हममें से ज़्यादातर लोग रस्साकशी के खेल से परिचित होंगे। इसमें एक लंबी रस्सी होती है और लोगों की दो टीमें रस्सी को दोनों ओर से तब तक खींचती हैं जब तक कि एक टीम दूसरे को बीच की रेखा पर पार न कर ले। इसे और मज़ेदार बनाने के लिए, कभी-कभी बीच में मिट्टी का गड्ढा या ठंडे पानी का टब होता है ताकि हारने वाली टीम उसमें गिर जाए। जीतने के लिए सिर्फ़ शारीरिक ताकत की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए ध्यान, दृढ़ संकल्प और कौशल की भी ज़रूरत होती है।

पौलुस हमें बताता है कि हम रस्साकशी में हैं। लेकिन हम जो खेल मज़े के लिए खेलते हैं, उससे अलग, हमारा संघर्ष “प्रधानों से, और अधिकारियों से, और इस संसार के अंधकार के हाकिमों से और उस दुष्ट की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं” (पद.12)। हम एक आध्यात्मिक रस्साकशी में हैं और हमारे विरोधी हमें हराना चाहते हैं और हमें पाप की गंदगी में गिराना चाहते हैं। पौलुस हमें इस आध्यात्मिक रस्साकशी के लिए “परमेश्वर के सारे हथियार बाँधकर” (पद.13) इस आश्वासन के साथ कि मसीह ने क्रूस पर दुष्ट को पहले ही हरा दिया है, तैयार होने के लिए कहता है । मजबूत बने रहने और जीतने के लिए, हमें मानवीय ताकत या अच्छे इरादों से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है। हमें परमेश्वर का अनुसरण और उस पर निर्भर रहने की ज़रूरत है। जैसा कि पौलुस कहता है, हमें “प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवंत बनना” है (पद.10)।

“शैतान की युक्तियों” और उसके “जलते हुए तीरों” को खुद से संभालना मुश्किल है (पद.11-16)। धन्यवाद हो, हमें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है। हम परमेश्वर द्वारा दी गई ताकत और रणनीति का लाभ उठा सकते हैं (पद.11)। जब हम उसके पास जाते हैं, तो वह हमें “सत्य” का कवच देता है। हमारे पैरों में “शांति का सुसमाचार” फिट होता है। और हम “विश्वास” से सुरक्षित रहते हैं। वास्तव में, उसका वचन हमें आध्यात्मिक रस्साकशी के दौरान दृढ़ रहने में मदद करता है (पद.14-17)। रवि एस. रात्रे