वह जानी मानी मुस्कराहट
हम दोनों पति पत्नी को पेरिस में लवरे(Louvre) अजायब घर देखने का अवसर मिला l मैंने अपनी ग्यारह वर्षीय पौत्री, एडी को फ़ोन कर उससे डा विन्ची की प्रसिद्ध चित्रकारी मोना लीसा की बात बतायी l एडी ने पूछा, “क्या वह मुस्करा रही है?”
क्या इस चित्र के विषय यह बड़ा प्रश्न नहीं है? लियोनार्डो डा विन्ची के द्वारा बनाए गए इस चित्र के 600 वर्षों बाद भी हम नहीं जानते कि यह स्त्री मुस्करा रही थी या नहीं l इस चित्र की ख़ूबसूरती द्वारा मंत्रमुग्ध होने के बाद भी, हम मोना लीसा के आचरण को नहीं जानते हैं l
“मुस्कराहट” उस चित्रकारी की जिज्ञासा का हिस्सा है l किन्तु फिर भी यह कितना महत्वपूर्ण है? क्या मुस्कराहट कुछ है जिसके विषय बाइबिल बताती है? वास्तव में, यह शब्द वचन में पाँच बार से कम आया है, और ऐसा कुछ नहीं जिसे हमसे करने को कहा गया है l हालाँकि, बाइबिल हमसे मुस्कराने वाला आचरण रखने को कहती है-अर्थात आनंद l हम लगभग 250 बार आनंद के विषय पढ़ते हैं : “मेरा हृदय प्रफुल्लित है,” दाऊद प्रभु के विषय विचार करते हुए कहता है (भजन 28:7) l हमें “यहोवा के कारण जयजयकार करना है” (भजन 33:1); परमेश्वर के नियम “मेरे हृदय के हर्ष का कारण हैं” (119:111); और “हम आनंदित हैं” क्योंकि “यहोवा ने हमारे साथ बड़े बड़े काम किए हैं” (126:3) l
स्पष्ट रूप से, परमेश्वर हमारे लिए सब कुछ करके आनंद देता है जो हमारे चेहरे पर मुस्कराहट लाती है l
रूत की कहानी
रूत रोकर ही अपनी कहानी बता सकती है l अस्सी से ऊपर और चलने फिरने में अयोग्य, रूत हमारे चर्च में मुख्य व्यक्ति नहीं लगती है l वह कहीं जाने के लिए दूसरों पर निर्भर है, और अकेली रहने के कारण उसके प्रभाव का क्षेत्र छोटा है l
किन्तु जब वह अपने उद्धार की कहानी बताती है-जो वह अक्सर करती है-रूत परमेश्वर के अनुग्रह की एक अद्भुत मिसाल है l जब वह 30 के आसपास की थी, एक सहेली उसे एक प्रार्थना सभा में ले गयी l रूत नहीं जानती थी कि वह एक उपदेशक की सुनने जा रही है l वह कहती है, “यदि मैं जानती तो कभी नहीं जाती l” वह पहले से “धर्म” में विश्वास करती थी जो उसके लिए लाभहीन था l किन्तु वह गयी l और उस रात उसने यीशु का सुसमाचार सुना l
अब, पचास वर्ष बाद, वह उसके जीवन को रूपांतरित करनेवाले यीशु की कहानी आनंद के आंसुओं के साथ बताती है l उस शाम, वह परमेश्वर की संतान बन गयी l उसकी कहानी कभी पुरानी नहीं होती l
इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि हमारी कहानी रूत की तरह है या नहीं l अर्थपूर्ण यह है कि हम यीशु और उसकी मृत्यु और उसके पुनरुत्थान में सरलता से विश्वास करें l प्रेरित पौलुस कहता है, “यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकार अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:9) l
रूत ने यही किया l आप भी कर सकते हैं l यीशु हमें छुड़ाता है, रूपांतरित करता है, और नया जीवन देता है l
कमरा नंबर 5020
जे बफन ने अपने हॉस्पिटल के कमरे को एक प्रकाशस्तंभ में बदल दिया l
बावन वर्षीय वृद्ध पति, पिता, हाई स्कूल शिक्षक, और कोच कैंसरग्रस्त था, किन्तु उसका कमरा नंबर 5020 मित्र, परिवार, और हॉस्पिटल कार्यकर्ताओं के लिए आशा का प्रकाशस्तंभ बन गया l उसके आनंदित आचरण और मजबूत विश्वास के कारण नर्सेज चाहती थीं कि उनकी ड्यूटी जे के कमरे में लगायी जाए l कुछ एक तो ड्यूटी समाप्त होने पर भी उससे मिलने आती थीं l
यद्यपि एक समय उसका मजबूत शरीर दुर्बल होता जा रहा था, वह सभी से मुस्कराकर और उत्साह के साथ मिलता था l एक मित्र ने कहा, “जे से हर मुलाकात के समय वह प्रसन्न, सकारात्मक और आशापूर्ण दिखाई देता था l कैंसर और मृत्यु सामने होने पर भी वह अपने विश्वास को जी रहा था l”
जे के अंतिम संस्कार के समय, एक वक्ता ने ध्यान दिया कि कमरा नंबर 5020 विशेष रूप से अर्थपूर्ण था l उसने उत्पत्ति 50:20 की ओर इशारा किया, जिसमें युसूफ कहता है कि यद्यपि उसके भाइयों ने उसे दासत्व में बेच दिया, परमेश्वर ने मेज को पलट दिया और कुछ भला संपन्न किया : “बहुत से लोगों के प्राण बचे l” जे को कैंसर हुआ, किन्तु परमेश्वर के कार्य को पहचानकर जे कह सका कि “परमेश्वर ने ... भलाई का विचार किया l” इसीलिए जे कैंसर के विनाश का उपयोग दूसरों को यीशु के विषय बताने में किया l
द्वार पर मृत्यु के दस्तक के बीच, हमारे उद्धारकर्ता में अडिग भरोसा की कितनी बड़ी विरासत! हमारे भले और भरोसेमंद परमेश्वर में भरोसे की कितनी बड़ी साक्षी!
बिल्कुल नया
कुछ वर्ष पूर्व एक प्रकाशक ने गलती की l एक पुस्तक बहुत वर्षों से बिक रही थी, इसलिए उसमें बदलाव ज़रूरी था l लेखक ने पुस्तक को पुनः लिखकर उसे बिल्कुल नया करना चाहा l किन्तु नए संकरण के प्रकाशन बाद, समस्या खड़ी हो गई l प्रकाशक ने नये आवरण के साथ पुरानी पुस्तक को छाप दी l
बाहरी आवरण साफ़ और नया था, किन्तु भीतर पुराना और पुराना l यह “नया संस्करण” नया नहीं था l
कभी-कभी लोग मानते हैं कि जीवन में बदलाव ज़रूरी है l बातें गलत दिशा में जा रही हैं l इसलिए हृदय में ज़रूरी बदलाव किये बिना बाहरी आवरण बदल देते हैं l वे किसी बाहरी आचरण को बदल देते हैं किन्तु समझते नहीं कि केवल परमेश्वर ही अन्दर का बदलाव ला सकता है l
यूहन्ना 3 में, निकुदेमुस ने ऐसा महसूस किया क्योंकि यीशु “परमेश्वर की ओर से” था (पद.2) l उसने बिल्कुल भिन्न बात बताया l यीशु के कहने पर निकुदेमुस ने पहचाना कि यीशू नए जन्म से कम कुछ नहीं देता है (पद.4) : उसे बिल्कुल नया बनने के लिए “नए सिरे” से जन्म लेना था (पद.7) l
बदलाव केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने से आता है l यह तब होता है जब “पुरानी बातें बीत” जाती हैं और “सब बातें नयी” हो जाती हैं (2 कुरिं. 5:17) l क्या आपको परिवर्तन चाहिए? यीशु में विश्वास करें l वही आपके हृदय को बदलकर सब कुछ बिल्कुल नया कर देता है l
दूसरों की रूचियाँ
मेरा मित्र जैमी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय निगम में काम करता है l कंपनी के साथ अपने काम के आरंभिक दिनों में, एक व्यक्ति उसके दफ्तर में आकर बातचीत शुरु करके जैमी से पूछा कि वह वहां क्या करता है l उस व्यक्ति को अपने काम के विषय बताते हुए, जैमी ने उस व्यक्ति से उसका नाम पुछा l “मेरा नाम रिच है,” उसने उत्तर दिया l
“आप से मिलकर ख़ुशी हुई,” जैमी ने उत्तर दिया l “और आप यहाँ क्या करते है?”
“ओ, मैं मालिक हूँ l”
जैमी ने अचानक पहचाना कि आकस्मिक, सरल बातचीत संसार के एक सबसे धनी व्यक्ति के लिए उसका परिचय था l
आज आत्म-प्रशंसा और “खुद” के विषय ख़ुशी मनाने वाली यह छोटी कहानी फिलिप्पियों की पत्री में पौलुस के महत्वपूर्ण शब्दों की ताकीद हो सकती है : विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो” (2:3) l जो लोग अपना ध्यान अपनी ओर न करके दूसरों की ओर करते हैं उनके भीतर पौलुस के बताए हुए गुण हैं l
जब हम “दूसरों को अपने से अच्छा” समझते हैं, हम मसीह की दीनता प्रगट करते हैं (पद.3) l हम मसीह का अनुसरण करते हैं, जो इसलिए नहीं आया कि उसकी “सेवा टहल की जाए”, किन्तु इसलिए कि “आप ही सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l जब हम “दास का स्वरुप” धारण करते हैं (फ़िलि. 2:7), हममें मसीह का स्वभाव होता है (पद.5) l
आज जब हम दूसरों के साथ बातचीत करते हैं, हम केवल अपने ही हित के नहीं किन्तु “दूसरों के हित की भी चिंता करें” (पद.4) l
एक “नया मनुष्य”
मोंटेगो, जमाइका में किशोरों का एक समूह वृद्धाश्रम घूमने गया l एक युवती ने एक कमरे में एक अकेले व्यक्ति को देखा l उसके पास केवल एक खाट थी , जिस पर अशक्तता के कारण वह स्थिर था l
उस किशोरी ने सीधे उसको परमेश्वर के प्रेम की कहानी और बाइबिल के कुछ परिच्छेद पढ़कर सुनाया l बाद में वह याद करती, “उसके साथ संवाद करते समय, मैंने उसके अन्दर और सुनने की जिज्ञासा देखी l” प्रतिउत्तर में, उसने यीशु की बलिदानी मृत्यु का आश्चर्य बताया l उसने याद किया, “इस आशाहीन और परिवार रहित व्यक्ति के लिए समझना कठिन था कि कोई अपरिचित व्यक्ति उससे प्रेम करके उसके पापों के लिए क्रूस पर अपना प्राण दे l”
उसने उसे विश्वास करनेवालों के लिए स्वर्ग की प्रतिज्ञा(एक नया शरीर भी) के साथ यीशु के विषय और बताया l उसने उससे पुछा, “क्या तुम मेरे संग वहां नाचोगी?” उसने उसको अपने दुर्बल शरीर और अशक्त करनेवाली सीमाओं से स्वतंत्रता की कल्पना करते देखा l
यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण करने की इच्छा जताने पर, उसने उसे क्षमा और विश्वास की प्रार्थना में सहायता की l तस्वीर लेने के आग्रह पर, उस व्यक्ति ने कहा, “यदि तुम मुझे बैठने में मदद करोगी l मैं एक नया मनुष्य हूँ l”
जीवन-परिवर्तन, आशा-देनेवाले, सब के लिए यीशु मसीह के सुसमाचार हेतु परमेश्वर की स्तुति हो! हर एक विश्वास करनेवाले के लिए नया जीवन है (कुलु. 1:5, 23) l
“मैं सचमुच ... भयभीत हूँ”
“मैं सचमुच भयभीत हूँ l” एक किशोरी ने अपने फेसबुक मित्रों को आनेवाले अपने कुछेक मेडिकल जांच के विषय एक मार्मिक नोट भेजा l वह अपने घर से तीन घंटे की दूरी पर हॉस्पिटल में भर्ती अनेक जांच से निकल रही थी और व्याकुलता से इंतज़ार कर रही थी जब डॉक्टर्स उसकी गंभीर चिकित्सीय समस्याओं की जड़ जानने की कोशिश में लगे थे l
हममें से किसने अपने युवावस्था अथवा बाद के वर्षों में वास्तव में भयभीत करने वालीं अनिच्छित जीवन घटनाओं का सामना नहीं किया होगा? और हम सहायता के लिए किसकी ओर मुड़ सकते हैं? हमें इन परिस्थितियों में साहस के लिए वचन में कैसी शांति मिलती है?
यह सच्चाई कि परमेश्वर हमारे संघर्षों में साथ रहकर मदद करेगा हमें आशा दे सकती है l यशायाह 41:13 हमसे कहता है, “क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा, तेरा दाहिना हाथ पकड़कर कहूँगा, ‘मत डर, मैं तेरी सहायता करूँगा l’”
इसके साथ, प्रार्थना में अपनी वर्तमान कठिनाइयां परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने पर वह हमें अवर्णनीय, हृदय की सुरक्षा करने वाली शांति देगा (फ़िलि. 4:6-7) l
हम परमेश्वर की विजयी उपस्थिति और उसकी शांति जो “सारी समझ से परे है” (पद.7), के द्वारा वास्तव में भयभीत करनेवाली स्थितियों को सहने के लिए आशा और मदद पा सकते हैं l
सेवा हेतु उपस्थित
हमारी कलीसिया नए अगुओं को समर्पित करनेवाली थी l सेवक-अगुआ के प्रतीक को बताने के लिए, कलीसिया के प्राचीनों ने पाँव धोने के यादगार क्षण में भागीदारी की l प्रत्येक अगुआ-पासवान के साथ-मण्डली की उपस्थिति में एक दूसरे के पाँव धोए l
उस दिन प्राचीनों द्वारा किये गए कार्य को यीशु ने हमारे लिए नमूना के तौर पर किया था, जैसे कि यूहन्ना 13 में वर्णित है l उस घटना में, जिसे अंतिम भोज कहा जाता है, यीशु ने “भोजन पर से उठकर ... बर्तन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने ... लगा” (यूहन्ना 13:4-5) l बाद में, यीशु अपने शिष्यों को इसका कारण बताते हुए कहा, “दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं, और न भेजा हुआ अपने भेज्नेवेवाले से” (पद.16) l उसने यह भी कहा, “मैं तुम्हारे बीच में सेवक के समान हूँ” (लूका 22:27) l
यदि ऐसा छोटा काम यीशु की गरिमा से निम्न नहीं है, तो दूसरों की सेवा हमारे लिए भी निम्न नहीं है l उसने हमारे सामने कितना अद्भुत उदाहरण रखा l वास्तव में, वह “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l उसने हमें दिखाया कि एक अगुआ और एक सेवक होना क्या है l यह यीशु है, जो सेवा करता है l
एक जैसा
उनका कहना है, हम सब में वह है : कुछ लोग उसे Doppelgangers कहते हैं l एक जैसा l शायद हमसे असम्बद्ध लोग जो बहुत हद तक हमारे जैसा दिखाई देते हैं l
मेरी तरह दिखाई देने वाला संगीत के क्षेत्र में है l उसके एक समारोह में जाने पर, मध्यांतर के समय मुझे अनेक प्रशंसकों से हास्य प्रतिक्रियाएं मिलीं l किन्तु अफ़सोस, जब गाने और गिटार बजाने की बात होती है, मैं जेम्स टेलर नहीं हूँ l हम केवल एक जैसे दिखाई देते हैं l
आप किस की तरह दिखाई देते हैं? इस प्रश्न पर विचार करते हुए आप, 2 कुरिन्थिन्यों 3:18 पर चिंतन करें, जहाँ पौलुस हमें बताता है कि हम [प्रभु] के रूप में रूपांतरित होते जा रहे हैं l” अपने जीवनों में प्रभु को आदर देते हुए, हमारा एक लक्ष्य उसके स्वरुप को धारण करना है l अवश्य ही, इसका अर्थ दाढ़ी रखना और सैंडल पहनना नहीं है-इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा मसीह के चरित्र को हमारे जीवनों में प्रगट करने में सहायता करता है l उदाहरणार्थ, आचरण में (दीनता), चरित्र में(प्रेम), और दयालुता में(साथ हो लेने), हमें यीशु की तरह दिखाई देना और उसका अनुकरण करना है l
अपनी आँखों को यीशु की ओर लगाकर “प्रभु की महिमा पर विचारते हुए,” हम उसकी तरह और बनते जाते हैं l कितना अद्भुत होता यदि लोग हमें देखकर कहते, “मैं तुममें यीशु को देखता हूँ”!