Our Authors

सब कुछ देखें

Articles by कैरल मैकवान

अव्यवस्था के बीच शांति

जब लगभग एक साल तक तलाश करने के बाद भी मधु को नौकरी नहीं मिली, तो अनिश्चित भविष्य के डरावने विचार उसके दिमाग में छा गए। इस दौरान लोगों द्वारा कहे गए बुरे शब्दों की वजह से उसकी नींद और जीने की इच्छा भी चली गई। फिर एक दिन, सूरज की रोशनी की तरह, बाइबल के एक पद ने उसकी उम्मीद को फिर से जगा दिया। उसने इसे एक तख्ती पर लिख लिया और जब भी वह इसे जोर से पढ़ती, तो उसका विश्वास मजबूत होता, उसका डर दूर होता और वह शांत हो जाती थी।

यशायाह 26 एक शांत मन विकसित करने के बारे में व्यावहारिक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। पहली बात यह है कि हमें परमेश्वर पर अपना विश्वास बनाए रखना चाहिए जो हमें बचाता है (पद.2-3)। उस पर विश्वास करने के अलावा, हमें अपने मन और विचारों को भी परमेश्वर पर स्थिर रखना चाहिए (पद.3)। जब हम उस पर भरोसा करते हैं और अपने जीवन को उसके प्रति समर्पित करते हैं, तो वह हमारे मन की रक्षा करने और हमें “पूर्ण शांति” देने का वादा करता है (पद.3)। इस “पूर्ण शांति” में विवेक की शांति, अपराध बोध से शांति, चिंता से शांति या उन स्थितियों में शांति शामिल हो सकती है जिन पर हमारा बहुत कम नियंत्रण है। हमारी निश्चयता यह है कि जिस पर हम भरोसा करते हैं वह “सनातन चट्टान” है (पद.4)। हमारी परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, उसका चरित्र और प्रेम कभी नहीं बदलता।

जब हम अनिश्चितता के क्षणों से गुज़रते हैं, तो हमारा मन बेचैन और घबरा देनेवाले विचारों से जूझ सकता है। लेकिन, अगर हम अपनी परेशानियों को परमेश्वर के पास ले जाएँ, अपना मन उस पर लगाएँ और अपने विचारों को उसकी अद्भुत प्रतिज्ञाओं से भरें, जैसा कि मधु ने किया, तो हम जीवन की उथल-पुथल के बीच भी उसकी शांति का अनुभव कर सकते हैं। जब हम परमेश्वर पर भरोसा करते हैं और अपनी बेचैनी उसे सौंपते हैं, तो वह अपनी “पूर्ण शांति” से हमारे मन को शांत करता है और हमारे डर को दूर करता है। जो अनिश्चित है उसके बारे में चिंता करने के बजाय, आइए हम उस पर अर्थात् यीशु पर भरोसा करें जो कभी विफल नहीं होता। —कैरल मैकवॉन

 

तारों को एकटक देखना

जब मैं निराश या हताश होती हूँ, तो मैं अपने घर की छत पर जाना पसंद करती हूँ। वहाँ, मैं खुलकर प्रार्थना कर सकती हूँ और अपने आँसू बहा सकती हूँ। लेकिन, वहाँ खड़े होकर, ठंडी रात की हवा से घिरी हुयी, मैं अक्सर ऊपर देखती हूँ और हरे, नीले, लाल और पीले रंग की टिमटिमाती रोशनी को आश्चर्य और प्रशंसा से निहारती हूँ। वे मुझे मेरे मन की उथल-पुथल को भुला देते हैं। एक साफ रात के आसमान की खूबसूरती मेरा ध्यान मेरी समस्याओं से हटाकर हमारे सृष्टिकर् की महानता पर केंद्रित कर देती है।

जब अय्यूब अपने कष्टों का कारण समझने में असमर्थ था, तो उसने प्रार्थना की कि परमेश्वर उससे बात करे (अय्यूब 13:20-22)। परमेश्वर ने अय्यूब को आलंकारिक प्रश्नों की एक श्रृंखला का उत्तर देने के लिए चुनौती देकर उत्तर दिया (38:3)। अय्यूब ‘क्या तुम जानते हो . . . ?’ वह प्रश्नों से चकित था जो परमेश्वर ने उसके ऊपर मंडराने हुए रखे थे। उन्हें पूछकर, परमेश्वर ने अय्यूब का ध्यान उसकी समस्याओं से हटाकर ब्रह्माण् के शानदार विवरणों पर केंद्रित कर दिया (अय्यूब 38-41)। परमेश्वर की सामर्थ्य और बुद्धि से अभिभूत, अय्यूब जीवन के एक नए दृष्टिकोण पर पहुँच गया। उसने अपनी अयोग्यता और कमज़ोरी पर विचार किया (40:4), और उसने पश्चाताप किया क्योंकि उसे एहसास हुआ कि परमेश्वर के तरीके और उसकी बुद्धि उसकी समझ से बहुत परे थे (42:5-6)।

जब चीजें हमारे मन मुताबिक नहीं होती हैं, तो हमारे मन में सवाल और संदेह पैदा होते हैं। अय्यूब की तरह, हम उन्हें परमेश्वर के पास ले जा सकते हैं और उसके साथ ईमानदार रहकर उसे बता सकते हैं कि हम कैसा महसूस करते हैं। हो सकता है कि हम अपने जीवन में परमेश्वर की अलौकिक आवाज़ को गरजते हुए न सुन पाएँ। लेकिन जब हम हवा में उड़ते पक्षियों, पीछे के आँगन में पेड़ों को अपनी शाखाएँ लहराते हुए या रात के आसमान में टिमटिमाते तारों की ओर देखते हैं, तो हम निश्चित रूप से जानते हैं कि जो परमेश्वर इन सबकी देखभाल करता है, वह हमारे जीवन को भी नियंत्रित करता है (मत्ती 6:26-27)। कैरल मैकवॉन

 

दूसरों की सेवा में

एस्तेर “बेन” खिमचंद 20वीं सदी की एक लेखिका थीं, जिनका जन्म गुजरात के एक साधारण परिवार में हुआ था। अपने लेखन के ज़रिए, उन्होंने राज्य में महिलाओं के अधिकारों की वकालत की। उन्होंने लिखा कि अच्छी शिक्षा महिलाओं को उनके परिवारों और समुदायों में सम्मानजनक पदों पर रखने में मदद कर सकती है। एस्तेर ने अपनी प्रतिभा को अपने पास नहीं रखा या अपने फ़ायदे के लिए उसका इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय, उसने अपने आस-पास के लोगों को सशक्त बनाने के लिए उनका इस्तेमाल किया।

पतरस की पत्री पहली सदी के उन मसीहियों को संबोधित है जो शरणार्थियों की तरह एशिया माइनर में बिखरे हुए थे(1 पतरस 1:1)। उसने उन्हें “एक-दूसरे से अधिक प्रेम रखने” और “जो वरदान” उन्हें मिला है उसका उपयोग “एक दूसरे की सेवा” करने में लगाने के लिए प्रेरित किया (पद.8,10)। इन वरदानों का श्रेय लेने के बजाय, पतरस ने उनसे आग्रह किया कि वे अपने आध्यात्मिक वरदानों को “परमेश्वर के अनुग्रह” के रूप में मानें। उसने उन्हें “विश्वासयोग्य भंडारी” बनने के लिए प्रोत्साहित किया जो परिश्रमपूर्वक परमेश्वर के अधिकार में की बातों का प्रबंधन करते हैं l उसने उनसे यह भी आग्रह किया कि वे इस समझ के साथ बोलें कि वे “मानो परमेश्वर के ही वचन” बोल रहे हैं और “[परमेश्वर] की शक्ति से” लोगों की सेवा करें ताकि उनके कार्यों में और उनके द्वारा परमेश्वर की स्तुति हो सके (पद.11)। इस तरह, हम अपने हर काम में परमेश्वर को महिमा देते हैं। एस्तेर और प्रारंभिक कलीसिया की तरह, हमें भी वरदान दिये गए हैं। ये वरदान, हालाँकि हमें सरल लगते हैं, परमेश्वर के राज्य को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। यह भोजन तैयार करना, सवालों के जवाब देना या किसी ज़रूरतमंद के लिए अपना घर खोलना हो सकता है। जब भी हमें बोलने या कार्य करने के लिए कहा जाता है, तो हमें एक-दूसरे की सेवा में और परमेश्वर को महिमा देने के लिए ऐसा करना चाहिए (पद.11)। इस तरह, हमारे पास जो भी वरदान हैं, आइए उनका उपयोग दूसरों को ऊपर उठाने के लिए करें। कैरल मैकवॉन

 

मरुभूमि में प्रश्न

हमारा परिवार पहाड़ की तलहटी के पास स्थित एक छोटा सा बांध देखने के लिए उत्साहित था। वहाँ पहुँचने पर, हमें नदी में पानी नहीं मिला, केवल चिलचिलाती धूप में सूखी भूमि थी। जैसे ही हमने सोचा कि हमारी यात्रा व्यर्थ हो गई, हमने दो स्थानीय लोगों से बातचीत शुरू की। उनमें से एक ने पूछा, “यीशु को क्रूस पर क्यों चढ़ाया गया?” वहाँ से शुरू करके, हमने उनके साथ यीशु के बारे में साझा करने के अवसर का लाभ उठाया।

परमेश्वर की आत्मा की अगुवाई में, फिलिप्पुस ने स्वयं को “यरूशलेम से गाजा तक जाने वाले रेगिस्तानी मार्ग पर दक्षिण की ओर” यात्रा करते हुए पाया (पद.26)। अपने रास्ते में, वह एक इथियोपियाई खोजे से मिला (पद.27)। जब यह व्यक्ति अपने घर लौट रहा था, तो फिलिप्पुस को आत्मा ने “निकट जाकर [उस] रथ के साथ हो लेने” के लिए प्रेरित किया(पद.29) l इसलिए, फिलिप्पुस रथ के पास गया और उसे “यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक पढ़ते हुए सुना”(पद.30)। खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, “भविष्यद्वक्ता यह किसके बारे में कहता है?” (पद.34)। इस प्रश्न से शुरू करते हुए, फिलिप्पुस को यीशु के बारे में बताने का अवसर मिला (पद.35)।

बहुत से लोग सत्य को खोज रहे हैं, किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो उन्हें यीशु के बारे में बताए। परमेश्वर के मार्गदर्शन से, जहाँ भी अवसर मिले, हम बातचीत के द्वारा उनसे यीशु के बारे में बात कर सकते हैं: काम पर, जिम में, कैफ़े में, स्कूल में या यात्रा करते समय। हम नहीं जानते कि कब कोई ऐसा प्रश्न पूछ सकता है जो यीशु के बारे में बातचीत का मार्ग प्रशस्त करता है। लेकिन, जैसा कि पौलुस कहता है, हमें “अवसर को बहुमूल्य [समझना होगा]” और [हमें] सदा अनुग्रह सहित उत्तर देना है(कुलुस्सियों 4:6)। यदि आप अनुमति देंगे तो परमेश्वर आपके द्वारा अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकता है। ऐसे व्यक्ति बनें जिसके पास वे लोग भी आ सकें जिनके पास रेगिस्तान में प्रश्न हो l कैरोल मैकवॉन