रस्सा-कशी
हममें से ज़्यादातर लोग रस्साकशी के खेल से परिचित होंगे। इसमें एक लंबी रस्सी होती है और लोगों की दो टीमें रस्सी को दोनों ओर से तब तक खींचती हैं जब तक कि एक टीम दूसरे को बीच की रेखा पर पार न कर ले। इसे और मज़ेदार बनाने के लिए, कभी-कभी बीच में मिट्टी का गड्ढा या ठंडे पानी का टब होता है ताकि हारने वाली टीम उसमें गिर जाए। जीतने के लिए सिर्फ़ शारीरिक ताकत की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए ध्यान, दृढ़ संकल्प और कौशल की भी ज़रूरत होती है।
पौलुस हमें बताता है कि हम रस्साकशी में हैं। लेकिन हम जो खेल मज़े के लिए खेलते हैं, उससे अलग, हमारा संघर्ष “प्रधानों से, और अधिकारियों से, और इस संसार के अंधकार के हाकिमों से और उस दुष्ट की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं” (पद.12)। हम एक आध्यात्मिक रस्साकशी में हैं और हमारे विरोधी हमें हराना चाहते हैं और हमें पाप की गंदगी में गिराना चाहते हैं। पौलुस हमें इस आध्यात्मिक रस्साकशी के लिए “परमेश्वर के सारे हथियार बाँधकर” (पद.13) इस आश्वासन के साथ कि मसीह ने क्रूस पर दुष्ट को पहले ही हरा दिया है, तैयार होने के लिए कहता है । मजबूत बने रहने और जीतने के लिए, हमें मानवीय ताकत या अच्छे इरादों से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है। हमें परमेश्वर का अनुसरण और उस पर निर्भर रहने की ज़रूरत है। जैसा कि पौलुस कहता है, हमें “प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवंत बनना” है (पद.10)।
“शैतान की युक्तियों” और उसके “जलते हुए तीरों” को खुद से संभालना मुश्किल है (पद.11-16)। धन्यवाद हो, हमें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है। हम परमेश्वर द्वारा दी गई ताकत और रणनीति का लाभ उठा सकते हैं (पद.11)। जब हम उसके पास जाते हैं, तो वह हमें “सत्य” का कवच देता है। हमारे पैरों में “शांति का सुसमाचार” फिट होता है। और हम “विश्वास” से सुरक्षित रहते हैं। वास्तव में, उसका वचन हमें आध्यात्मिक रस्साकशी के दौरान दृढ़ रहने में मदद करता है (पद.14-17)। रवि एस. रात्रे
एकजुटता में शक्ति है
मेरी अमेरिकी मित्र कैरल ने 2016 में पहली बार भारत का दौरा किया था। अपनी यात्रा से पहले, उन्होंने इसकी विविध संस्कृतियों, व्यंजनों और भाषाओं के बारे में सुना था। हालाँकि, जब वह बेंगलुरु में एक सम्मेलन में शामिल हुई, तो वह भारत के हर कोने से आए लोगों को उसकी विविध संस्कृतियों और पृष्ठभूमियों के साथ एक प्रेमपूर्ण समुदाय बनाते हुए देखकर चकित रह गई। कैरल ने देखा कि कैसे परमेश्वर ने लोगों को एकजुट किया था।
प्रारंभिक विश्वासियों ने समझा कि एक समुदाय के रूप में एकजुट रहना क्या होता है। लूका लिखता है कि “वे प्रेरितों की शिक्षा पाने और संगति रखने, रोटी तोड़ने, और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (पद.42)। वे अलग-अलग कस्बों, शहरों और पृष्ठभूमियों से आए थे, और फिर भी वे एक साथ रहते थे। कुछ चीजें जो उनके समुदाय को सुंदर बनाती थीं, वे थीं उनकी दैनिक गतिविधियाँ। वे प्रेरितों से सीखने, एक-दूसरे के साथ समय बिताने, प्रभु भोज का जश्न मनाने और एक साथ प्रार्थना करने के लिए प्रतिबद्ध थे (पद.42)। उन्होंने अपने संसाधनों को भी साझा किया और “आनंद और मन की सीधाई से भोजन किया करते थे,” औए इसके मध्य परमेश्वर की स्तुति करते थे (पद.44-46)। परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने हर दिन उनके समुदाय में नए लोगों को जोड़ाता था (पद.47)।
यीशु के आरंभिक अनुयायी हमें समुदाय का एक आदर्श प्रदान करते हैं। उन्होंने गरीबी, सताव और यहाँ तक कि मृत्यु के बीच साझा करने के द्वारा दिखाया कि समुदाय होना क्या होता है। हमें भी हर समय मसीह के द्वारा एकजुट होने के लिए कहा जाता है, न कि केवल चर्च सेवाओं या संगति सभाओं के दौरान और न केवल तब जब हमारे विचार एक जैसे हों। क्योंकि जब हम दुनिया के सामने अपनी मसीह-केंद्रित एकता को दर्शाते हैं, तो परमेश्वर हमारे प्रेम के समुदाय में नए लोगों को लाएगा। —रवि एस. रात्रे
विश्वासयोग्य भण्डारी
मैं 2023 में थोड़े समय के लिए बेंगलुरु आया था। लेकिन मेरा प्रवास अप्रत्याशित रूप से लंबा हो गया। जब मेरे लिए रात का खाना लाने वाला परिवार मेरी और मदद नहीं कर पाया, तो मैंने अपना खाना बाहर से मंगवाना शुरू कर दिया। इससे मेरे स्वास्थ्य पर असर पड़ा। शुक्र है कि एक परिवार जिससे मैं थोड़े समय से परिचित था, आगे आकर कहा कि वे मेरे लिए भोजन लाना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “परमेश्वर ने हमें दूसरों की मदद करने और उनकी सेवा करने की शक्ति दी है और हमें विश्वासयोग्य भण्डारी बनना चाहिए।”
परमेश्वर का वचन विभिन्न संदर्भों में भण्डारी कार्य के बारे में बात करता है और हमसे “विश्वासयोग्य भण्डारी” बनने की अपेक्षा करता है (लूका 12:42-48)। परमेश्वर ने हमें कई वरदान दिए हैं और वह चाहता है कि हम उनका ईमानदारी से उपयोग करें (1 पतरस 4:10)। इन वरदानों का उपयोग करते हुए, हमें दूसरों की सेवा करने की उत्सुकता के साथ प्रेमपूर्ण और अतिथि सत्कार करनेवाला बनने के लिए प्रेरित किया जाता है (पद.8-10)। एक विश्वासयोग्य भण्डारी समझता है कि हमारे पास जो कुछ है वह केवल हमारे लिए नहीं बल्कि दूसरों के लाभ के लिए भी है। बेंगलुरु के परिवार ने मेरे लिए यही किया। उन्होंने अपनी ताकत को पहचाना और उसके अनुसार विश्वासयोग्य भण्डारी के रूप में काम किया।
आइए हम याद रखें कि हमारे पास जो भी क्षमता है, वह परमेश्वर की ओर से है (पद.10)। उसने हमें हमारे वरदान और संसाधन दिए हैं ताकि हम दूसरों के प्रति विश्वासयोग्य भण्डारी बन सकें। इसलिए, आइए हम स्वेच्छा से एक-दूसरे की मदद करें, यह जानते हुए कि परमेश्वर चाहता है कि हम ऐसा करें। आइए हम याद रखें कि हमें जो वरदान दिए गए हैं, और हम जिस अद्वितीय व्यक्ति के रूप में बने हैं, उसका उद्देश्य न केवल हमें बल्कि ज़रूरतमंदों को भी लाभ पहुँचाना है। जब हम परमेश्वर द्वारा दिए गए अपने अनुग्रह और उपहारों के अनुसार दूसरों के लिए अच्छा करते हैं, तो हम उनके विश्वासयोग्य भण्डारी बन जाते हैं। —रवि एस. रात्रे