क्या आप अविरुद्ध प्रार्थना जीवन बनाए रखने में संघर्षरत् हैं? हममें से अनेक हैं l हम जानते हैं प्रार्थना महत्वपूर्ण है, किन्तु वह सर्वथा कठिन हो सकता है l हमारे पास परमेश्वर के साथ सहभागिता के गहरे क्षण हो सकते हैं और तब हमारे कुछ क्षण केवल औपचारिक हो सकते हैं l हम प्रार्थना में इतना संघर्ष क्यों करते हैं?

विश्वास का जीवन एक लम्बी दौड़ है l ऊँचाई और गहराई, और प्रार्थना जीवन के पठार इस दौड़ के प्रतिबिम्ब हैं l और जिस तरह एक लम्बी दौड़ में निरंतर दौड़ना होता है, उसी तरह प्रार्थना में हैं l मुख्य बात है : हार न माने!

वह परमेश्वर का उत्साह भी है l प्रेरित पौलुस ने कहा, “नित्य प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्स. 5:17), “प्रार्थना में नित्य लगे रहो” (रोमियों 12:12), और “प्रार्थना में लगे रहो” (कुलु.4:2) l ये सभी कथन दृढ़ रहने और प्रार्थना में निरंतरता बताते हैं l

और चूँकि हमारा स्वर्गिक पिता एक व्यक्तिगात् सत्ता है, हम उसके साथ मानवीय संबंधों की तरह अन्तरंग सहभागिता विकसित कर सकते हैं l ए. डब्ल्यू. टोज़र लिखते हैं कि प्रार्थना करना सीखते समय, हमारा प्रार्थना का जीवन “सबसे अस्थिर स्पर्श से परिपूर्णता की ओर, सबसे निकट सहभागिता जिसके लिए मानवीय आत्मा सक्षम है” में विकसित हो सकता है l और हमारी यही इच्छा है-परमेश्वर के साथ गहरी सहभागिता l यह निरंतर प्रार्थना करने से संभव है l