मेरे दो मित्र और मैं हमेशा से एक पहाड़ी रास्ते से पैदल यात्रा करना चाहते थे l आरम्भ करने से पूर्व, हमें आश्चर्य हुआ कि क्या हमारे पास पर्याप्त पानी था क्योंकि हमने अपनी पदयात्रा आरम्भ की थी, और पानी तेजी से खत्म हो गया l हमारे पास पानी नहीं बचा था और किनारे तक पहुँचने के लिए अभी भी कोई रास्ता नहीं बचा था l हाँफते हुए, प्रार्थना करते हुए, चलते गए l फिर हमने एक कोने का चक्कर लगाया और एक चमत्कार घटित हुआ l हमने चट्टान की एक दरार में तीन पानी कि बोतलें दबी हुयी देखीं, जिस पर लिखा था: जानता था कि आपको इसकी ज़रूरत होगी l आनंद लें!” हमें अविश्वास से एक-दूसरे को देखा, परमेश्वर को धन्यवाद कहा, कुछ बेहद ज़रूरी घूँट पीये और फिर आखिरी पड़ाव पर निकल पड़े l मैं अपने जीवन में इतना प्यासा और आभारी कभी नहीं हुआ l

भजन संहिताकार के पास पहाड़ी यात्रा का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन यह स्पष्ट है कि वह जानता था कि प्यास लगने पर और संभवतः डर लगने पर हरिणी कैसे व्यवहार करती है l हरिणी “हाँफती” है (भजन संहिता 42:1), एक ऐसा शब्द जो प्यास और भूख को मन में लाता है, इस हद तक कि अगर कुछ नहीं बदलता है, तो आप डरते हैं कि आप मर सकते हैं l भजन संहिताकार ने हरिणी की प्यास की डिग्री को परमेश्वर के लिए उसकी इच्छा के बराबर बताया है: “वैसे ही, हे परमेश्वर, मैं तेरे लिए हाँफता हूँ” (पद.1) l

अति-आवश्यक जल की तरह, परमेश्वर सदैव उपस्थित रहने वाला सहायता है l हम उसके लिए हाँफते हैं क्योंकि वह हमारे थके हुए जीवन में नयी ताकत और ताज़गी लाता है, हमें दिन भर की तैयारी के लिए सुसज्जित करता है l जॉन ब्लेस