स्नेपडील नगर
उत्तर प्रदेश के एक गांव ने ऑनलाइन कॉरपोरेशन के सम्मान में अपना नाम बदलकर “स्नेपडील.कॉम नगर” रख लिया, जिसने उनकी मदद की। 2011 से पहले, गांव वालों को पानी लाने के लिए हर दिन कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी। लेकिन ऑनलाइन कंपनी की बदौलत अब उन्हें हैंडपंप के ज़रिए आसानी से साफ पानी मिल रहा है। सी.इ.ओ कुणाल भाल ने कहा कि यह एक अनाम कर्मचारी की वजह से संभव हुआ, जो पास के गांव से आया था। इस कर्मचारी ने ग्रामीणों की दुर्दशा को कॉरपोरेशन के साथ साझा किया और उसके सरल संदेश ने सैकड़ों लोगों के जीवनों में खुशियों भरा बदलाव ला दिया।
बाइबल में एक नबी के क्रांतिकारी कार्यों का वर्णन है। इस नबी ने निर्भीकता से क्रूर राजा अहाब को परमेश्वर का संदेश सुनाया। राजा के लिए उसका संदेश सुखद नहीं था, लेकिन यह सत्य था और उसने परमेश्वर की आज्ञाकारिता में इसे सुनाया (पद.42)। एलिय्याह जैसे अन्य नबी भी थे, जो उसी समय अवधि में रहते थे और भविष्यवाणी करते थे। जबकि उनके नाम और कार्य प्रसिद्ध हैं, इस नबी का नाम नहीं बताया गया है। फिर भी, उसने वह कार्य पूरा किया जो परमेश्वर ने उसके लिए निर्धारित किया था।
स्नैपडील नगर के कर्मचारी की तरह इस अनाम भविष्यवक्ता ने भी सच बोला, भले ही उसने यथास्थिति को चुनौती दी हो। ऐसी दुनिया में जहाँ मान्यता की माँग करना असामान्य नहीं है, हम अपने जीवन के हर पहलू में चुपचाप और बिना किसी दिखावे के परमेश्वर की आज्ञा मानने की कोशिश करें। जब हम परमेश्वर के बच्चों के रूप में अपने रिश्तों, बातों और कार्यों के माध्यम से उसका संदेश प्रसारित करते हैं, तो हम भी बदलाव के साधन बन सकते हैं। अनाम होने के बावजूद, हम अज्ञात नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर हमारे कर्मों को देखता है और वह जानता है कि हम क्या करते हैं, तब भी जब कोई और नहीं जानता (इब्रानियों 6:10)। —रेबेका विजयन
हमारा झंडा मायने रखता है
पिंगली वेंकैया को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मूल डिजाइनर के रूप में श्रेय दिया जाता है। एक दूरदर्शी, जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने से बहुत पहले एक स्वतंत्र देश के रूप में देखा और एक ऐसे ध्वज को देखने का सपना देखा जो भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व करता हो। उन्होंने ए नेशनल फ्लैग फॉर इंडिया नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने विचार के लिए 24 डिज़ाइन पेश किए। इसके बाद वे विजयवाड़ा में महात्मा गांधी से मिले और स्वतंत्रता के क्षितिज पर आने से पहले ही राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी दृढ़ता के कारण, 1947 में भारत की स्वतंत्रता से बहुत पहले, गांधीजी द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधनों के साथ ध्वज को अंतिम रूप दिया गया।
यीशु एक अन्य व्यक्ति की दृढ़ता की बात करते हैं: एक विधवा। लूका 18:1-8 के दृष्टांत में, एक विधवा के हठ ने एक अन्यायी न्यायाधीश को राजी कर लिया, जिसका उसके प्रति न्याय करने का कोई झुकाव नहीं था (पद.5)। इस दृष्टांत में विधवा यीशु के शिष्यों का प्रतिनिधित्व करती है जिनके बारे में यीशु जानते थे कि उन्हें जल्द ही बहुत सताव सहना पड़ेगा (पद.1)। मसीह ने उन्हें बिना आशा छोड़े, ऐसी विपत्ति का सामना करते हुए लगातार प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया, जैसा कि विधवा ने न्यायाधीश से किया था (पद.6)। क्योंकि जहाँ उत्साही और निरंतर प्रार्थना और दृढ़ कार्रवाई होती है, वहाँ परमेश्वर की विश्वासयोग्यता न्याय सुनिश्चित करेगी (पद.8)।
हमारे संसार में सताव और अन्याय बहुत है। हिंसा, घृणा और भ्रष्टाचार के बीच, हमें प्रार्थना में बने रहने के लिए कहा गया है। क्योंकि जब हम बने रहते हैं, तो हमारा स्वर्गीय न्यायाधीश हमें न्याय देने का वादा करता है। जैसा कि यीशु ने हमें सिखाया, आइए प्रार्थना करें, “तेरा राज्य आए, तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 7:10)। जब वह वापस आए तो हम प्रार्थना में विश्वासयोग्य पाए जाएँ (लूका 18:8)। —रेबेका विजयन
हीरे का पेपर वेट
“जेकब डायमंड” को दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा हीरा माना जाता है। यह एक रंगहीन हीरा है, जिसके विषय ऐसा कहा जाता है कि यह रत्न कई सालों तक खो गया था और भुला दिया गया था जब तक कि हैदराबाद के आखिरी निज़ाम को यह अपने दिवंगत पिता के जूते में नहीं मिला। अजीब बात यह है कि निज़ाम ने इस दुर्लभ खजाने को कई सालों तक एक पेपर वेट के रूप में इस्तेमाल किया जब तक कि इसे भारतीय रिजर्व बैंक ने 108 करोड़ रूपए की अद्भुत् कीमत पर संरक्षित कर लिया। उनके पिता ने अपने जूते में छोड़े गए हीरे से निज़ाम का जीवन समृद्ध कर दिया l
प्रेरित पौलुस कुरिन्थुस की कलीसिया का ध्यान यीशु की ओर आकर्षित करता है: सबसे मूल्यवान खजाना उन्हें हमारे परमेश्वर, पिता द्वारा दिया गया था (पद.4)। पौलुस लिखता है कि कुरिन्थियों को यीशु के साथ उसकी आत्मा के द्वारा जो संगति मिली थी, उसके कारण वे “समृद्ध” हुए हैं (पद.5-9)। वह उन्हें इस अमूल्य उपहार को महत्व देने का आग्रह करता है, जो कि मसीह है। वह उन्हें यह भी याद दिलाता है कि जब उनके पास मसीह होता है, तो उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होती। इसके अलावा, पौलुस कलीसिया से आग्रह करता है कि वे उन अनेक “आध्यात्मिक वरदानों” पर विचार करें जो परमेश्वर ने उन्हें दिए हैं (पद.5-7)। उसका मानना है कि जब कलीसिया इस खजाने की रक्षा करती है, जो कि मसीह है, तो यह उन्हें उसके लौटने के दिन तक निर्दोष बने रहने में मदद करेगा।
जब हम जीवन से असंतुष्ट महसूस करते हैं, खासकर जब हम अपनी कमी के बारे में कुड़कुड़ाते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि हम आंतरिक रूप से समृद्ध हैं क्योंकि हमारे पास यीशु है। हानि, वित्तीय उथल-पुथल, घरेलू संकट या किसी अन्य अशांति के दौरान, हमें याद रखना चाहिए कि हम भी अपने पिता द्वारा हर तरह से वास्तव में “समृद्ध” हैं। उसने पवित्र आत्मा की स्थायी उपस्थिति के द्वारा मसीह के खजाने को हमारे अंदर निवेश किया है (2 कुरिन्थियों 1:22)। —रेबेका विजयन
आक्रामक यूकेलिप्टस
नीलगिरी के पहाड़ों पर चढ़ते समय यूकेलिप्टस की सुखदायक खुशबू आपके होश उड़ा देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यूकेलिप्टस इन पहाड़ियों का मूल निवासी नहीं है? यह एक आक्रामक प्रजाति है जिसे औपनिवेशिक काल(colonial times) के दौरान अंग्रेजी व्यापारियों के लिए गर्मियों के महीनों को सहने योग्य बनाने के लिए लगाया गया था। एक प्रतीत होता है कि निर्दोष कार्य अब पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव डालता है, क्योंकि जानवर इसके जहरीले पत्ते नहीं खा सकते हैं। चारे की तलाश में, ये जानवर खेतों और फसलों पर हमला करते हैं, और क्रोधित किसान जानवरों पर हमला करते हैं। हालाँकि अब पौधों की देशी प्रजातियों को फिर से लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं, फिर भी पुरानी गलतियाँ अभी भी विनाशकारी परिणाम देती हैं।
गलातिया की कलीसिया के लेखक ने उन्हें शरीर की संतुष्टि के खिलाफ चेतावनी दी है (पद.16)। वह शरीर की इच्छाओं को व्यभिचार, गंदे काम, लुचपन, मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध फूट, विधर्म, डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा के रूप में परिभाषित करता है (पद.19-21)। एक आक्रामक प्रजाति की तरह, ये हानिरहित प्रतीत होने वाले पाप जड़ पकड़ लेते हैं और अंततः हमें बहुत नुकसान पहुँचाते हैं। फिर भी, लेखक हमें आश्वस्त करता है कि यदि हम “आत्मा के चलाए [चलेंगे]” तो हम जीत सकते हैं (पद.18)। तब हम प्रेम, आनन्द, शांति, धीरज, कृपा, भलाई और विश्वास के फल प्राप्त करेंगे (पद.22-23)।
जब आप पाप के आक्रामक प्रभावों का सामना करते हैं, तो याद रखें कि हमारे पास आशा है। यीशु ने हमें जो आत्मा भेजी है, वह हमें सही मार्ग पर चलने में मदद करने में सक्षम है (2 कुरिन्थियों 5:5)। यह पहले मुश्किल हो सकता है क्योंकि शरीर और आत्मा हमेशा एक दूसरे के विरोधी हैं (पद.17), लेकिन यीशु में हम पाप के आक्रमण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। —रेबेका विजयन
डोनावुर में प्रेम
“अम्मा,” तमिल में माँ के लिए उपयोग होने वाला शब्द, एमी कारमाइकल की कब्र के पास एक पक्षी स्नानघर पर उकेरा गया है। तमिलनाडु के डोहनावुर में उनका मिशन स्कूल, मंदिर वेश्यावृत्ति में फंसी हज़ारों लड़कियों के लिए एक शरणस्थली बन गया। ऐसा कहा जाता है कि अपने शुरुआती वर्षों में, कई रातें वह साड़ी धारण करके, साइकिल चलाकर, सिर्फ़ एक छोटी लड़की को बचाने के लिए ढूंढती थी l 1931 में गिरने की एक गंभीर घटना के बाद जब वह बिस्तर पर ही सीमित हो गईं, तब भी उन्होंने दूसरों के ज़रिए इन बच्चों को बचाना जारी रखा। उन्होंने कई पत्र और किताबें लिखीं, जिनसे काम चलता रहा और स्कूल को वित्तीय सहायता मिली। जब बच्चों से पूछा गया कि उन्हें एमी की ओर क्या आकर्षित करता है, तो उन्होंने बस इतना कहा, “यह प्यार था। अम्मा हमसे प्यार करती थीं।”
कभी-कभी हमें याद दिलाने की ज़रूरत होती है कि प्यार सभी गुणों की जननी है। सच्चे प्यार का अनुभव मसीह में किया जा सकता है, क्योंकि वह प्यार का वास्तविक देह धारित रूप है (पद.8)। मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में और उसके ज़रिए, हमारे लिए सच्चे प्यार का प्रदर्शन है। यीशु का प्यार शर्त के साथ नहीं था। उसने अयोग्य लोगों से भी प्रेम किया (पद.11)। जब हम प्रेम को उस तरह से देखते हैं जिस तरह से परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, तो यह इसे प्रकट करने के तरीके के बारे में हमारा दृष्टिकोण बदल देता है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि जब तक हम यीशु की तरह प्रेम नहीं करते हैं, हम परमेश्वर को सही मायने में नहीं जान सकते हैं (पद.7-8)।
पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर की स्वरूप में बनाया गया है (उत्पत्ति 1:27) और हम जिस किसी से भी मिलते हैं, उसे प्रेम की आवश्यकता होती है। हम, परमेश्वर की संतान के रूप में, उन लोगों को सच्चे, बेदाग प्रेम का अर्थ दिखाने के लिए सबसे अच्छी जगह पर हैं जो इसके लिए भूखे हैं। एमी की तरह जो डोहनावुर की दासी लड़कियों के लिए प्रेम की प्रतिमूर्ति बन गई, हम भी अपने हर कार्य, शब्द और कर्म में यीशु के वास्तविक प्रेम को मूर्त रूप दें सके। —रेबेका विजयन
सही प्रतिक्रिया दें
गौरव अपनी आँखों पर भरोसा नहीं कर पा रहा था, “क्यों वे इस सफ़ेद पोशाक वाले अच्छे अंकल को पीट रहे थे,” उसने सोचा, जब उसने यीशु जैसे वस्त्र पहने एक व्यक्ति को सड़कों पर ले जाते हुए देखा, जिसके शरीर से नकली खून टपक रहा था और सैनिकों की पोशाक पहने हुए लोग उसे कोड़े मार रहे थे। यह एक चर्च का गुड फ्राइडे जुलूस था। लेकिन गौरव के लिए यह दृश्य बहुत वास्तविक था। गौरव डाउन सिंड्रोम(Down Syndrome-एक बीमारी) से पीड़ित था, और उसकी स्थिति ने उसे बाकी लोगों की तुलना में अधिक चिंतित और दयालु बना दिया था। अपनी माँ की साड़ी में अपना चेहरा छिपाते हुए, उसका हृदय करुणा से भर गया, और वह रोते हुए बोला, “मम्मी, कृपया उन्हें ऐसा करने से रोकें!”
हमें गौरव की तरह दयालु बनने के लिए कहा जाता है। जबकि कुछ लोगों के अन्दर करुणा आसानी से आ सकती है, हममें से बाकी लोगों को इसके लिए मेहनत करना चाहिए। कुलुस्से की कलीसिया को अपने पुराने जीवन के तरीके से “छुटकारा” पाने के लिए दृढ़ता से आग्रह किया गया था। गंदे और मैले कपड़े को उतार के फेंकने की तरह, उन्हें अपने सांसारिक स्वभाव को त्यागने के लिए कहा गया था, जिसमें क्रोध, रोष, बैरभाव, निंदा और मुँह से गालियाँ बकना” शामिल है (पद.8)। इसकी जगह, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और सहनशीलता (पद.12) के गुणों को धारण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जो उनके सृष्टिकर्ता को दर्शाते हैं जो “अनुग्रहकारी और दयालु” है (भजन संहिता 145:8)। आज के संसार में करुणा, अनुग्रह, नम्रता और दयालुता को अक्सर कमज़ोरी माना जाता है। फिर भी दूसरों को हममें यही देखना और अनुभव करना चाहिए (पद.12)। सहकर्मियों, पड़ोसियों, दोस्तों और परिवार के साथ हमारे दैनिक व्यवहार में, इन गुणों के साथ प्रतिक्रिया करना हमेशा आसान नहीं होता है। लेकिन हमें परिस्थितियों के बावजूद सही प्रतिक्रिया करने का जानबूझकर संकल्प लेना चाहिए, क्योंकि इस तरह संसार को पता चलेगा कि हम मसीह के शिष्य हैं। —रेबेका विजयन
हमारी आत्माओं को बचा लीजिए
तमिल संस्कृति में पत्तियाँ और पौधे विशेष रूप से उत्सवों के दौरान बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेहमानों के स्वागत के लिए विवाह स्थलों के प्रवेश द्वार पर टिमटिमाती रोशनी से लदे केले के पेड़ लगाए जाते हैं। आम के पत्तों को आपस में जोड़कर दरवाजों को सजाया जाता है। केले के पत्तों का उपयोग रंगीन, विभिन्न प्रकार का भोजन परोसने के लिए प्लेट के रूप में किया जाता है। और नारियल के पत्तों का उपयोग सजावट के रूप में किया जाता है।
यहूदा में भी, ऐसा लगता है कि पत्तियों ने उनके उत्सव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब यीशु गधे पर सवार होकर यरूशलेम में दाखिल हुआ, तो फसह का पर्व चल रहा था। यह वह समय था जब दुनिया भर के यहूदी मिस्र से मिले छुटकारे का जश्न मनाने के लिए एकत्र होते थे। उत्सव और एकता के संकेत के रूप में खजूर की पत्तियों का उपयोग करना एक परंपरा थी। रोम के कठोर शासन के नीचे, यहूदी एक मसीह(Messiah) की लालसा रखते थे जो उन्हें एक बार फिर से बचाएगा जैसे मूसा ने बहुत पहले किया था। इसलिए, जब नासरत का आश्चर्यकर्म करनेवाला यीशु गधे पर सवार होकर आया, तो इसने आशा को प्रज्वलित किया (पद.37)। भीड़ खजूर की डालियाँ लेकर, लहराते हुए और “होसन्ना!” चिल्लाती हुई निकली l जिसका अर्थ है “हमें बचाओ” (मत्ती 21:8-9)। परमेश्वर ने सचमुच अपने पुत्र, आत्माओं के उद्धारकर्ता के द्वारा उनकी ‘आत्माओं को बचाने’ की इच्छा पूरी की।
हम अक्सर इस बात से अनजान होते हैं कि हमें किससे बचाये जाने की ज़रूरत है। हम सोच सकते हैं कि अगर हमारी वित्तीय, शारीरिक या भावनात्मक समस्याएँ हल हो जाती हैं, तो हम बच जाते हैं। लेकिन हमें जिस वास्तविक बचाव की ज़रूरत है, वह हमारी आत्माओं का है। यीशु हमें अपनी बचाने वाली सामर्थ्य और प्रेम दिखाने के लिए मनुष्य रूप में आया (लूका 19:10)। उन्होंने क्रूस पर अपने बलिदान के द्वारा हमारी आत्मा को बचाया, ताकि हमारे माध्यम से, वह दूसरों की आत्माओं को बचा सकें जिन्हें उद्धारकर्ता की ज़रूरत है। —रेबेका विजयन
तैरता हुआ डाक-घर
क्या आपने कभी तैरता हुआ डाकघर देखा है? अगर नहीं देखा है, तो आप जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर जा सकते हैं। बर्फ से ढके हिमालय की पृष्ठभूमि में डल झील पर एक अनोखा “तैरता हुआ” डाकघर है जो वाकई अपनी तरह का अनूठा है। हालाँकि यह झील पर अकेला तैरता है, लेकिन यह वास्तव में अकेला नहीं है। यह भारतीय डाक सेवा के व्यापक नेटवर्क का हिस्सा है, जिसके देश भर में 1.5 लाख से ज़्यादा दफ़्तर हैं और यह दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क है।
कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखते हुए, प्रेरित पौलुस उसके सदस्यों से आग्रह करता है कि वे खुद को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि विश्वासियों के समुदाय के सदस्यों के रूप में सोचें। वह उन्हें अपने आध्यात्मिक वरदानों में विविधता को महत्व देने के लिए प्रोत्साहित करता है और उनसे इन अंतरों की सुंदरता को अपनाने के लिए विनती करता है (पद.4-5)। पौलुस चर्च को यह एहसास कराने में मदद करता है कि ये अंतर पवित्र आत्मा की एकजुट करने वाली सामर्थ्य (पद. 7) के कारण अच्छे हैं, जो हर एक का इस्तेमाल अपनी मर्ज़ी से करता है। अंत में, वह उन्हें समझाता है कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक नेटवर्क का हिस्सा हैं। और व्यक्तिगत लाभ की तलाश करने के बजाय, प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के लाभ के लिए अपने वरदान का उपयोग करना चाहिए।
ऐसे संसार में जहाँ खुद को दूसरों से आगे रखना सामान्य माना जाता है, हमें जीवन के प्रति एक अलग दृष्टिकोण अपनाने के लिए कहा जाता है। हमें एक साथ काम करने के लिए कहा जाता है, यह महसूस करते हुए कि हमारे मतभेदों के बावजूद हम एक व्यापक समूह का हिस्सा हैं, अर्थात् परमेश्वर की कलीसिया। तैरते हुए डाकघर की तरह, हमारे वरदान, प्रतिभाएँ और योग्यताएँ अद्वितीय हैं। और जब उनका उपयोग पवित्र आत्मा की शक्ति के तहत किया जाता है, तो वे परमेश्वर के राज्य का निर्माण करने के लिए शक्तिशाली साधन बन सकते हैं। —रेबेका विजयन
इन्डिया मैन
50 और 60 के दशक में, ओवरलैंड बस मार्ग, ‘द हिप्पी ट्रेल’ ने यूरोप को एशिया के अनोखे स्थलों से जोड़ा। एक सेवानिवृत्त अंग्रेज़ सैन्यकर्मी जिसका उपनाम “पैडी” था, ने इस मार्ग पर बस चलाकर भारत की अपनी लगातार यात्राओं का अधिकतम लाभ उठाने का फैसला किया। ‘द इंडियामैन’ नामक बस लंदन से कलकत्ता और फिर लंदन तक चलती थी। यात्रा की शुरुआत में, यात्री उत्साह से बस में चढ़ते थे, लेकिन 60 दिनों के अंत में वे अकड़ती गर्दन और चरमराते घुटनों के साथ उतरते थे। पूरी तरह से थके हुए, वे आमतौर पर अगली बस से घर वापस जाने के लिए पूरी तरह तैयार रहते थे।
एलिय्याह एक उत्साही भविष्यवक्ता था। अपनी भविष्यसूचक यात्रा की शुरुआत में, वह अत्यधिक उत्तेजित था। उसने किसी भी कीमत पर परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया और दुष्ट राजा अहाब या उसकी रानी, ईज़ेबेल का सामना करने में संकोच नहीं किया। हालाँकि, थोड़ी देर बाद, एलिय्याह इसे और सहन नहीं कर सका। आखिरी समस्या तब थी जब ईज़ेबेल ने उसके भविष्यवक्ताओं को मारने के लिए उसकी(एलिय्याह) जान को खतरे में डाल दिया (पद.2)। भावनात्मक और शारीरिक रूप से थके हुए, उसने प्रार्थना की, “बस है; अब मेरा प्राण ले ले” (पद. 4)। जब वह थका हुआ एक पेड़ के नीचे सो रहा था, तो परमेश्वर ने उसे प्यार से प्रोत्साहित करने और खिलाने के लिए एक स्वर्गदूत भेजा (पद.5-7)। एक बार फिर से मजबूत होकर, एलिय्याह कई दिनों तक होरेब तक चला (पद.8)। शायद आप एलिय्याह और ‘द इंडियामैन’ के यात्रियों की थकान को समझ सकते हैं। निराशा, असफलता, हानि और दुःख के उतार-चढ़ाव से हम थक जाते हैं और ऊर्जाहीन हो जाते हैं। लेकिन निराशा के अपने सबसे गहरे क्षणों में, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम परमेश्वर से छिपे नहीं हैं। वह हमारी ज़रूरतों को जानता और समझता है, और उसकी मदद दूर नहीं है। —रेबेका विजयन