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Articles by एलिसन कीडा

मुझे बनाया जाना

सात वर्षीय थॉमस एडिसन को स्कूल ना ही पसंद और न वो पड़ने में अच्छे थे। एक दिन, उन्हें एक शिक्षक द्वारा "एडल्ड" (मानसिक रूप से भ्रमित) भी कहा गया था। उन्होंने घर में आकर  तूफ़ान मचा दिया। अगले दिन शिक्षक के साथ बात करने के बाद, उसकी माँ, जो स्वयं एक शिक्षक थी, थॉमस को घर पर पढ़ाने का फैसला किया। उनके प्रेम और प्रोत्साहन (और एडिसन की ईश्वर प्रदत्त निपुणता) की सहायता द्वारा, थॉमस एक महान आविष्कारक बन गए। बाद में उन्होंने लिखा, "मेरी मां ही मेरी बनाने वाली थी। वह इतनी सच्ची थी, मुझ पर इतना यकीन करती थी, की मुझे लगा कि मेरे पास जीने के लिए कोई है, जिसे मुझे निराश नहीं करना चाहिए।”

प्रेरितों के काम १५ में, हम पढ़ते हैं कि बरनबास और प्रेरित पौलुस ने मिशनरियों के रूप में एक साथ सेवा की, जब तक कि उनके बीच इस बारे में एक बड़ी असहमति नहीं थी कि यूहन्ना मरकुस को साथ लाया जाए या नहीं। पौलुस ने विरोध किया क्योंकि मरकुस ने पहले "उन्हें पंफूलिया में छोड़ दिया था" (पद ३६-३८)। नतीजतन, पौलुस और बरनबास अलग हो गए। पौलुस ने सीलास को और बरनबास ने मरकुस को ले लिया। बरनबास मरकुस को दूसरा मौका देने के लिए तैयार था, और उसके प्रोत्साहन ने एक मिशनरी के रूप में सेवा करने और सफल होने के लिए मरकुस की क्षमता में योगदान दिया। उसने आगे जाकर मरकुस के सुसमाचार को लिखा और यहाँ तक कि पौलुस के लिए वह एक सांत्वना देने वाला बना जब वे जेल में था (२ तीमुथियुस ४:११)।

हम में से बहुत से लोग पीछे मुड़कर देख सकते हैं और अपने जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा कर सकते हैं जिसने हमें प्रोत्साहित किया और हमारे रास्ते में मदद की। हो सकता है कि परमेश्वर आपको भी अपने जीवन में किसी के लिए ऐसा ही करने के लिए बुला रहा हो। आप किसे प्रोत्साहित कर सकते हैं?

यीशु कौन है ?

लोग यीशु को क्या मानते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि वह एक अच्छे शिक्षक थे, लेकिन वह सिर्फ एक मनुष्य थे। लेखक सी एस लुईस ने लिखा, या तो यह आदमी परमेश्वर का पुत्र था, और है, या फिर एक पागल, या कुछ इससे भी और बुरा। आप उसे एक मूर्ख बोल कर चुप करा सकते हैं, आप उस पर थूक सकते हैं और उसे एक दुष्ट आत्मा के रूप में मार सकते हैं, या आप उसके चरणों में गिर सकते हैं और उसे परमेश्वर और प्रभु कह सकते हैं, लेकिन हमें उसके महान मानव शिक्षक होने के बारे में कोई भी बेकार का समर्थन नहीं करना चाहिए।” मियर क्रिस्चीऐनिटी के ये अब प्रसिद्ध शब्द बताते हैं कि यदि यीशु ने ईश्वर होने का झूठा दावा किया होता तो वह एक महान भविष्यवक्ता नहीं होता। यह परम विधर्म होगा।

गाँवों के बीच चलते समय अपने शिष्यों से बात करते हुए, यीशु ने उनसे पूछा, “लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?  मरकुस (8:27)। उनके उत्तरों में— यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला, एलिय्याह और भविष्यद्वक्ताओं में से एक शामिल थे  (पद 28) । लेकिन यीशु जानना चाहते थे कि वे क्या मानते हैं? “तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूं?” पतरस ने इसे सही बताया, “तू मसीह है”, उद्धारकर्ता (पद 29)  ।

लेकिन हम क्या कहते हैं कि यीशु कौन है? यीशु एक अच्छा शिक्षक या भविष्यद्वक्ता नहीं हो सकता था यदि उसने अपने बारे में जो उसने कहा था—  कि वह और पिता परमेश्वर “एक हैं” (यूहन्ना 10:30)— सच नहीं था। उसके अनुयायियों और यहाँ तक कि दुष्टात्माओं ने भी उसकी ईश्वरत्व (दिव्यता) को परमेश्वर के पुत्र के रूप में घोषित किया (मत्ती 8:29;16:16. 1यूहन्ना 5:20)। आज, हम इस बात का प्रचार करें कि मसीह कौन है क्योंकि वह हमें वह प्रदान करता है जिसकी हमें आवश्यकता है।

क्रूस का संदेश

मुकेश का पालन-पोषण इस प्रकार हुआ अर्थात उनके शब्दों में कहे तो, "कोई ईश्वर नहीं, कोई धर्म नहीं, कुछ भी नहीं।" अपने लोगों के लिए लोकतंत्र और स्वतंत्रता की मांग करते हुए, उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में छात्रों का नेतृत्व करने में मदद की। लेकिन विरोध के कारण सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और सैकड़ों लोगों की जान चली गई। इस प्रदर्शन में भाग लेने के लिए, मुकेश को उनके देश की सर्वाधिक वांछित (गिरफ्तारी) सूची में रखा गया था। थोड़े समय के कारावास के बाद, वह एक दूर के गाँव में भाग गए जहाँ उनकी मुलाकात एक बुजुर्ग किसान से हुई जिन्होंने उन्हें मसीहत से परिचित कराया। उनके पास यहुन्ना के सुसमाचार की केवल एक हस्तलिखित प्रति थी, लेकिन वह पढ़ नहीं सकती थी, इसलिए उन्होंने मुकेश से उसे पढ़ने के लिए कहा। जैसे ही उन्होंने पढ़ा, उन्होंने उसे समझाया — और एक साल बाद वह यीशु में विश्वास करने लगे।

उन्होंने जो कुछ भी सहा, उसके द्वारा, मुकेश ने यह देखा कि परमेश्वर शक्तिशाली रूप से उन्हें क्रूस के समीप ला रहे थे, जहाँ उन्होंने पहली बार अनुभव किया जो प्रेरित पौलुस 1 कुरिन्थियों में कहता है, "क्रूस का संदेश ... परमेश्वर की सामर्थ" (1:18)। जिसे लोग मूर्खता, कमजोरी समझते थे, वही मुकेश की ताकत बन गयी। हम में से कुछ की भी, मसीह के पास आने से पहले यही सोच थी। लेकिन आत्मा के द्वारा, हमने महसूस किया कि परमेश्वर की शक्ति और ज्ञान हमारे जीवन में प्रवेश कर रहा है और हमें मसीह की ओर ले जा रहा है। आज मुकेश एक पादरी के रूप में कार्य करते है जो क्रूस की सच्चाई को उन सभी तक फैलाते है जो उन्हें सुनते हैं।

यीशु के पास कठोर से कठोर हृदय को भी बदलने की शक्ति है। आज उनके शक्तिशाली स्पर्श की आवश्यकता किसे है?

किसी सूत्र की जरूरत नहीं

जब मेघना छोटी थी, उसके सुविचारित संडे स्कूल के शिक्षक ने कक्षा को सुसमाचार देने के लिए प्रशिक्षित किया, जिसमें कई सारे वचनों को याद करना और सुसमाचार साझा करने का एक सूत्र शामिल था। उसने और उसकी एक सहेली ने घबराहट के साथ अपने एक दूसरे दोस्त पर इसे करने की कोशिश की, इस डर से कि कहीं वे किसी महत्वपूर्ण वचन या कदम भूल न जाएँ। मेघना को "याद नहीं है कि यदि उस शाम का अंत मन परिवर्तन के साथ हुआ [लेकिन अनुमान है] ऐसा नहीं हुआ।" यह तरीका व्यक्ति से ज्यादा उस सूत्र पर केंद्रित प्रतीत हुआ।

 

अब, वर्षों बाद, मेघना और उनके पति अपने बच्चों में परमेश्वर के प्रति प्रेम और अपने विश्वास को और अधिक आकर्षक तरीके से साझा करते हैं। वे अपने बच्चों को परमेश्वर, बाइबल और यीशु के साथ एक व्यक्तिगत संबंध के बारे में सिखाने के महत्व को समझते हैं, लेकिन वे इसे परमेश्वर और उसके वचन से प्रेम करने के कारण अपने दैनिक जीवन के उदहारण से करते है । वे यह प्रदर्शित करते हैं कि "जगत की ज्योति" (मत्ती 5:14) होने और दयालुता और सत्कारशील शब्दों के माध्यम से दूसरों तक पहुँचने  का क्या अर्थ है । मेघना कहती हैं, "हम दूसरों को जीवन के वचन नहीं दे सकते, अगर वे खुद हमारे अंदर न हो।" जैसे वह और उनके पति अपने जीवन द्वारा दया दिखाना प्रदर्शित करते  हैं, इससे वे अपने बच्चों को "दूसरों को उनके विश्वास में आमंत्रित करने" के लिए तैयार करते हैं।

हमें दूसरों को यीशु तक ले जाने के लिए किसी नुस्खे की आवश्यकता नहीं है - जो बात सबसे ज्यादा मायने रखती है वे यह है कि परमेश्वर के लिए हमारा प्रेम विवश करता और हमारे द्वारा चमकता है। जैसे-जैसे हम उसके प्रेम में जीते और उसके प्रेम को साझा करते हैं, परमेश्वर दूसरों को भी उसे जानने के लिए आकर्षित करता है।

हमें दूसरों को यीशु तक ले जाने के लिए किसी नुस्खे की आवश्यकता नहीं है - जो बात सबसे ज्यादा मायने रखती है वे यह है कि परमेश्वर के लिए हमारा प्रेम विवश करे और हमारे द्वारा चमके। जैसे-जैसे हम उसके प्रेम में जीते और उसके प्रेम को साझा करते हैं, परमेश्वर दूसरों को भी उसे जानने के लिए आकर्षित करता है।

कभी मत कहो 'नहीं कर सकता'

जेन बिना पैरों के पैदा हुई थी और उसे अस्पताल में छोड़ दिया गया था। फिर भी वह कहती है कि गोद लेने के लिए रखा जाना एक आशीर्वाद था। “मैं यहां उन लोगों के कारण हूं जिन्होंने मुझ पर उंडेला है।“ उसके दत्तक परिवार ने उसे यह देखने में मदद की कि वह “एक कारण से इस तरह पैदा हुई थी।“ उन्होंने उसे “कभी नहीं कहना ‘नहीं कर सकता’” के लिए उठाया और उसे अपने सभी कार्यों में प्रोत्साहित किया-जिसमें एक निपुण कलाबाज और हवाईवादी बनना शामिल है! वह “मैं इससे कैसे निपट सकती हूं?” के दृष्टिकोण से चुनौतियों का सामना करती है। और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है।

बाइबल ऐसे कई लोगों की कहानियाँ बताती है जिनका परमेश्वर ने उपयोग किया था जो उनकी बुलाहट के लिए अक्षम या अनुपयुक्त लग रहे थे—परन्तु परमेश्वर ने वैसे भी उनका उपयोग किया। मूसा एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जब परमेश्वर ने उसे इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले जाने के लिए बुलाया, तो वह झुक गया (निर्गमन 3:11; 4:1) और विरोध किया, “मैं बोलने और जीभ में धीमा हूं।“परमेश्वर ने उत्तर दिया, “मनुष्य को उनके मुंह किसने दिए? कौन उन्हें बहरा या गूंगा बनाता है? . . . क्या यह मैं नहीं, प्रभु? अब जाओ; मैं तुझे बोलने में सहायता दूंगा, और तुझे क्या बोलना सिखाऊंगा” (4:10-12)। जब मूसा ने अभी भी विरोध किया, तो परमेश्वर ने हारून को उसके लिए बोलने के लिए प्रदान किया और उसे आश्वासन दिया कि वह उनकी मदद करेगा (v 13-15)।

जेन की तरह और मूसा की तरह, हम सभी यहां एक कारण से हैं—और रास्ते में परमेश्वर कृपापूर्वक हमारी मदद करता है। वह लोगों को हमारी मदद करने के लिए आपूर्ति करता है और वह प्रदान करता है जो हमें उसके लिए जीने के लिए चाहिए।

अँधेरा और उजाला

जब मैं अदालत में बैठा था, तो मैंने अपनी दुनिया के टूटेपन के कई उदाहरण देखे : एक बेटी अपनी माँ से अलग थी; एक पति और पत्नी अपने प्यार को खो चुके थे जो कभी उनके बीच था और अब केवल कड़वाहट साझा करते थे; एक पति जो अपनी पत्नी के साथ मेल-मिलाप करना चाहता था और अपने बच्चों के साथ फिर से मिलना चाहता था। उन्हें बदले हुए हृदय, चंगा किये गए घावों और परमेश्वर के प्रेम की प्रबलता की सख्त आवश्यकता थी।

कभी-कभी जब हमारे आस-पास की दुनिया में केवल अंधेरा और निराशा होती है, तो निराशा में हार मान लेना आसान होता है। परन्तु तब आत्मा, जो मसीह में विश्वासियों के भीतर रहता है (यूहन्ना 14:17), हमें स्मरण दिलाता है कि यीशु उस टूटेपन और पीड़ा के लिए मरा। जब वह एक मनुष्य के रूप में संसार में आया, तो वह अंधकार में प्रकाश लाया (1:4-5; 8:12)। हम इसे नीकुदेमुस के साथ उसकी बातचीत में देखते हैं, जो चुपके से अंधेरे के आवरण में यीशु के पास आया लेकिन प्रकाश से प्रभावित हुआ (3:1–2; 19:38–40)।

यीशु ने नीकुदेमुस को सिखाया कि "परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए" (3:16)।

तौभी यद्यपि यीशु ने जगत में प्रकाश और प्रेम लाया, फिर भी बहुत से लोग अपने पाप के अन्धकार में खोए रहते हैं (पद 19-20)। यदि हम उसके अनुयायी हैं, तो हमारे पास वह प्रकाश है जो अंधकार को दूर करता है। कृतज्ञता में, आइए प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमें अपने प्रेम का प्रकाशस्तंभ बनाए (मत्ती 5:14-16)।

महान योद्धा

डाएट इमन नेदरलैंड्स की एक साधारण, शर्मीली युवती थी──प्यार में, काम करने में, और परिवार और दोस्तों के साथ समय का आनंद लेने वाली──जब 1940 में जर्मनी ने आक्रमण किया । जैसा कि डाएट (उच्चारित डीफ) ने बाद में लिखा, “जब आपके दरवाजे पर खतरा है, आप लगभग शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर छिपाना चाहते हैं ।” फिर डाएट ने महसूस किया कि ईश्वर ने उसे जर्मन उत्पीड़कों का विरोध करने के लिए बुलाया है, जिसमें यहूदियों और अन्य लोगों के लिए छिपने के स्थानों को खोजने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालना शामिल है । यह बेबस युवती ईश्वर के लिए योद्धा बन गयी । 

हमें डाएट के समान बाइबल में कई कहानियाँ मिलती हैं, कहानियाँ जिसमें हम परमेश्वर को अविश्वसनीय प्रतीत होने वाले चरित्रों को अपनी सेवा में उपयोग करते हुए देखते हैं । उदहारण के लिए, जब प्रभु के दूत ने गिदोन से संपर्क किया, तो उसने घोषणा की, “हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है” (न्यायियों 6:12) । फिर भी गिदोन शूरवीर के सिवा कुछ और प्रतीत हो रहा था । वह गुप्त रूप से मिद्यानियों की भेद लेनेवाली आँखों से दूर गेहूं झाड़ रहा था जिन्होंने दमनात्मक ढंग से इस्राएल को नियंत्रित कर रखा था (पद. 1-6, 11) । वह इस्राएल(मनश्शे) के सबसे कमज़ोर कुल और उसके घराने में “सबसे छोटा” (पद.15) था । उसने परमेश्वर के आह्वान को महसूस नहीं किया और कई संकेतों का अनुरोध भी किया । फिर भी परमेश्वर ने उसे क्रूर मिद्यानियों को पराजित करने के लिए इस्तमाल किया (देखें अध्याय 7) । 

परमेश्वर ने गिदोन को “शूरवीर” के रूप में देखा । और जिस तरह परमेश्वर गिदोन के साथ था और उसे सज्जित किया, उसी तरह ईश्वर हमारे──“उसके प्रिय बालकों”──साथ भी है, (इफिसियों 5:1)──हमारे जीने के लिए उसकी सेवा छोटे या बड़े तरीकों से करने के लिए हमारी समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है । 

एक नई बुलाहट

किशोर गिरोह का नेता केसी और उसके समर्थकों ने घरों और कारों में तोड़-फोड़ की, सुविधा भण्डार लूट लिए और अन्य गिरोह से लड़ाई की l आख़िरकार, केसी को गिरफ्तार किया गया और सजा सुनाई गयी l जेल में, वह “शॉट कॉलर(Shot Caller-बॉस)” बन गया, व्यक्ति जिसने दंगों के दौरान घर के बने हुए चाक़ू बांटे l 

कुछ समय बाद, उसे एकांत कारावास में रखा गया l अपने कक्ष में, केसी ने एक “चलचित्र” का अनुभव किया जिसमें उसने अपने जीवन की क्रमबद्ध घटनाओं की पुनरावृत्ति देखी──और यीशु को देखा, जिसमें उसे ले जाया जा रहा है और क्रूस पर किलों से ठोंका जा रहा है और वह कह रहा था, “मैं यह तुम्हारे लिए कर रहा हूँ l” केसी रोते हुए फर्श पर गिर गया और अपने पापों को स्वीकार किया l बाद में, उसने एक पास्टर के साथ अपने अनुभव को साझा किया, जिसने यीशु के बारे में और समझाया और उसे एक बाइबल दी l “यह मेरे विश्वास की यात्रा की शुरुआत थी,” केसी ने कहा l आख़िरकार, उन्हें मेनलाइन कैदखाने में डाल दिया गया, जहाँ कैदी स्वतंत्रता से एक दूसरे से मिल सकते थे, जहाँ उसके विश्वास के लिए उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया l लेकिन उसने शांति महसूस की, क्योंकि “[उसने] एक पवित्र बुलाहट प्राप्त की थी : दूसरे कैदियों को यीशु के विषय बताता था l”

तीमुथियुस को लिखे अपने पत्र में, प्रेरित पौलुस जीवन को बदलने की मसीह की सामर्थ्य के विषय बात करता है l परमेश्वर हमें दुराचार के जीवन से निकालकर यीशु का अनुसरण करने और उसकी सेवा करने के लिए बुलाता है (2 तीमुथियुस 1:9) l जब हम विश्वास से उसे स्वीकार करते हैं, हम मसीह के प्रेम के जीवित गवाह बनने की अभिलाषा करते हैं l पवित्र आत्मा हमें ऐसा करने के लिए सक्षम बनाता है, उस समय भी जब सुसमाचार साझा करने के अपने प्रयास में हम पीड़ा सहते हैं (पद.8) l केसी के समान , आइये हम अपनी नई बुलाहट के अनुकूल जीएँ l 

आंधी में होकर सुरक्षित

1830 में स्कॉटिश मिशनरी एलेग्जेंडर डफ की भारत की पहली यात्रा के दौरान, उनका जहाज़ दक्षिण अफ्रीका के तट से दूर एक तूफ़ान से टूट गया l वह और उसके सह यात्री किसी प्रकार एक विरान द्वीप पर अपनी जान बचायी; और कुछ समय बाद जहाज़ के एक कर्मी को डफ की बाइबल मिली जो बहती हुई तट पर आ गई थी l जब वह पुस्तक सूख गई, डफ ने बचे हुए लोगों के समक्ष भजन 107 पढ़ा, और उनको साहस मिला l आखिरकार, बचाए जाने के बाद और एक और बार जहाज़ के नष्ट होने के बाद, डफ भारत पहुँचे l 

भजन 107 कुछ एक तरीके बताता है जिससे परमेश्वर ने इस्राएलियों को छुड़ाया था l इसमें शक नहीं कि डफ और उसके सहयात्रियों ने वचन का समर्थन किया और उसमें शांति प्राप्त की : “वह आंधी को शांत कर देता है और तरंगें बैठ जाती हैं l तब वे उनके बैठने से आनंदित होते हैं, और वह उनकी मन चाहे बंदरगाह में पहुँचा देता है” (पद.29-30) l और, इस्राएलियों के समान, उन्होंने भी “यहोवा की करुणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिए करता है, उसका धन्यवाद (किया)” (पद.31) l 

हम नया नियम (मत्ती 8:23-27); मरकुस 4:35-41) में भजन 107:28-30 का सामानांतर देखते हैं l यीशु और उसके शिष्य झील पर एक नाव में थे जब एक प्रचंड आंधी आयी l उसके शिष्य भय में पुकार उठे, और यीशु──देह में परमेश्वर──ने झील को शांत कर दिया l हम साहस न छोड़ें! हमारा सामर्थी परमेश्वर और उद्धारकर्ता हमारी पुकार सुनता और प्रत्युत्तर देता है और हमारे तूफानों के बीच हमें शांति देता है l