परमेश्वर का पक्का पीछा
कुछ वर्ष पहले, एक व्यक्ति मुझसे लगभग एक ब्लॉक आगे चल रहा था। मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था कि उसकी बाहें सामान से भरी थीं। अचानक, वह सब कुछ गिराते हुए फिसल गया। कुछ लोगों ने, जो उसने गिराया उसे इकट्ठा करने, और उसे उसके पैरों पर खड़े होने में उसकी मदद की, लेकिन उन लोगों से कुछ रह गया —उसका बटुआ। मैंने उसे उठाया और, उस महत्वपूर्ण चीज को लौटाने की आशा करते हुए उस अजनबी का पीछा करने लगा। मैं चिल्लाया “सर, सर!” और अंत में उसका ध्यान खींचा। जैसे ही मैं उसके पास पहुँचा वह मुड़ा। जैसे ही मैंने बटुआ निकाला, मैं उसके आश्चर्यजनक राहत और अपार कृतज्ञता के उसके रूप को कभी नहीं भूलूंगा।
उस व्यक्ति का पीछा करना जिस रूप में शुरु हुआ था वह आगे कुछ अलग ही रूप में बदल गया। अधिकांश अंग्रेजी अनुवाद भजन 23 के अंतिम पद में साथ बनी रहेंगी शब्द का उपयोग्य करते है-“ निश्चय भलाई और करुणा जीवन भर मेरे साथ साथ बनी रहेंगी;” (6)। और जबकि “साथ बनी रहेंगी” सही बैठता है, वास्तविक इब्रानी शब्द अधिक शक्तिशाली, आक्रामक भी है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है “पीछा करना”, जिस तरह एक शिकारी अपने शिकार का पीछा करता है (एक भेड़िया को भेड़ का पीछा करते हुए कल्पना करें)।
परमेश्वर की कृपा और भलाई हमारा पीछा किसी ढीली गति या इस तरह कि वास्तव में कोई जल्दी न हो नहीं करती, जैसे एक पालतू जानवर इत्मीनान से घर तक आपका पीछा कर सकता है। नहीं, "निश्चित रूप से" हमारा पीछा किया जा रहा है - उदेश्य के साथ। बहुत हद तक इस तरह कि एक व्यक्ति को उसका बटुआ लौटाने के लिए उसका पीछा करना, हमारा पीछा भी उस अच्छे चरवाहे के द्वारा किया जा रहा है जो हमसे अनंत प्रेम से प्रेम करते है (1,6)।

बड़ी अपेक्षाएं
क्रिसमस से पहले एक व्यस्त दिन, एक बूढ़ी औरत मेरे भीड़-भाड़ वाले पड़ोस के डाकघर के मेल काउंटर पर पहुंची। उसकी धीमी गति को देखकर, धैर्यवान डाक क्लर्क ने उसका अभिवादन किया, “अच्छा नमस्ते, जवान महिला!” उसका शब्द मित्रवत था, लेकिन कुछ लोग उन्हें इस तरह सुन सकते हैं कि “युवा होना” बेहतर है।
बाइबल हमें यह देखने के लिए प्रेरित करती है कि उन्नत आयु हमारी आशा को प्रेरित कर सकता है। शिशु यीशु को जब पवित्र ठहराने के लिए युसूफ और मरियम के द्वारा मन्दिर में लाया जाता है(लुका 2:23; देखें निर्गमन 13:2, 12), दो बुज़ुर्ग विश्वासी बीच में अचानक अहम् स्थान लेते है।
पहला, सिमोन—जो वर्षों से मसीहा को देखने का इंतजार कर रहा था-“ .. उसे अपनी गोद में लिया और परमेश्वर का धन्यवाद करके कहा : “हे स्वामी, अब तू अपने दास को अपने वचन के अनुसार शान्ति से विदा करता है, क्योंकि मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है, जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है,”
फिर जैसे शिमोन मरियम और यूसुफ से बातें कर रहा था हन्नाह, एक “बहुत बूढ़ी” भविष्यद्वक्तिन आती है (v.36)। एक विधवा जो सिर्फ सात साल विवाहित रही, वह चौरासी साल की उम्र तक मंदिर में ही थी, मंदिर को कभी नहीं छोड़ा, वह “उपवास और प्रार्थना कर करके रात–दिन उपासना किया करती थी।” जब उसने यीशु को देखा, वह “उन सभों से, जो यरूशलेम के छुटकारे की बाट जोहते थे, उस बालक के विषय में बातें करने लगी।” (vv.37-38) और प्रभु की स्तुति करने लगी।
ये दो आशा से भरपूर दास हमें याद दिलाते है की हमें बड़ी आशा के साथ- परमेश्वर की प्रतीक्षा करना कभी बंद नहीं करनी चाहिए- भले ही हमारी उम्र कुछ भी क्यों न हो।
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