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Articles by एलिसन कीडा

एक दूसरे के लिए बनाए गए

“मैं उसकी देखभाल करुँगी l जब वो खुश, तब मुझे ख़ुशी होती है,” स्टेला कहती है l प्रदीप उत्तर देता है, “जब वह मेरे पास होती है मुझे ख़ुशी होती है l प्रदीप और स्टेला की शादी के 79 वर्ष हो चुके हैं l हाल ही में जब प्रदीप को एक नर्सिंग होम में भर्ती किया गया, उसकी हालत दयनीय थी – तो स्टेला उसे आनंदपूर्वक घर ले आई l वह 101, और स्टेला 95 वर्ष की है l यद्यपि वह चलने-फिरने के लिए वॉकर का उपयोग करती है, वह प्रेमपूर्वक अपने पति के लिए वह सब करती है जो वह कर सकती है, जैसे कि उसका पसंदीदा भोजन तैयार करना l परन्तु वह अपने बल पर यह नहीं कर सकती थी l नाती-पोते और पड़ोसी स्टेला की उन बातों में मदद करते हैं जो वह खुद नहीं कर सकती है l

स्टेला और प्रदीप का एक साथ का जीवन उत्पत्ति 2 का एक उदहारण है, जहां परमेश्वर ने कहा है, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं, मैं उसके लिए एक ऐसा सहायक बनाऊंगा जो उससे मेल खाए” (पद.18) l कोई भी जीव जिसे परमेश्वर आदम के पास लेकर आया उस वर्णन में ठीक बैठता है l केवल हव्वा में, जो आदम की पसली से बनी थी, आदम ने एक सहायक और सहयोगी प्राप्त किया (पद.19-24) l

हव्वा ही आदम के लिए सही सहयोगी थी, और उनके द्वारा परमेश्वर ने विवाह की स्थापना की l यह केवल व्यक्तियों की आपसी सहायता के लिए नहीं थी बल्कि एक परिवार को शुरू करने और सृष्टि की देखभाल के लिए भी थी जिसमें अन्य लोग शामिल हैं (1:28) l उस पहले परिवार से एक समुदाय आया ताकि चाहे वह विवाहित हो या एकल, वृद्ध या युवा, हममें से कोई भी अकेला नहीं होगा l एक समुदाय के रूप में, परमेश्वर ने हमें “एक दूसरे का भार” (गलतियों 6:2) उठाने का विशेषाधिकार दिया है l

स्मरण रखना

स्मारक दिवस(Memorial Day) पर, मैं कई पूर्व सैनिकों के बारे में सोचता हूँ, लेकिन विशेष रूप से मेरे पिताजी और चाचा, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना में सेवा की थी l वे घर लौट आए, लेकिन उस युद्ध में सैंकड़ों हजारों परिवारों ने दुखद रूप से अपने देश की सेवा में अपने प्रियजनों को खो दिया l फिर भी, जब पूछा गया, मेरे पिताजी और उस युग के अधिकांश सैनिक कहते कि वे अपने प्रियजनों की रक्षा के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे और वे जो सही मानते थे, उसके लिए खड़े थे l
जब कोई अपने देश की रक्षा में मर जाता है, तो यूहन्ना 15:13 –“इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे” – अक्सर उनके बलिदान का सम्मान करने के लिए अंतिम संस्कार सेवा के दौरान सुनाया जाता है l लेकिन इस पद के पीछे क्या स्थिति थी?
जब यीशु ने उन लोगों से अंतिम भोज के दौरान अपने शिष्यों से बात की, वह मृत्यु के निकट था l और, वास्तव में, उसके शिष्यों के एक छोटे से समूह से, यहूदा ने पहले ही उसे धोखा देने के लिए छोड़ दिया था (13:18-30) l फिर भी मसीह यह सब जानता था और फिर भी उसने अपने दोस्तों औरदुश्मनों के लिए अपने जीवन को बलिदान करने का विकल्प चुना l
यीशु उन लोगों के लिए मरने के लिए इच्छित और तैयार था जो एक दिन उस पर विश्वास करने वाले थे, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो अभी भी उसके दुश्मन थे (रोमियों 5:10) l बदले में, वह अपने शिष्यों (तब और अब) से “एक-दूसरे से प्यार करने” के लिए कहता है जैसे  उसने उनसे प्यार किया था (यूहन्ना 15:12) l उसका महान प्रेम हमें दूसरों के लिए बलिदानी प्रेम करने के लिए मजबूर करता है – मित्र और शत्रुओं को एक समान l

दुःख में सामर्थ्य

1948 में, एक भूमिगत चर्च के पादरी, हार्लेन पोपोव को उनके घर से “थोड़ी पूछताछ” के लिए ले जाया गया l दो सप्ताह बाद, उससे चौबीसों घंटे पूछताछ की गयी और दस दिनों तक भोजन नहीं दिया गया l हर बार उसने जासूस होने से इनकार किया, तो उसे पीटा गया l पोपोव न केवल अपने कठोर बर्ताव से बचे, बल्कि अपने साथी कैदियों को भी यीशु के पास ले आए l अंत में, ग्यारह साल बाद, उन्हें रिहा कर दिया गया और उन्होंने अपने विश्वास को साझा करना जारी रखा जब तक कि, दो साल बाद, वह उस देश को छोड़ कर पुनः अपने परिवार से जुड़ नहीं गए l वे आनेवाले वषों में बंद देशों में बाइबल वितरित करने हेतु प्रचार करते रहे और धन इकठ्ठा करते रहे l 

यूगों से यीशु में अनगिनत विश्वासियों की तरह, पोपोव को उनके विश्वास के कारण सताया गया था l मसीह, अपनी खुद की यातना और मृत्यु और उसके अनुयायियों के समक्ष बाद में आने वाले उत्पीडन से बहुत पहले कहा था, “धन्य हैं वे, जो धर्म के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:10) l वह आगे कहता है, “धन्य हो तुम जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निंदा करें, और सताएं और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बातें कहें” (पद.11) l 

“धन्य”? यीशु का क्या मतलब हो सकता है? वह उसके साथ रिश्ते में मिलनेवाली पूर्णता, आनंद और आराम का जिक्र कर रहा था (पद. 4, 8-10) l पोपोव दृढ़ रहा क्योंकि उसने महसूस किया कि परमेश्वर की उपस्थिति उसके कष्ट में भी शक्ति प्रदान कर रही थी l जब हम परमेश्वर के साथ चलते हैं, तो हमारी परिस्थितिचाहे कुछ भी हो, हम भी उसकी शांति का अनुभव कर सकते हैं l वह हमारे साथ है l 

पुनर्मिलन

छोटे लड़के ने उत्साह से सेना में कार्यरत पिता से प्राप्त एक डिब्बा खोला, जिनके बारे में उसका मानना था कि वे उसका जन्मदिन मनाने घर नहीं आ पाएँगे l उस डिब्बे के अन्दर लिपटा हुआ एक और उपहार था, और उस डिब्बे के अन्दर एक और जिसमें एक कागज़ के टुकड़े पर लिखा था, “आश्चर्य!” l उलझन में, उस लड़के ने ऊपर देखा – जब तुरंत ही उसका पिता कमरे में प्रवेश किया l आंसुओं के साथ वह बेटा चिल्लाते हुए अपने पिता की बाहों में कूद पड़ा, “डैडी, आई मिस्ड यू” और “आई लव यू!”

वह आश्रुपुरित लेकिन आनंदित पुनर्मिलन मेरे लिए प्रकाशितवाक्य 21 के हृदय के महिमामय क्षण के वर्णन को अधिकार में कर लेता है जब परमेश्वर की संतान अपने प्रेमी पिता को आमने-सामने देखते है – पूरी तरह नवीनीकृत और बहाल सृष्टि में l वहाँ “[परमेश्वर हमारी] आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा l” फिर हम कभी दर्द या दुःख का अनुभव नहीं करेंगे, क्योंकि हम अपने स्वर्गिक पिता के साथ होंगे l जिस प्रकार प्रकाशितवाक्य 21 में “ऊँचे शब्द” द्वारा घोषणा होती है, “देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है l वह उनके साथ डेरा करेगा . . . “ (पद.3-4) l 

एक कोमल प्रेम और आनंद है जिसका यीशु के अनुयायी पहले से ही परमेश्वर के साथ आनंद लेते हैं, जैसा कि 1 पतरस 1:8 वर्णन करता है : “उससे तुम बिन देखे प्रेम रखते हो, और अब तो उस पर बिन देखे भी विश्वास करके ऐसे आनंदित और मगन होते हो जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है l” फिर भी हमारे अविश्वसनीय, उमड़ते आनंद की कल्पना करें जब हम उसे देखेंगे जिसे हम प्यार करते थे और लालसा करते थे कि उसकी खुली बाहें हमारा स्वागत करेंगी!

सबको सहानुभूति चाहिए

जब जीवन यीशु में नया विश्वासी था और कॉलेज से निकला ही था, उसने एक तेल की एक बड़ी कंपनी में कार्य किया l सेल्समैन की भूमिका में, उसने यात्राएं की; और अपनी यात्रा में उसने लोगों की कहानियाँ सुनी – उनमें से कई मार्मिक थीं l उसने महसूस किया कि ग्राहकों की सबसे बड़ी ज़रूरत तेल नहीं थी, बल्कि सहानुभूति l उनको परमेश्वर की ज़रूरत थी l इसने जीवन को सेमिनरी जाकर परमेश्वर के हृदय के विषय जानने और आखिरकार पास्टर बनने के लिए प्रेरित किया l 

जीवन की सहानुभूति का उद्गम यीशु में था l मत्ती 9:27-33 में हमें दो दृष्टिहीनों और एक दुष्टात्माग्रस्त मनुष्य की आश्चर्यजनक चंगाई में मसीह की करुणा की झलक मिलती है l “वह अपनी समस्त सांसारिक सेवा के दौरान, “सब नगरों और गाँवों में” (पद.35) सुसमाचार प्रचार करता रहा और चंगाई देता रहा l क्यों? “जब उसने भीड़ को देखा तो उसको लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे” (पद.36) l 

आज का संसार अभी भी परेशान और दुखित लोगों से भरा हुआ है जिन्हें एक उद्धारकर्ता की कोमल देखभाल की ज़रूरत है l अपनी भेड़ की अगुवाई, सुरक्षा, और देखभाल करनेवाले चरवाहे की तरह, यीशु अपने निकट आनेवालों पर अपनी सहानुभूति दिखाता है (11:28) l कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम जीवन में कहाँ हैं और हम क्या अनुभव कर रहे हैं, हम उसमें कोमलता और देखभाल से उमड़ता हुआ हृदय पाते हैं l और जब हम परमेश्वर की प्रेममयी करुणा के लाभार्थी बन गए हैं, हम इसे दूसरों तक पहुँचाए बिना रह नहीं सकते हैं l 

आशा में जल

टॉम और मार्क की सेवा जीवनों को तरोताज़ा करती है l वीडियों में यह स्पष्ट है कि एक खुले स्नानघर में पूरे कपड़े पहने हुए बच्चों का एक समूह हँस और नाच रहा है – उनके लिए यह पहली बार हुआ है l ये लोग हैती(Haiti) देश में स्थानीय कलीसियाओं के साथ मिलकर कुओं में छनाई/निस्यन्दन(filtration) प्रणाली इनस्टॉल करके, दूषित जल से जुड़ी बीमारियों को रोककर जीवनों को आसान बनाते और बढ़ाते हैं l स्वच्छ, ताजे जल तक पहुँच लोगों को उनके भविष्य के लिए आशा देता है l

यीशु ने यूहन्ना 4 में “जीवन जल” का सन्दर्भ देकर तरोताजगी के निरंतर श्रोत के समान विचार को पकड़ लेने का उल्लेख किया l थके और प्यासे यीशु ने एक सामरी स्त्री से पीने के लिए जल माँगा (पद.4-8) l इस अनुरोध के कारण एक संवाद आरम्भ हुआ, जिसमें यीशु ने स्त्री को “जीवन जल” (पद.9-15) की पेशकश की – जल जो उसके जीवन और आशा का श्रोत बन जाएगा, जैसे “अनंत जीवन के लिए उमड़ता रहेगा” (पद.14) l

हमें पता चलता है कि यह जीवन जल बाद में यूहन्ना में क्या है जब यीशु ने कहा, “यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए और पीए,” यह घोषणा करते हुए कि जो कोई भी उस पर विश्वास करता है, उसके पास “जीवन के जल की नदियाँ ]बहेंगी) l” उसने यह वचन पवित्र आत्मा के विषय में कहा” (पद.37-39) l    

आत्मा के द्वारा, विश्वासी मसीह में एक किये जाते हैं और असीम सामर्थ्य, आशा और परमेश्वर में पाए जाने वाले आनंद तक उनकी पहुँच होती है l जीवन जल की तरह, पवित्र आत्मा विश्वासियों के भीतर रहते हुए, हमें ताज़ा और नवीनीकृत करता है l

सच्चे मित्र

मध्य विद्यालय में, मेरे पास एक “कभी-कभी” सहेली थी l हम दोनों हमारी छोटी कलीसिया में “घनिष्ठ मित्र” थे (जहाँ मैं उसकी उम्र की एक ही लड़की थी), और हम कभी-कभी स्कूल के बाहर एक साथ रहते थे l लेकिन स्कूल में यह एक अलग कहानी थी l अगर वह मुझसे खुद मिलती थी, तो हेलो कह सकती थी; लेकिन केवल अगर कोई और आसपास नहीं होता था l यह महसूस करते हुए, मैंने शायद ही कभी स्कूल की दीवारों के भीतर उसका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की l मुझे हमारी मित्रता की सीमा पता थी l

शायद हम सभी ने एकतरफा या संकीर्ण मित्रता के दर्द का अनुभव किया है l लेकिन एक और तरह की मित्रता है – एक जो सभी सीमाओं से परे फैली हुयी है l यह सादृश्य स्वभाव वालों के साथ हमारी मित्रता है जो हमारे साथ जीवन की यात्रा को साझा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं l

दाऊद और योनातान इसी प्रकार के मित्र थे l योनातान दाऊद के साथ “आत्मा में एक” था और उसे “अपने प्राण के समान प्यार करता था” (1 शमूएल 18:1-3) l हालाँकि, योनातान अपने पिता शाऊल की मृत्यु के बाद शासन करने के लिए कतार में था, वह परमेश्वर के चुने हुए प्रतिस्थापन दाऊद के प्रति वफादार था l योनातान ने शाऊल द्वारा दाऊद की हत्या करने के दो षड्यंत्रों से बच निकलने में उसकी मदद की थी (19:1-6; 20:1-42) l

सभी बाधाओं के बावजूद, योनातान और दाऊद मित्र बने रहे – जो नीतिवचन 17:17 की सच्चाई की ओर इशारा करता है : “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है l” उनकी विश्वासयोग्य मित्रता हमें प्यार भरे रिश्ते की झलक देती है जो परमेश्वर हमारे साथ रखता है (युहन्ना 3:16; 15:15) l उनकी तरह की मित्रता के द्वारा, परमेश्वर के प्यार के बारे में हमारी समझ गहरी हो जाती है l

मुड़कर भागो

ऐली के पास प्रेमी माता-पिता थे और वह एक खुबसूरत, स्मार्ट, और प्रतिभाशाली किशोरी थी l परन्तु हाई स्कूल के बाद किसी व्यक्ति या स्थिति ने उसे हेरोइन(नशीला पदार्थ) लेने को उकसाया l उसके माता पिता ने उसके अन्दर बदलाव देखकर उसे स्वास्थ्यलाभ/पुनर्वासन केंद्र भेज दिया जिसके बाद ऐली ने आख़िरकार उसके ऊपर होनेवाले प्रभाव को स्वीकार किया l इलाज के बाद, उन्होंने उससे पूछा कि नशीला पदार्थ के उपयोग के विषय वह अपने मित्रों से क्या कहना चाहेगी l उसकी सलाह थी : “केवल मुड़कर भागो l” उसने निवेदन किया कि “केवल नहीं कहना” प्रर्याप्त नहीं है l 

दुखद रूप से, ऐली पुनः पूर्व दशा में चली गयी और नशीले पदार्थ के अधिक मात्रा में सेवन करने के कारण बाईस वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गयी l उसके दुखी माता-पिता दूसरों को उस नियति से बचाने के प्रयास में, एक स्थानीय न्यूज़ कार्यक्रम में उपस्थित होकर श्रोताओं से उन स्थितियों से दूर रहकर जहाँ वे नशीले पदार्थ और दूसरे खतरों के संपर्क में आ सकते हैं उन्हें “ऐली के लिए दौड़ेने” के लिए उत्साहित किया l

प्रेरित पौलुस ने अपने आत्मिक पुत्र तीमुथियुस से (और हम सबसे) बुराई से भागने पर जोर दिया (2 तीमुथियुस 2:22), और प्रेरित पतरस ने भी उसी प्रकार चेतावनी दी, “सचेत हो, और जागते रहो; क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए l विश्वास में दृढ़ होकर . . .  उसका सामना करो” (1 पतरस 5:8-9) l

हममें से कोई भी परीक्षा से मुक्त नहीं है l और अक्सर सबसे अच्छी बात यह है कि हम उन स्थितियों से दूर हो जाएं जहां हमारे सामने परीक्षा आ सकती है – यद्यपि हमेशा परीक्षाएं टाली नहीं जा सकती हैं l परन्तु हम बाइबल पर आधारित होकर और प्रार्थना की सामर्थ्य से मजबूत विशवास रखते हुए बेहतर तैयार रह सकते हैं l जब हम “विश्वास में दृढ़ [खड़े रहते हैं] हम जानेंगे कब हमें मुड़ना है और कब परमेश्वर की ओर भागना है l

विशवास की विरासत

निर्णायक क्षण से बहुत पहले जब बिली ग्रैहम सोलह वर्ष की उम्र में मसीह में विश्वास में आए, यीशु के प्रति उनके माता-पिता की भक्ति प्रगट थी l वे दोनों विश्वासियों के एक परिवार में विशवास किये थे और उनका पालन पोषण भी वहीं हुआ था l बिली के माता-पिता ने अपने विवाह के बाद, प्रेमपूर्वक अपने बच्चों का पालन-पोषण करने के द्वारा उस विरासत को जारी रखा, जिसमें प्रार्थना और बाइबल पठन और बच्चों के साथ विश्वासयोग्यता से चर्च जाना शामिल था l ग्रैहम के माता-पिता द्वारा बिली के लिए दृढ़ बुनियाद रखना ही वह मिटटी थी जिसे परमेश्वर ने उसे विश्वास में लाने के लिए उपयोग किया और, अंततः, एक दृढ़ सुसमाचार प्रचारक की उसकी बुलाहट भी l

प्रेरित पौलुस का युवा शागिर्द तीमुथियुस भी एक मजबूत आत्मिक बुनियाद से फायदा उठाया था l पौलुस ने लिखा, “मुझे तेरे उस निष्कपट विश्वास की सुधि आती है, जो पहले तेरी नानी लोइस और तेरी माता युनिके में था” (2 तीमुथियुस 1:5) l इस विरासत ने तीमुथियुस को तैयार किया और उसके हृदय को मसीह में विश्वास करने की ओर ले चला l

अब पौलुस तीमुथियुस को अपने विशवास की परम्परा को आगे ले चलने का आग्रह करता है (पद.5), “परमेश्वर के . . . वरदान को . . . [पवित्र आत्मा द्वारा जो] “सामर्थ्य” [देता है,  अपने अन्दर] प्रज्वलित कर दे” (पद.6-7) l आत्मा की सामर्थ्य के कारण, तीमुथियुस निर्भय होकर सुसमाचार के लिए जी सकता था (पद.8) l एक मजबूत आत्मिक विरासत गारन्टी नहीं देता है कि हम विश्वास में आ जाएंगे, परन्तु दूसरों का नमूना और सलाह मार्ग प्रशस्त करने में सहायता कर सकता है l और हमारे यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण करने के बाद, आत्मा सेवा में, उसके साथ जीवन जीने में, और दूसरों के विश्वास को पोषित करने में भी हमारी अगुवाई करेगा l