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Articles by डेव ब्रेनन

कमरा नंबर 5020

जे बफन ने अपने हॉस्पिटल के कमरे को एक प्रकाशस्तंभ में बदल दिया l

बावन वर्षीय वृद्ध पति, पिता, हाई स्कूल शिक्षक, और कोच कैंसरग्रस्त था, किन्तु उसका कमरा नंबर 5020 मित्र, परिवार, और हॉस्पिटल कार्यकर्ताओं के लिए आशा का प्रकाशस्तंभ बन गया l उसके आनंदित आचरण और मजबूत विश्वास के कारण नर्सेज चाहती थीं कि उनकी ड्यूटी जे के कमरे में लगायी जाए l कुछ एक तो ड्यूटी समाप्त होने पर भी उससे मिलने आती थीं l

यद्यपि एक समय उसका मजबूत शरीर दुर्बल होता जा रहा था, वह सभी से मुस्कराकर  और उत्साह के साथ मिलता था l एक मित्र ने कहा, “जे से हर मुलाकात के समय वह प्रसन्न, सकारात्मक और आशापूर्ण दिखाई देता था l कैंसर और मृत्यु सामने होने पर भी वह अपने विश्वास को जी रहा था l”

जे के अंतिम संस्कार के समय, एक वक्ता ने ध्यान दिया कि कमरा नंबर 5020 विशेष रूप से अर्थपूर्ण था l उसने उत्पत्ति 50:20 की ओर इशारा किया, जिसमें युसूफ कहता है कि यद्यपि उसके भाइयों ने उसे दासत्व में बेच दिया, परमेश्वर ने मेज को पलट दिया और कुछ भला संपन्न किया : “बहुत से लोगों के प्राण बचे l” जे को कैंसर हुआ, किन्तु परमेश्वर के कार्य को पहचानकर जे कह सका कि “परमेश्वर ने ... भलाई का विचार किया l” इसीलिए जे कैंसर के विनाश का उपयोग दूसरों को यीशु के विषय बताने में किया l

द्वार पर मृत्यु के दस्तक के बीच, हमारे उद्धारकर्ता में अडिग भरोसा की कितनी बड़ी विरासत! हमारे भले और भरोसेमंद परमेश्वर में भरोसे की कितनी बड़ी साक्षी!

बिल्कुल नया

कुछ वर्ष पूर्व एक प्रकाशक ने गलती की l एक पुस्तक बहुत वर्षों से बिक रही थी, इसलिए उसमें बदलाव ज़रूरी था l लेखक ने पुस्तक को पुनः लिखकर उसे बिल्कुल नया करना चाहा l किन्तु नए संकरण के प्रकाशन बाद, समस्या खड़ी हो गई l प्रकाशक ने नये आवरण के साथ पुरानी पुस्तक को छाप दी l

बाहरी आवरण साफ़ और नया था, किन्तु भीतर पुराना और पुराना l यह “नया संस्करण” नया नहीं था l

कभी-कभी लोग मानते हैं कि जीवन में बदलाव ज़रूरी है l बातें गलत दिशा में जा रही हैं l इसलिए हृदय में ज़रूरी बदलाव किये बिना बाहरी आवरण बदल देते हैं l वे किसी बाहरी आचरण को बदल देते हैं किन्तु समझते नहीं कि केवल परमेश्वर ही अन्दर का बदलाव ला सकता है l

यूहन्ना 3 में, निकुदेमुस ने ऐसा महसूस किया क्योंकि यीशु “परमेश्वर की ओर से” था (पद.2) l उसने बिल्कुल भिन्न बात बताया l यीशु के कहने पर निकुदेमुस ने पहचाना कि यीशू नए जन्म से कम कुछ नहीं देता है (पद.4) : उसे बिल्कुल नया बनने के लिए “नए सिरे” से जन्म लेना था (पद.7) l

बदलाव केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने से आता है l यह तब होता है जब “पुरानी बातें बीत” जाती हैं और “सब बातें नयी” हो जाती हैं (2 कुरिं. 5:17) l क्या आपको परिवर्तन चाहिए? यीशु में विश्वास करें l वही आपके हृदय को बदलकर सब कुछ बिल्कुल नया कर देता है l

दूसरों की रूचियाँ

मेरा मित्र जैमी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय निगम में काम करता है l कंपनी के साथ अपने काम के आरंभिक दिनों में, एक व्यक्ति उसके दफ्तर में आकर बातचीत शुरु करके जैमी से पूछा कि वह वहां क्या करता है l उस व्यक्ति को अपने काम के विषय बताते हुए, जैमी ने उस व्यक्ति से उसका नाम पुछा l “मेरा नाम रिच है,” उसने उत्तर दिया l

“आप से मिलकर ख़ुशी हुई,” जैमी ने उत्तर दिया l “और आप यहाँ क्या करते है?”

“ओ, मैं मालिक हूँ l”

जैमी ने अचानक पहचाना कि आकस्मिक, सरल बातचीत संसार के एक सबसे धनी व्यक्ति के लिए उसका परिचय था l

आज आत्म-प्रशंसा और “खुद” के विषय ख़ुशी मनाने वाली यह छोटी कहानी फिलिप्पियों की पत्री में पौलुस के महत्वपूर्ण शब्दों की ताकीद हो सकती है : विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो” (2:3) l जो लोग अपना ध्यान अपनी ओर न करके दूसरों की ओर करते हैं उनके भीतर पौलुस के बताए हुए गुण हैं l

जब हम “दूसरों को अपने से अच्छा” समझते हैं, हम मसीह की दीनता प्रगट करते हैं (पद.3) l हम मसीह का अनुसरण करते हैं, जो इसलिए नहीं आया कि उसकी “सेवा टहल की जाए”, किन्तु इसलिए कि “आप ही सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l जब हम “दास का स्वरुप” धारण करते हैं (फ़िलि. 2:7), हममें मसीह का स्वभाव होता है (पद.5) l

आज जब हम दूसरों के साथ बातचीत करते हैं, हम केवल अपने ही हित के नहीं किन्तु “दूसरों के हित की भी चिंता करें” (पद.4) l

एक “नया मनुष्य”

मोंटेगो, जमाइका में किशोरों का एक समूह वृद्धाश्रम घूमने गया l एक युवती ने एक कमरे में एक अकेले व्यक्ति को देखा l  उसके पास केवल एक खाट थी , जिस पर अशक्तता के कारण वह स्थिर था l

उस किशोरी ने सीधे उसको परमेश्वर के प्रेम की कहानी और बाइबिल के कुछ परिच्छेद पढ़कर सुनाया l बाद में वह याद करती, “उसके साथ संवाद करते समय, मैंने उसके अन्दर और सुनने की जिज्ञासा देखी l” प्रतिउत्तर में, उसने यीशु की बलिदानी मृत्यु का आश्चर्य बताया l उसने याद किया, “इस आशाहीन और परिवार रहित व्यक्ति के लिए समझना कठिन था कि कोई अपरिचित व्यक्ति उससे प्रेम करके उसके पापों के लिए क्रूस पर अपना प्राण दे l”

उसने उसे विश्वास करनेवालों के लिए स्वर्ग की प्रतिज्ञा(एक नया शरीर भी) के साथ यीशु के विषय और बताया l उसने उससे पुछा, “क्या तुम मेरे संग वहां नाचोगी?” उसने उसको अपने दुर्बल शरीर और अशक्त करनेवाली सीमाओं से स्वतंत्रता की कल्पना करते देखा l

यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण करने की इच्छा जताने पर, उसने उसे क्षमा और विश्वास की प्रार्थना में सहायता की l तस्वीर लेने के आग्रह पर, उस व्यक्ति ने कहा, “यदि तुम मुझे बैठने में मदद करोगी l मैं एक नया मनुष्य हूँ l”

जीवन-परिवर्तन, आशा-देनेवाले, सब के लिए यीशु मसीह के सुसमाचार हेतु परमेश्वर की स्तुति हो! हर एक विश्वास करनेवाले के लिए नया जीवन है (कुलु. 1:5, 23) l

“मैं सचमुच ... भयभीत हूँ”

“मैं सचमुच भयभीत हूँ l” एक किशोरी ने अपने फेसबुक मित्रों को आनेवाले अपने कुछेक मेडिकल जांच के विषय एक मार्मिक नोट भेजा l वह अपने घर से तीन घंटे की दूरी पर हॉस्पिटल में भर्ती अनेक जांच से निकल रही थी और व्याकुलता से इंतज़ार कर रही थी जब डॉक्टर्स उसकी गंभीर चिकित्सीय समस्याओं की जड़ जानने की कोशिश में लगे थे l

हममें से किसने अपने युवावस्था अथवा बाद के वर्षों में वास्तव में भयभीत करने वालीं अनिच्छित जीवन घटनाओं का सामना नहीं किया होगा? और हम सहायता के लिए किसकी ओर मुड़ सकते हैं? हमें इन परिस्थितियों में साहस के लिए वचन में कैसी शांति मिलती है?

यह सच्चाई कि परमेश्वर हमारे संघर्षों में साथ रहकर मदद करेगा हमें आशा दे सकती है l यशायाह 41:13 हमसे कहता है, “क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा, तेरा दाहिना हाथ पकड़कर कहूँगा, ‘मत डर, मैं तेरी सहायता करूँगा l’”

इसके साथ, प्रार्थना में अपनी वर्तमान कठिनाइयां परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने पर वह हमें अवर्णनीय, हृदय की सुरक्षा करने वाली शांति देगा (फ़िलि. 4:6-7) l

हम परमेश्वर की विजयी उपस्थिति और उसकी शांति जो “सारी समझ से परे है” (पद.7), के द्वारा वास्तव में भयभीत करनेवाली स्थितियों को सहने के लिए आशा और मदद पा सकते हैं l

सेवा हेतु उपस्थित

हमारी कलीसिया नए अगुओं को समर्पित करनेवाली थी l सेवक-अगुआ के प्रतीक को बताने के लिए, कलीसिया के प्राचीनों ने पाँव धोने के यादगार क्षण में भागीदारी की l प्रत्येक अगुआ-पासवान के साथ-मण्डली की उपस्थिति में एक दूसरे के पाँव धोए l

उस दिन प्राचीनों द्वारा किये गए कार्य को यीशु ने हमारे लिए नमूना के तौर पर किया था, जैसे कि यूहन्ना 13 में वर्णित है l उस घटना में, जिसे अंतिम भोज कहा जाता है, यीशु ने “भोजन पर से उठकर ... बर्तन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने ... लगा” (यूहन्ना 13:4-5) l बाद में, यीशु अपने शिष्यों को इसका कारण बताते हुए कहा, “दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं, और न भेजा हुआ अपने भेज्नेवेवाले से” (पद.16) l उसने यह भी कहा, “मैं तुम्हारे बीच में सेवक के समान हूँ” (लूका 22:27) l

यदि ऐसा छोटा काम यीशु की गरिमा से निम्न नहीं है, तो दूसरों की सेवा हमारे लिए भी निम्न नहीं है l उसने हमारे सामने कितना अद्भुत उदाहरण रखा l वास्तव में, वह “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l उसने हमें दिखाया कि एक अगुआ और एक सेवक होना क्या है l यह यीशु है, जो सेवा करता है l

एक जैसा

उनका कहना है, हम सब में वह है : कुछ लोग उसे Doppelgangers कहते हैं l एक जैसा l शायद हमसे असम्बद्ध लोग जो बहुत हद तक हमारे जैसा दिखाई देते हैं l

मेरी तरह दिखाई देने वाला संगीत के क्षेत्र में है l उसके एक समारोह में जाने पर, मध्यांतर के समय मुझे अनेक प्रशंसकों से हास्य प्रतिक्रियाएं मिलीं l किन्तु अफ़सोस, जब गाने और गिटार बजाने की बात होती है, मैं जेम्स टेलर नहीं हूँ l हम केवल एक जैसे दिखाई देते हैं l

आप किस की तरह दिखाई देते हैं? इस प्रश्न पर विचार करते हुए आप, 2 कुरिन्थिन्यों 3:18 पर चिंतन करें, जहाँ पौलुस हमें बताता है कि हम [प्रभु] के रूप में रूपांतरित होते जा रहे हैं l” अपने जीवनों में प्रभु को आदर देते हुए, हमारा एक लक्ष्य उसके स्वरुप को धारण करना है l अवश्य ही, इसका अर्थ दाढ़ी रखना और सैंडल पहनना नहीं है-इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा मसीह के चरित्र को हमारे जीवनों में प्रगट करने में सहायता करता है l उदाहरणार्थ, आचरण में (दीनता), चरित्र में(प्रेम), और दयालुता में(साथ हो लेने), हमें यीशु की तरह दिखाई देना और उसका अनुकरण करना है l

अपनी आँखों को यीशु की ओर लगाकर “प्रभु की महिमा पर विचारते हुए,” हम उसकी तरह और बनते जाते हैं l कितना अद्भुत होता यदि लोग हमें देखकर कहते, “मैं तुममें यीशु को देखता हूँ”!

वायलेट के साथ गाना

जमाइका के एक अस्पताल में कुछ किशोरों ने एक वृद्ध महिला, वाएलेट को अपने बिस्तर पर बैठे मुस्कराते देखा l उसके छोटे समूह निवास में गर्म, चिपचिपी दोपहर की हवा पूरे आवेश में आ रही थी, किन्तु उसने शिकायत नहीं की किन्तु एक गीत गाना चाही l और उसने मुस्कराकर गाया, “मैं दौड़ती, उछलती, कूदती हुई प्रभु की स्तुति कर रही हूँ!” गाते समय वह अपनी बाहों को आगे पीछे हिला रही थी, मानो वह दौड़ रही हो l लोगों की आँखें नम हुईं, क्योंकि वायलेट के पास पैर नहीं थे l वह गाती हुए बोली, “यीशु मुझसे प्रेम करता है- और स्वर्ग में दौड़ने के लिए मेरे पास पैर होंगे l”

जब फिलिप्पियों 1 में पौलुस जीवन और मृत्यु की बात करता है वाएलेट का आनंद और आशापूर्ण प्रत्याशा उसके शब्दों को नयी गूंज देती है l उसने कहा, “यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिए लाभदायक है तो मैं नहीं जानता कि किसको चुनूँ l ...जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है” (पद.22-23) l

हममें से प्रत्येक कठिन अवस्था में स्वर्गिक विश्राम चाहते हैं l किन्तु जैसे वाएलेट ने अपनी स्थिति में आनंद प्रगट किया, हम भी “दौड़ते, उछलते, और कूदते हुए प्रभु की प्रशंसा कर सकते हैं-वर्तमान के बहुतायत के जीवन के लिए और भावी आनंद के लिए l

भाषा सीखना

जमाइका के एक छोटे चर्च में मण्डली के समक्ष खड़े होकर मैंने उत्तम तरीके से प्रान्तीय भाषा में बोलने का प्रयास किया, “वा ग्वान, जमाइका ?” प्रतिक्रिया मेरी अपेक्षा से बेहतर था, जब मुकराहट और हर्षध्वनि ने मेरा अभिवादन किया l

वास्तव में, मैंने पटोइस [पा-त्वा] भाषा में केवल सामान्य शुभकामनाएं दी थी, “क्या हो रहा है?,” किन्तु उन्होंने सुना कि मैंने बोला, “मैं आपकी भाषा बोलना पसंद करता हूँ l” निःसन्देह, मैं पटोइस भाषा में आगे और नहीं बोल सकता था, किन्तु एक द्वार अवश्य ही खुल गया था l

प्रेरित पौलुस अथेने के लोगों के सामने खड़े होकर, उनको जता दिया कि वह उनकी संस्कृति से अवगत् था l उसने उनको बताया कि उसने एक “अनजाने ईश्वर के लिए” उनकी वेदी देखी थी, और उसने उनके एक कवि का सन्दर्भ भी दिया l निःसंदेह सभी ने यीशु के पुनरुत्थान सम्बंधित सन्देश पर विश्वास नहीं किया, किन्तु कुछ ने कहा, “यह बात हम तुझ से फिर कभी सुनेंगे” (प्रेरितों 17:32) l

दूसरों के साथ यीशु और उसके द्वारा प्रदत्त उद्धार के विषय बातें करते समय, वचन हमें अपने को दूसरों में निवेश करने को कहता है-उनकी भाषा सीखना, जैसे कि वह सुसमाचार बताने के लिए एक द्वार खोलना है (1 कुरिं. 9:20-23 भी देखें) l

जब हम “वा ग्वान?” दूसरों के जीवन में खोज लेते हैं, दूसरों को बताना सरल होगा जो परमेश्वर ने हमारे जीवनों में किया है l

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आपका सुरक्षित स्थान

मेरी बेटी और मैं एक बड़े पारिवारिक उत्सव के लिए तैयारी कर रहे थे l इसलिए कि वह उत्सव के विषय घबरायी हुई थी मैंने कहा कि मैं गाड़ी ड्राइव करुँगी l “ठीक है l किन्तु मैं अपनी कार में सुरक्षित महसूस करती हूँ l क्या आप चलाएंगी?” उसने पुछा l यह महसूस करके कि उसे मेरी गाड़ी छोटी लगती है, मैंने पूछा कि क्या मेरी गाड़ी बहुत छोटी थी l उसका उत्तर था, “नहीं, बस मेरी गाड़ी मुझे सुरक्षित लगती है l पता नहीं क्यों, मैं अपनी गाड़ी में आरामदायक महसूस करती हूँ l”

उसकी टिप्पणी ने मुझे मेरे “सुरक्षित स्थान” के सम्बन्ध में मुझे सोचने की चुनौती दी l तुरंत ही मैंने नीतिवचन 18:10 के विषय सोची, “यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है l” पुराने नियम के काल में, दीवारें और पहरे की मीनार लोगों को बाहरी खतरों की चेतावनी के साथ-साथ उनकी रक्षा भी करती थीं l लेखक बताना चाहता है कि परमेश्वर का नाम, जो उसका चरित्र है, व्यक्तित्व और सब कुछ है जो वह है, उसके लोगों को वास्तविक सुरक्षा देती है l

ख़ास भौतिक स्थान खतरनाक क्षणों में इच्छित सुरक्षा देने का वादा करते हैं l तूफ़ान के मध्य एक मजबूत छत l चिकित्सीय सहायता देनेवाला एक हॉस्पिटल l एक प्रिय का गले लगाना l

आपका “सुरक्षित स्थान” क्या है? हम जहाँ भी सुरक्षा खोजते हैं, उस स्थान पर हमारे साथ परमेश्वर की उपस्थिति ही है जो हमारी ज़रूरत में हमें ताकत और सुरक्षा देती है l

जब खूबसूरती ख़त्म नहीं होती

मुझे ग्रैंड घाटी देखना पसंद है l जब मैं घाटी के किनारे खड़ा होता हूँ, मैं परमेश्वर की चौंकानेवाली कृति देखता हूँ l 

यद्यपि वह भूमि में एक (बहुत बड़ा) “गड्ढा” है, ग्रैंड घाटी मुझे स्वर्ग पर विचार करने हेतु विवश करता है l एक बारह वर्षीय ईमानदार युवक ने एक बार मुझ से पूछा, “क्या स्वर्ग अरुचिकर नहीं होगा? क्या आप नहीं सोचते कि हम हमेशा परमेश्वर की प्रशंसा करते हुए थक जाएंगे?” किन्तु यदि भूमि में एक “गड्ढा” इतना जबरदस्त खुबसूरत है और हम उसे देखते नहीं थकते हैं, हम खूबसूरती के श्रोत-हमारे प्रेमी सृष्टिकर्ता-को नयी सृष्टि के सम्पूर्ण असली आश्चर्य में एक दिन देखने की कल्पना ही कर सकते हैं l

“एक वर मैंने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिससे यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूँ,” (भजन 27:4) दाऊद ने इन शब्दों को लिखते हुए यह इच्छा प्रगट की l परमेश्वर की उपस्थिति से सुन्दर कुछ नहीं, जो इस पृथ्वी पर हमारे निकट आती है जब हम भविष्य में उसका चेहरा आमने-सामने देखने की चाह में उसे विश्वास से खोजते हैं l

उस दिन हम अपने अद्भुत प्रभु की प्रशंसा करते हुए नहीं थकेंगे, क्योंकि हम उसकी उत्तम भलाई और उसके हाथों के कार्य के आश्चर्य की तरोताज़गी, और नयी खोज के अंत में कभी नहीं पहुंचेंगे l उसकी उपस्थिति उसकी खूबसूरती और उसके प्रेम का असाधारण प्रकाशन प्रगट करेगी l

हमारे पास सामर्थ्य है

कड़कड़ाहट की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया l मैं आवाज़ को पहचानकर रसोई की ओर भागी l मैंने भूल से कॉफ़ी बनाने वाला बिजली का उपकरण ऑन कर दिया था l मैंने उपकरण का प्लग हटाकर, उसके तले को छूकर देखना चाही कि टाइल का काउंटर पैर रखने लायक बहुत गर्म तो नहीं है l उसके चिकने भाग से मेरी उंगलियाँ जल गयीं, और मेरे कोमल पैरों में छाले हो गए l

मेरे पति द्वारा मेरे घाव में दावा लगाते समय मैंने अपना सिर हिलाया l मैं जानती थी कि कांच गरम होगा l “मैं ईमानदारी से कहती हूँ, मुझे नहीं मालुम मैंने उसे क्यों छू दिया,” मैं बोली l

मेरी गलती ने मुझे वचन में एक गंभीर विषय, पाप के स्वभाव के विषय पौलुस का प्रतिउत्तर याद दिलाया l

प्रेरित स्वीकारता है कि जो वह करता है उस को नहीं जानता; क्योंकि जो वह चाहता है वह नहीं करता (रोमि. 7:15) l स्वीकार करते हुए कि वचन सही और गलत को निश्चित करता है (पद.7), वह पाप के विरुद्ध शरीर और आत्मा के बीच निरंतर चलनेवाली जटिल और वास्तविक युद्ध को पहचानता है (पद.15-23) l वह अपनी दुर्बलता स्वीकारते हुए, वर्तमान और सर्वदा की विजय की आशा प्रस्तुत करता है (पद.24-25) l

जब हम मसीह को अपना जीवन समर्पित करते हैं, वह हमें पवित्र आत्मा देता है जो हमें सही करने के लिए सामर्थी बनाता है (8:8-10) l जब वह हमें परमेश्वर का वचन मानने के लिए आज्ञाकारी बनाता है, हम झुलसाने वाले पाप से दूर हो सकते हैं जो हमें उस बहुतायत के जीवन से दूर करता है जो परमेश्वर अपने प्रेम करनेवाले को देने की प्रतिज्ञा की है l