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Articles by एलिसामॉर्गन

अपनी पीड़ा को छिपाना

 

मैंएक स्थानीय चर्च में अतिथि-उपदेशक होकर परमेश्वर के समक्ष अपना टूटापन रखकर उसके द्वारा दी जानेवाली उस चंगाई को प्राप्त करने के विषय एक सच्चा उपदेश दे रहा था l अंतिम प्रार्थना से पहले, पास्टर ने वीच के गलियारे में खड़े होकर अपनी मंडली की आँखों में देखते हुए बोले, “आपका पास्टर होने के कारण मैं आपसे सप्ताह के मध्य मिलूँगा और आपके हृदय के टूटेपन की कहानियाँ सुनना चाहूँगा l उसके बाद सप्ताह के अंत की आराधनाओं में, आप अपना दुःख छिपाएंगे और मुझे दुखित होकर यह सब देखना होगा l”

मेरा हृदय उन छिपी हुई पीड़ाओं को देखकर रोया जिसे परमेश्वर दूर कर सकता था l इब्रानियों का लेखक परमेश्वर के वचन को जीवित और क्रियाशील बताता है l कितनों ने इस “वचन” को बाइबल समझा है, किन्तु यह तो उससे कहीं अधिक है l यीशु परमेश्वर का जीवित  वचन है l वह हमें प्यार करते हुए हमारे विचारों और व्यवहार को जांचता है l

यीशु बलिदान हुआ कि हमें सदैव परमेश्वर की उपस्थिति तक पहुँच मिल जाए l और जबकि हमें ज्ञात है कि सभी के साथ सब बातें बांटना बुद्धिमानी नहीं है, हम यह भी जानते हैं कि  परमेश्वर चाहता है कि कलीसिया वह स्थान बने जहां हम ग्लानी के बगैर मसीह के टूटे और क्षमा प्राप्त अनुयायी की तरह जीवन जी सकें l कलीसिया को वह स्थान बनना है जहां हम “एक दूसरे का भार” उठाते हैं (गलातियों 6:2) l
आज आप दूसरों से क्या छिपा रहें हैं? और आप किस प्रकार परमेश्वर से भी छिपा रहे हैं? परमेश्वर यीशु के द्वारा हमें देखता है l और वह अभी भी हमें प्यार करता है l क्या हम उसे प्यार करने की अनुमति देंगे?

एक साल में बाइबल

मेरी सहेली और मैं सर्वदा-लयबद्ध समुद्र के निकट रेत पर बैठे हुए थे l सूर्य जैसे- जैसे दूर अस्त हो रहा था, लहरें बार-बार मुड़कर हमारे पावों के निकट आकर ठहर जाती थीं l “मुझे समुद्र पसंद है,” वह मुस्करा कर बोली l “उसमें गति है इसलिए मुझे गतिमान होने की ज़रूरत नहीं l”

कितना अच्छा विचार! हममें से कितने लोग ठहरने  के लिए संघर्ष करते हैं l हम इस भय से अत्यधिक प्रयास करते जाते हैं, कि कहीं हमारे प्रयासों के विफल होने से हमारा अस्तित्व ही न मिट जाए l अथवा हमारा सामना उन वर्तमान सच्चाइयों से होगा जिनसे हम दूरी बनाकर रखना चाहते हैं l

भजन 46:8-9 में, परमेश्वर अपने सर्वसामर्थी ताकत का उपयोग करके अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करता है l “आओ, यहोवा के महाकर्म देखो . . . . वह पृथ्वी की छोर तक की लड़ाइयों को मिटाता है; वह धनुष को तोड़ता, और भाले को दो टुकड़े कर डालता है l” परमेश्वर एक व्यस्त परमेश्वर है, जो हमारे अव्यवस्थित दिनों को शांत करता है l

और उसके बाद हम पद 10 में पढ़ते है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँ l”

अवश्य ही अव्यवस्थित दिनों में भी परमेश्वर को जानना संभव है l किन्तु खुद के प्रयासों को विराम देने का भजनकार का निमंत्रण हमें एक भिन्न प्रकार का बोध कराता है l यह जानना कि हम अपने प्रयासों को विराम देकर भी अस्तित्व में रह सकते हैं क्योंकि परमेश्वर कभी भी नहीं रुकता है l यह जानना कि यह परमेश्वर की सामर्थ्य है जो हमें असली महत्त्व, सुरक्षा, और शांति देती है l  

पेड़ के ऊपर

मेरी माँ ने मेरी बिल्ली, वेलवेट को रसोई के चौके पर घर में बनी ब्रेड खाते देखा l उससे तंग आकर, उन्होंने उसे दरवाजे से बाहर कर दिया l कुछ घंटों बाद, हमने उस खोयी हुई बिल्ली को ढूंढा पर वह नहीं मिली l उसकी हलकी सी आवाज़ सुनाई दी, और मैंने उसे एक पोपुलर पेड़ की चोटी पर एक झुकी हुई डाली पर बैठे देखा l

मेरी माँ ने जब उसकी आदत से तंग आकर उसे घर के बाहर किया, वेलवेट(बिल्ली) ने एक खतरनाक चुनाव किया l क्या यह संभव नहीं कि हम भी कभी-कभी कुछ वैसा ही करते हैं – अपनी गलती से भाग कर खुद को खतरे में डालते हैं? ऐसे समय में भी परमेश्वर हमें बचाने आता है l

योना नबी अनाज्ञाकारिता में नीनवे में प्रचार करने की परमेश्वर की बुलाहट से भागा, और एक महामच्छ ने उसे निगल लिया l “तब योना ने उसके पेट में से अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना की l ‘मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है’” (योना 2:1-2) l परमेश्वर ने योना का निवेदन सुनकर मच्छ को आज्ञा दी, और उसने योना को स्थल पर उगल दिया” (पद.10) l उसके बाद परमेश्वर ने योना को एक और अवसर दिया (3:1) l

वेलवेट को नीचे उतारने के लिए काफी प्रयास करने के बाद, हमने स्थानीय अग्निशमन सेवा(फायर ब्रिगेड) को बुलाया l सबसे लम्बी सीढ़ी की सहायता से, एक दयालु व्यक्ति ऊपर चढ़कर मेरी बिल्ली को नीचे मेरे सुरक्षित बाहों में दे दिया l

परमेश्वर अपने बचानेवाले प्रेम से ऊँचाइयों और गहराइयों में जाकर हमें बचाता है!

कहीं भी

अपनी शादी की तस्वीरें देखते हुए, मैं एक पर रुक गई जिसमें हम नए "मिस्टर एंड मिसेज" बने थेI मेरा समर्पण भाव स्पष्ट दिख रहा था, मैं उनके साथ कहीं भी जाने को तैयार थीI

40 वर्षों बाद भी हमारी शादी प्रेम और प्रतिबद्धता की डोर से बंधी है, जिसने हमें कठिन और अच्छे समय से निकाला है। उनके साथ कहीं भी चलने के वचन को हर साल मैंने पुनःसमर्पित किया है।

यिर्मयाह 2:2 में परमेश्वर अपने प्रिय परंतु हठी इस्राइल से कहते हैं, "तेरी जवानी का..."। स्नेह भक्ति का इब्रानी शब्द सर्वोच्च कोटि की विश्वासयोग्यता और वचनबद्धता को व्यक्त करता है। पहले इस्राइल परमेश्वर के प्रति दृढ़ संकल्प से समर्पित रहने के लिए वचनबध्द था परंतु धीरे-धीरे वह दूर हो गया।

समर्पण में आत्मसंतुष्टता प्रेम को फ़ीका कर सकती है तथा उत्साह की कमी विश्वासघात पैदा कर सकती है। शादी में ऐसी लापरवाही से संघर्ष करने के महत्व को तो हम जानते हैं। परंतु परमेश्वर के साथ हमारे प्रेम-संबंध के बारे में क्या?  क्या उनके प्रति हम आज वैसे समर्पित हैं जैसे पहली बार विश्वास में आने पर थे?

परमेश्वर विश्वासयोग्यता से अपने लोगों को वापस आने की अनुमति देते हैं (3:14-15)।

हम नए सिरे से अपनी प्रतिज्ञा को दोहरा सकते हैं, कि हम उनके पीछे चलेंगे- कहीं भी।

विरासत आगे बढ़ाना

मेरी बेटी को मेरी दादी की पिपरमेंट आइसक्रीम-पाई की रेसिपी चाहिए थी। मैंने अपने पुराने रेसिपी बक्से को खोला तो अपनी दादी की अनोखी लिखावट में लिखी रेसिपी को पहचान लिया-साथ ही मेरी माँ के हाथ के लिखे कई नोट्स भी उसमें थे। अचानक मुझे आभास हुआ कि मेरी बेटी की आइसक्रीम-पाई की रेसिपी की मांग मेरे परिवार की चौथी पीढ़ी में स्थान पा चुकी है।

मैंने सोचा कि अन्य परिवारों में एक पीढ़ी से दूसरी को मिलने वाली विरासत क्या होती होंगी। विश्वास सबंधी चुनावों के बारे में क्या? इस पाई के अतिरिक्त क्या मेरी दादी का-और स्वयं मेरा-विश्वास मेरी बेटी और उसकी संतानों के जीवन में जारी रहेगा?

भजन 79 में भजनकार हठधर्मी इस्राएल का शोक मनाता है, जिसने अपनी आस्था खो दी है। वह परमेश्वर से उनके लोगों को अन्यजातियों से छुड़ाने और यरुशलेम की सुरक्षा में लौटाने के लिए प्रार्थना करता है। ऐसा होने पर वह परमेश्वर के मार्गों का अनुसरण करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा। “हम जो तेरी प्रजा...(पद 13)”।

इस उत्सुकता से कि दादी की इस मीठी विरासत का स्वाद अब हमारे परिवार की एक नई परत लेने जा रही है, मैंने रेसिपी उसे भेज दी। और प्रार्थना की कि मेरे परिवार के विश्वास का प्रभाव भी एक पीढ़ी से अगली पर पड़ता रहे।

आशीषों का प्याला

कंप्यूटर पर काम करते हुए एक ईमेल ने मेरा ध्यान खींच लिया जिसकी सब्जेक्ट लाइन थी: “आप एक आशीष हैं”। उत्सुकतावश मैंने ईमेल खोला जिसमें मेरी मित्र ने लिखा था कि मैं तुम्हारे  परिवार के लिए प्रार्थना कर रही हूँ।  “मैं जब जब तुम्हें स्मरण करती हूं...” (फिल्लिपियों 1:3)। और फिर उसने परमेश्वर के प्यार को दूसरों के साथ बांटने के हमारे प्रयासों की सराहना लिखी थी। अपने किचन टेबल पर रखे आशीषों के प्याले में वह हर सप्ताह किसी परिवार का चित्र रख कर उसके लिए प्रार्थना करती है।

मेरी मित्र के शब्द,  मेरे मन में वैसा आनन्द भर रहे थे जैसा फिल्लिपियों को प्रेरित पौलुस के पहली सदी के धन्यवाद नोट से मिला होगा। पौलुस ने अपने सहकर्मियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की आदत बना ली थी। उनके पत्र ऐसे ही वाक्यांश से आरंभ होते हैं: “मैं तुम सब के लिये यीशु मसीह के द्वारा अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं...” (रोमियो 1:8)।

पहली सदी में, पौलुस ने अपने सह-कार्यकर्ताओं को एक प्रार्थनापूर्ण धन्यवाद-नोट के साथ आशीषित किया, इक्कीसवीं शताब्दी में, मेरी मित्र ने एक आशीष के प्याले का उपयोग मेरे दिन में आनन्द लाने के लिए किया। हम कैसे उन लोगों का धन्यवाद कर सकते हैं जो हमारे साथ परमेश्वर के मिशन में सेवा करते हैं।

दैनिक क्षण

मैंने अपनी कार में किराने का सामन लादकर पार्किंग स्थल से निकला ही था कि अचानक एक व्यक्ति सड़क के किनारे से मेरे सामने आ पहुंचा l मैंने कार के ब्रेक्स लगाए और उसको बचा लिया l वह चौंककर मुझे घूरने लगा l उस क्षण, मैं अपनी आँखों को घुमाकर निराशा से उसे देख सकता था अथवा मुस्कराते हुए उसे क्षमा कर सकता था l मैं मुस्करा दिया l

उसके चेहरे पर शांति और उसके होठों पर धन्यवाद था l

नीतिवचन 15:13 कहता है, “मन आनंदित होने से मुख पर भी प्रसन्नता छा जाती है, परन्तु मन के दुःख से आत्मा निराश होती है l” क्या लेखक जीवन की हरेक बाधा, निराशा, और असुविधा में हमारे चेहरे पर मुस्कराहट चाहता है? शायद नहीं! वास्तविक शोक, निराशा, और अन्याय के प्रति क्रोध का समय होता है l किन्तु हमारे दैनिक क्षणों में, मुस्कराहट से आशा उत्पन्न होती है और आगे बढ़ने के लिए अनुग्रह मिलता है l

शायद नीतिवचन का इशारा है कि मुस्कराहट हमारे भीतरी व्यक्तित्व की स्थिति का स्वाभाविक परिणाम होता है l एक “आनंदित मन” शांत, संतुष्ट, और परमेश्वर से सर्वोत्तम पाने के प्रति समर्पित होता है l पूरी तौर से आनंदित हृदय द्वारा, हम चकित करनेवाली परिस्थितियों में  भी वास्तविक मुस्कराहट से प्रतिउत्तर देकर, दूसरों को परमेश्वर के साथ आशा और शांति प्राप्त करने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं l

मनुष्य होना

जब समाज में अपनी भूमिका बताने के लिए बोला गया जो कभी-कभी कानून को लागू करने में असहयोगी था, उस शासनाधिकारी ने न तो अपना बैज दिखाया और न ही अपने पद के आधार पर जवाब दिया l इसके विपरीत उसने कहा, “हम मनुष्य हैं और उन मनुष्यों की मदद करते हैं जो संकट में हैं l”

उसकी दीनता अर्थात् अपने साथी मनुष्यों के साथ उसके द्वारा व्यक्त की गयी समानता, मुझे पतरस के शब्द याद दिलाते हैं जब वह रोमी शासन के आधीन सताव सह रहे प्रथम शताब्दी के मसीहियों को लिख रहा था l पतरस निर्देश देता है : “अतः सब के सब एक मन और कृपामय और भाईचारे की प्रीति रखनेवाले, और करुणामय, और नम्र बनो” (1 पतरस 3:8 ) l शायद पतरस कह रहा था कि जो मनुष्य संकट में हैं उनके साथ मनुष्य ही बनना होगा, यह याद रखने के लिए कि हम सब एक से हैं l आखिरकार, क्या परमेश्वर अपने पुत्र को भेजकर ऐसा ही नहीं किया l वह हमारी सहायता करने के लिए मनुष्य बना? (फ़िलि. 2:7) l

अपने पतित हृदयों के भीतर झाँकने पर, अपने मानवीय अवस्था का तिरस्कार एक परीक्षा की तरह है l किन्तु क्या होगा यदि हम अपने संसार में अपने इंसानियत को अपने बलिदान का एक भाग बना दें? यीशु हमें पूर्ण मनुष्य बनाकर जीना सिखाता है, सेवक के समान जो पहचानते हैं कि हम सब एक से हैं l परमेश्वर हमें “मनुष्य” ही बनाया है, अपनी समानता और स्वरुप में बनाया है और अपने शर्तहीन प्रेम से छुड़ाया है l

आज हम लोगों को अनेक संघर्षों से सामना करते पाते हैं l अंतर की कल्पना करें जो हम मनुष्य बनकर ला सकते हैं अर्थात् उन लोगों की मदद करनेवाले साथी मनुष्य जो संकट में हैं l

आपका सुरक्षित स्थान

मेरी बेटी और मैं एक बड़े पारिवारिक उत्सव के लिए तैयारी कर रहे थे l इसलिए कि वह उत्सव के विषय घबरायी हुई थी मैंने कहा कि मैं गाड़ी ड्राइव करुँगी l “ठीक है l किन्तु मैं अपनी कार में सुरक्षित महसूस करती हूँ l क्या आप चलाएंगी?” उसने पुछा l यह महसूस करके कि उसे मेरी गाड़ी छोटी लगती है, मैंने पूछा कि क्या मेरी गाड़ी बहुत छोटी थी l उसका उत्तर था, “नहीं, बस मेरी गाड़ी मुझे सुरक्षित लगती है l पता नहीं क्यों, मैं अपनी गाड़ी में आरामदायक महसूस करती हूँ l”

उसकी टिप्पणी ने मुझे मेरे “सुरक्षित स्थान” के सम्बन्ध में मुझे सोचने की चुनौती दी l तुरंत ही मैंने नीतिवचन 18:10 के विषय सोची, “यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है l” पुराने नियम के काल में, दीवारें और पहरे की मीनार लोगों को बाहरी खतरों की चेतावनी के साथ-साथ उनकी रक्षा भी करती थीं l लेखक बताना चाहता है कि परमेश्वर का नाम, जो उसका चरित्र है, व्यक्तित्व और सब कुछ है जो वह है, उसके लोगों को वास्तविक सुरक्षा देती है l

ख़ास भौतिक स्थान खतरनाक क्षणों में इच्छित सुरक्षा देने का वादा करते हैं l तूफ़ान के मध्य एक मजबूत छत l चिकित्सीय सहायता देनेवाला एक हॉस्पिटल l एक प्रिय का गले लगाना l

आपका “सुरक्षित स्थान” क्या है? हम जहाँ भी सुरक्षा खोजते हैं, उस स्थान पर हमारे साथ परमेश्वर की उपस्थिति ही है जो हमारी ज़रूरत में हमें ताकत और सुरक्षा देती है l