यह समझने के लिए कि क्या डॉक्टरों को अपना काम सार्थक लगता है, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर के शोधकर्ताओं ने दो अध्ययन किए। दोनों अध्ययनों से पता चला कि अधिकांश डॉक्टरों को अपने काम सार्थक लगे, भले ही वे तनावपूर्ण थे। जब उनसे पूछा गया कि उनकी नौकरी की संतुष्टि में क्या योगदान है, तो उन्होंने नौकरी की सुरक्षा, जिम्मेदारी का स्तर, स्वतंत्रता, आवास, उनके सहकर्मियों का उनके प्रति दृष्टिकोण और अपने कौशल का उपयोग करने, सिखाने और नई चीजें सीखने के लिए उन्हें मिले अवसरों जैसे कारण बताए।

सभोपदेशक का लेखक भी काम में अर्थ के बारे में विचारता था l वह पूछता है, “मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगाकर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है?” (पद..22)। हम पूरे दिन “दुखों से भरे” रहकर काम करते हैं और फिर रात “को भी . . . मन चैन नहीं पाता” (पद.23)। वह निष्कर्ष निकालता है कि काम अपने आप में अर्थहीन है (पद..23)। हालाँकि, वह महसूस करता है कि खाने-पीने और अपने काम में संतुष्टि पाने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर की ओर से एक उपहार है (पद.24)। “क्योंकि परमेश्वर से दूर दूर रहकर कौन व्यक्ति खा-पी सकता है, और आनंद मना सकता है?” (पद.25 BSI CL)। घर पर या बाहर, शारीरिक श्रम या मानसिक प्रयास के साथ काम करने में सक्षम होना एक सम्मान की बात है। हममें से ज़्यादातर लोग काम के दिन के अंत में संतुष्टि की तलाश करते हैं। और जबकि कुछ लोग सेवा के कार्यों, पैसा का लाभ या दोस्ती के ज़रिए इस संतुष्टि को खोजने की कोशिश करते हैं, कई अन्य लोग बिना किसी संतुष्टि के संघर्ष करते हैं, जब तक कि वे काम को परमेश्वर द्वारा दिए गए विशेषाधिकार के रूप में नहीं देख पाते (उत्पत्ति 2:15)। अगर हम कभी असंतुष्ट महसूस करते हैं, तो हम परमेश्वर के पास जा सकते हैं। क्योंकि, सच्चाई यह है कि कोई भी नौकरी हमें पूर्ण संतुष्टि नहीं दे सकती, लेकिन परमेश्वर हमें हमारे काम में अर्थ खोजने में मदद कर सकता है। —ऍन हरिकीर्तन