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Articles by पो फैंग चिया

धन्यवाद, लेकिन इसकी कोई ज़रूरत नहीं

भारत में स्वलीन (autistic) बच्चों के लिए एक मसीही स्कूल को एक संस्था से बड़ा दान मिला। यह जांचने के बाद कि यह बिना किसी शर्त का है, उन्होंने धन स्वीकार किया। लेकिन बाद में, संस्था ने स्कूल बोर्ड में प्रतिनिधित्व करने का अनुरोध किया। स्कूल संचालक ने पैसा लौटा दिया। उन्होंने स्कूल के मूल्यों के साथ समझौता करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, "परमेश्वर के कार्य को परमेश्वर के तरीके से करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।"

सहायता अस्वीकार करने के कई कारण हैं, और यह उनमें से एक है। बाइबिल में हम एक और देखते हैं। जब निर्वासित यहूदी यरूशलेम लौटे, तो राजा कुस्रू ने उन्हें मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए अनुमति दी  (एज्रा 3)। जब उनके पड़ोसियों ने कहा, "हमें भी अपने संग बनाने दो; क्योंकि तुम्हारी नाई हम भी तुम्हारे परमेश्वर की खोज में लगे हुए हैं"(4:2), इस्राएल के अगुवों ने मना कर दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि उनकी मदद को स्वीकार करने से, मंदिर पुनर्निर्माण कार्य की पवित्रता से समझौता करना होगा और मूर्तिपूजा उनके समुदाय में प्रवेश कर सकती है क्योंकि उनके पड़ोसी भी मूर्तियों को पूजते थे। इस्राएलियों ने सही निर्णय लिया, क्योंकि उनके पड़ोसियों ने इमारत बनने के काम को हतोत्साहित करने के लिए जो कुछ वह कर सकते थे उन्होंने किया।

पवित्र आत्मा और यीशु में बुद्धिमान विश्वासियों की सलाह की मदद से, हम परखने की समझ विकसित कर सकते हैं। हम साहसपूर्वक उन मैत्रीपूर्ण प्रस्तावों को ना कह सकते हैं जिनमें सूक्ष्म आत्मिक खतरा छुपा हो। क्योंकि जब परमेश्वर का काम परमेश्वर के तरीके से किया जाता है तो उसमें उसके प्रावधान की कोई घटी नहीं होती।

अच्छे से जीना

जीवितों के लिए मुफ्त अंतिम-संस्कार l दक्षिण कोरिया में एक संस्थान  यही सेवा देती है l जब से यह 2012 में आरंभ हुई  है, 25,000 से अधिक लोगों ने──किशोर से लेकर सेवानिवृत लोगों तक── अपनी मृत्यु पर विचार करते हुए अपने जीवनों को सुधारने की आशा में ”जीवित अंतिम-संस्कार” सभाओं में भागीदारी की है l अधिकारी बताते हैं “दिखावटी मृत्यु सभाओं का अर्थ भागीदारों को उनके जीवनों के विषय एक सच्चा भाव देना है, कृतज्ञता प्रेरित करना है, और क्षमा देने में मदद, और परिवार और मित्रों के बीच पुनः सम्बन्ध स्थापित करना है l”

ये शब्द सभोपदेशक के लिखनेवाले शिक्षक की बुद्धिमत्ता को प्रतिध्वनित करते हैं l “सब मनुष्यों का अंत(मृत्यु) है, और जो जीवित है वह मन लगाकर इस पर सोचेगा” (सभोपदेशक 7:2) l मृत्यु हमें जीवन की लघुता की याद दिलाती है और कि जीवन जीने और अच्छे से प्रेम करने के लिए हमारे पास सीमित समय है l यह परमेश्वर के कुछ अच्छे उपहारों──जैसे धन/पैसा, सम्बन्ध, और सुख──पर हमारी पकड़ को ढीला करता है और हमें इसका आनंद यहाँ और वर्तमान में लेने के लिए स्वतंत्र करता है जब हम “स्वर्ग में धन इकठ्ठा [करते हैं], जहाँ न तो कीड़ा और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं” (मत्ती 6:20) l 

जब हम याद करते हैं कि मृत्यु किसी समय दस्तक दे सकती है, शायद यह हमें अपने माता-पिता से मुलाकात को न टालने को विवश करे, एक ख़ास तरीके से परमेश्वर की सेवा करने के हमारे निर्णय को विलंबित न होने दे, या हम अपने काम के ऊपर अपने बच्चों के साथ अपना  समय बिताने को प्राथमिकता दें l परमेश्वर की सहायता से, हम बुद्धिमत्ता से जीवन जीना सीख सकते हैं l 

एक अनापेक्षित अतिथि

जैक एक अकेला व्यक्ति था l जब वह शहर   के सड़कों पर चलता था, वह प्रतिकूल नज़र को महसूस कर सकता था l लेकिन उसके बाद उसके जीवन ने एक करवट लिया l धर्म पिताओं में से एक, सिकंदरिया का क्लेमेंट, कहते हैं कि जैक एक बहुत ही प्रमुख मसीही अगुआ बना और कैसरिया में चर्च का पास्टर बना l जी हाँ, हम जक्कई के विषय बात कर रहे हैं, कर अधिकारी जो यीशु को देखने के लिए एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया था (लूका 19:1-10) l 

किसने उसे पेड़ पर चढ़ने के लिए प्रेरित किया? कर अधिकारियों को देशद्रोही समझा जाता था क्योंकि रोमी साम्राज्य की सेवा करने के कारण वह अपने ही लोगों पर भारी कर लगाया करते थे l इसके बावजूद ऐसों को स्वीकार करने के लिए यीशु के पास एक ख्याति थी l जक्कई शायद सोचा होगा कि क्या यीशु उसे भी स्वीकार करेगा l कद में नाटा  होने के कारण, हालाँकि, वह भीड़ के ऊपर देखने में असमर्थ था (पद.3) l शायद उसे देखने के लिए वह एक पेड़ पर गया l 

और यीशु भी जक्कई को ढूंढ़ रहा था l जब मसीह पेड़ के निकट पहुँचा जहाँ पर वह चढ़ा हुआ था, उसने ऊपर देखा और कहा, “जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है” (पद.5) l यीशु ने इस बात को बिलकुल  अनिवार्य  माना की वह इस परित्यक्त के घर पर अतिथि हो l इसकी कल्पना कीजिये! संसार का उद्धारकर्ता सामाजिक रूप से तिरस्कृत के साथ समय व्यतीत करना चाहता है l 

चाहे हमारे हृदय, सम्बन्ध, अथवा जीवन जिसे दुरुस्ती की ज़रूरत है, जक्कई की तरह हमारे पास आशा हो सकती है l यीशु हमें तिरस्कृत नहीं करेगा जब हम उसकी ओर मुड़ते हैं l जो खो, और टूट गया है उसे वह पुनर्स्थापित कर सकता है और हमारे जीवनों को नया अर्थ और उद्देश्य दे सकता है l 

परमेश्वर का प्रावधान

हम जंगल में अन्दर चलते गए, और गाँव से बहुत दूर निकल गए l लगभग एक घंटे बाद, हमने जल की गर्जनापूर्ण आवाज़ सुनी l अपने क़दमों को तेज करते हुए, हम एक वृक्षहीन स्थान पर पहुंचे और हमारा स्वागत धूसर चट्टानों पर प्रपात के रूप में गिरता हुआ सफ़ेद जल ने किया l भव्य!

हमारे साथ चलने वाले मित्र, जो उस गाँव के निवासी थे जिसे हम एक घंटे पहले पीछे छोड़ आये थे, ने निर्णय किया कि हम एक पिकनिक करेंगे l महान विचार, लेकिन भोजन कहाँ से आएगा? हमने कुछ भी नहीं ख़रीदा था l हमारे मित्र आसपास के जंगल में चले गए और विभिन्न प्रकार के फल और सब्जी और कुछ मछली के साथ लौटे l भोजन विचित्र था, लेकिन उसका स्वाद स्वर्गिक था!

मैंने याद किया कि सृष्टि परमेश्वर के असाधारण प्रबंध का वर्णन करती है l हम उसकी उदारता का साक्ष्य “छोटे छोटे पेड़ जिनमें अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीजे एक एक की जाति के अनुसार उन्हीं में होते हैं” में पाते हैं (उत्पत्ति 1:12) l परमेश्वर ने “बीजवाले छोटे छोटे पेड़ . . . और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं” (पद. 29) उन्हें बनाया है और हमें भोजन के लिए दिया है l 

क्या आपको कभी-कभी परमेश्वर पर आपके लिए प्रबंध करने में भरोसा करने में कठिनाई होती है? क्यों न प्रकृति में घूमने चलें? जो आप देखते हैं वह आपको यीशु के आश्वस्त करने वाले शब्द स्मरण दिला सकें : “इसलिए तुम चिंता करके यह न कहना कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएँगे . . . क्योंकि . . . तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है” (मत्ती 6:31-32) l 

कौन जानता है?

चीनी दंतकथा के अनुसार, एक व्यक्ति ने एक बार अपने बेशकीमती घोड़ों में से एक को खो दिया, उसके पड़ोसी ने उसके नुकसान के लिए दुख व्यक्त किया l लेकिन यह आदमी बेपरवाह था l उसने कहा, “कौन जानता है कि यह मेरे लिए अच्छी बात हो सकती है?” आश्चर्यजनक रूप से, खोया हुआ घोड़ा दूसरे घोड़े के साथ घर लौट आया l जब पड़ोसी ने उसे बधाई दी, उसने कहा, “कौन जानता है कि यह मेरे लिए एक बुरी बात हो सकती है?” जैसा कि पता चला, उसके बेटे ने नए घोड़े पर सवार होकर अपना पैर तोड़ लिया l यह एक दुर्भाग्य की तरह लग रहा था, जब तक कि सेना युद्ध में लड़ने के लिए सभी सक्षम पुरुषों की भर्ती करने के लिए गांव में नहीं पहुंची l बेटे की चोट के कारण, वह भर्ती नहीं हो सका, जो अंततः उसे मौत से बचा सकता था l
यह चीनी कहावत के पीछे की कहानी है जो सिखाती है कि एक कठिनाई भेष में एक आशीष हो सकती है और इसके विपरीत भी l इस प्राचीन ज्ञान का सभोपदेशक 6:12 में एक करीबी समानांतर है, जहाँ लेखक ध्यान देता है : “कौन जानता है कि उसके लिए(किसी व्यक्ति के लिए) क्या अच्छा है?” वास्तव में, हममें से कोई भी नहीं जानता कि भविष्य क्या है l प्रतिकूलता के सकारात्मक लाभ हो सकते हैं और समृद्धि के दुष्प्रभाव हो सकते हैं l
प्रत्येक दिन नए अवसर, खुशियाँ, संघर्ष और दुख प्रदान करता है l परमेश्वर के प्यारे बच्चों के रूप में, हम उसकी संप्रभुता में आराम कर सकते हैं और अच्छे और बुरे समय के बीच उस पर विश्वास कर सकते हैं l “परमेश्वर ने दोनों को एक ही संग रखा है” (7:14) l वह हमारे जीवन की सभी घटनाओं में हमारे साथ है और अपनी प्रेमपूर्ण देखभाल का वादा करता है l

पलों को संजोए रखें

सू डाँगपो(Su Dongpo) चीन के सबसे बड़े कवियों और निबंधकारों में से एक थे l निर्वासन में और पूर्णिमा के चाँद को एक टक देखते हुए, उन्होंने यह वर्णन करने के लिए एक कविता लिखी कि वे अपने भाई को कितना याद कर रहे हैं l वे लिखते हैं, “हम आनंद करते और शोक करते हैं, इकठ्ठा होते और अलग होते हैं, जब चाँद बढ़ता और घटता रहता है l बीते समयों से, कुछ भी सम्पूर्ण नहीं रहता l काश हमारे प्रियजन लम्बी आयु पाएं, और हज़ारों मील एक दूसरे से दूर रहने के बावजूद इस खूबसूरत दृश्य को देखते रहें l”

उनकी कविता में सभोपदेशक की पुस्तक की विषय-वस्तु पायी जाती है l लेखक, जो उपदेशक  के रूप में जाना जाता है (1:1), ने ध्यान दिया कि “रोने का समय, और हँसने का भी समय . . . गले लगाने का समय, और गले लगाने से रुकने का भी समय है” (3:4-5) l दो विपरीत गतिविधियों को जोड़कर, उपदेशक, इस कवि की तरह, यह सुझाव देता कि आखिरकार सभी अच्छी चीजों का अंत होगा l

जैसा कि चीनी कवि ने चाँद के बढ़ने और घटने को एक और संकेत के रूप में देखा, कि कुछ भी सम्पूर्ण नहीं है उसी प्रकार उपदेशक ने भी परमेश्वर के संसार में संभावित क्रम के निर्माण में देखा जो उन्होंने बनाया था l परमेश्वर घटनाओं की देख-रेख करता है, और “उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं” (पद.11) l

जीवन अप्रत्याशित हो सकता है और कभी-कभी दर्दनाक अलगाव से भरा हो सकता है, लेकिन हम उत्साहित हो सकते हैं कि सब कुछ परमेश्वर की निगाह में है l हम जीवन का आनंद ले सकते हैं और क्षणों को संजो सकते हैं – अच्छे और बुरे – हमारे प्रिय परमेश्वर हमारे साथ हैं l

बचाव की आवश्यकता में

इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप से करीब 125 किलोमीटर (लगभग 78 मील) की दूरी पर मछली पकड़ने वाली एक झोपड़ी(fishing hut) में एलडी नाम का एक किशोर अकेले काम कर रहा था  जब तेज़ हवाओं ने उसकी झोपड़ी को नाव बाँधने की जगह से उठाकर उसे समुद्र में फेंक दिया l उनतालीस दिनों तक, एलडी समुद्र में बहता रहा l हर बार जब उसने एक जहाज़ देखा, तो उसने नाविकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कोशिश करने के लिए अपने दीपक को चालू कर दिया, पर केवल निराशा मिली l इससे पहले कि वह कुपोषित किशोर बचाया गया लगभग दस जहाज़ उस के पास से निकल गए l

यीशु ने “एक व्यस्थापक” (लूका 10:25) से किसी के विषय जिसे बचाया जाना ज़रूरी था एक दृष्टान्त कहा l दो व्यक्ति – एक पुरोहित(याजक) और एक लेवी(याजकीय गोत्र) ने – अपनी यात्रा के दौरान एक घायल आदमी को देखा l लेकिन उसकी मदद करने की बजाए, दोनों “कतरा कर [चले गए]” (पद.31-32) l हमें इसका कारण नहीं बताया गया है l दोनों ही धार्मिक व्यक्ति थे और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के परमेश्वर के नियम से अवश्य ही परिचित थे (लैव्यव्यवस्था 19:17-18) l शायद उन्होंने सोचा होगा कि यह कुछ अधिक खतरनाक है या शायद वे मृत शरीरों को स्पर्श करने के विषय यहूदी व्यवस्था नहीं तोड़ना चाहते थे, जिससे वे अनुष्ठानिक तौर से अशुद्ध हो जाएँ और मंदिर में सेवा न कर सकें l तुलनात्मक तौर पर, एक सामरी व्यक्ति जो यहूदियों द्वारा तुच्छ समझा जाता था – ने भलमनसी की तरह कार्य किया l उसने उस व्यक्ति को ज़रूरत में देखा और निस्वार्थ भाव से उसकी देखभाल की l

यीशु ने इस आज्ञा के साथ अपने उपदेश को समाप्त किया कि उनके शिष्यों को “भी ऐसा ही” करना है (लूका 10:37) l परमेश्वर हमें दूसरों की मदद करने के लिए प्रेम में जोखिम लेने की इच्छा दे l

आशंका और विश्वास

मैथ्यू एक गंभीर सिरदर्द के साथ जागा और उसने सोचा कि यह एक और माइग्रेन(अधकपारी) है। लेकिन जब वह बिस्तर से बाहर निकला, तो वह फर्श पर गिर गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसे दौरा पड़ा है। चार महीनों के पुनर्वास के बाद, उसने सोचने और बात करने की अपनी क्षमता को पुनः प्राप्त किया लेकिन फिर भी पीड़ा के साथ लंगड़ा कर चलता है। वह अक्सर निराशा के साथ संघर्ष करता है, लेकिन उसे अय्यूब की पुस्तक से बहुत आराम मिलता है।
अय्यूब ने अपने सारी दौलत और अपने बच्चों को रातोंरात खो दिया l खौफनाक खबर के बावजूद, पहले उसने परमेश्वर को आशा से देखा और सब कुछ का श्रोत होने के लिए उसकी प्रशंसा किया। उसने विपत्ति के समय में भी परमेश्वर के प्रभुत्व को स्वीकार किया (अय्यूब 1:21) l हम उसके मजबूत विश्वास पर अचंभित हैं, लेकिन अय्यूब ने निराशा के साथ भी संघर्ष किया। जब उसने अपने स्वास्थ्य को भी खो दिया (2:7), उसने अपने जन्म के दिन को श्राप दिया (3:1)। वह अपने मित्रों और परमेश्वर के साथ अपनी पीड़ा के सम्बन्ध में ईमानदार था। आखिरकार, यद्यपि, इस निश्चय पर पहुंचा कि परमेश्वर की ओर से अच्छा और बुरा दोनों आता है (13:15; 19:25-27)।
हमारे कष्टों में, हम भी निराशा और आशा, संदेह और विशवास के बीच खुद को दुविधा में पड़ा हुआ पाते हैं। परमेश्वर नहीं चाहता की हम कठिनाई के समक्ष निडर हों परन्तु अपने प्रश्नों के साथ उसके निकट जाने के लिए हमें आमंत्रित किया है। हालाँकि हमारा विश्वास कई बार विफल हो सकता है, लेकिन हम परमेश्वर पर हमेशा विश्वासयोग्य रहने पर भरोसा कर सकते हैं।

परमेश्वर के लिए भूखा

यीशु में एक नया विश्वासी बाइबल पढ़ने के लिए बेताब था l यद्यपि, उसने एक विस्फोट में अपनी दृष्टि और दोनों हाथों को खो दिया था l जब उसने एक महिला के बारे में सुना, जिसने अपने होंठों से ब्रेल लिपि को पढ़ती थी, तो उसने ऐसा ही करने की कोशिश की – लेकिन जाना कि उसके होंठों की तंत्रिकाओं के शिरे भी नष्ट हो गए थे l बाद में, वह ख़ुशी से भर गया जब उसे पता चला की वह ब्रेल अक्षरों को अपनी जीभ से महसूस कर सकता है! उसने पवित्रशास्त्र को पढ़ने और आनंद लेने का एक तरीका खोज लिया था l 

आनंद और प्रसन्नता की भावनाएं थीं जो नबी यिर्मयाह ने परमेश्वर के शब्दों को प्राप्त करके अनुभव किया l “जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया,” उसने कहा, “और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनंद का कारण हुए” (यिर्मयाह 15:16) l यहूदा के लोगों के विपरीत जिन्होंने उसके शब्दों का तिरस्कार किया (8:9), यिर्मयाह आज्ञाकारी था और उनमें आनंदित था l उसकी आज्ञाकारिता, हालाँकि, नबी को अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार कर दिया और गलत तरीके से सताया (15:17) l 

हममें से कुछ ने कुछ इसी तरह का अनुभव किया होगा l हमने एक बार ख़ुशी के सस्थ बाइबल पढ़ी, लेकिन परमेश्वर की आज्ञा मानने से दूसरों को दुःख और अस्वीकृति हुयी l यिर्मयाह की तरह हम अपने बरम को परमेश्वर तक पहुंचा सकते हैं l उसने यिर्मयाह को उस वाडे को दोहराते हुए जवाब दिया जो उसने उसे दिया था जब उसने पहली बार उसे नबी कहा था (पद. 19-21; देखें 1:18-19) l परमेश्वर ने उसे याद दिलाया की उसने अपने लोगों को अभी निराश नहीं होने दिया l हमारा भी यही भरोसा हो सकता है l वह वफादार है और हमें कबी नहीं छोड़ेगा l