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Articles by जेनिफ़र बेन्सन शुल्ट्ज

जब शार्क काटते नहीं

मेरे बच्चे उत्साहित थे, परन्तु मैं असहज थी l छुट्टियों में, हम एक्वेरियम(मछलीघर) धूमने गए जहां लोग एक विशेष टैंक में रखे छोटे शार्कों को दुलार सकते थे l जब मैंने अटेंडेंट(सहायक) से पूछा कि क्या कभी इन प्राणियों ने ऊंगलियों को काता है, उसने कहा कि शार्कों को अभी खिलाया गया है और उसके बाद अतिरिक्त भोजन दिया गया है l वे काटेंगे नहीं क्योंकि वे भूखे नहीं हैं l

जो मैंने शार्कों को दुलारने के विषय सीखा नीतिवचन के अनुसार अर्थपूर्ण है : “संतुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएं भी मीठी जान पड़ती हैं” (नीतिवचन 27:7) l भूख – आन्तरिक खालीपन का भाव – हमारे निर्णय करने के समय निर्णय करने की शक्ति को कमजोर करता है l यह हमें भरोसा देता है कि कुछ भी जो हमें भरता है ठीक है, चाहे यह हमें किसी दूसरे को काट खाने को ही विवश क्यों न करे l

परमेश्वर हमें हमारी भूख/इच्छा के रहम पर जीवन जीने से कहीं अधिक हमारे लिए चाहता है l वह चाहता है हम मसीह के प्रेम से भर जाएँ ताकि जो भी हम करें वह उसके प्रबंध की शांति और स्थिरता से प्रवाहित हो l निरंतर अभिज्ञता कि हमसे शर्तहीन प्रेम किया गया है हमें भरोसा देता है l यह हमें चयनात्मक बनाता है जब हम जीवन में “मीठी/अच्छी” वस्तुओं – उपलब्धियां, सम्पति, और सम्बन्ध - के विषय विचार करते हैं l

केवल यीशु के साथ सम्बन्ध ही सच्ची संतुष्टि देती है l काश हम अपने लिए उसके अद्वितीय प्रेम को समझ लें ताकि हम अपने लिए – और दूसरों के लिए “परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो [जाएँ]” (इफिसियों 3:19) l

एक दयालु आलोचक

परिदृश्य चित्रकारी कक्षा में, शिक्षक ने, जो एक उच्च अनुभवी व्यवसायिक कलाकार थे, मेरे प्रथम नियत कार्य की जांच की l वे अपनी ठुड्डी के नीचे हाथ रखकर, चित्रकारी के सामने खड़े हो गए l ये रहा, मैंने सोचा l वे शायद कहनेवाले हैं यह बेकार है l

किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं कहा l

उन्होंने कहा उनको रंगों की पद्धति और स्पष्टता की भावना अच्छी लगी l तब उन्होंने उल्लिखित किया कि दूर के वृक्षों में अधिक हल्के रंग भरे जा सकते थे l घासपात के गुच्छों को सोम्य किनारा चाहिए थी l उनके पास परिदृश्य और रंग के नियमों पर आधारित मेरे काम की आलोचना करने का अधिकार था, फिर भी उनकी आलोचना ईमानदार ओर हितकर थी l

यीशु, जो लोगों को उनके पाप के कारण दोषी ठहराने में पूर्णरूपेण योग्य था, एक सामरी स्त्री को जिससे उसने प्राचीन कुँए पर मुलाकात की, दोषी ठहराने के लिए दस आज्ञा का उपयोग नहीं किया l उसने केवल थोड़े से शब्दों का उपयोग करके कोमलता से उसके जीवन की समीक्षा की l परिणाम यह निकला कि उसने महसूस किया कैसे संतुष्टता के लिए उसकी खोज उसे पाप में ले गयी थी l इस अभिज्ञता पर बल देते हुए, यीशु ने खुद को अनंत संतुष्टता का एकमात्र श्रोत बताते हुए प्रगट किया (युहाना 4:10-13) l

इस परिस्थिति में यीशु द्वारा उपयोग किया गया अनुग्रह और सच्चाई का मेल ही है जिसका अनुभव हम उसके साथ हमारे सम्बन्ध में करते हैं (1:17) l उसका अनुग्रह हमें हमारे पाप के द्वारा अभिभूत होने से रोकता है, और उसकी सच्चाई हमें यह सोचने से रोकती है कि यह एक गंभीर विषय नहीं है l

क्या हम यीशु को हमारे जीवनों में उन क्षेत्रों को दर्शाने के लिए आमंत्रित करेंगे जहाँ हमें उन्नति की ज़रूरत है ताकि हम उसके समान और अधिक बन सकें l

वह कौन है?

जब एक व्यक्ति ने अपने घर के बाहर एक सुरक्षा कैमरा लगवाया, उसने यह निश्चित करने के लिए कि प्रणाली ठीक से काम कर रहा है विडियो की विशेषता की जांच की l वह अहाते में गहरे रंग के कपड़े पहने चौड़े कंधे वाले किसी व्यक्ति को देखकर चौंक गया l उसने ध्यान से देखा वह व्यक्ति क्या करना चाहता है l हालाँकि, अनधिकार प्रवेश करनेवाला परिचित दिखाई दिया l आखिरकार उसने जान लिया कि वह किसी अपरिचित को अपनी संपत्ति में फिरते हुए नहीं देख रहा है, किन्तु अपने अहाते में खुद की ही एक रिकॉर्डिंग देख रहा था!

हम क्या देखते होते यदि हम अपने खुद से निकल सकते और दूसरी स्थितियों में खुद पर ध्यान देते? जब दाऊद का हृदय कठोर हो गया और बतशेबा के साथ उसके सम्बन्ध के विषय उसे बाहरी परिप्रेक्ष्य– एक ईश्वरीय परिप्रेक्ष्य - की ज़रूरत पड़ी, परमेश्वर ने नातान को बचाव के लिए भेजा (2 शमूएल 12) l

नातान ने दाऊद को एक धनी व्यक्ति की कहानी बताई जिसने एक निर्धन व्यक्ति की  एकलौती भेड़ छीन ली थी l यद्यपि धनी व्यक्ति के पास बहुत सी भेड़ें थीं, उसने निर्धन व्यक्ति की एकलौती भेड़ को मार कर भोजन तैयार किया l जब नातान ने यह प्रगट किया कि कहानी दाऊद के कृत्य को दर्शाता है, दाऊद ने महसूस किया कि उसने ऊरिय्याह को किस प्रकार हानि पहुंचाई थी l नातान ने उसके परिणाम को समझाया, किन्तु इससे भी प्रमुख उसने दाऊद को निश्चित किया, “परमेश्वर ने तेरे पाप को दूर किया है” (पद.13) l

यदि परमेश्वर हमारे जीवनों में पाप को दर्शाता है, उसका अंतिम उद्देश्य हमसे नफ़रत करना नहीं है, किन्तु हमें पुनःस्थापित करना और उनके साथ मेल करने में हमारी मदद करना  जिनको हमने हानि पहुँचायी है l पश्चाताप परमेश्वर के साथ उसकी क्षमा और अनुग्रह के  सामर्थ्य में नवीकृत निकटता का मार्ग बनाता है l

आगे बढ़ते रहो

व्यवसायिक जगत में काम करने ने मुझे अनेक प्रतिभावान और ऊँचे स्तर के लोगों (के) साथ बात करने का अवसर प्रदान किया। परन्तु शहर से बाहर एक निरीक्षक की अगुवाई में किया गया एक कार्य एक अपवाद था। समूह की प्रगति पर ध्यान दिए बिना यह प्रबन्धक कठोरता के साथ हमारे काम की आलोचना करता था और हर सप्ताह काम का ब्यौरा लेने के लिए किए गए फोन पर और काम करने की माँग करता था। इस प्रकार बीच में आ जाने से मैं निरुत्साहित और भयभीत हो गई थी। मैं काम छोड़ देना चाहती थी।

सम्भव है कि मूसा ने भी उसके काम को छोड़ देने का अनुभव किया होगा, जब अन्धियारे की महामारी के दौरान उसका सामना फिरौन से हुआ था। परमेश्वर ने मिस्र में आठ अन्य भयावह महामारियाँ भेजी और अंततः फिरौन चिल्ला उठा, मेरे सामने से चला जा; और सचेत रह; मुझे अपना मुख फिर न दिखाना; क्योंकि जिस दिन तू मुझे मुँह दिखाए उसी दिन तू मारा जाएगा।” (निर्गमन 10:28)।

इस खतरे के बावजूद भी मूसा को परमेश्वर के द्वारा इस्राएलियों को फिरौन के नियन्त्रण से आज़ाद करवाने के लिए इस्तेमाल किया गया। “विश्‍वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उसने मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा।”(इब्रानियों 11:27)। मूसा ने फिरौन पर यह विश्वास करने के द्वारा जय प्राप्त कर ली कि परमेश्वर छुड़ाने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेगा। (निर्गमन 3:17).

आज, हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर निर्भर हो सकते हैं कि वह हर परिस्थिति में हमारे साथ है और वह अपने पवित्र आत्मा से हमारी सहायता कर रहा है। वह हमें दिव्य सामर्थ, प्रेम, और आत्म नियन्त्रण प्रदान (2 तीमुथियुस 1:7) करने के द्वारा हमें धमकी के दबाव का विरोध करने और इस पर गलत प्रतिक्रिया करने में सहायता करता है। हमारे जीवनों में बढ़ते रहने और परमेश्वर की अगुवाई का पालन करने के लिए आत्मा वह साहस प्रदान करता है, जिसकी हमें आवश्यकता है। 

फ्रॉस्टबाइट से मुक्त

सर्दियों के एक दिन मेरे बच्चों ने स्लेज पर जाने की विनती की। तापमान ज़ीरो डिग्री फारनहाईट तक पहुँचा हुआ था। हिम कण हमारी खिडकियों तक फैले हुए थे। मैंने इस पर विचार किया और हाँ कह दिया , परन्तु उन्हें अच्छे से कपड़े पहनने और एकसाथ रहने और हर पन्द्रह मिनट में अन्दर आने के लिए बताया।

प्रेम में मैंने वे नियम बनाए, ताकि मेरे बच्चे फ्रास्टबाइट के बिना मुक्त हो कर खेल सकें। मेरे विचार से भजन 119 का लेखक परमेश्वर के भले मन्तव्य को पहचान गया, जब उसने लगातार दो पदों को लिखा, जो एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं: “मैं तेरी व्यवस्था पर लगातार सदा सर्वदा चलता रहूँगा” और “मैं चौड़े स्थान में चला फिरा करूँगा, क्योंकि मैंने तेरे उपदेशों की सुधि रखी है” (पद 44-45) । यह कैसे है कि भजनकार ने स्वतन्त्रता और व्यवस्था का पालन करने वाले आत्मिक जीवन को एकसाथ मिला दिया? 

परमेश्वर के बुद्धिमतापूर्ण निर्देशों का पालन करना हमें उन परिणामों से बचाता है, जो उन चुनावों से आते हैं, जिन्हें बाद में बदलना चाहते हैं। दोषभाव और पीड़ा के बोझ के बिना हम अपने जीवनों का आनन्द उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं। परमेश्वर हमें यह करो और यह न करो के निर्देशों के साथ नियन्त्रित नहीं करना चाहता, परन्तु उसके निर्देश दर्शाते हैं कि वह हम से प्रेम करता है।

जब मेरे बच्चे स्लेज चला रहे थे, मैंने उन्हें पहाड़ी से तेज़ी से नीचे आते देखा। मैं उनके हंसी के ठाहकों और उनकी गुलाबी हुई गालों को देखकर मुस्कुराई। मेरे द्वारा दी गई सीमाओं में वे स्वतन्त्र थे। यही अकाट्य विरोधाभास परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में भी है-यह हमें भजनकार के साथ यह कहने की ओर ले कर जाता है, “अपनी आज्ञाओं के पथ में मुझ को चला, क्योंकि मैं उसी से प्रसन्न हूँ” (पद 35)।

सनातन सहायक

रीढ़ की हड्डी की चोट से लकवाग्रस्त होने के बाद, मार्टी ने एमबीए अर्जित करने के लिए कॉलेज जाने का फैसला किया l मार्टी की माँ, जूडी, ने उसके लक्ष्य को वास्तविकता बनाने में सहायता की l वह उसके साथ निरंतर बैठकर हर व्याख्यान और अध्ययन नोट्स लिखने और प्रोद्योगिकी मुद्दों को समझने में उसकी सहायता की l उसने उसे मंच पर पहुँचाकर डिप्लोमा प्राप्त करने में उसकी सहायता की l मार्टी ने व्यवहारिक सहायता से अप्राप्य को संभव कर लिया l
यीशु जानता था उसके पृथ्वी से जाने के बाद उसके चेलों को उसी प्रकार की सहायता की ज़रूरत होगी l उसने अपनी शीघ्र घटित होनेवाली अनुपस्थिति की बात कही, उसने कहा वे पवित्र आत्मा द्वारा परमेश्वर के साथ एक नए प्रकार का सम्बन्ध प्राप्त करेंगे l आत्मा उन्हें पल-पल मदद करेगा - एक शिक्षक और मार्गदर्शक जो केवल उनके साथ निवास ही नहीं करेगा किन्तु उनमें बसेगा भी (यूहन्ना 14:17, 26) l
आत्मा परमेश्वर की ओर से यीशु के शिष्यों को आंतरिक सहायता पहुंचाएगा, जो उन्हें सुसमाचार सुनाते समय उनको वह सब बातें सहने की शक्ति देगा जिसे वे अपने बल पर बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं l संघर्ष के क्षणों में, आत्मा उनको यीशु की कही बातें स्मरण दिलाएगा (पद.26) : तुम्हारे मन व्याकुल न हों . . . एक दूसरे से प्रेम करो . . . पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ l
क्या आप अपनी सामर्थ्य और योग्यता से बाहर कुछ सहन कर रहे हैं? आप आत्मा की सनातन सहायता पर निर्भर हो सकते हैं l आपके अन्दर पवित्र आत्मा का काम उसे [परमेश्वर को] उचित महिमा देगा l

बुद्धिमत्ता का श्रोत

एक व्यक्ति ने एक महिला पर मुकद्दमा दायर कर दिया, कि महिला के पास उसका कुत्ता था l कोर्ट में महिला ने कहा, उसका कुत्ता उस व्यक्ति का नहीं हो सकता और जज को बताया उसने उसे कहाँ से ख़रीदा था l वास्तविक मालिक का पता चल गया जब जज ने कोर्ट के कमरे में ही उस कुत्ते को खोल दिया l पूंछ हिलाते हुए, वह अपने मालिक के पास दौड़ गया l
प्राचीन इस्राएल का एक न्यायी, सुलैमान को इस तरह का एक मामला सुलझाना पड़ा l दो महिलाएँ एक ही छोटे लड़के की माँ होने का दावा कर रही थीं l दोनों के दलील को सुनने के बाद, तलवार से उस बच्चे को दो भाग में विभाजित करने को कहा l बच्चे की असली माँ ने अपना बच्चा नहीं मिलने की स्थिति में भी उसकी जान बचाने के उद्देश्य से उसे दूसरी स्त्री को दे देने का आग्रह किया (1 राजा 3:26) l सुलैमान में उसे  बच्चा दे दिया l
न्यायोचित और नैतिक, सही और गलत क्या है का निर्णय करने के लिए बुद्धिमत्ता अनिवार्य है l यदि हम सचमुच बुद्धि का मूल्य समझते हैं, हम सुलेमान की तरह, परमेश्वर से समझने वाला हृदय मांग सकते हैं (पद.9) l परमेश्वर दूसरों की रुचियों के साथ हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुलित करके हमारे निवेदन का उत्तर दे सकता है l वह दीर्घकालीन(कभी-कभी अनंत)  लाभ के विरुद्ध अल्पकालीन लाभ को तौलने में हमारी मदद भी कर सकता है ताकि हम अपने जीवन जीने में उसका आदर कर सकें l
हमारा परमेश्वर केवल एक सिद्ध बुद्धिमान न्यायी ही नहीं है, किन्तु एक व्यक्तिगत परामर्शदाता भी है जो हमें बड़ी मात्रा में ईश्वरीय बुद्धिमत्ता भी देना चाहता है (याकूब 1:5) l

वश में रखना असम्भव

मेक्सिको की खाड़ी में अपने मित्रों के साथ तैरती हुयी, कैत्लिन का एक शार्क से सामना हुआ, जो उसके पैरों पर झपटकर उसे खींचने लगा l कैत्लिन ने जवाबी हमले में शार्क के नाक पर एक जोर का घूँसा मारा l हिंसक शार्क हारकर उसके पाँवों को छोड़कर चला गया l यद्यपि उसके काटने के कारण उसे 100 से अधिक टाँके लगे, शार्क कैत्लिन को अपने पकड़ में नहीं ले सका l
यह कहानी मुझे यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु ने मृत्यु पर वार करके, उसके अनुयायियों को डराने और उन्हें पराजित करने की उसकी शक्ति समाप्त कर दी l पतरस के अनुसार, “क्योंकि मृत्यु के वश में रहना उसके लिए असम्भव था” (प्रेरितों 2:24) l
पतरस ने यरूशलेम में एक भीड़ से यह शब्द कहे l शायद उनमें से कईयों ने यीशु को दण्डित करने के लिए चिल्लाए होंगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए” (मत्ती 27:22) l परिणामस्वरूप, रोमी सैनिकों ने उसे मरने तक क्रूस पर टंगा हुआ रखा l परमेश्वर द्वारा यीशु को जिलाए जाने तक उसका शरीर तीन दिनों तक कब्र में रखा रहा l उसके पुनरुत्थान के बाद, पतरस और अन्य लोग उससे बात और उसके साथ भोजन किया, और चालीस दिनों के बाद वह स्वर्ग पर उठा लिया गया (प्रेरितों 1:9) l
पृथ्वी पर यीशु का जीवन शारीरिक दुःख और मानसिक पीड़ा के मध्य बीता, इसके बावजूद परमेश्वर की सामर्थ्य ने कब्र को पराजित कर दिया l इसके कारण, मृत्यु या कोई और संघर्ष/पीड़ा हमें सर्वदा अपने पकड़ में नहीं रख सकती l एक दिन सभी विश्वासी परमेश्वर की उपस्थिति में अनंत जीवन और परिपूर्णता का अनुभव करेंगे l उस भविष्य पर केन्द्रित होकर हम वर्तमान में स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हैं l  

परमेश्वर के साथ वास्तविक रहना

मैं अपने सिर को झुकाकर, अपनी आँखों को बंद करके, अपने हाथों को जोड़कर प्रार्थना करना आरम्भ कर देता हूँ l “प्रिय परमेश्वर, मैं आपके सामने एक बच्चे की तरह आता हूँ l मैं आपकी सामर्थ्य और भलाइयों को स्वीकार करता हूँ . . . l”  अचानक, मेरी आँखें खुल जाती हैं l मुझे याद आता है कि मेरे बेटे ने इतिहास के प्रोजेक्ट को पूरा नहीं किया है, जो उसको कल दिखाना है l स्कूल के बाद उसे बास्केटबाल गेम भी खेलना है, और मैं कल्पना करता हूँ कि वह मध्य रात्रि तक जागकर अपना गृह कार्य पूरा कर रहा है l इससे मैं चिंतित हो जाता हूँ कि कहीं थकान से उसे बुखार न आ जाए!

सी.एस. लयूईस प्रार्थना में विकर्षण के विषय अपनी पुस्तक स्क्रूटेप लेटर्स  में लिखते हैं l उन्होंने ध्यान दिया कि हमारे मस्तिष्क के भटकने पर, हम अपनी पूर्व की प्रार्थना में लौटने के लिए अपनी इच्छाशक्ति का उपयोग करते हैं l लयूईस यद्यपि इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि उस विकर्षण को [अपनी] वर्तमान समस्या के रूप में स्वीकार करना बेहतर होगा और उसे [परमेश्वर] के आगे [रखकर], उसे अपनी प्रार्थना का मुख्य विषय बना लेना चाहिए l”

प्रार्थना में भटकाव लानेवाली एक स्थायी चिंता अथवा एक पापी विचार भी परमेश्वर के साथ हमारी चर्चा का केंद्रबिंदु बन सकता है l जब हम परमेश्वर से बातचीत करते हैं उसकी इच्छा है कि हम वास्तविक बनकर उसे अपनी गहरी चिंता, भय, और संघर्ष बताएं l वह हमारी बातों से चकित नहीं होता है l वह एक घनिष्ट मित्र की देखभाल की तरह हमारा ध्यान रखता है l इसीलिए हम अपनी सारी चिंता और बेचैनी उस पर डालने में उत्साहित होते हैं – क्योंकि उसको हमारा ध्यान है (1 पतरस 5:7) l