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Articles by लेस्ली कोह

जब सबकुछ खोया हुआ लगे

केवल छः महीनों में जेरल्ड का जीवन टुकड़े-टुकड़े हो गया l एक आर्थिक संकट ने उसके कारोबार और धन-दौलत को बर्बाद कर दिया, जबकि एक दुखद दुर्घटना ने उसके पुत्र की जान ले ली l आघात से अभिभूत, उसकी माँ की हृदयाघात से मृत्यु हो गयी, उसकी पत्नी विषाद में चली गयी, और उसकी दो तरुण बेटियाँ शोकाकुल बनी रहीं…

क्या आप वहाँ हैं?

जब माइकल की पत्नी को मरणान्तक बीमारी(Terminal illness) हो गयी, उसकी इच्छा हुयी कि वह भी उस शांति का अनुभव करे जो परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखने के द्वारा उसके पास थी l उसने उसके साथ अपना विश्वास साझा किया था, किन्तु उसमें रूचि नहीं थी l एक दिन, जब वह स्थानीय बुकस्टोर में गया, एक पुस्तक ने उसे अपनी ओर आकर्षित की, परमेश्वर, क्या आप वहाँ हैं? अनिश्चित कि इस पुस्तक के प्रति उसकी पत्नी का रवैया क्या रहेगा, पुस्तक खरीदने से पहले कई बार उसने दूकान के अन्दर बाहर आना जाना किया l वह चकित हुआ, उसकी पत्नी ने पुस्तक स्वीकार कर लिया l

उस पुस्तक ने उसे स्पर्श किया, और वह बाइबल भी पढ़ने लगी l दो सप्ताह बाद, माइकल की पत्नी गुज़र गयी – परमेश्वर के साथ शांति में और इस निश्चयता में कि वह उसे कभी नहीं त्यागेगा या छोड़ेगा l

जब परमेश्वर ने मूसा से अपने लोगों को मिस्र से निकलने के लिए बुलाया, उसने अपनी सामर्थ्य की प्रतिज्ञा नहीं दी l इसके बदले, उसने अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा दी : “मैं तेरे संग रहूँगा” (निर्गमन 3:12) l अपने क्रूसीकरण से पूर्व यीशु ने अपने शिष्यों से परमेश्वर की अनंत ऊपस्थिति की प्रतिज्ञा की, जो वे पवित्र आत्मा द्वारा प्राप्त करेंगे (यूहन्ना 15:26) l

अनेक चीजें हैं जो परमेश्वर जीवन की चुनौतियों में हमें मदद के लिए दे सकता था, जैसे भौतिक आराम, चंगाई, या हमारी समस्याओं का त्वरित हल l कभी-कभी वह करता भी है l किन्तु खुद को देकर वह हमें सर्वोत्तम उपहार देता है l यह हमारे लिए महानतम सुख है : जीवन में जो भी हो, वह हमारे साथ रहेगा; वह हमें न छोड़ेगा और न त्यागेगा l

पीड़ा में एक उद्देश्य?

जब सिउ फेन को पता चला कि उनके गुर्दे खराब हो गए हैं और अब उन्हें पूरे जीवन भर डायलिसिस करवाने की आवश्यकता पड़ेगी, तो वह हार मान लेना चाहती थी। सेवानिवृत्त और अकेली, यीशु पर लम्बे समय से विश्वासी, उस महिला को जीने का कोई उद्देश्य दिखाई नहीं दिया। परन्तु मित्रों ने उन्हें डटे रहने और डायलिसिस करवाने और उसकी सहायता के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए कायल किया।

दो साल बाद, उसने अपने अनुभव के जैसा ही कुछ पाया, जब उनकी भेंट दुर्बल कर देने वाली बिमारी वाली कलीसिया की एक मित्र से हुई। वह महिला भी अकेली थी, कुछ लोग ही समझ सकते थे कि वह महिला कैसे समय से गुजर रही थी। परन्तु सिउ फेन उसकी शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा को समझ सकती थी और उसके साथ व्यक्तिगत रूप से सम्बन्ध रख सकती थी। उसके अपने अनुभव ने उन्हें उस महिला के साथ-साथ चलने और उसे वह आराम देने के योग्य बनाया, जो उसे दूसरे लोग नहीं दे पाए थे। उसने कहा “अब मैं देख रही हूँ, कि परमेश्वर अभी भी मुझे कैसे इस्तेमाल कर सकता है।”

यह समझना कठिन हो सकता है कि हम दुःख क्यूँ उठाते हैं। परन्तु फिर भी परमेश्वर हमारी पीड़ाओं को अनपेक्षित रूप से इस्तेमाल कर सकता है। परीक्षाओं में जब हम आराम और प्यार के लिए उसकी ओर मुड़ते हैं, तो यह हमें दूसरों की सहायता करने के लिए भी सशक्त करता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पौलुस ने अपनी पीड़ाओं में उद्देश्य को देखना सीख लिया था: इसने उसे परमेश्वर के आराम को ग्रहण करने का अवसर प्रदान किया, जिसे फिर वह दूसरों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल कर सका (2 कुरिन्थियों 1:3-5) । हमें अपनी पीड़ा और दुःख से बचने के लिए नहीं कहा गया है, परन्तु हम ढाढ़स के साथ परमेश्वर की योग्यता में इसे भले के लिए प्रयोग कर सकते हैं।

सर्वोत्तम समाचार!

स्थानीय समाचार-पत्र का अनुच्छेद छोटा था, परन्तु यह दिल को छू लेने वाला था। सुदृढ़ पारिवारिक सम्बन्धों पर विश्वास पर आधारित एक कार्यक्रम में भाग लेने के पश्चात जेल के कुछ कैदियों को उनके परिवारों से मिलने के एक सुअवसर प्रदान किया गया था। कुछ कैदियों ने तो अपने बच्चों को सालों से नहीं देखा था। एक शीशे की खिड़की से बात करने के स्थान पर वे अपने प्रियों को छू और गले से लगा सकते थे। जब वे परिवार निकट आए तो आँसू बहने लगे और ज़ख्म चंगे होने शुरू हो गए।  

अधिकत्तर पाठकों के लिए, यह मात्र एक कहानी थी। परन्तु इस परिवारों के लिए एक-दूसरे को थामना एक जीवन परिवर्तक घटना थी-और कुछ के लिए क्षमा करने और पुनर्मेल की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी।

परमेश्वर का हमारे पापों को क्षमा करना और पुनर्मेल का प्रस्ताव देना, उसके पुत्र के द्वारा ही सम्भव हुआ और यह मसीही विश्वास का एक तथ्य मात्र होने से कहीं अधिक है। समाचार पत्र के पुनर्मेल का वह अनुच्छेद हमें याद दिलाता है कि यीशु का बलिदान संसार के लिए मात्र एक सर्वोत्तम समाचार ही नहीं, परन्तु आपके और मेरे लिए भी है।

कईबार हम उस अपराध के द्वारा दबे होते हैं, जो हम ने किया होता है, परन्तु यही वह समाचार है जिसे हम हताशा के साथ थामे रख सकते हैं। तभी परमेश्वर की कभी न समाप्त होने वाली दया का तथ्य एक व्यक्तिगत समाचार बन जाता है: यीशु के हमारे लिए मरने के कारण हम पिता के समक्ष साफ़-सुथरे बन कर आ सकते हैं, “हिम से भी श्वेत” (भजन संहिता 51:7) । ऐसे समयों में, जब हम जानते हैं कि हम उसकी दया के योग्य नहीं हैं तो हम एक ही बात को थाम सकते हैं, जिस पर हम निर्भर हो सकते हैं: परमेश्वर की करुणा और बड़ी दया (पद 1) ।  

तैयार भले काम

विदेश की एक गली में जब एक हट्टा-कट्टा अजनबी जब मेरी और मेरी पत्नी की ओर आया, तो हम भय के मारे पीछे हट गए। हमारी छुट्टियाँ बहुत ही बुरी बीत रही थीं; हम पर चिल्लाया गया था, हमारे साथ धोखेबाज़ी हुई थी और अनेक बार ज़बरदस्ती हमारी चीज़ें छीन ली गई थीं। क्या हमें अब दुबारा कोई झटका मिलने वाला था? हम आश्चर्यचकित हुए, कि वह तो हमें बस यह दिखाना चाहता कि उसके नगर का सबसे अच्छा दृश्य कहाँ से देखा जा सकता था। उसके बाद उसने हमें एक चॉकलेट दी, मुस्कुराया और चला गया। उसे छोटी सी घटना ने हमारे दिन को खुशनुमा बना दिया-और जैसे कि पूरी ट्रिप को ही अच्छा बना दिया। इस घटना ने हमें खुश करने के लिए हमें परमेश्वर और उस व्यक्ति, दोनों का कृतज्ञ बना दिया।

उस व्यक्ति को हम दो अजनबियों तक पहुँचने के लिए किसने बाध्य किया था? क्या वह सारा दिन उस चॉकलेट के साथ किसी को खुश करने के लिए घूमता रहा था?

यह एक अद्भुत सी बात है कि एक छोटा सा काम बहुत बड़ी मुस्कुराहट ला सकता है-या शायद किसी का परमेश्वर की ओर मार्गदर्शन कर सकता है। बाइबल भले काम करने के महत्व पर बल देती है (याकूब 2:17,24) । यदि वह चुनौतीपूर्ण लगता है, तो हमारे पास यह आश्वासन है कि परमेश्वर हमें न केवल ये कार्य करने के योग्य बनाता है, परन्तु उन्हें “पहले से ही हमारे करने के लिए तैयार किया है (इफिसियों 2:10) ।

शायद परमेश्वर ने हमारा किसी से “टकराने” का प्रबन्ध किया हो, कोई ऐसा व्यक्ति जिसे प्रोत्साहन के एक शब्द की ज़रूरत हो या उसने हमें आज किसी की सहायता करने का सुअवसर प्रदान किया हो। हमें तो बस आज्ञाकारिता में जवाब देना है।

जब परमेश्वर नहीं कहता है

जब मुझे अठारह वर्ष की आयु में सेना में शामिल किया गया, क्योंकि यह सिंगापुर के सभी पुरुषों के लिए अनिवार्य है, मैंने ईमानदारी से आसान नियुक्ति के लिए प्रार्थना की l शायद एक लिपिक या ड्राईवर l ख़ास तौर से मजबूत नहीं होने के कारण, मेरी आशा थी कि मुझे युद्ध प्रशिक्षण की कठोरता से नहीं गुज़ारना पड़ेगा l किन्तु एक शाम बाइबल पढ़ते समय, एक पद स्पष्ट दिखाई दिया : “मेरा अनुग्रह तुम्हारे लिए पर्याप्त है . . . “ (2 कुरिन्थियों 12:9) l

मेरा दिल बैठ गया – किन्तु ऐसा होना नहीं चाहिए था l परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली l एक कठिन जिम्मेदारी मिलने पर भी, वह मेरे लिए प्रबंध करेगा l

फिर मेरी नियुक्ति बख्तरबंद पैदल सैनिक के रूप में हुयी, मुझे ऐसे काम करने पड़े जो मुझे पसंद नहीं थे l मैं अब पीछे मुड़कर, परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि परमेश्वर ने मेरी इच्छा पूरी नहीं की l प्रशिक्षण ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत किया और वयस्कता में प्रवेश करने में दृढ़ किया l

यशायाह 25:1-5 में, इस्राएल का दण्ड और तत्पश्चात शत्रुओं से छुटकारे की घोषणा करने के बाद, नबी परमेश्वर की योजनाओं की प्रशंसा करता है l यशायाह इस बात पर ध्यान देता है कि ये सभी “आश्चर्यकर्म,” “प्राचीन काल से” नियोजित हैं (पद.1), फिर भी इसमें  कठिन समय सम्मिलित है l

परमेश्वर का इनकार सुनना कठिन हो सकता है, और जब हम कुछ अच्छे के लिए प्रार्थना करते हैं तब और भी कठिन – जैसे किसी को संकट से छुड़ाने के लिए l ऐसे समय में हमें परमेश्वर की अच्छी योजनाओं को थामे रहना है l शायद हम नहीं समझेंगे क्यों, किन्तु उसके प्रेम, भलाई, और विश्वासयोग्यता में भरोसा करते रहें l

माँ का प्रेम

सु की युवावस्था में, उसके माता-पिता के तलाक के बाद उसकी परवरिश सम्बन्धी कानूनी लड़ाई और अन्य मामलों के परिणामस्वरूप उसे कुछ समय के लिए बाल-आश्रम में रहना पड़ा l बड़े बच्चों के परेशान करने के कारण, उसने खुद को अकेला और तिरस्कृत समझा l हर महीने उसकी माँ उससे मिलने एक बार आती थी, और वह अपने पिता से शायद ही मिलती थी l कई वर्षों के बाद, हालाँकि, उसकी माँ ने उसे बताया कि बाल-आश्रम के नियमों के कारण वह अक्सर उससे मिलने नहीं आ पाती थी, और ज्यादातर, वह प्रतिदिन बाड़े के निकट खड़ी होकर उसकी एक झलक पाने की आशा करती थी l कभी-कभी,” उसने कहा, “मैं तुम्हें गार्डन में खेलती हुई देखती थी, केवल यह जानने के लिए कि तुम ठीक होगी l”
जब सु ने यह कहानी बतायी, इससे मुझे परमेश्वर के प्रेम का एक झलक मिला l कभी-कभी हम अपने संघर्षों में त्यागे हुए और अकेला महसूस करेंगे l यह जानना कितना सुखकर है कि वास्तव में परमेश्वर हमेशा हमारी निगरानी कर रहा है (भजन 33:18) l यद्यपि हम उसे देख नहीं सकते, वह मौजूद है l एक प्रेमी अभिभावक की तरह, उसकी आँखें और उसका हृदय हमेशा और हर जगह हमारे ऊपर रहता है l फिर भी, सु की माँ के विपरीत, वह इस समय भी हमारे पक्ष में कार्य कर सकता है l
भजन 91 परमेश्वर का अपने बच्चों के छुटकारा, सुरक्षा और उन्हें थामे रहने का वर्णन करता है l वह शरणस्थान और आश्रय से बढ़ कर है l जब हम जीवन की अंधकारमय घाटियों में होकर जाते हैं, हम इस बोध में विश्राम पाते हैं कि सर्वशक्तिमान प्रभु हमेशा हमारी निगरानी करता है और हमारे जीवनों में क्रियाशील है l वह घोषणा करता है, “मैं [तुम्हारी] सुनूंगा, संकट में मैं [तुम्हारे] संग रहूँगा, मैं [तुम्हें बचाऊंगा]” (पद.15) l

निर्माण न रोकें

जब काम में एक नयी भूमिका निभाने का अवसर मिला, साइमन ने उसे परमेश्वर की ओर से माना l निर्णय पर प्रार्थना करके और सलाह लेकर, उसने महसूस किया कि परमेश्वर उसे और बड़ी जिम्मेदारी दे रहा है l सब कुछ ठीक था, और उसके बॉस ने उसके कदम को सराहा l तब बातें बिगड़ने लगीं l कुछ सहयोगियों ने उसकी पदोन्नति से अप्रसन्न होकर सहयोग बंद किया l वह यह जिम्मेदारी छोड़ने पर विचार करने लगा l
जब इस्राएली परमेश्वर का घर बनाने यरूशलेम लौटे, शत्रुओं ने उन्हें भयभीत और हतोत्साहित किया (एज्रा 4:4) l पहले तो इस्राएली ठहर गए, किन्तु परमेश्वर द्वारा हाग्गै और जकर्याह नबी के उत्साहवर्धन के बाद निर्माण जारी रहा (4:24-5:2) l
एक बार फिर, शत्रु उनको परेशान करने आए l किन्तु यह जानकार कि "परमेश्वर की दृष्टि उन पर [लगी हुयी है]" (5:5) वे लगे रहे l वे दृढ़ता से परमेश्वर के निर्देशों को थामे हुए और उसपर भरोसा करके हर एक विरोध के बीच निर्माण जारी रखा l निश्चित रूप से, परमेश्वर ने मंदिर निर्माण पूरा होने के लिए फारस के राजा का समर्थन उनकी ओर कर दिया (पद.13-14) l
उसी प्रकार, साइमन ने यह समझने के लिए परमेश्वर की बुद्धिमत्ता मांगी कि उसे वहाँ रहना चाहिए या नयी जगह खोजनी चाहिए l वहाँ रहने हेतु परमेश्वर की इच्छा को जानकार, उसने दृढ़ रहने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा किया l समय के साथ, उसने धीरे-धीरे अपने सहयोगियों की स्वीकृति प्राप्त कर लिया l
जब हम परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, जहाँ भी वह हमें रखता है, हम विरोध का सामना कर सकते हैं l उसी समय हमें उसका अनुसरण करना होगा l वह हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें लिए चलेगा l

सर्वदा स्वीकार्य

अनेक वर्षों तक एंजी अपनी पढ़ाई में संघर्ष करती रही, जिसके बाद उसे, सर्वोत्कृष्ट प्रार्थमिक स्कूल से निकाल कर एक “साधारण” स्कूल में भर्ती कर दिया गया l सिंगापुर में जहां बहुत ही प्रतियोगी शिक्षा का परिदृश्य है, जहां एक “अच्छे” स्कूल में किसी की भावी संभावनाएं सुधर सकती है, अनेक लोगों ने इसे पराजय के रूप में देखा l   
एंजी के माता-पिता निराश थे, और एंजी ने भी खुद के विषय सोचा मानो उसे नीचे उतार  दिया गया है l किन्तु नये स्कूल में जाने के शीघ्र बाद, नौ वर्ष की एंजी समझ गयी कि औसत विद्यार्थियों की क्लास में पढ़ने का क्या अर्थ होता है l उसने कहा, “माँ, मैं सही जगह पर हूँ, यहाँ मैं स्वीकारी गयी हूँ!”
मैंने इस बात को याद किया कि जक्कई कितना उत्साहित हुआ होगा जब यीशु ने खुद ही उस चुंगी लेनेवाले के घर में जाने को तैयार हुआ होगा (लूका 19:5) l मसीह ने उन लोगों के साथ भोजन करने में रूचि लिया जिन्हें मालूम था कि वे दोषपूर्ण हैं और परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य नहीं (पद.10) l हम जैसे भी हैं, यीशु हमें खोजकर और हमसे प्रेम करके अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा देता है l हम उसके अनुग्रह द्वारा ही सिद्ध बनाए जाते हैं l
यह जानते हुए कि मेरा जीवन परमेश्वर के मानक के बराबर नहीं है, मैंने अक्सर अपनी आत्मिक यात्रा को संघर्षशील पाया है l यह जानना कितना आरामदायक है कि हम सर्वदा स्वीकार्य हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा हमें यीशु की तरह बनाने में लगा हुआ है l