50 और 60 के दशक में, ओवरलैंड बस मार्ग, ‘द हिप्पी ट्रेल’ ने यूरोप को एशिया के अनोखे स्थलों से जोड़ा। एक सेवानिवृत्त अंग्रेज़ सैन्यकर्मी जिसका उपनाम “पैडी” था, ने इस मार्ग पर बस चलाकर भारत की अपनी लगातार यात्राओं का अधिकतम लाभ उठाने का फैसला किया। ‘द इंडियामैन’ नामक बस लंदन से कलकत्ता और फिर लंदन तक चलती थी। यात्रा की शुरुआत में, यात्री उत्साह से बस में चढ़ते थे, लेकिन 60 दिनों के अंत में वे अकड़ती गर्दन और चरमराते घुटनों के साथ उतरते थे। पूरी तरह से थके हुए, वे आमतौर पर अगली बस से घर वापस जाने के लिए पूरी तरह तैयार रहते थे।

एलिय्याह एक उत्साही भविष्यवक्ता था। अपनी भविष्यसूचक यात्रा की शुरुआत में, वह अत्यधिक उत्तेजित था। उसने किसी भी कीमत पर परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया और दुष्ट राजा अहाब या उसकी रानी, ईज़ेबेल का सामना करने में संकोच नहीं किया। हालाँकि, थोड़ी देर बाद, एलिय्याह इसे और सहन नहीं कर सका। आखिरी समस्या तब थी जब ईज़ेबेल ने उसके भविष्यवक्ताओं को मारने के लिए उसकी(एलिय्याह) जान को खतरे में डाल दिया (पद.2)। भावनात्मक और शारीरिक रूप से थके हुए, उसने प्रार्थना की, “बस है; अब मेरा प्राण ले ले” (पद. 4)। जब वह थका हुआ एक पेड़ के नीचे सो रहा था, तो परमेश्वर ने उसे प्यार से प्रोत्साहित करने और खिलाने के लिए एक स्वर्गदूत भेजा (पद.5-7)। एक बार फिर से मजबूत होकर, एलिय्याह कई दिनों तक होरेब तक चला (पद.8)। शायद आप एलिय्याह और ‘द इंडियामैन’ के यात्रियों की थकान को समझ सकते हैं। निराशा, असफलता, हानि और दुःख के उतार-चढ़ाव से हम थक जाते हैं और ऊर्जाहीन हो जाते हैं। लेकिन निराशा के अपने सबसे गहरे क्षणों में, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम परमेश्वर से छिपे नहीं हैं। वह हमारी ज़रूरतों को जानता और समझता है, और उसकी मदद दूर नहीं है। —रेबेका विजयन