संडे स्कूल में भाग लेने के बाद, मैं घर जाने के लिए बस में चढ़ी। पीछे एक आदमी बैठा था जिसे मैंने दक्षिण भारत के एक प्रमुख कॉलेज के नए निदेशक के रूप में पहचाना। मैं उन्हें कॉलेज और स्कूल के विद्यार्थियों के बस में देखकर हैरान थी। उनके पद के ज़्यादातर लोगों के पास एक अलग कार और ड्राइवर होता है। इसलिए, मैंने उनसे पूछा, “आप बस से जा रहे हैं और कार में क्यों नहीं?” उन्होंने उत्तर दिया, “क्योंकि मैं हमेशा बस से यात्रा करता हैं।” उनके नए पद ने उनके सामान्य व्यवहार को नहीं बदला था। उन्होंने अपने पद के कारण खुद को हकदार महसूस नहीं होने दिया।
फिलिप्पी में चर्च को लिखे पत्र में, पौलुस विश्वासियों से विनम्र होने के लिए कहता है (पद.3)। वह कहता है कि उन्हें विरोध” या “झूठी बड़ाई”(पद 3) के साथ कुछ भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, एक-दूसरे के साथ अपने रिश्तों में, उन्हें “मसीह यीशु का स्वभाव” रखना चाहिए (पद.5)। यीशु के पास सर्वोच्च पद है। वह “परमेश्वर के स्वरूप में” था, फिर भी उसने “परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा”(पद.6)। उसने जो कुछ भी उसका अधिकार था, उसे अलग रख दिया और हमारे हितों का ध्यान रखा। उसने “दास का स्वरूप” धारण किया, और अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, मृत्यु भी सह ली(पद.7-8) l
जब हमें लगता है कि हम अपनी नौकरी, शिक्षा, उम्र या समाज में स्थिति के कारण एक निश्चित तरीके से व्यवहार किए जाने के लायक हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यीशु ने हमें दिखाया कि हमें अपनी उपाधियों और अधिकार की भावना को कैसे अलग रखना चाहिए। हालाँकि यह मुश्किल है, लेकिन हमें अपने फायदे के लिए जो कुछ भी हमारा है उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हुए साथी मनुष्यों के प्रति विनम्र होने की मानसिकता अपनानी चाहिए। ऍन हरिकीर्तन
आप किस तरह से हकदार महसूस करते हैं?
आप अपने जीवन में यीशु की विनम्रता का उदाहरण कैसे दे सकते हैं?
यीशु, मेरे मन को बदल दें ताकि मैं आपके प्रति विनम्र और आज्ञाकारी
बनूँ ताकि दूसरे लोग मेरे द्वारा आपको देख सकें।
