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Articles by जेनिफ़र बेन्सन शुल्ट्ज

परमेश्वर कैसा है?

एक विशेष अवसर को मनाने के लिए, मेरे पति मुझको एक स्थानीय कला दीर्घा (Art gallery) ले गए और मुझे उपहार देने के लिए मुझसे कोई चित्रकला चुनने को कहा l मैंने वन के बीच से बहती हुई एक छोटी नदी की छोटी चित्रकला का चुनाव किया l उस चित्र में नदी का तल पूरे चित्र फलक(Canvas) पर फैला हुआ था, और इस कारण आकाश का हिस्सा बहुत कम दिखाई दे रहा था l हालाँकि, नदी की प्रतिबिम्ब में सूरज, पेड़ों की चोटियाँ, और धुंधला फ़िज़ा स्पष्ट था l केवल पानी की सतह पर ही आसमान “देखा”  जा सकता था l
आत्मिक भाव में, यीशु उस नदी के समान है l जब हम जानना चाहते हैं कि परमेश्वर कैसा है, हम यीशु की ओर देखते हैं l इब्रानियों का लेखक कहता है कि वह “[परमेश्वर] के तत्व की छाप [है]” (1:3) l यद्यपि हम “परमेश्वर प्रेम है” जैसे बाइबल के प्रत्यक्ष कथनों से परमेश्वर के विषय सच्चाइयाँ सीख सकते हैं, हम परमेश्वर को उन समस्याओं में कार्य करते हुए देखकर  जिनसे हमारा सामना इस संसार में होता है, हम अपनी समझ को और भी गहरा कर सकते हैं l यीशु हमें दिखाने आया कि वह मानव रूप में परमेश्वर है l
परीक्षा में, यीशु ने परमेश्वर की पवित्रता प्रगट किया l आत्मिक अन्धकार का सामना करते हुए, उसने परमेश्वर का अधिकार दर्शाया l लोगों की परेशानियों से जूझते हुए, उसने परमेश्वर की बुद्धिमत्ता दिखाई l अपनी मृत्यु में, उसने परमेश्वर का प्रेम प्रगट किया l
यद्यपि हम परमेश्वर के विषय सब कुछ नहीं समझ सकते हैं – वह असीमित है और हम अपनी सोच में सीमित हैं – हम मसीह को देखकर परमेश्वर के चरित्र के विषय निश्चित हो सकते हैं l

यह कौन है?

कल्पना करें कि आप धूल सने मार्ग पर दर्शकों के साथ खड़े हैं। पीछे खड़ी एक महिला अपने पैर उच्चकर देखने की कोशिश कर रही है कि कौन आ रहा है। दूर गधे पर बैठा एक व्यक्ति आ रहा है। उसके निकट आने पर लोग अपने वस्त्र सड़क पर डालने लग जाते हैं। अचानक, किसी टहनी के चटकने की आवाज आती है। कोई खजूर की शाखाएं काट रहा है और लोग उन्हें गधे के सामने डाल रहे हैं।

क्रूसित होने से पूर्व जब यीशु ने यरूशलेम में प्रवेश किया तो उनके अनुयायियों ने उत्साहपूर्वक उन्हें सम्मानित किया।“सारी मण्डली उन सब सामर्थ...”। (लूका 19:37)। यीशु के भक्त कह रहे थे, "धन्य है वह राजा..."(पद 38)। उनके उत्साह ने लोगों को प्रभावित किया। सारे नगर में हलचल मच गई; और लोग कहने लगे, यह कौन है? (मत्ती 21:10)।

आज भी, लोग यीशु के बारे में उत्सुक हैं। हालांकि हम शाखाओं से उनके मार्ग को प्रशस्त या प्रशंसा में चिल्लाकर स्तुति नहीं कर सकते,  फिर भी हम उन्हें आदर दे सकते हैं। हम उनके सामर्थ के कार्यों की बातें, जरूरतमंद लोगों की सहायता, धैर्य से अपमान को सहन, और गहराई से दूसरों को प्रेम कर सकते हैं। हमें उन दर्शकों को बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो पूछते हैं, "यीशु कौन है?"

अदृश्य प्रभाव

वाशिंगटन डी सी, में राष्ट्रीय कला भवन का सैर करते हुए मैंने अति उत्तम रचना “द विंड” देखा l तस्वीर में एक जंगल में आंधी चल रही थी l ऊंचे, पतले पेड़ बायीं ओर झुक रहे थे l झाड़ियाँ उसी दिशा में गिर रहीं थीं l

इससे भी अधिक सामर्थी भाव में, पवित्र आत्मा विश्वासियों को परमेश्वर की भलाई और सच्चाई की ओर झुका सकता है l पवित्र आत्मा के साथ चलकर, हम अधिक साहसी और प्रेमी बन सकते हैं l हम अधिक समझदारी से अपनी इच्छाओं को सँभाल सकेंगे (2 तीमु. 1:7) l

कुछ एक स्थितियों में, हालाँकि, पवित्र आत्मा हमें आत्मिक उन्नत्ति और बदलाव की ओर ले जाता है, किन्तु हम “नहीं” कहते हैं l वचन लगातार इस दृढ़ विश्वास में अवरोध उत्पन्न करने को “आत्मा को” बुझाना कहती है (1 थिस्स. 5:19) l समय के साथ, जिन बातों को हम गलत मानते थे अब उतने बुरे नहीं लगते l

परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध दूर और टूटा महसूस होता है, क्योंकि आत्मा के दृढ़ निश्चय को बारम्बार किनारे किया गया है l जितने लम्बे समय तक ऐसा होगा, समस्या का कारण जानना उतना ही कठिन होगा l धन्यवाद हो, हम प्रार्थना करके परमेश्वर से हमारे पाप प्रगट करने का आग्रह कर सकते हैं l यदि हम पाप से मन फिराकर स्वयं को पुनः उसके सामने समर्पित करते हैं, परमेश्वर हमें क्षमा करके हमारे अन्दर अपनी आत्मा की सामर्थ और प्रभाव को जागृत करेगा l

समझनेवाला

टेक्सास शहर समुदाय में पुलिस और अग्निशमन विभाग के पास्टर जॉन बैबलर, अपने कार्य से बाईस सप्ताह के विश्राम अवकाश के दौरान, क़ानून-व्यवस्था अमल में लानेवाले अफसरों द्वारा सामना की जानेवाली स्थितियों को समझने हेतु पुलिस अकादमी प्रशिक्षण लिया l दूसरे सैन्य विद्यार्थियों के साथ समय बिताकर और पेशे के अत्यंत चुनौतियों के विषय सीखकर, उनको दीनता और सहानुभूति का नया अनुभव मिला l भविष्य में, वे भावनात्मक तनाव, थकावट, और हानि के साथ संघर्ष कर रहे पुलिस अफसरों को सलाह देने में अधिक प्रभावशाली होने की आशा करते हैं l

हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारी स्थिति जानता है  क्योंकि उसने हमें बनाया और हमारे साथ होनेवाली सभी बातें देखता है l और हम यह भी जानते हैं कि वह समझता है क्योंकि उसने पृथ्वी पर मानव जीवन जीया l वह “देहधारी हुआ और ... हमारे बीच में [यीशु मसीह में] डेरा किया” (यूहन्ना 1:14) l

यीशु का सांसारिक जीवन कठिन था l उसने सूर्य की गर्मी, खाली पेट का दर्द, बेघर होने का अनिश्चिय अनुभव किया l उसने भावनात्मक रूप से, विरोध का तनाव, धोखे की दाग़, और हिंसा की लगातार धमकी सही l

यीशु ने हमारी तरह मित्रता का आनंद और पारिवारिक प्रेम के साथ-साथ संसार की सबसे बुरी परेशानियाँ अनुभव की l गहरी जानकारी और देखभाल के साथ हमारी चिंता करनेवाला अद्भुत सलाहकार ही (यशा.9:6) बोल सकता है, “मैंने उसका अनुभव किया है l मैं समझता हूँ l”

सिंहों के संग निवास

शिकागो अजायबघर घर घूमते समय, मैंने बेबीलोन के लम्बे डग मारने वाले सिंहों का मूल चित्र देखा l वह भयंकर भाव के साथ एक पंखदार सिंह का भित्तिचित्र था l बेबीलोन की प्रेम और यूद्ध की देवी इश्तार का प्रतीक, यह सिंह 120 समरूप सिंहों का उदहारण था जो ई०पु० 604-562 के वर्षों में बेबीलोन की सड़कों पर पंक्तिबद्ध रहे होंगे l

इतिहासकारों के अनुसार बेबीलोन के लोगों द्वारा यरूशलेम पर कब्ज़ा करने के बाद, यहूदी बंदियों ने अपने समय में नबूकदनेस्सर के राज्य में इन सिंहों को देखा होगा l इतिहासकारों का यह भी मानना है कि कुछ इस्राएलियों का विश्वास था कि इश्तार देवी ने इस्राएल के परमेश्वर को पराजित किया था l

एक इब्री बंदी, दानिय्येल अपने कुछ इस्राएली भाइयों की शंकाओं से विचलित और शंकित नहीं था l परमेश्वर के विषय उसका विचार और समर्पण स्थिर था l वह यह जानकार भी कि प्रार्थना करना उसे सिंहों के मांद में भेज सकता था वह खिड़की खोलकर तीन बार प्रार्थना करता था l परमेश्वर द्वारा दानिय्येल को भूखे जंतुओं से छुड़ाने के बाद, राजा दारा ने कहा, “जीवता और युगानयुग तक रहनेवाला परमेश्वर [दानिय्येल का ही है] .... वही बचाने और छुड़ानेवाला है” (दानि. 6:26-27) l दानिय्येल की विश्वासयोग्यता ने उसको बेबीलोन के अगुवों को प्रभावित करने दिया l

तनाव एवं निराशा के बावजूद विश्वासयोग्यता उसे महिमान्वित करने हेतु लोगों को प्रेरित करेगा l

परमेश्वर से प्रश्न

यदि आपके किसी कार्य-दिवस में प्रभु एक सन्देश लेकर आपके पास आता, आप क्या करते? एक प्राचीन यहूदी, गिदोन के साथ ऐसा हुआ l “उसको यहोवा के दूत ने दर्शन दिया, ‘हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है l’” गिदोन मूक रह सकता था, किन्तु उसने कहा, “यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?” (न्या. 6:12-13) l मानो परमेश्वर ने अपने लोगों को त्याग दिया था, गिदोन जानना चाहता था l

परमेश्वर ने उस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया l गिदोन के सात वर्षों तक शत्रुओं का आक्रमण, भुखमरी और गुफाओं में छिपने के बाद, परमेश्वर ने हस्तक्षेप नहीं करने का कारण नहीं बताया l उसने इस्राएल के अतीत के पापों को न जताते हुए, उसको आशा दी l उसने कहा, “अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा l  निश्चय मैं तेरे संग हूँ l (न्यायियों 6:14,16) l

क्या आपने कभी सोचा क्यों परमेश्वर ने आपके जीवन में दुःख आने दी? उस ख़ास प्रश्न के उत्तर के बदले, परमेश्वर आपको अपनी निकटता से आज संतुष्ट करके ताकीद देता है कि आप दुर्बलता में उसकी सामर्थ्य पर निर्भर हों l गिदोन के अंततः भरोसा करने पर कि परमेश्वर साथ था और मदद करेगा, उसने एक वेदी बनाकर उसको “यहोवा शालोम” नाम दिया (पद.24) l

इसमें शांति है कि हमारे हर काम और स्थान में, परमेश्वर साथ रहेगा l  

क्रोध का विकल्प

एक दिन पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में फिओन मुलहॉलैंड ने देखा कि उसकी कार नहीं थी l उसने जाना कि गलती से उसने निषिद्ध क्षेत्र में कार खड़ी कर दी थी इसलिए वह खींच ली गयी थी l स्थिति की जांच के बाद, अर्थात्, खींचकर ले जाने और पार्किंग जुर्माना 600 डॉलर देने के बाद, मुलहॉलैंड निराश हुआ, किन्तु उसने निर्णय लिया कि वह अपनी कार को छुड़ाने के लिए सम्बंधित व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होगा l उसने क्रोध न दर्शाते हुए उस स्थिति के विषय एक हास्य कविता लिखकर गाड़ी-यार्ड के कार्यकर्त्ता को पढ़कर सुनाया l कार्यकर्त्ता ने कविता पसंद की, और संभवतः भद्दी बातचीत टल गयी l

नीतिवचन की पुस्तक सिखाती है, “मुक़दमें से हाथ उठाना, ... महिमा ठहरती है” (20:3) l झगड़ा वह घर्षण है जो या तो अन्दर ही अन्दर उबलती रहती है अथवा खुले में फूट जाती है जब दो लोग एक मत नहीं होते l

परमेश्वर ने दूसरों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहने के लिए संसाधन दिए हैं l उसका वचन  आश्वस्त करता है कि क्रोध तो करो किन्तु पाप ने करो (इफि.4:26) l उसकी आत्मा  हमें क्रोध की चिंगारियों को बुझाने की ताकत देता है जो हमें परेशान करनेवालों पर टूट पड़ने से हमें रोकती हैं l और उत्तेजित होने पर परमेश्वर ने हमें अनुसरण के लिए अपना उदाहरण  दिया है (1 पतरस 2:23) l वह दयालु, अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है l

छोटा होता पियानो

लगातार तीन वर्षों तक मेरा बेटा पियानो वादन में भाग लिया l पिछले वर्ष, मैंने उसे मंच पर अपना पियानो सजाते देखा l उसने दो गानें बजाए और फिर मेरे निकट बैठकर मेरे कानों में फुसफुसाया, “माँ, इस वर्ष पियानो छोटा था l” मैं बोली, “नहीं, तुमने वही पियानो बजाया l तुम बड़े हो गए हो! तुम बढ़ गए हो l”

शारीरक उन्नति की तरह, आत्मिक उन्नत्ति, समय के साथ धीरे-धीरे होती है l यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है जिसमें यीशु की तरह बनना शामिल है, और हमारे मन के नए हो जाने से हम रूपांतरित होते हैं l

हमारे अन्दर पवित्र आत्मा के कार्य से, हम अपने जीवनों में पाप को पहचान जाते हैं l परमेश्वर की महिमा करने की इच्छा में, हम बदलना चाहते हैं l कभी-कभी हम सफल होते हैं, किन्तु दूसरे समयों में, हम प्रयास करते और हार जाते हैं l कुछ नहीं बदलते देखकर हम निरास होते हैं l हम पराजय को उन्नत्ति की कमी कहते हैं, जबकि अक्सर यह प्रक्रिया के मध्य में होने का प्रमाण है l

आत्मिक उन्नत्ति में पवित्र आत्मा, हमारे बदलने की इच्छा, और समय शामिल है l जीवन के किसी ख़ास बिंदु पर, हम मुड़कर देखेंगे कि हम उन्नत्ति किये हैं l परमेश्वर हमें यह विश्वास करने का भरोसा दे कि “जिसने [हम]में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलि. 1:6) l

क्रूस को याद रखें

मेरे चर्च में, वेदी के सामने एक बड़ा क्रूस है l यह मूल क्रूस का प्रतिक है जहाँ यीशु मरा था-हमारे पाप और उसकी पवित्रता का मिलन स्थान l परमेश्वर ने वहाँ पर हमारे मन, वचन और कर्म द्वारा किये गए प्रत्येक पाप के लिए अपने निर्दोष पुत्र को मृत्यु सहने दिया l क्रूस पर, यीशु ने उस कार्य को पूरा किया जो हमें मृत्यु से, जिसके लायक हम थे, बचा सकता था (रोमि.6:23) l

यीशु ने जो हमारे लिए सहा, क्रूस का दृश्य हमें उस पर विचार करने को विवश करता है l उसे कोड़े मारे गए और उस पर थूका गया l सिपाहियों ने उसके सिर पर मारा और घुटने टेक कर उसकी दिखावटी आराधना की l उससे उसकी मृत्यु के स्थान तक अपना क्रूस उठाने को कहा, किन्तु वह कोड़ों की मार से बहुत दुर्बल था l गुलगुता पर, उन्होंने उसे क्रूस पर लटके रहने के लिए उसके हाथों में कीलें ठोकर क्रूस को खड़ा कर दिया l क्रूस पर उसके घावों ने उसके देह का वजन सहा l छः घंटे बाद, यीशु ने अंतिम सांस ली (मरकुस 15:37) l एक सेनानायक यीशु की मृत्यु देखकर बोल पड़ा, “सचमुच यह मनुष्य, परमेश्वर का पुत्र था!” (पद.39) l 

अगली बार जब आप क्रूस का चिन्ह देखें, विचार करें कि आपके लिए उसका अर्थ क्या है l परमेश्वर पुत्र दुःख उठाकर वहाँ मरा और उसके बाद अनंत जीवन संभव बनाने के लिए पुनरुथित हुआ l