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Articles by एलिसन कीडा

यीशु मेसेल को प्रेम करता है

मेरी बहन मेसेल बचपन में अपने तरीके से एक परिचित गीत गाया करती थी : यीशु मुझसे करता प्यार, बाइबिल बताती मेसेल को l” इससे मैं अत्याधिक परेशान होती थी! क्योंकि उसकी बड़ी और बुद्धिमान बहन होने के कारण मैं जानती थी कि वास्तविक शब्द थे “यह सार,” न कि “मेसेल को l” किन्तु वह ज़िद  से अपने मन की गाती थी l

अब मैं सोचती हूँ कि मेरी बहन बिलकुल ठीक थी l बाइबिल सही में मेसेल से और हम सब से कहती है कि यीशु हम सब से प्यार करता है l हम बार-बार यह सच्चाई पढ़ते हैं, जैसे, हम यूहन्ना प्रेरित, “[चेला] जिससे यीशु प्रेम रखता था” (यूहन्ना 21:7,20) की पत्रियों में पढ़ते हैं l वह बाइबिल के एक सबसे अधिक जाने हुए पद में हमसे परमेश्वर के प्रेम के विषय बताता है : यूहन्ना 3:16, “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनंत जीवन पाए l”

यूहन्ना 1 यूहना 4:10 में इस सन्देश का समर्थन करता है : “प्रेम इसमें नहीं कि हम ने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इस में है कि उसने हम से प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने को भेजा l” जैसे कि यूहन्ना जानता था कि यीशु उससे प्रेम करता था, हमें भी वही निश्चय है : यीशु अवश्य  ही हमसे प्रेम करता है l बाइबिल हमें यह बताती है l

महान प्रेम

हाल ही में हमने अपनी बाईस महीने की नातिन, मोरिया को उसके बड़े भाइयों के बिना रात भर के लिए अपने घर ले गए l हमनें अधिक प्रेम के साथ उसका ध्यान दिया, और हम उसकी इच्छा पूरी करने में आनंदित हुए l अगले दिन उसको वापस घर पहुंचाने के बाद, हम अलविदा कहकर घर के बाहर निकलने लगे l ऐसा करते समय, मोरिया ने चुपचाप अपना बैग उठाकर(जो अभी भी दरवाजे के निकट बैठी हुयी थी) हमारे पीछे चलने लगी l

वह तस्वीर मेरी यादों में बैठ गयी : मोरिया अपनी चड्डी में और दो अलग-अलग सैंडल पहनी हुयी पुनः नाना-नानी के साथ जाने को तैयार थी l मैं इसके विषय सोचकर मुस्कराती हूँ l वह मेरे संग जाने को उत्सुक, और अधिक व्यक्तिगत ध्यान पाने के लिए तैयार थी l

यद्यपि हमारी नातिन अभी बता नहीं पाती है, वह प्रेम और उसका महत्व अनुभव करती है l एक छोटे रूप से, मोरिया के लिए हमारा प्रेम हमारे लिए अर्थात् उसकी संतान के लिए परमेश्वर के प्रेम की तस्वीर है l “देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है कि हम परमेश्वर की संतान कहलाएं; और हम हैं भी” (1 यूहन्ना 3:1) l

हम यीशु पर अपने उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करके, उसकी संतान बन जाते हैं और हमारे लिए उसकी क्रूसित मृत्यु द्वारा उसके उदार प्रेम को समझने लगते हैं (पद.16) l हमारी इच्छा अपने वचन और कार्यों द्वारा उसको प्रसन्न करने(पद.6)-और उसको प्रेम करने और उसके साथ समय बिताने की होती है l

यदि मुझे उस वक्त मालूम होता ...

घर लौटते समय, मैं “Dear Younger Me,” गीत सुन रही थी जो खूबसूरती से पूछता है : यदि मैं अतीत में लौट पाती, जानते हुए जो मैं अभी जानती हूँ, आप अपने युवा व्यक्तित्व से क्या कहते? सुनते हुए, मैंने अपने कम बुद्धिमान युवा व्यक्तित्व को थोड़ी बुद्धि और चेतावनी देना चाही l हममें से बहुतों में जीवन के किसी मोड़ पर भिन्न तरीके से काम करने की इच्छा हुई होगी-काश हम सब कुछ दोहरा पाते l

किन्तु गीत बताता है कि यद्यपि हमारा अतीत हमें खेदित करे, हमारे समस्त अनुभवों ने हमें बनाया है l हम लौट नहीं सकते अथवा अपने चुनाव या पाप के परिणाम को बदल नहीं सकते l किन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमें अपने अतीत के भारी बोझ और गलतियों को उठाकर घूमने की ज़रूरत नहीं l यीशु के काम के कारण! “जिसने ... अपने बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया” (1 पतरस 1:3) l

विश्वास में उसकी ओर लौटकर अपने पापों के लिए खेदित होने पर, वह हमें क्षमा करेगा l हम उस दिन बिल्कुल नए बनाए जाएंगे और आत्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया आरंभ करेंगे (2 कुरिं. 5:17) l हमने क्या किया था (अथवा नहीं किया था) इसका कोई औचित्य नहीं, क्योंकि उसके काम से हम क्षमा किये गए l हम आगे बढ़ते हुए, वर्तमान का पूरा लाभ उठाकर उसके साथ भविष्य की आशा कर सकते हैं l मसीह में, हम स्वतंत्र हैं!

स्वर्ग की झलक

मैं अपने अध्ययन कमरे की खुली खिड़की के बाहर चिड़ियों को चहकते और पेड़ों पर मंद-मंद हवा चलते देखती हूँ l मेरे पड़ोसी के जोते हुए खेत में पुआल के ढेर, और चमकदार नीले आसमान के विपरीत सफ़ेद बादल दिखाई देते हैं l

मेरे घर के निकट निरंतर यातायात का शोर और मेरे पीठ में हलके दर्द को छोड़ दें तो मैं स्वर्ग का अल्प आनंद उठा रही हूँ l मैं स्वर्ग  शब्द को हलके तौर पर उपयोग कर रही हूँ क्योंकि यद्यपि हमारा संसार एक समय पूरी तौर से अच्छा था, अब नहीं है l मानवता के पापी होने के बाद, हमें अदन के बाग़ से निष्कासित कर दिया गया और भूमि को “श्रापित” किया गया (देखें उत्प.3) l उस समय से पृथ्वी और उसमें की हर वस्तु “पतन के आधीन” है l” पीड़ा, बीमारी, और हमारी मृत्यु मानव के पाप में गिरने का परिणाम है (रोमियों 8:18-23) l

फिर भी परमेश्वर सब कुछ नया कर रहा है l एक दिन उसका निवास उसके लोगों के बीच और पुनःस्थापित संसार में होगा-“एक नया आकाश और एक नयी पृथ्वी”-जहाँ मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं” (प्रकाशित 21:1-4) l हम उस दिन तक चमकीले रंग और कभी-कभी अपने संसार के विस्तृत अद्भुत खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं, जो आनेवाले “स्वर्ग” की एक झलक है l

दुःख से आनंद तक

केली की गर्भावस्था में परेशानी आ गयी, और डॉक्टर चिंतित हो गए l उसके

लम्बे प्रसव पीड़ा में, उन्होंने फुर्ती से सर्जरी (Cesarean section) करने का निर्णय लिया l  किन्तु कठिन समय में, केली अपना दर्द भूल गयी जब उसने अपने नवजात बेटे को अपनी गोद में उठाया l दर्द आनंद में बदल गया l

बाइबिल इस सच्चाई की पुष्टि करती है : “प्रसव के समय स्त्री को शोक होता है, क्योंकि उसकी दुःख की घड़ी आ पहुंची है, परन्तु जब वह बालक को जन्म दे चुकती है, तो इस आनंद से कि संसार में एक मनुष्य उत्पन्न हुआ, उस संकट को फिर स्मरण नहीं करती” (यूहन्ना 16:21) l यीशु ने इस बात पर बल देने के लिए अपने शिष्यों के साथ इस उदाहरण का उपयोग किया कि उसके शीघ्र जाने से उनको दुःख होगा, किन्तु जब वे उसे पुनः देखेंगे उनका मन फिर आनंद से भर जाएगा (पद.20-22) l

यीशु अपनी मृत्यु और जी उठने और उसके बाद आनेवाली बातों के विषय कह रहा था l उसके जी उठने के बाद, शिष्य आनंदित हुए, क्योंकि यीशु उनको छोड़कर स्वर्ग जाने से पूर्व चालीस दिनों तक उनके साथ रहा और उनको सिखाता रहा (प्रेरितों 1:3) l फिर भी यीशु उनको दुखित नहीं छोड़ा l पवित्र आत्मा उनको आनंद से भरने वाला था (यूहन्ना 16:7-15; प्रेरितों 13:52) l

यद्यपि हम लोगों ने यीशु को आमने-सामने नहीं देखा है, विश्वासी होने के कारण हमें भरोसा है कि एक दिन हम उसे देखेंगे l उस दिन, हम पृथ्वी पर का दुःख भूल जाएंगे l किन्तु उस समय तक, प्रभु ने हमें आनंद के बिना नहीं छोड़ा है l उसने हमें अपना पवित्र आत्मा दिया है (रोमि. 15:13; 1 पतरस 1:8-9) l

कपड़े पहनकर

अपनी पुस्तक Wearing God  में, लेखक लॉरेन विनर कहती है कि हमारे वस्त्र शांति से हमारा व्यक्तित्व संप्रेषित करते हैं l हमारे पहिरावे जीविका, समाज या पहिचान, मिजाज़, अथवा सामजिक स्थिति दर्शाते हैं l स्लोगन वाला टी-शर्ट, बिज़नस सूट, यूनिफार्म, अथवा ग्रीस लगी जीन्स की विषय विचारे और वे क्या प्रगत करते हैं l वह लिखती है, “यह विचार कि, वस्त्र की तरह, मसीही शब्दहीन होकर यीशु के विषय कुछ कह सकते हैं-चित्ताकर्षक है l”

पौलुस के अनुसार, हम भी मसीह का प्रतिनिधित्व शब्दहीन तरीके से कर सकते हैं l रोमियों 13:14 हमसे “मसीह को [पहिनने], और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाए [नहीं करने]” को कहता है l इसका अर्थ क्या है? मसीही हो जानने के बाद, हम मसीह की पहिचान बन जाते है l हम “विश्वास के द्वारा ... परमेश्वर की संतान” हैं (गला.3:26-27) l यही हमारा दर्जा है l फिर भी हमें प्रतिदिन उसके चरित्र को धारण करना है l हम यीशु की तरह जी कर और उसकी तरह और भी बनकर, भक्ति, प्रेम और आज्ञाकारिता में उन्नति करते हुए और एक समय हमें दास बनाने वाले पापों की ओर पीठ फेरकर ऐसा करते हैं l       

यह उन्नत्ति पवित्र आत्मा का हमारे भीतर कार्य, और वचन, प्रार्थना, और दूसरे मसीहियों के साथ संगति का परिणाम है (यूहन्ना 14:26) l जब दूसरे हमारे शब्द और आचरण को देखते हैं, हम मसीह के विषय क्या बोल रहे हैं?

आनंदित हृदय

मेरी नातिन का पसंदीदा सुर जॉन फ़िलिप सौसा का एक प्रयाण गीत(marching tune) है l 19 वीं शताब्दी में, सौसा, “सेना प्रयाण” का अमरीकी रचयिता और बैंड मास्टर था l मोरियाह प्रयाण बैंड में  नहीं है; वह केवल 20 महीने की है l वह इस सुर को पसंद करती है और कुछ एक सुर को गुनगुनाती भी है l यह उसके लिए आनंदित समय होता है l हमारे पारिवारिक मिलन के समय, हम इस गीत को तालियों और दूसरी प्रबल आवाजों के साथ गुनगुनाते हैं, और नाती-पोते इसके ताल पर नाचते अथवा गोल-गोल घूमकर परेड करते हैं l

हमारे आनंदित स्वर हमें उस भजन का स्मरण कराते हैं जो हमसे “आनंद से यहोवा की आराधना” करने को कहते हैं (भजन 100:2) l जब सुलेमान ने मंदिर का अर्पित किया, इस्राएलियों ने प्रशंसा के साथ उत्सव मनाया (2 इतीहास 7:5-6) l भजन 100 उनका एक गीत  रहा होगा l भजन घोषणा करता है : हे सारी पृथ्वी के लोगों, यहोवा का जयजयकार करो ! ... उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आँगनो में स्तुति करते हुए प्रवेश करो, उसका धन्यवाद करो, और उसके नाम को धन्य कहो ! (पद. 1,4) l क्यों? “क्योंकि यहोवा भला है, उसकी करुणा सदा के लिए [है]! (पद.5) l

हमारा भला परमेश्वर हमसे प्रेम करता है ! कृतज्ञ प्रतिउत्तर में, आइये “जयजयकार” [करें] ! (भजन 100:1) l

बहुत अच्छा!

कुछ दिनों में एक ही विषय दिखाई देता है l हाल ही में मेरा एक दिन ऐसा ही था l हमारे पासवान ने विस्मयकारी, दो मिनट के अन्तराल में खिलते फूलों की फोटोग्राफी के साथ  उत्पत्ति पर अपना उपदेश आरंभ किया l तब, घर में, सोशल मीडिया की सूची में फूलों के अनेक चित्र दिखाई दिए l बाद में जंगल में घूमते समय, बसंत के जंगली फूल से हम घिरे थे-लाखों में जंगली गेंदे और आईरिस l

सृष्टि के तीसरे दिन परमेश्वर ने फूल और हर दूसरे प्रकार की वनस्पति (और सुखी भूमि जिसमें वे पैदा हो सकें) बनाए l और उस दिन दूसरी बार, परमेश्वर ने उन्हें “अच्छा” कहा (उत्पत्ति 1:10, 12) l केवल सृष्टि के छठवें दिन, परमेश्वर ने दो बार “अच्छा” कहा (पद.24,31) l वास्तव में, इस दिन जब उसने मनुष्य को रचा और उसकी श्रेष्ठकृति पूरी हो गई, उसने अपने द्वारा रचित सभी वस्तुओं को देखा “कि वह बहुत ही अच्छा है!”

सृष्टि की कहानी में, हम एक ऐसा सृष्टिकर्ता देखते हैं जो अपनी सृष्टि में आनंद लेता है-और सृष्टि करने में आनंदित दिखाई देता है l अन्यथा ऐसा रंगीन और अद्भुत विविधता वाला संसार क्यों बनाया जाए? और उसने सर्वोत्तम को अंत के लिए रखा जब उसने “मनुष्य को अपने स्वरुप के अनुसार उत्पन्न किया” (पद.27) l उसकी छविवाले होने के कारण हम उसकी खूबसूरत हस्तकला द्वारा आशीषित और प्रेरित हैं l

मिलकर समय बिताना

एक परिजन के विवाह से कार में लौटते समय दो घंटे की यात्रा में, मेरी माँ तीन बार मुझसे पूछी कि मेरे काम में नया क्या है l मैं उनको कुछ ख़ास बातें बतायीं जैसे मैं पहली बार बता रही थी, जबकि सोचती रही कि मेरे कौन से शब्द संभवतः  यादगार बन सकते हैं l मेरी माँ स्मरण शक्ति नष्ट करनेवाली मानसिक रोग से पीड़ित है, जो गंभीर रूप से व्यवहार को प्रभावित करके बोलचाल की शक्ति के साथ और भी हानि कर सकता है l

माँ की बीमारी पर मैं दुखित होती हूँ किन्तु मैं उनके जीवित रहने और हमारे साथ समय बिताने और बात करने के लिए धन्यवादित हूँ l मैं उनसे मिलकर उत्तेजित होती हूँ क्योंकि वह आनंदित होकर कहती है, “एलिसन, कितना खूबसूरत आश्चर्य!” हम एक दूसरे की संगति का आनंद लेते हैं और उनकी खामोशी में भी, संगति करते हैं l

यह परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध की छोटी तस्वीर है l बाइबिल हमें बताती है, “यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात् उन से जो उसकी करुणा की आशा लगाए रहते हैं" (भजन 147:11) l परमेश्वर यीशु को अपना उद्धारकर्ता माननेवालों को अपनी संतान कहता है (यूहन्ना 1:12) l और यद्यपि हम शब्दों की कमी के कारण बार-बार वे ही निवेदन करते हैं, वह धीरजवंत है क्योंकि वह हमसे प्रेम सम्बन्ध रखता है l उससे प्रार्थना में शब्दों की कमी में भी वह खुश होता है l