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Articles by एलिसन कीडा

परमेश्वर सुनता है

जब समूह के अन्य लोग चुनौतियों अथवा बीमारी से जूझ रहे अपने परिजनों और मित्रों के लिए मांग रहे थे डाईएन सुन रही थी l उसके परिवार का एक सदस्य वर्षों से नशे की लत से संघर्ष कर रहा था l किन्तु डाईएन ने अपना निवेदन साझा नहीं किया l उसकी ऊँची आवाज़ में बोले गए शब्दों के प्रतिउत्तर में लोगों के चेहरों के भाव या उनका प्रश्न पूछना या उनकी सलाह वह सहन नहीं कर पाती थी l उसने महसूस किया कि उसका निवेदन नहीं बताना और चुप रहना ही बेहतर था l दूसरे समझ नहीं पाए कि उसका प्रिय यीशु का विश्वासी होकर भी दैनिक संघर्ष कैसे कर सकता था l
यद्यपि डाईएन ने समूह के साथ अपना निवेदन साझा नहीं किया, उसने कुछ भरोसेमंद मित्रों से उसके साथ प्रार्थना करने को कहा l उनके साथ मिलकर उसने परमेश्वर से अपने प्रिय के लिए नशे की वास्तविक बंधन से छुटकारा माँगा कि वह मसीह में स्वतंत्रता का अनुभव कर सके – और कि परमेश्वर डाईएन को आवश्यक शांति और धीरज दे l प्रार्थना करने पर, उसने अपने प्रिय के साथ अपने सम्बन्ध में आराम और सामर्थ्य महसूस किया l
हममें से अनेक के पास वास्तविक, दृढ़ प्रार्थना निवेदन होते हैं जो अनुत्तरित महसूस होते हैं l किन्तु हम आश्वास्त हों कि परमेश्वर ध्यान देता ही है और वह हमारे सभी निवेदन सुनता ही है l वह हमसे “आशा में आनन्दित, क्लेश में स्थिर, प्रार्थना में नित्य लगे” (रोमियों 12:12) रहकर उसके निकट चलने को प्रेरित करता है l हम उसपर भरोसा कर सकते हैं l

मैं माफ़ी चाहता हूँ

2005में, कॉलिंस के एक रिपोर्ट को झूठा ठहराने के कारण मेगी को चार साल के लिए जेल जाना पड़ा, और मेगी जेल से छूटने के बाद कॉलिंस को ढूंढ़ कर उसे “हानि” पहुँचाने की कसम खायी l अंततः सबकुछ खोने के बाद, मेगी दोषमुक्त हो गया l इस बीच, कॉलिंस के सभी रिपोर्ट झूठे साबित हुए, उसकी नौकरी छूट गयी, उसे भी कई वर्षों के लिए जेल में रहना पड़ा l जेल में रहते हुए दोनों मसीह में विश्वास में आ गए l
2015 में, दोनों ने खुद को एक साथ एक विश्वास-आधारित कंपनी में नौकरी करते हुए पाया l कॉलिंस याद करता है, “[मैंने मेगी से कहा], ‘इमानदारी से, मेरे पास स्पष्ट करने के लिए कुछ भी नहीं है, मैं केवल यह कह सकता हूँ मुझे क्षमा कर दो l” मेगी का उत्तर था, “मैं लगभग यही सुनना चाहता था,” और उसने उसे माफ़ कर दिया l दोनों में मेल हो सका क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का अतुलनीय प्रेम और क्षमा का अनुभव किया था, जो हमें “एक दूसरे . . . [को] . . . क्षमा” करने की योग्यता देता है (कुलुस्सियों) 3;13) l
वर्तमान में दोनों घनिष्ठ मित्र हैं l “हमारे पास संसार को बताने के लिए एक संयुक्त मिशन है . . . कि यदि आपको किसी से क्षमा मांगनी है, तो अहंकार छोड़कर उससे क्षमा मांग लें,” कॉलिंस ने कहा l “और यदि आपको किसी के विरुद्ध कोई शिकायत है, कड़वाहट छोड़ दें क्योंकि यह इस आशा से ज़हर पीने के समान है कि यह उन्हें हानि पहुंचेगा l”
परमेश्वर विश्वासियों को शांति और एकता में रहने के लिए बुलाता है l यदि हमारे पास  “किसी पर दोष देने का कोई कारण हो,” हम उसे परमेश्वर के पास ले जाएँ l वह हमें मेल करने में मदद करेगा (पद.13-15; फिलिप्पियों 4:6-7) l

पशुओं से पूछो

बचाए गए एक चील/गरुड़(Bald Eagle) को देखकर हमारे नाती-पोते भावविभोर हो उठे l वे उसे स्पर्श भी कर सके l चिड़ियाघर के स्वयंसेविका ने बाँह पर बैठाए उस शक्तिशाली पक्षी के विषय बताया कि इस नर पक्षी के पंखों का फैलाव साढ़े छह फीट है, फिर भी खोखली हड्डियों के कारण उनका वजन केवल आठ पौंड है l यह सुनकर मैं चकित हुआ l
उपरोक्त बात से मैंने एक गरुड़ को याद किया जिसे मैंने झील के ऊपर उड़ते देखा था और जो गति से नीचे आकर शिकार को अपने चंगुल में लेनेवाला था l और मैंने कल्पना किया कि लम्बे टांगों वाला एक बगुला एक तालाब के किनारे स्थिर खड़ा हुआ अपनी लम्बी चोंच से जल के अन्दर शिकार करने को तैयार है l हमारे सृष्टिकर्ता की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करनेवाले लगभग 10,000 प्रजातियों में से ये केवल दो ही हैं l     
अय्यूब की पुस्तक में, अय्यूब के मित्र उसके दुःख के कारण पर तर्क-वितर्क करते हुए पूछते हैं, “क्या तू परमेश्वर का गूढ़ भेद पा सकता है?” (देखें 11:5-9) l प्रतिउत्तर देते हुए अय्यूब स्पष्ट करता है, “पशुओं से तो पूछ और वे तुझे सिखाएँगे; और आकाश के पक्षियों से, और वे तुझे बताएँगे” (अय्यूब 12:7) l परमेश्वर की अभिकल्पना, देखभाल, और सृष्टि पर नियंत्रण की सच्चाई को पशु सत्यापित करते हैं : “उसके हाथ में एक एक जीवधारी का प्राण, और एक एक देहधारी मनुष्य की आत्मा भी रहती है” (पद.10) l
क्योंकि परमेश्वर पक्षियों की देखभाल करता है (मत्ती 6:26; 10:29), हम भी आश्वास्त हैं कि वह आपसे और मुझसे प्रेम करता है और हमारी देखभाल करता है, उस समय भी जब हम अपनी परिस्थितियों को नहीं समझते हैं l चारोंओर देखें और उससे सीखें l  

जब हम थक जाते हैं

कभी-कभी सही काम थका देता है l हम सोच सकते हैं, क्या सही इरादों के साथ शब्दों और कार्यों से कुछ अंतर पड़ता है या नहीं?  हाल ही में मैं इस पर विचार कर रही थी जब मैंने प्रार्थना के साथ विचार करके एक मित्र को उत्साहित करने के लिए ई-मेल भेजा, जिसका क्रोधित प्रतिउत्तर मिला l मेरी अविलम्ब प्रतिक्रिया ठेस और क्रोध दोनों ही थी l मुझे इतना  गलत कैसे समझा जा सकता था?

क्रोध में प्रतिउत्तर देने से पहले, मैंने स्मरण किया कि ज़रूरी नहीं कि किसी को भी यीशु के प्रेम के विषय बताने का परिणाम(या इच्छित परिणाम) मिले l दूसरों की भलाई करके उन्हें यीशु के निकट लाने की आशा करने पर, वे हमें अस्वीकार करेंगे l किसी को सही कार्य करने के हमारे विनम्र प्रयास की उपेक्षा हो सकती है l

अपने सच्चे प्रयास के प्रतिउत्तर के परिणामस्वरूप निराश होने पर गलातियों 6 में जाना अच्छा है l यहाँ पर प्रेरित पौलुस हमें अपने इरादों पर विचार करने के लिए उत्साहित करता है अर्थात् जो कुछ हम बोलते और करते हैं, अर्थात् “अपने काम को जाँच [लें]” (पद.1-4) l ऐसा करने के बाद, वह हमें दृढ़ रहने हेतु उत्साहित करता है : “हम भले काम करने में साहस न छोड़ें, क्योंकि यदि हम ढीले न हों तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे l इसलिए जहां तक अवसर मिले हम सब के साथ भलाई करें, विशेष करके विश्वासी भाईयों के साथ” (पद.9-10) l

परमेश्वर चाहता है कि हम उसके लिए निरंतर जीवन बिताएं, जिसमें दूसरों के लिए प्रार्थना और उसके विषय उनको बताना शामिल है अर्थात् “भले काम l” परिणाम वह देगा l

हमारे लिए परमेश्वर की परवाह

मेरे नाती, जो अभी नन्हें हैं, उन्हें अपने कपड़े खुद पहनना पसंद है। वे अक्सर अपनी कमीज़ पीछे ज्यादा खींच देते हैं और अपने जूते उल्टे पहन लेते हैं। मुझे उनकी गलती सुधारने का मन नहीं करता क्योंकि मुझे उनकी मासूमियत और दुनिया को उनकी आंखों से देखना पसंद है।

उनके लिए सब कुछ एक नया अनुभव हैI, टूटे पेड़ पर चलना, कछुए की जासूसी करना, या उत्साह से दमकल ट्रक गुजरते देखना। वास्तव में मेरे नन्हें नाती इतने मासूम नहीं हैं। बिस्तर पर ना जाने के उनके पास दर्जन बहाने होते हैं और वो दूसरे का खिलौना झटपट छीन लेते हैं। फिर भी मैं उनसे बहुत प्रेम करती हूँ।

पहले मानव आदम-हव्वा कई मायनों में मेरे नातियों के समान थे।I परमेश्वर के साथ बगीचे में चलते हुए हर चीज़ उनके लिए आश्चर्यजनक रही होगी। परन्तु एक दिन उन्होंने मनमानी और अवज्ञा की और उस पेड़ का फल खा लिया जिसकी मनाही थी (उत्पत्ति 2:15-17;3:6)। परिणामस्वरूप वह झूठ बोलने और दोष लगाने लगे (3:8-13)।

फिर भी, परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया और उनकी परवाह करते रहे। उन्होंने चमड़े के अंगरखे बना कर उन्हें पहिना दिए (पद 21)-और आगे चलकर अपने पुत्र के बलिदान द्वारा सभी पापियों के लिए उद्धार का मार्ग प्रदान किया (यूहन्ना 3:16)। वह हमें बहुत प्रेम करते हैं!

यीशु कारण जानता है

 

मेरे कुछ मित्र हैं जिन्होनें आंशिक चंगाई पायी है किन्तु अपनी बीमारियों के दुखद पहलुओं से अभी भी संघर्ष कर रहे हैं l दूसरे मित्र किसी नशे की लत से चंगाई पाए हैं किन्तु अपनी अयोग्यता की भावनाओं और आत्म-घृणा से अभी भी संघर्ष कर रहे हैं l और मैं चकित हूँ,क्यों नहीं परमेश्वर ने उनको एक बार में ही पूरी रीति से चंगा कर दिया?

मरकुस 8:22-26 में, यीशु के एक दृष्टिहीन व्यक्ति को चंगा करता है l सर्वप्रथम यीशु उस व्यक्ति को गाँव से बाहर ले गया l उसके बाद उसकी आँखों में थूका और “उस पर हाथ रखे l” उस व्यक्ति ने कहा कि उसे मनुष्य “चलते हुए पेड़ों जैसे दिखाई देते हैं” उसके बाद यीशु ने उसकी आँखों पर दोबारा हाथ रखे, और इस बार वह “सब कुछ साफ़-साफ़ देखने लगा l”

यीशु की सेवा में, उसके शब्द और कार्य अक्सर लोगों को और उसके शिष्यों को चकित और चौंका दिया करते थे (मत्ती 7:28; लूका 8:10; 11:14) और बहुतों को उससे दूर भी ले गए (यूहन्ना 6:60-66) l इसमें कोई शंका नहीं कि ये दोनों आश्चर्यक्रम भी गड़बड़ी उत्पन्न कर दी l इस व्यक्ति को तुरन्त  चंगा क्यों नहीं किया गया?

हम नहीं जानते क्यों l किन्तु यीशु जानता था कि उस क्षण इस व्यक्ति को और शिष्यों को जो इस चंगाई  के गवाह थे, क्या ज़रूरत थी l और वह जानता है कि आज हमें क्या चाहिए जिससे उसके साथ हमारे सम्बन्ध और निकट के हो जाएं, l यद्यपि हम हमेशा नहीं समझ पाएंगे, हम भरोसा करें कि परमेश्वर हमारे और हमारे प्रियों के जीवनों में कार्य कर रहा है और वह उसके पीछे चलने के लिए हमें सामर्थ्य, साहस और स्पष्टता देगा l

के बावजूद भी

कभी-कभी ज़िन्दगी हम पर भयानक वार करती है l अन्य समयों में आश्चर्यजनक होता है l

बेबीलोन में तीन युवक, उस देश के भयंकर राजा के सामने साहसपूर्वक डटे रहे और अपने सामने खड़ी सोने की बड़ी मूरत को किसी भी स्थिति में दण्डवत् करने से इनकार किया l वे एक साथ बोले : “इस विषय में तुझे उत्तर देने का हमें कुछ प्रयोजन नहीं जान पड़ता l हमारा परमेश्वर, जिसकी हम उपासना करते है वह हम को उस धधकते हुए भट्ठे की आग से बचाने की शक्ति रखता है; वरन् हे राजा, वह हमें तेरे हाथ से भी छुड़ा सकता है l परन्तु यदि नहीं, तो हे राजा, तुझे मालूम हो, कि हम लोग . . . उपासना नहीं करेंगे, और न तेरी खड़ी कराई हुई . . .  मूरत को दण्डवत् करेंगे” (दानिय्येल 3:16-27) l

ये तीन युवक – शद्रक, मेशक, और अबेदनगो – धधकते हुए भट्ठे में फेंक दिए गए; और परमेश्वर ने आश्चर्जनक रूप से उनको छुड़ाया और उनके सिर का एक बाल भी न झुलसा और न ही उनके कपड़ों से जलने की गंध आई (पद.19-27) l  वे मृत्यु के लिए तैयार किये गए थे किन्तु परमेश्वर में उनका विश्वास अटल था – यदि वह उनको नहीं बचाता “तो भी l”

परमेश्वर की यह इच्छा है कि हम उससे लिपटे रहें –मेरे किसी प्रिय को चंगाई नहीं मिलने के बावजूद भी, हमारी नौकरी चले जाने के बावजूद भी, हमारे सताए जाने के बावजूद भी l कभी-कभी इस जीवन में परमेश्वर हमें बचाता है, और कभी-कभी नहीं भी बचाता है l लेकिन हमें इस सच्चाई पर अडिग रहना है : “परमेश्वर जिसकी हम सेवा करते हैं वह सक्षम है, और . . . . के बावजूद भी  “हमें प्यार करता है, और हमारे कठिनतम परीक्षा में हमारे साथ है l

एक बालक की नाई

आराधना के समय वो नन्हीं सी लड़की गलियारे में बड़ी प्रसन्नता और शालीनता से अकेली ही नाच रही थी। उसकी माँ मुस्कुरा रही थी और उसे रोका नहीं।

उसे देख कर मेरा दिल बहुत उत्साहित हो गया, मैं उसका साथ देना चाहती थी लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। बचपन के उस आनन्द और विस्मय की अभिव्यक्ति को मैं कुछ समय पहले खो चुकी हूँ। यद्यपि हमें बचपना छोड़कर परिपक्व बनना चाहिए, तो भी हमें अपने आनंद और विस्मय को नहीं खोना चाहिए, विशेषकर परमेश्वर के साथ हमारे संबंध में।

यीशु के सांसारिक जीवन में उन्होंने छोटे बच्चों का खुली बाहों से स्वागत किया और अपनी शिक्षाओं में उनका उदाहरण दिया (मत्ती 11:25; 18:3;21:16)।  एक अवसर पर उसने अपने चेलों को फटकार लगाई जब वह किसी माता-पिता को अपने बच्चे को उनके पास लाने से रोक रहे थे। बालकों को मेरे पास आने दो... (मरकुस 10:14) यीशु बच्चों के बाल गुणों के बारे में कह रहे थे जो हमें मसीह को ग्रहण करने के लिए तैयार करते हैं -आनन्द और विस्मय, साथ ही सादगी, निर्भरता, विश्वास और विनम्रता।

बच्चों जैसा आनन्द और विस्मय (और इससे भी बड़कर) हमारे हृदय को यीशु को ग्रहण करने के लिए खोलता है वह हमें अपनी बाहों में लेने की प्रतीक्षा करते हैं।

जहाँ वह अगुवाई करें उसका अनुसरण करना

बचपन में रविवार की संध्या में होने वाली कलीसिया की सभा बहुत रोमांचक होती थी। इसमें प्रायः परिवारों, मित्रों और घर और व्यवसाए आदि को छोड़कर परमेश्वर की सेवा करने वाले मिशनरी आकर प्रेरणादायक सन्देश देते थे।

एलीशा ने भी परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए बहुत कुछ छोड़ा था। जब एल्लियाह नबी की उनसे भेंट हुई तब वह खेत में हल जोत रहे थे, उन्होंने अपने चौगे को एलीशा के कंधों पर डाल दिया (जो नबी के रूप में उनकी भूमिका का प्रतीक था) और उन्हें अपने पीछे हो लेने को कहा। माता और पिता को चूमकर विदा लेने के मात्र एक ही आवेदन के साथ एलीशा ने तुरंत अपने बैलों की बलि चढ़ाई और हल को जलाकर और अपने माता पिता से विदा लेकर उनके पीछे हो लिए।

हम में से अनेकों को अपने परिवारों और मित्रों को छोड़कर पूर्णकालिक रूप से परमेश्वर की सेवा की बुलाहट नहीं मिली है। तो भी परमेश्वर की इच्छा है कि हम सब विश्वासी के समान जैसे परमेश्वर ने [हमें] बुलाया है और जैसी भी स्थिति प्रभु ने [हमें] सौंपी है उसमें उनका अनुसरण करें।(1 कुरिन्थियों 7:17) परमेश्वर की सेवा रोमांच और चुनौतियों से भरा हो सकता है फिर चाहे हम कहीं भी हों-चाहे हम अपने घर भी ना छोड़ें।