एक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि हमारे मेनेजर की वजह से उसका प्रार्थना जीवन बेहतर हुआ है l मैं यह सोचकर प्रभावित हुयी कि हमारे कठिन अगुआ ने उसके साथ कुछ आध्यात्मिक बातें साझा की थीं और उसके प्रार्थना करने के तरीके को प्रभावित किया था l मैं गलत थी—कुछ इस तरह l मेरे सहकर्मी और सहेली ने समझाया : “हर बार जब मैं उसे आते हुए देखती हूँ, तो प्रार्थना करना शुरू कर देती हूँ l” उसके प्रार्थना करने के समय में सुधार हुआ था क्योंकि वह उसके साथ प्रत्येक बातचीत से पहले अधिक प्रार्थना करती थी l वह जानती थी कि उसके अपने प्रबंधक के साथ चुनौतीपूर्ण कार्य संबंधों में परमेश्वर की मदद चाहिए और इसलिए उसने उसे अधिक पुकारा l

कठिन समय और बातचीत के दौरान प्रार्थना करने की मेरी सहकर्मी का अभ्यास कुछ ऐसी है जिसे मैंने अपनाया है l यह 1 थिस्सलुनीकियों में पायी जाने वाली एक बाइबल अभ्यास भी है जब पौलुस यीशु में विश्वासियों को “निरंतर प्रार्थना करने” और “हर बात में धन्यवाद” करने की याद दिलाता है (1 थिस्सलुनीकियों 5:13) l चाहे हम किसी भी परिस्थिति का सामना करें, प्रार्थना हमेशा सर्वोत्तम अभ्यास है l यह हमें परमेश्वर से जोड़े रखता है और उसकी आत्मा को हमें निर्देशित करने के लिए आमंत्रित करता है (गलातियों 5:16) बजाय इसके कि हम अपनी मानवीय प्रवृत्तियों पर निर्भर रहें l यह हमें संघर्षों का सामना करने पर भी “आपस मैं मेलमिलाप से [रहने]” में मदद करता है (1 थिस्सलुनीकियों 5:13) l

जब परमेश्वर हमारी सहायता करता है, हम उसमें आनंदित हो सकते हैं, हर चीज़ के लिए प्रार्थना कर सकते हैं और अक्सर धन्वाद दे सकते हैं l और वे चीज़ें और भाइयों और बहनों के साथ और भी अधिक सद्भाव में रहने में मदर करेंगी l केटारा पैटन