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Articles by पो फैंग चिया

बोलने से पहले विचार करें

चुअंग अपनी पत्नी से नाराज़ हो गया क्योंकि वह उस रेस्टोरेंट का मार्ग भूल गयी थी जिसमें वे भोजन करना चाहते थे l घर लौटने के लिए हवाई जहाज पकड़ने से पूर्व वे परिवार के रूप में अपनी छुट्टियों का समापन जापान में एक शानदार भोजन पार्टी के साथ करना चाहते थे l अब देर हो रही थी और भोजन करना मुश्किल लग रहा था l निराश होकर, चुअंग ने ख़राब आयोजन के लिए अपनी पत्नी की आलोचना की l

बाद में अपने शब्दों के लिए पछताया l वह बहुत अधिक कठोर हो गया था, और उसने यह भी महसूस किया कि वह खुद ही होटल का पता लगा सकता था और दूसरे सात दिनों के अच्छे आयोजन के लिए पत्नी को धन्यवाद देना भूल गया l

हममें से बहुत लोग चुअंग के समान हो सकते हैं l हम क्रोधित होकर अपने शब्दों को अनियंत्रित होने देते हैं l हमारे लिए भजनकार के साथ प्रार्थना करना कितना ज़रूरी है : “हे यहोवा, मेरे मुख पर पहरा बैठा, मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर!” (भजन 141:3 ) l

किन्तु हम ऐसा कैसे करें? यहाँ एक लाभदायक सलाह है : बोलने से पहले विचार करें l क्या आपके शब्द उत्तम, लाभदायक, अनुग्रह से परिपूर्ण और दयालु हैं? (इफि.4:29-32) l

अपने मुँह पर पहरा बैठाने के लिए हमें क्रोध आने पर अपना मुँह बंद रखना होगा और कि हमें सही सुर में सही शब्द बोलने के लिए प्रभु से सहायता मांगनी होगी अथवा, शायद चुप रहना होगा l अपनी बोली नियंत्रित रखना जीवन भर का कार्य है l धन्यवाद हो, परमेश्वर हममें कार्य कर रहा है ताकि हम “उसकी आज्ञा [मानें] और उसकी इच्छा पर चल सकें” (फ़िलि. 2:13) l

दो-पंखों वाला सूर्य

मिट्टी का एक प्राचीन मुहर यरूशलेम पुरातत्व इंस्टीट्यूट की आलमारी में पाँच साल तक पड़ा रहा क्योंकि यरूशलेम की पुरानी दीवार के दक्षिणी भाग के निकट खुदाई में मिली इस  3,000 वर्ष पुरानी वस्तु के प्रारंभिक जांच में इसका महत्व पता न चला l किन्तु तब एक शोधकर्ता के उस मुहर पर खुदे शब्दों की गहन जांच में एक बड़ी खोज सामने आई l अभिलेख प्राचीन इब्री में था : “यहूदा के राजा आहाज (के पुत्र) हिजकिय्याह का l”

मुहर के बीच जीवन का प्रतीक दो-पंखों वाला सूर्य की आकृति है l मुहर खोजनेवाले पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि राजा हिजकिय्याह ने इस मुहर का उपयोग खतरनाक बीमारी से प्रभु की चंगाई पाने के बाद परमेश्वर की सुरक्षा के रूप में करने लगा (यशायाह 38:1-8) l हिजकिय्याह प्रभु से चंगाई मांग रहा था l और परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुनकर उसे यह कहकर, “मैं [सूर्य की छाया को] दस अंश पीछे की ओर लौटा दूंगा”  एक चिन्ह दिया कि वह दी गयी अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा (पद.8) l

पुरातत्विक शिल्पकृति के ये तथ्य हमें उत्साहवर्धक ताकीद देते हैं कि बाइबिल के लोग हमारी तरह सीख रहे थे कि सहायता मांगने पर प्रभु हमारी सुनता है l और यद्यपि हमारी अपेक्षानुसार उसका उत्तर नहीं होता, हम उसकी करुणा और सामर्थ्य में विश्राम कर सकते हैं l सूर्य की गति को प्रभावित करनेवाला हमारे हृदयों को भी प्रभावित कर सकता है l

जो शमौन ने कहा

रिफ्यूज रबिन्द्रनाथ नाम का एक व्यक्ति श्रीलंका में 10 वर्षों से अधिक से युवा कार्यकर्त्ता रहा  है l वह अक्सर युवाओं के साथ देर रात को बातचीत करता है-खेलता है, उनकी सुनता है, सलाह  देता है  और सिखाता है, जो उसे पसंद है, किन्तु भरोसेमंद विद्यार्थीयों के कभी-कभी विश्वास से फिर जाने से निराशा मिलती है l वह कभी-कभी लूका 5 में शमौन पतरस की तरह कुछ-कुछ अनुभव करता है l

शमौन पूरी रात मेहनत करके भी मछली नहीं पकड़ा (पद.5) l वह हताश और थका हुआ था l किन्तु यीशु के कहने पर कि, “गहरे में ले चल, और ... अपने जाल डालो” (पद.4), शमौन का उत्तर था, “तौभी तेरे कहने से जाल डालूँगा” (पद.5) l

शमौन का आज्ञा मानना अद्भुत था l अनुभवी मछुआरे के रूप में, वह जानता था कि सूर्य निकलने के बाद मछलियाँ गहरे में चली जाती हैं, और उनके जाल गहराई में नहीं जा सकते थे l  

यीशु पर भरोसा करने की उसकी इच्छा रंग लायी l शमौन को ढेर सारी मछलियाँ मिलीं और उसने जाना कि यीशु कौन है l वह यीशु को “स्वामी” (पद.5) से “प्रभु” कह पाया (पद.8) l वास्तव में, “सुनना” अक्सर हमें प्रगट रूप से परमेश्वर के कार्य देखने देता है और उसके निकट लाता है l

शायद परमेश्वर आपसे पुनः “अपने जाल डालने को कह रहा है l” हम शमौन की तरह प्रभु को उत्तर दें : “तौभी तेरे कहने से जाल डालूँगा l”

पूरी दौड़

2016 के रिओ ओलंपिक्स में, 5,000 मीटर दौड़ में दो धावकों ने संसार का ध्यान आकर्षित किया l 3,200 मीटर दौड़ के बाद, न्यूज़ीलैण्ड की निक्की हैम्बलिन और अमरीका की एबे डीऔगुस्तटिनो आपस में टकराकर गिर गयीं l एबे तुरन्त खड़ी हो गयी, किन्तु निक्की की मदद करने ठहर गयी l क्षण भर बाद दोनों धावक दौड़ने लगे, और एबे गिरने के कारण दायीं पैर में चोट से लड़खड़ाने लगी l अब निक्की की बारी थी कि दौड़ पूरी करने के लिए ठहर कर सह-धावक को उत्साहित करे l एबे के लड़खड़ाने के बाद, निक्की समापन रेखा पर आख़िरकार, उसे गले लगाने के लिए खड़ी थी l आपसी उत्साह का कितना सुन्दर तस्वीर!

यह मुझे बाइबिल का एक परिच्छेद याद दिलाता है : “एक से दो अच्छे हैं .... यदि उनमें से एक गिरे, तो दूसरा उसको उठाएगा; परन्तु हाय उस पर जो अकेला होकर गिरे और उसका कोई उठानेवाला न हो” (सभो. 4:9-10) l आत्मिक दौड़ में धावक होकर, हमें परस्पर सहायता चाहिए-शायद और अधिक, क्योंकि हम दौड़ प्रतियोगिता में नहीं हैं किन्तु एक ही टीम के सदस्य हैं l गिरने के क्षण होंगे जहाँ उठने में किसी की मदद चाहिए; दूसरे क्षणों में किसी को प्रार्थना और उपस्थिति द्वारा उत्साह की आवश्यकता होगी l

आत्मिक दौड़ में अकेला नहीं दौड़ा जाता l क्या परमेश्वर आपको किसी के जीवन में निक्की या एबे बना रहा है? आज ही तुरंत मदद देकर, दौड़ पूरी करें!

पहला कदम

थाम दाशु ने अपने जीवन में कुछ कमी महसूस करके अपनी बेटी के चर्च जाने लगा l किन्तु वे अलग-अलग जाते थे l कुछ दिन पहले वह अपनी बेटी को ठेस पहुँचाया था, जिससे दोनों के बीच अलगाव हो गया था l इसलिए, थाम गीत आरंभ होने के बाद चुपचाप अन्दर जाकर आराधना समाप्ति के तुरंत बाद निकल आता था l

कलीसिया के सदस्यों ने थाम को सुसमाचार बताया, किन्तु वह यीशु पर विश्वास करने  का उनका निमंत्रण नम्रता के साथ टाल जाता था l किन्तु, वह चर्च जाता रहा l  

एक दिन थाम काफी बीमार हो गया l उसकी बेटी ने हिम्मत जुटाकर उसको पत्र लिखी l उसने बताया किस तरह मसीह ने उसका जीवन बदल दिया था, और उसने अपने पिता से मेल-मिलाप किया l उस रात, थाम यीशु पर विश्वास किया और परिवार में मेल हो गया l कुछ दिन बाद, थाम की मृत्यु हो गयी और वह यीशु की उपस्थिति में प्रवेश करके परमेश्वर और अपने प्रियों के साथ शांति पाया l

प्रेरित पौलुस ने लिखा कि हम भी परमेश्वर के प्रेम और क्षमा की सच्चाई “लोगों को समझाते हैं” (2 कुरिन्थियों 5:11) l मेल-मिलाप की सेवा हेतु “मसीह का प्रेम [ही] हमें विवश कर देता है” (पद.14) l

दूसरों को क्षमा करने की हमारी इच्छा उनको समझने में सहायता करेगा कि परमेश्वर हमसे मेल-मिलाप करना चाहता है (पद.19) l क्या आप परमेश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा करके उनको उसका प्रेम दिखाएँगे?

क्या अनंत है?

हाल ही में अनेक तकलीफों से गुज़र चुकी मेरी सहेली ने लिखा, “अपने विद्यार्थी जीवन के पिछले चार टर्म में अनेक बातें बदली हैं ... डरावनी हैं, वास्तव में डरावनी l कुछ भी स्थायी नहीं l”

वास्तव में, दो वर्षों में बहुत कुछ हो सकता है-जीविका परिवर्तन, नए मित्र, बीमारी, मृत्यु l अच्छा या बुरा, जीवन में परिवर्तन का अनुभव निकट घात लगाए है! हम बिल्कुल नहीं जानते l यह जानना कितना सुखकर है कि हमारा प्रेमी स्वर्गिक पिता अपरिवर्तनीय है l

भजनकार कहता है, “तू वही है, और तेरे वर्षों का अंत नहीं होने का” (भजन 102:27) l यह असीम सच है l अर्थात् परमेश्वर सर्वदा  प्रेमी, न्यायी, और बुद्धिमान है l बाइबिल शिक्षक आर्थर डब्ल्यू. पिंक, अद्भुत तरीके से बताते हैं : सृष्टि के अस्तित्व से पूर्व परमेश्वर के गुण, अभी भी हैं, और हमेशा रहेंगे l”

नए नियम में याकूब लिखता है, “हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें ... न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है” (याकूब 1:17) l हमारी बदलती परिस्थितियों में, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हमारा भला परमेश्वर अपने चरित्र अनुकूल ही रहेगा l वह सभी भलाइयों का श्रोत है, और उसके समस्त कार्य भले है l

ऐसा लगता है कि सब कुछ अस्थायी है, किन्तु परमेश्वर अपने लोगों के लिए हमेशा भला रहेगा l

आप नहीं हैं

दाऊद ने योजना बनायी, फर्नीचर अभिकल्पित किया, सामग्री इकट्ठा किया, समस्त प्रबंध किया (देखें 1 इतिहास 28:11-19) l किन्तु यरूशलेम का प्रथम मंदिर दाऊद का नहीं, सुलेमान का मंदिर कहलाता है l

क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, “तू घर बनवाने न पाएगा” (1 इतिहास 17:4) l परमेश्वर दाऊद के पुत्र सुलेमान को मंदिर बनाने के लिए चुना था, इस इनकार का प्रतिउत्तर अनुकरणीय था l वह परमेश्वर के कार्य पर केन्द्रित रहा (पद.16-25) l उसकी आत्मा धन्वादित थी l उसने सम्पूर्ण प्रयास किया और मंदिर बनाने में योग्य लोगों से सुलेमान की मदद करवायी (देखें 1 इतिहास 22) l

बाइबिल टीकाकार जे. जी, मेक्कोन्विल ने लिखा : “अक्सर हमें स्वीकार करना होगा कि मसीही सेवा के रूप में जो कार्य हम करना पसंद करेंगे, वो नहीं है जिसके लिए हम योग्य हैं, और जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाया है l यह दाऊद की तरह हो सकता है, कार्य का आरंभ, जो भविष्य में और भी भव्य होगा l

दाऊद ने अपनी नहीं, परमेश्वर की महिमा खोजी l उसने परमेश्वर के मंदिर के लिए विश्वासयोग्यता से सब कुछ किया, उसके लिए एक मजबूत नींव डाला जो उसके बाद कार्य को संपन्न करनेवाला था l काश हम भी, उसी तरह, परमेश्वर का चुना हुआ कार्य धन्यवादी हृदय से करें! जाहिर है कि हमारा प्रेमी परमेश्वर  “अधिक भव्य” ही करेगा l

सम्पूर्ण प्रेम दिखाना

अपनी बेटी की समस्या बताते समय उसकी आवाज़ में व्याकुलता थी l  अपनी बेटी के संदिग्ध मित्रों के विषय परेशान, इस चिंतित माँ ने उसका मोबाइल फ़ोन छीनकर हर जगह उसकी निगरानी करने लगी l दोनों के बीच का सम्बन्ध बद से बदतर हो गया l

उसकी बेटी से बातचीत से मैंने पाया कि वह अपनी माँ से अत्यधिक प्रेम करती है किन्तु दमघोंटू प्रेम में उसकी सांस रुकती है l वह स्वतंत्र होना चाहती है l

अपूर्ण व्यक्ति होने के कारण हम सब अपने संबंधों में संघर्ष करते हीन l हम माता-पिता हैं अथवा बच्चे, अविवाहित या विवाहित, हम प्रेम के सही प्रगटन का सामना करते हैं, अर्थात् सही समय पर सही बात कहना और करना l

1 कुरिन्थियों 13 में पौलुस सिद्ध प्रेम को परिभाषित करता है l उसके मानक अद्भुत है, किन्तु उस प्रेम का अभ्यास पुर्णतः चुनौतीपूर्ण है l धन्यवाद हो, हमारे पास आदर्श के तौर पर यीशु है l विभिन्न और समस्याओं के साथ लोगों से उसके मुलाकात में हम सिद्ध व्यवहारिक प्रेम देखते हैं l उसके साथ चलकर, उसके प्रेम में रहकर और उसके वचन से भरकर, हम उसकी समानता को और अधिक प्रतिबिंबित करेंगे l हम फिर भी गलतियां करेंगे, किन्तु परमेश्वर उनसे बचाएगा हर स्थिति से भलाई निकलेगी, क्योंकि उसका प्रेम “सब बातें सह लेता है” और “कभी टालता नहीं l”

कोई कमी नहीं

बिना सामान के दौरे पर जाने की कल्पना करें l न बुनियादी ज़रूरतें न वस्त्र, न पैसे न क्रेडिट कार्ड l क्या यह बुद्धिहीनता और भयानक नहीं?

किन्तु यीशु ने अपने बारह शिष्यों को बिल्कुल इसी तरह प्रचार और चंगाई के उनके  प्रथम मिशन पर भेजा l उसने उन्हें आज्ञा दी, “मार्ग के लिए लाठी छोड़ और कुछ न लो; न तो रोटी, न झोली, न बटुए में पैसे, परन्तु जूतियाँ पहिनो और दो दो कुरते न पहिनो” (मरकुस 6:8-9) l

फिर भी, बाद में, यीशु अपने जाने के बाद के कार्य हेतु उन्हें तैयार करते समय, उनसे कहा, “... जिसके पास बटुआ हो वह उसे ले और वैसे ही झोली भी, और जिसके पास तलवार न हो वह अपने कपड़े बेचकर एक मोल ले” (लूका 22:36) l

तो, यहाँ पर यह परमेश्वर के प्रावधान पर निर्भरता  है l

यीशु पिछले दौरे का सन्दर्भ देकर अपने शिष्यों से पुछा, “जब मैं ने तुम्हें बटुए, और झोली, और जूते बिना भेजा था, तो क्या तुम को किसी वस्तु की घटी हुए थी?” (पद.35) l  उत्तर मिला, “किसी वस्तु की नहीं” (पद.35) l शिष्यों के पास परमेश्वर की बुलाहट अनुसार सब प्रावधान था l उसने उनको पूर्ण समर्थ किया (मरकुस 6:7) l

क्या हम परमेश्वर पर आवश्यकता पूर्ति हेतु भरोसा करते हैं? क्या हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेकर योजना बनाते हैं? हम उसके कार्य हेतु उसके प्रावधान पर विश्वास करें l