मेरी अमेरिकी मित्र कैरल ने 2016 में पहली बार भारत का दौरा किया था। अपनी यात्रा से पहले, उन्होंने इसकी विविध संस्कृतियों, व्यंजनों और भाषाओं के बारे में सुना था। हालाँकि, जब वह बेंगलुरु में एक सम्मेलन में शामिल हुई, तो वह भारत के हर कोने से आए लोगों को उसकी विविध संस्कृतियों और पृष्ठभूमियों के साथ एक प्रेमपूर्ण समुदाय बनाते हुए देखकर चकित रह गई। कैरल ने देखा कि कैसे परमेश्वर ने लोगों को एकजुट किया था।

प्रारंभिक विश्वासियों ने समझा कि एक समुदाय के रूप में एकजुट रहना क्या होता है। लूका लिखता है कि “वे प्रेरितों की शिक्षा पाने और संगति रखने, रोटी तोड़ने, और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (पद.42)। वे अलग-अलग कस्बों, शहरों और पृष्ठभूमियों से आए थे, और फिर भी वे एक साथ रहते थे। कुछ चीजें जो उनके समुदाय को सुंदर बनाती थीं, वे थीं उनकी दैनिक गतिविधियाँ। वे प्रेरितों से सीखने, एक-दूसरे के साथ समय बिताने, प्रभु भोज का जश्न मनाने और एक साथ प्रार्थना करने के लिए प्रतिबद्ध थे (पद.42)। उन्होंने अपने संसाधनों को भी साझा किया और “आनंद और मन की सीधाई से भोजन किया करते थे,” औए इसके मध्य परमेश्वर की स्तुति करते थे (पद.44-46)। परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने हर दिन उनके समुदाय में नए लोगों को जोड़ाता था (पद.47)।

यीशु के आरंभिक अनुयायी हमें समुदाय का एक आदर्श प्रदान करते हैं। उन्होंने गरीबी, सताव और यहाँ तक कि मृत्यु के बीच साझा करने के द्वारा दिखाया कि समुदाय होना क्या होता है। हमें भी हर समय मसीह के द्वारा एकजुट होने के लिए कहा जाता है, न कि केवल चर्च सेवाओं या संगति सभाओं के दौरान और न केवल तब जब हमारे विचार एक जैसे हों। क्योंकि जब हम दुनिया के सामने अपनी मसीह-केंद्रित एकता को दर्शाते हैं, तो परमेश्वर हमारे प्रेम के समुदाय में नए लोगों को लाएगा। —रवि एस. रात्रे