दावा कर रहा था l वह त्रिएक परमेश्वर का सदस्य होकर, ऐसा दावा कर सकता था l

यूहन्ना 17:3 में, यीशु ने कहा, “ और अनंत जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, ... जानें l अनंत ने समय में प्रवेश किया ताकि हम सर्वदा जीवित रहें l वह हमारे बदले मृत्यु सहकर, पुनरुथित होकर अपना उद्देश्य पूरा किया l उसके बलिदान के कारण, हम अनंत भविष्य की राह देखते हैं, जहाँ हम उसके साथ अनंत बिताएंगे l वह अनंत है l

बांटने योग्य धन

1974 के मार्च में, एक कुआं खोदते समय चीनी किसानों ने चौकानेवाली खोज की l मध्य चीन के सूखी धरती के नीचे लाल भूरे रंग की पकी मिट्टी की सेना (Terracotta Army) मिली-ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की आदम कद पकी मिट्टी की मूर्तियाँ l इस अद्भुत खोज में लगभग 8,000 सैनिक, 150 अश्वारोही सेना, और 520 घोड़ों द्वारा खींचे जानेवाले 130 रथ l  यह टेराकोटा सेना चीन के सैलानी स्थलों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसे लाखों लोग देखने आते हैं l यह अदभुत धन शताब्दियों से छिपा था किन्तु अब संसार के साथ बांटा जा रहा है l

प्रेरित पौलुस ने मसीह के अनुगामियों को लिखा कि उनके अन्दर एक धन है जिसे संसार के साथ बांटना होगा : “वही [ज्योति] हमारे हृदयों में चमकी ... परन्तु हमारे पास वह धन मिट्टी की बरतनों में रखा है” (2 कुरिं. 4:7) l यह धन हमारे अन्दर मसीह और उसके प्रेम का है l

यह धन छिपाने के लिए नहीं बांटने के लिए है कि परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह द्वारा प्रत्येक राष्ट्र के लोग उसके परिवार में शामिल हो सकें l काश हम भी, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में आज किसी के साथ यह धन बाँट सकें l

हमारे प्रावधान का श्रोत

अगस्त 2010 में, संसार की निगाहें कोपिआपो, चिली के एक खनन दस्ते की ओर थी l  33 खनिक 2,300 फीट धरती के नीचे अँधेरे में फंसे थे l उन्हें सहायता की आशा न थी l 17 दिनों के इंतज़ार के बाद बचाव दल ने, खनिकों तक जल, भोजन और दवाईयाँ पहुँचाने के लिए चार सुराख़ बनाए l खनिक ऊपर धरती से इन वाहिकाओं पर अर्थात् बचाव दल के प्रावधान पर निर्भर थे l उनहत्तरवें दिन, बचाव दल ने अंतिम खनिक को सुरक्षित बाहर निकाला l

हममें से हर कोई इस संसार में खुद की सामर्थ के बाहर के प्रावधान पर निर्भर है l संसार का रचनाकार, परमेश्वर हमारी समस्त ज़रूरतें पूरी करता है l उन खनिकों के लिए उन सुराखों की तरह, प्रार्थना समस्त ज़रूरतों की पूर्तिकर्ता से हमें जोड़ता है l

यीशु ने हमें प्रार्थना करने को उत्साहित किया, “हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे” (मत्ती 6:11) l उनके दिनों में रोटी जीवन का बुनियादी भोजन था अर्थात् लोगों की दैनिक ज़रूरत का चिंत्रण l यीशु हमें केवल भौतिक आवश्यकताओं के लिए नहीं किन्तु समस्त ज़रूरतों के लिए प्रार्थना करने को कहता है-सुख,चंगाई,साहस,बुद्धिमत्ता l

हर क्षण उस तक प्रार्थना द्वारा हमारी पहुँच है, और वह हमारे मांगने से पूर्व हमारी ज़रूरत जानता है (पद.8) l आज आप किस से संघर्षरत हैं? “जितने यहोवा को पुकारते हैं ...उन सभों के वह निकट रहता है” (भजन 145:18) ;

तुम उसे क्या कहते हो?

1929 के एक शनिवार संध्या अखबार के साक्षात्कार  में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा, “बचपन में मैं बाइबिल और तालमूद(यहूदी धर्म साहित्य) दोनों ही की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु मैं नासरी . . . . के प्रकाशमान रूप द्वारा सम्मोहित हूँ l कोई भी यीशु की उपस्थिति की वास्तविकता अनुभव किये बगैर सुसमाचारों को नहीं पढ़ सकता l उसका व्यक्तित्व प्रत्येक शब्द में धड़कती है l ऐसे जीवन में कोई मिथ्या नहीं है l”

नया नियम हमें यीशु के देशवासियों का उदहारण देता है जो उसके विषय कुछ विशेष पाते थे l जब यीशु ने अपने अनुयायियों से पुछा, “लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं?” उनके उत्तर थे कि कुछ यूहन्ना बप्तिस्मा देनेवाला, दूसरे कहते हैं वह एलिय्याह है, और अन्य उसे यिर्मयाह अथवा कोई और नबी (मत्ती 16:14) l  इस्राएल के महान नबियों के साथ गिनती वास्तव में एक सम्मान था, किन्तु यीशु को सम्मान नहीं चाहिए था l वह उनकी समझ देखना चाहता था और विश्वास खोज रहा था l इसलिए उसने दूसरा प्रश्न किया : “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? (16:15) l

पतरस की घोषणा ने पूरी तरह यीशु की पहचान बता दी: “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (पद.16) l

यीशु चाहता है कि हम उसको और उसके बचानेवाले प्रेम को जाने l इसलिए हममें से प्रत्येक को इस प्रश्न का उत्तर देना ही होगा, “आप के लिए यीशु कौन है?”

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आप नहीं हैं

दाऊद ने योजना बनायी, फर्नीचर अभिकल्पित किया, सामग्री इकट्ठा किया, समस्त प्रबंध किया (देखें 1 इतिहास 28:11-19) l किन्तु यरूशलेम का प्रथम मंदिर दाऊद का नहीं, सुलेमान का मंदिर कहलाता है l

क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, “तू घर बनवाने न पाएगा” (1 इतिहास 17:4) l परमेश्वर दाऊद के पुत्र सुलेमान को मंदिर बनाने के लिए चुना था, इस इनकार का प्रतिउत्तर अनुकरणीय था l वह परमेश्वर के कार्य पर केन्द्रित रहा (पद.16-25) l उसकी आत्मा धन्वादित थी l उसने सम्पूर्ण प्रयास किया और मंदिर बनाने में योग्य लोगों से सुलेमान की मदद करवायी (देखें 1 इतिहास 22) l

बाइबिल टीकाकार जे. जी, मेक्कोन्विल ने लिखा : “अक्सर हमें स्वीकार करना होगा कि मसीही सेवा के रूप में जो कार्य हम करना पसंद करेंगे, वो नहीं है जिसके लिए हम योग्य हैं, और जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाया है l यह दाऊद की तरह हो सकता है, कार्य का आरंभ, जो भविष्य में और भी भव्य होगा l

दाऊद ने अपनी नहीं, परमेश्वर की महिमा खोजी l उसने परमेश्वर के मंदिर के लिए विश्वासयोग्यता से सब कुछ किया, उसके लिए एक मजबूत नींव डाला जो उसके बाद कार्य को संपन्न करनेवाला था l काश हम भी, उसी तरह, परमेश्वर का चुना हुआ कार्य धन्यवादी हृदय से करें! जाहिर है कि हमारा प्रेमी परमेश्वर  “अधिक भव्य” ही करेगा l

उसका अद्भुत चेहरा

मेरा चार वर्षीय बेटा जिज्ञासु है और निरंतर बातें करता है l मुझे उससे बातें करना पसंद है, किन्तु वह अपनी पीठ मेरी ओर करके बातें करने की खेदजनक आदत बना ली है l मैं अक्सर कहती हूँ, “मैं तुम्हारी सुन नहीं सकती-कृपया मेरी ओर देखकर बातें करो l”

कभी-कभी परमेश्वर हमसे भी यही कहता है-इसलिए नहीं कि वह सुन नहीं सकता, किन्तु हम वास्तव में “उसे देखे बिना” उससे बातचीत करना चाहते हैं l हम प्रार्थना करते समय अपने प्रश्नों में उलझकर और स्वकेन्द्रित रहकर, भूल जाते हैं किससे प्रार्थना कर रहे हैं l मेरे बेटे की तरह, हम उसकी ओर केन्द्रित हुए बिना प्रश्न करते हैं जिससे हम बातचीत कर रहे हैं l

हम, परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया है, के विषय खुद को याद दिलाकर अपने अनेक चिंताओं को संबोधित कर सकते हैं l केवल पुनः केन्द्रित होकर, ही हम उसके चरित्र को जानकर सुख पाते हैं : कि वह प्रेमी, क्षमाशील, प्रभु, और अनुग्रहकारी है l

भजनकार का विश्वास था कि हम परमेश्वर का मुख निरंतर निहारें (भजन 105:4) l  दाऊद द्वारा अगुओं को उपासना और प्रार्थना के लिए नियुक्ति पर, उसने लोगों को परमेश्वर के चरित्र की प्रशंसा करने और उसके पूर्व विश्वासयोग्यता की चर्चा करने को उत्साहित किया (1 इतिहास 16:8-27) l

परमेश्वर का खूबसूरत चेहरा निहारने पर, हम सामर्थ्य और सुख पाते हैं जो हमें हमारे अनुत्तरित प्रश्नों के मध्य भी संभालता हैं l

सुख का पलना

मेरी सहेली ने मुझे अपने चार दिन की बेटी को गोद में लेने का सौभाग्य दिया l बच्चावह मेरे गोद में आने के बाद ही हलचल करने लगा l मैंने उसे दुलारा, अपने गाल उसके सिर से लगाया, और उसे चुप करने के लिए हिलाते हुए एक गीत गुनगुनाने लगी l इन प्रयासों के साथ, दस वर्षों के अपने लालन-पालन अनुभव के बाद भी, मैं उसे शांत न कर सकी l मैंने उसे उसकी अधीर माँ के बाहों में डालने तक वह अत्यंत परेशान रही l तुरन ही वह शांत हो गई; उसका रोना बंद हो गया और उसकी बेचैनी उसके भरोसेमंद सुरक्षा में तब्दील हो गई l  मेरी सहेली अपनी बेटी को गोद लेना और उसकी परेशानी दूर करना जानती थी l

परमेश्वर अपने बच्चों को माता की तरह सुख देता है : कोमल, भरोसेमंद, और बच्चे को शांत करने में चिन्ताशील l हमारे थकित अथवा परेशान होने पर, वह हमें अपनी बाहों में उठाता है l हमारा पिता और सृष्टिकर्ता होकर, वह हमें निकटता से जानता है l “जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शांति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है” (यशा. 26:3) l

जब हमें संसार का भारी बोझ दबाए, हम इस ज्ञान में सुख पाते हैं कि वह प्रेमी अभिभावक की तरह हमें अर्थात् अपने बच्चों को सुरक्षित रखता और उनके लिए लड़ता है l