पहली कक्षा के छात्र ने आपातकालीन स्थिति के दिए गए नंबर पर फ़ोन’ किया। आपातकालीन ऑपरेटर ने उसका फ़ोन उठायाI। “मुझे मदद की ज़रूरत है,” लड़के ने कहा। “मुझे टेक-अवे करना हैं” (सीखना हैं)।” ऑपरेटर सहायता के लिए आगे बढ़ता, उससे पहले उसने एक महिला को कमरे में प्रवेश करते और यह कहते हुए सुना, “जॉनी, तुम क्या कर रहे हो?” जॉनी ने बताया कि वह अपना गणित का होमवर्क नहीं कर पा रहा है, इसलिए जब उसे मदद की ज़रूरत पड़ी तो उसने वही किया जो उसकी माँ ने उसे सिखाया था। उसने आपातकालीन नंबर पर कॉल किया। जॉनी के लिए, उसकी वर्तमान आवश्यकता आपातकाल के समान थी। दयालु ऑपरेटर के लिए, उस पल में छोटे लड़के को उसके होमवर्क में मदद करना सर्वोच्च प्राथमिकता थी।

जब भजन संहिताकार दाऊद को सहायता की आवश्यकता पड़ी, तो उसने कहा, “हे यहोवा ऐसा कर कि मेरा अन्त मुझे मालूम हो जाए, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं; जिस से मैं जान लूं कि कैसा अनित्य हूं” (भजन संहिता संहिता 39:4)। उसने कहा, “मेरी आशा तो तेरी ओर लगी है” (पद 7)। इसलिए, उसने उससे उसकी “मदद की पुकार” सुनने और उसका उत्तर देने की विनती की (पद 12)। फिर चौकाने वाले ढंग से उसने परमेश्वर से “उसे न देखने” को कहा (पद 13)। हालाँकि दाऊद की ज़रूरतें अनकही हैं, पूरे पवित्रशास्त्र में उसने यही बात कही कि परमेश्वर हमेशा उसके साथ रहेगा, उसकी प्रार्थनाएँ सुनेगा और उनका उत्तर देगा।

परमेश्वर की नियमितता में हमारा विश्वास हमें अपनी अस्थिर भावनाओं को संसाधित करने में सहायता करता है, यह पुष्टि करते हुए कि न बदलने वाले परमेश्वर के लिए कोई भी विनती बहुत बड़ी या बहुत छोटी नहीं है। वह हमें सुनता है, हमारी परवाह करता है और हमारी हर प्रार्थना का उत्तर देता है। सोची डिक्सन