ऑटिज्म(Autism-मस्तिष्क विकार) से पीड़ित किन्तु कार्य करने में सक्षम रंजीत को जीवन भर डराया-धमकाया गया l भेदभाव और अपमान का डर इस हद तक बढ़ गया कि रंजीत को अपने आस-पास के लोगों से ही डर लगने लगा। हालाँकि, यह तब बदल गया जब उसे एक कंपनी ने प्रौद्योगिकी (technology) सलाहकार के रूप में काम पर रखा। वहाँ, उसकी टीम का उसके प्रति धैर्य और निर्णायक रुख नहीं अपनाने के कारण लोगों और जीवन के बारे में रंजीत के दृष्टिकोण को बदल दिया।

रोम में विश्वासियों को संबोधित करते हुए, पौलुस मसीह के समान बनने के बारे में कुछ व्यावहारिक निर्देश देता है। वह विश्वास में मजबूत लोगों से आग्रह करता है कि वे कमजोर लोगों के साथ धैर्य सहें (पद.1) और मसीह की देह के भीतर सच्ची टीम भावना को प्रोत्साहित करता है। खुद को खुश करने या लोगों को उनकी निर्बलता में अपमानित करने के बजाय, पौलुस हमें उनके साथ अच्छा व्यवहार करके उनकी “भलाई और उन्नति” के लिए उनके प्रति दयालु होने के लिए कहता है (पद.1-2)। ऐसा करके हम मसीह का स्वभाव दर्शाते हैं (पद.5) l आखिरकार, यीशु हमारी दुर्बलताओं में हमारे प्रति दयालु है (पद.3-7)। कलीसिया और हमारे लिए पौलुस की प्रार्थना और आशीष यह है कि परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए “धीरज और शांति” के साथ, हम भी एक दूसरे के प्रति यीशु का स्वभाव रख सकते हैं (पद.5)। फिर हम एक दूसरे को सिखा सकते हैं और परमेश्वर की महिमा करने के लिए आपसी सद्भाव में एक साथ रह सकते हैं (पद.6)।

रंजीत के सहकर्मियों की तरह, हम अपने आस-पास के लोगों के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं। रोम में कलीसिया को उन लोगों के लिए पूर्वाग्रह-मुक्त(prejudice-free) स्थान बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जो अभी भी परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ रहे हैं। यीशु के साथी अनुयायियों की कमज़ोरियों के बारे में निर्णय लेने के बजाय, हम अपनी ताकत का उपयोग उन लोगों की सेवा करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए कर सकते हैं जिन्हें हमारी मदद की ज़रूरत है। —कैरल मैकवॉन