हमारी प्रतिदिन की रोटी

शांत जीवन जीना

आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं? हम सभी ने इस प्रश्न को बच्चों के रूप में और कभी-कभी व्यस्क के रूप में भी सुना है l प्रश्न जिज्ञासा में उत्पन्न हुआ है, और उत्तर अक्सर महत्वकांक्षा के संकेत के रूप में सुना जाता है l मेरे जवाब वर्षों के दौरान आकार लेते गए, जो एक चरवाहा के रूप में शुरू हुआ, उसके बाद एक ट्रक ड्राईवर, उसके बाद एक सैनिक और मैं कॉलेज में प्रवेश करके एक डॉक्टर बनने की ओर बढ़ा l हालाँकि, मैं एक बार भी याद नहीं कर सकता कि किसी ने सुझाव दिया था या मैंने जानबूझकर “शांत जीवन” का पीछा किया था l

फिर भी पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को यही बताया l पहले, उसने उनसे एक दूसरे से और परमेश्वर के सम्पूर्ण परिवार से और अधिक प्रेम करने का निवेदन किया (1 थिस्सलुनीकियों 4:10) l फिर उसने उन्हें एक सामान्य नसीहत दी जिसमें उनके हाथों द्वारा कोई भी  विशिष्ट काम सम्मिलित होगा l “चुपचाप रहने . . . का प्रयत्न करो” (पद.11) l अब पौलुस का वास्तव में क्या मतलब था? उसने स्पष्ट किया : “[तुम] अपना-अपना काम काज करने और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो” ताकि बाहरवाले तुम्हें आदर दें और तुम किसी के लिए बोझ न बनो (पद.11-12) l हम बच्चों को उनके गुण या जुनून का पीछा करने में हतोत्साहित नहीं करना चाहते हैं, लेकिन शायद हम उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं कि वे जो कुछ भी करना चाहते हैं, वे शांत भाव से करें l

जिस संसार में हम निवास करते हैं, महत्वकांक्षी और शांत शब्द इससे और अधिक अलग प्रतीत नहीं हो सकते थे l लेकिन वचन हमेशा प्रासंगिक हैं, इसलिए शायद हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि शांत जीवन जीना में कैसा महसूस हो सकता है?

हेस्टैक प्रार्थना

सैमुएल मिल्स और उसके चार मित्र अक्सर यीशु का सुसमाचार साझा करने के लिए और लोगों को भेजने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए इकठ्ठा होते थे l 1806 में एक दिन, अपनी प्रार्थना सभा से लौटने के बाद, वे एक आंधी में फंस गए और भूसा के एक ढेर(Haystack) में शरण लिए l उनकी साप्ताहिक प्रार्थना सभा हेस्टैक प्रार्थना सभा के रूप में प्रसिद्ध हुयी, जो वैश्विक मिशन आन्दोलन में परिणित हुयी l 

आज अमेरिका में विलियम्स कॉलेज में स्थित हेस्टैक प्रार्थना स्मारक याद दिलाता है कि परमेश्वर प्रार्थना के माध्यम से क्या कर सकता है l

हमारे स्वर्गिक पिता को ख़ुशी होती है जब उसके बच्चे एक समान अनुरोध के साथ उसके पास आते हैं l या एक पारिवारिक सभा कि तरह है जहाँ वे एक संयुक्त बोझ साझा करने के उद्देश्य से इकठ्ठा होते हैं l

प्रेरित पौलुस स्वीकार करता है कि गंभीर पीड़ा के समय में परमेश्वर ने दूसरों की प्रार्थनाओं के द्वारा उसकी कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे” (2 कुरिन्थियों 1:10-11) l परमेश्वर ने संसार में अपने काम को पूरा करने के लिए हमारी परर्थ्नाओं का – विशेषकर हमारी प्रार्थनाओं को एक साथ – उपयोग करने का चुनाव किया है : “तब बहुत लोग धन्यवाद देंगे . . . बहुतों की प्रार्थना के उत्तर [के लिए] l”

आइये हम एक साथ प्रार्थना करें ताकि हम भी परमेश्वर की भलाई में आनंदित हो सकें l हमारा प्रेमी पिता हमारे आने का इंतज़ार कर रहा है ताकि वह हमारे द्वारा उन तरीकों से काम कर सके जो हमारी कल्पना से परे किसी भी चीज़ से बहुत दूर पहुँच सकता है l

गीत से मजबूती मिली

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब फ़्रांसीसी ग्रामीणों ने यहूदी शरणार्थियों को नाज़ियो(Nazi) से छिपने में मदद की, कुछ लोगों ने अपने शहर के चारोंओर घने जंगल में गीत गाए – और इस प्रकार शरणार्थियों को सूचित किया कि छिपने के स्थान से बाहर निकलना सुरक्षित था l ली-शोमबॉन-शु-लिंग्यु(Le Chambon-sur-Lignon) शहर के बहादुर लोगों ने स्थानीय पासवान आंद्रे ट्रोक्मी और उनकी पत्नी, मैग्डा का युद्ध के समय यहूदियों को उनके “ला मोंटेगने प्रोतेसतान्ते (La Montagne Protestante) नामक असुरक्षित पठार पर शरण देने के आह्वान का उत्तर दिया था l उनका संगीतमय संकेत ग्रामीणों की बहादुरी का केवल एक चिन्ह बन गया जिसने 3,000 यहूदियों तक को लगभग निश्चित मृत्यु से बचाने में सहायता की l

एक और खतरनाक समय में, दाऊद ने गीत गाया जब उसके शत्रु शाऊल ने उसके घर पर रात्रिकालीन हत्यारे भेजे l संगीत का उसका उपयोग एक संकेत नहीं था; बल्कि, वह परमेश्वर के प्रति जो जसका शरणस्थान था एक गीत था l दाऊद आनंदित हुआ, “मैं तेरी सामर्थ्य का यश गाऊंगा, और भोर को तेरी करुणा का जयजयकार करूंगा l क्योंकि तू मेरा ऊंचा गढ़ है, और संकट के समय मेरा शरणस्थान ठहरा है” (भजन 59:16) l

इस प्रकार का गीत गाना खतरे के समय “बहादुरी का अभिनय” नहीं था l इसके बदले, दाऊद का गीत गाना सर्वशक्तिमान परमेश्वर में उसके भरोसे को प्रगट करना था l “हे मेरे बल, मैं तेरा भजन गाऊंगा, क्योंकि हे परमेश्वर, तू मेरा ऊंचा गढ़ और मेरा करुणामय परमेश्वर है” (पद.17) l

दाऊद की प्रशंसा, और ली-शोमबॉन(Le Chambon) में ग्रामीणों का गीत गाना, आज हमें परमेश्वर को धन्य कहने, जीवन की चिंताओं के बावजूद उसकी प्रशंसा करने के लिए निमंत्रण देता है l उसकी प्रेमी उपस्थिति अनुकूल होगी और हमारे हृदयों को सामर्थ्य मिलेगी l





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