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Articles by जेनिफ़र बेन्सन शुल्ट्ज

बुद्धिमत्ता का श्रोत

एक व्यक्ति ने एक महिला पर मुकद्दमा दायर कर दिया, कि महिला के पास उसका कुत्ता था l कोर्ट में महिला ने कहा, उसका कुत्ता उस व्यक्ति का नहीं हो सकता और जज को बताया उसने उसे कहाँ से ख़रीदा था l वास्तविक मालिक का पता चल गया जब जज ने कोर्ट के कमरे में ही उस कुत्ते को खोल दिया l पूंछ हिलाते हुए, वह अपने मालिक के पास दौड़ गया l
प्राचीन इस्राएल का एक न्यायी, सुलैमान को इस तरह का एक मामला सुलझाना पड़ा l दो महिलाएँ एक ही छोटे लड़के की माँ होने का दावा कर रही थीं l दोनों के दलील को सुनने के बाद, तलवार से उस बच्चे को दो भाग में विभाजित करने को कहा l बच्चे की असली माँ ने अपना बच्चा नहीं मिलने की स्थिति में भी उसकी जान बचाने के उद्देश्य से उसे दूसरी स्त्री को दे देने का आग्रह किया (1 राजा 3:26) l सुलैमान में उसे  बच्चा दे दिया l
न्यायोचित और नैतिक, सही और गलत क्या है का निर्णय करने के लिए बुद्धिमत्ता अनिवार्य है l यदि हम सचमुच बुद्धि का मूल्य समझते हैं, हम सुलेमान की तरह, परमेश्वर से समझने वाला हृदय मांग सकते हैं (पद.9) l परमेश्वर दूसरों की रुचियों के साथ हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुलित करके हमारे निवेदन का उत्तर दे सकता है l वह दीर्घकालीन(कभी-कभी अनंत)  लाभ के विरुद्ध अल्पकालीन लाभ को तौलने में हमारी मदद भी कर सकता है ताकि हम अपने जीवन जीने में उसका आदर कर सकें l
हमारा परमेश्वर केवल एक सिद्ध बुद्धिमान न्यायी ही नहीं है, किन्तु एक व्यक्तिगत परामर्शदाता भी है जो हमें बड़ी मात्रा में ईश्वरीय बुद्धिमत्ता भी देना चाहता है (याकूब 1:5) l

वश में रखना असम्भव

मेक्सिको की खाड़ी में अपने मित्रों के साथ तैरती हुयी, कैत्लिन का एक शार्क से सामना हुआ, जो उसके पैरों पर झपटकर उसे खींचने लगा l कैत्लिन ने जवाबी हमले में शार्क के नाक पर एक जोर का घूँसा मारा l हिंसक शार्क हारकर उसके पाँवों को छोड़कर चला गया l यद्यपि उसके काटने के कारण उसे 100 से अधिक टाँके लगे, शार्क कैत्लिन को अपने पकड़ में नहीं ले सका l
यह कहानी मुझे यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु ने मृत्यु पर वार करके, उसके अनुयायियों को डराने और उन्हें पराजित करने की उसकी शक्ति समाप्त कर दी l पतरस के अनुसार, “क्योंकि मृत्यु के वश में रहना उसके लिए असम्भव था” (प्रेरितों 2:24) l
पतरस ने यरूशलेम में एक भीड़ से यह शब्द कहे l शायद उनमें से कईयों ने यीशु को दण्डित करने के लिए चिल्लाए होंगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए” (मत्ती 27:22) l परिणामस्वरूप, रोमी सैनिकों ने उसे मरने तक क्रूस पर टंगा हुआ रखा l परमेश्वर द्वारा यीशु को जिलाए जाने तक उसका शरीर तीन दिनों तक कब्र में रखा रहा l उसके पुनरुत्थान के बाद, पतरस और अन्य लोग उससे बात और उसके साथ भोजन किया, और चालीस दिनों के बाद वह स्वर्ग पर उठा लिया गया (प्रेरितों 1:9) l
पृथ्वी पर यीशु का जीवन शारीरिक दुःख और मानसिक पीड़ा के मध्य बीता, इसके बावजूद परमेश्वर की सामर्थ्य ने कब्र को पराजित कर दिया l इसके कारण, मृत्यु या कोई और संघर्ष/पीड़ा हमें सर्वदा अपने पकड़ में नहीं रख सकती l एक दिन सभी विश्वासी परमेश्वर की उपस्थिति में अनंत जीवन और परिपूर्णता का अनुभव करेंगे l उस भविष्य पर केन्द्रित होकर हम वर्तमान में स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हैं l  

परमेश्वर के साथ वास्तविक रहना

मैं अपने सिर को झुकाकर, अपनी आँखों को बंद करके, अपने हाथों को जोड़कर प्रार्थना करना आरम्भ कर देता हूँ l “प्रिय परमेश्वर, मैं आपके सामने एक बच्चे की तरह आता हूँ l मैं आपकी सामर्थ्य और भलाइयों को स्वीकार करता हूँ . . . l”  अचानक, मेरी आँखें खुल जाती हैं l मुझे याद आता है कि मेरे बेटे ने इतिहास के प्रोजेक्ट को पूरा नहीं किया है, जो उसको कल दिखाना है l स्कूल के बाद उसे बास्केटबाल गेम भी खेलना है, और मैं कल्पना करता हूँ कि वह मध्य रात्रि तक जागकर अपना गृह कार्य पूरा कर रहा है l इससे मैं चिंतित हो जाता हूँ कि कहीं थकान से उसे बुखार न आ जाए!

सी.एस. लयूईस प्रार्थना में विकर्षण के विषय अपनी पुस्तक स्क्रूटेप लेटर्स  में लिखते हैं l उन्होंने ध्यान दिया कि हमारे मस्तिष्क के भटकने पर, हम अपनी पूर्व की प्रार्थना में लौटने के लिए अपनी इच्छाशक्ति का उपयोग करते हैं l लयूईस यद्यपि इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि उस विकर्षण को [अपनी] वर्तमान समस्या के रूप में स्वीकार करना बेहतर होगा और उसे [परमेश्वर] के आगे [रखकर], उसे अपनी प्रार्थना का मुख्य विषय बना लेना चाहिए l”

प्रार्थना में भटकाव लानेवाली एक स्थायी चिंता अथवा एक पापी विचार भी परमेश्वर के साथ हमारी चर्चा का केंद्रबिंदु बन सकता है l जब हम परमेश्वर से बातचीत करते हैं उसकी इच्छा है कि हम वास्तविक बनकर उसे अपनी गहरी चिंता, भय, और संघर्ष बताएं l वह हमारी बातों से चकित नहीं होता है l वह एक घनिष्ट मित्र की देखभाल की तरह हमारा ध्यान रखता है l इसीलिए हम अपनी सारी चिंता और बेचैनी उस पर डालने में उत्साहित होते हैं – क्योंकि उसको हमारा ध्यान है (1 पतरस 5:7) l  

प्रबल प्रेम

शादी के एक हफ्ते पहले, सारा की सगाई टूट गई। उदास और निराश होने के बावजूद, उसने रिसेप्शन के खाने को बेकार ना जाने देने का फैसला किया।  उत्सव की योजना और अतिथियों की लिस्ट बदल कर उसने स्थानीय आश्रय स्थलों के निवासियों को भोज में बुलाया।

फरीसियों को स्वार्थहीन दया करने के महत्व को समझाने के लिए यीशु ने कहा, "जब तू भोज करे..." (लूका 14:13-14)। उन्होंने कहा कि तू धन्य होगा, क्योंकि उनके पास बदले में मेज़बान को देने के लिए कुछ नहीं। यीशु ने उन लोगों की मदद करने की अनुमति दी जो ना तो दान दक्षिणा, न दिलचस्प बातें और नाही ऊंची जान-पहचान से इसकी आपूर्ति कर सकें।

यदि विचार किया जाए कि यीशु ने ये वचन तब कहे जब वे एक फरीसी के दिए भोज में बैठे थे तो, उनका कथन भडकाने वाला और उग्र लगेगा। परन्तु सच्चा प्रेम उग्र होता है। बदले में बिना कुछ पाने के उम्मीद किए दूसरों की मदद करना प्रेम है। इसी समान यीशु ने हम में से प्रत्येक से प्रेम किया। उन्होंने हमारी भीतरी दरिद्रता को देखकर हमारे लिए अपना जीवन दे दिया।

मसीह को व्यक्तिगत रूप से जानना, उनके अनंत प्रेम की थाह लेना है। हम सभी आमंत्रित हैं कि यह जानें कि "मसीह के प्रेम की चौड़ाई..." (इफिसियों 3:18)।

परमेश्वर कैसा है?

एक विशेष अवसर को मनाने के लिए, मेरे पति मुझको एक स्थानीय कला दीर्घा (Art gallery) ले गए और मुझे उपहार देने के लिए मुझसे कोई चित्रकला चुनने को कहा l मैंने वन के बीच से बहती हुई एक छोटी नदी की छोटी चित्रकला का चुनाव किया l उस चित्र में नदी का तल पूरे चित्र फलक(Canvas) पर फैला हुआ था, और इस कारण आकाश का हिस्सा बहुत कम दिखाई दे रहा था l हालाँकि, नदी की प्रतिबिम्ब में सूरज, पेड़ों की चोटियाँ, और धुंधला फ़िज़ा स्पष्ट था l केवल पानी की सतह पर ही आसमान “देखा”  जा सकता था l
आत्मिक भाव में, यीशु उस नदी के समान है l जब हम जानना चाहते हैं कि परमेश्वर कैसा है, हम यीशु की ओर देखते हैं l इब्रानियों का लेखक कहता है कि वह “[परमेश्वर] के तत्व की छाप [है]” (1:3) l यद्यपि हम “परमेश्वर प्रेम है” जैसे बाइबल के प्रत्यक्ष कथनों से परमेश्वर के विषय सच्चाइयाँ सीख सकते हैं, हम परमेश्वर को उन समस्याओं में कार्य करते हुए देखकर  जिनसे हमारा सामना इस संसार में होता है, हम अपनी समझ को और भी गहरा कर सकते हैं l यीशु हमें दिखाने आया कि वह मानव रूप में परमेश्वर है l
परीक्षा में, यीशु ने परमेश्वर की पवित्रता प्रगट किया l आत्मिक अन्धकार का सामना करते हुए, उसने परमेश्वर का अधिकार दर्शाया l लोगों की परेशानियों से जूझते हुए, उसने परमेश्वर की बुद्धिमत्ता दिखाई l अपनी मृत्यु में, उसने परमेश्वर का प्रेम प्रगट किया l
यद्यपि हम परमेश्वर के विषय सब कुछ नहीं समझ सकते हैं – वह असीमित है और हम अपनी सोच में सीमित हैं – हम मसीह को देखकर परमेश्वर के चरित्र के विषय निश्चित हो सकते हैं l

यह कौन है?

कल्पना करें कि आप धूल सने मार्ग पर दर्शकों के साथ खड़े हैं। पीछे खड़ी एक महिला अपने पैर उच्चकर देखने की कोशिश कर रही है कि कौन आ रहा है। दूर गधे पर बैठा एक व्यक्ति आ रहा है। उसके निकट आने पर लोग अपने वस्त्र सड़क पर डालने लग जाते हैं। अचानक, किसी टहनी के चटकने की आवाज आती है। कोई खजूर की शाखाएं काट रहा है और लोग उन्हें गधे के सामने डाल रहे हैं।

क्रूसित होने से पूर्व जब यीशु ने यरूशलेम में प्रवेश किया तो उनके अनुयायियों ने उत्साहपूर्वक उन्हें सम्मानित किया।“सारी मण्डली उन सब सामर्थ...”। (लूका 19:37)। यीशु के भक्त कह रहे थे, "धन्य है वह राजा..."(पद 38)। उनके उत्साह ने लोगों को प्रभावित किया। सारे नगर में हलचल मच गई; और लोग कहने लगे, यह कौन है? (मत्ती 21:10)।

आज भी, लोग यीशु के बारे में उत्सुक हैं। हालांकि हम शाखाओं से उनके मार्ग को प्रशस्त या प्रशंसा में चिल्लाकर स्तुति नहीं कर सकते,  फिर भी हम उन्हें आदर दे सकते हैं। हम उनके सामर्थ के कार्यों की बातें, जरूरतमंद लोगों की सहायता, धैर्य से अपमान को सहन, और गहराई से दूसरों को प्रेम कर सकते हैं। हमें उन दर्शकों को बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो पूछते हैं, "यीशु कौन है?"

अदृश्य प्रभाव

वाशिंगटन डी सी, में राष्ट्रीय कला भवन का सैर करते हुए मैंने अति उत्तम रचना “द विंड” देखा l तस्वीर में एक जंगल में आंधी चल रही थी l ऊंचे, पतले पेड़ बायीं ओर झुक रहे थे l झाड़ियाँ उसी दिशा में गिर रहीं थीं l

इससे भी अधिक सामर्थी भाव में, पवित्र आत्मा विश्वासियों को परमेश्वर की भलाई और सच्चाई की ओर झुका सकता है l पवित्र आत्मा के साथ चलकर, हम अधिक साहसी और प्रेमी बन सकते हैं l हम अधिक समझदारी से अपनी इच्छाओं को सँभाल सकेंगे (2 तीमु. 1:7) l

कुछ एक स्थितियों में, हालाँकि, पवित्र आत्मा हमें आत्मिक उन्नत्ति और बदलाव की ओर ले जाता है, किन्तु हम “नहीं” कहते हैं l वचन लगातार इस दृढ़ विश्वास में अवरोध उत्पन्न करने को “आत्मा को” बुझाना कहती है (1 थिस्स. 5:19) l समय के साथ, जिन बातों को हम गलत मानते थे अब उतने बुरे नहीं लगते l

परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध दूर और टूटा महसूस होता है, क्योंकि आत्मा के दृढ़ निश्चय को बारम्बार किनारे किया गया है l जितने लम्बे समय तक ऐसा होगा, समस्या का कारण जानना उतना ही कठिन होगा l धन्यवाद हो, हम प्रार्थना करके परमेश्वर से हमारे पाप प्रगट करने का आग्रह कर सकते हैं l यदि हम पाप से मन फिराकर स्वयं को पुनः उसके सामने समर्पित करते हैं, परमेश्वर हमें क्षमा करके हमारे अन्दर अपनी आत्मा की सामर्थ और प्रभाव को जागृत करेगा l

समझनेवाला

टेक्सास शहर समुदाय में पुलिस और अग्निशमन विभाग के पास्टर जॉन बैबलर, अपने कार्य से बाईस सप्ताह के विश्राम अवकाश के दौरान, क़ानून-व्यवस्था अमल में लानेवाले अफसरों द्वारा सामना की जानेवाली स्थितियों को समझने हेतु पुलिस अकादमी प्रशिक्षण लिया l दूसरे सैन्य विद्यार्थियों के साथ समय बिताकर और पेशे के अत्यंत चुनौतियों के विषय सीखकर, उनको दीनता और सहानुभूति का नया अनुभव मिला l भविष्य में, वे भावनात्मक तनाव, थकावट, और हानि के साथ संघर्ष कर रहे पुलिस अफसरों को सलाह देने में अधिक प्रभावशाली होने की आशा करते हैं l

हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारी स्थिति जानता है  क्योंकि उसने हमें बनाया और हमारे साथ होनेवाली सभी बातें देखता है l और हम यह भी जानते हैं कि वह समझता है क्योंकि उसने पृथ्वी पर मानव जीवन जीया l वह “देहधारी हुआ और ... हमारे बीच में [यीशु मसीह में] डेरा किया” (यूहन्ना 1:14) l

यीशु का सांसारिक जीवन कठिन था l उसने सूर्य की गर्मी, खाली पेट का दर्द, बेघर होने का अनिश्चिय अनुभव किया l उसने भावनात्मक रूप से, विरोध का तनाव, धोखे की दाग़, और हिंसा की लगातार धमकी सही l

यीशु ने हमारी तरह मित्रता का आनंद और पारिवारिक प्रेम के साथ-साथ संसार की सबसे बुरी परेशानियाँ अनुभव की l गहरी जानकारी और देखभाल के साथ हमारी चिंता करनेवाला अद्भुत सलाहकार ही (यशा.9:6) बोल सकता है, “मैंने उसका अनुभव किया है l मैं समझता हूँ l”

सिंहों के संग निवास

शिकागो अजायबघर घर घूमते समय, मैंने बेबीलोन के लम्बे डग मारने वाले सिंहों का मूल चित्र देखा l वह भयंकर भाव के साथ एक पंखदार सिंह का भित्तिचित्र था l बेबीलोन की प्रेम और यूद्ध की देवी इश्तार का प्रतीक, यह सिंह 120 समरूप सिंहों का उदहारण था जो ई०पु० 604-562 के वर्षों में बेबीलोन की सड़कों पर पंक्तिबद्ध रहे होंगे l

इतिहासकारों के अनुसार बेबीलोन के लोगों द्वारा यरूशलेम पर कब्ज़ा करने के बाद, यहूदी बंदियों ने अपने समय में नबूकदनेस्सर के राज्य में इन सिंहों को देखा होगा l इतिहासकारों का यह भी मानना है कि कुछ इस्राएलियों का विश्वास था कि इश्तार देवी ने इस्राएल के परमेश्वर को पराजित किया था l

एक इब्री बंदी, दानिय्येल अपने कुछ इस्राएली भाइयों की शंकाओं से विचलित और शंकित नहीं था l परमेश्वर के विषय उसका विचार और समर्पण स्थिर था l वह यह जानकार भी कि प्रार्थना करना उसे सिंहों के मांद में भेज सकता था वह खिड़की खोलकर तीन बार प्रार्थना करता था l परमेश्वर द्वारा दानिय्येल को भूखे जंतुओं से छुड़ाने के बाद, राजा दारा ने कहा, “जीवता और युगानयुग तक रहनेवाला परमेश्वर [दानिय्येल का ही है] .... वही बचाने और छुड़ानेवाला है” (दानि. 6:26-27) l दानिय्येल की विश्वासयोग्यता ने उसको बेबीलोन के अगुवों को प्रभावित करने दिया l

तनाव एवं निराशा के बावजूद विश्वासयोग्यता उसे महिमान्वित करने हेतु लोगों को प्रेरित करेगा l