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Articles by पो फैंग चिया

हेस्टैक प्रार्थना

सैमुएल मिल्स और उसके चार मित्र अक्सर यीशु का सुसमाचार साझा करने के लिए और लोगों को भेजने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए इकठ्ठा होते थे l 1806 में एक दिन, अपनी प्रार्थना सभा से लौटने के बाद, वे एक आंधी में फंस गए और भूसा के एक ढेर(Haystack) में शरण लिए l उनकी साप्ताहिक प्रार्थना सभा हेस्टैक प्रार्थना सभा के रूप में प्रसिद्ध हुयी, जो वैश्विक मिशन आन्दोलन में परिणित हुयी l 

आज अमेरिका में विलियम्स कॉलेज में स्थित हेस्टैक प्रार्थना स्मारक याद दिलाता है कि परमेश्वर प्रार्थना के माध्यम से क्या कर सकता है l

हमारे स्वर्गिक पिता को ख़ुशी होती है जब उसके बच्चे एक समान अनुरोध के साथ उसके पास आते हैं l या एक पारिवारिक सभा कि तरह है जहाँ वे एक संयुक्त बोझ साझा करने के उद्देश्य से इकठ्ठा होते हैं l

प्रेरित पौलुस स्वीकार करता है कि गंभीर पीड़ा के समय में परमेश्वर ने दूसरों की प्रार्थनाओं के द्वारा उसकी कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे” (2 कुरिन्थियों 1:10-11) l परमेश्वर ने संसार में अपने काम को पूरा करने के लिए हमारी परर्थ्नाओं का – विशेषकर हमारी प्रार्थनाओं को एक साथ – उपयोग करने का चुनाव किया है : “तब बहुत लोग धन्यवाद देंगे . . . बहुतों की प्रार्थना के उत्तर [के लिए] l”

आइये हम एक साथ प्रार्थना करें ताकि हम भी परमेश्वर की भलाई में आनंदित हो सकें l हमारा प्रेमी पिता हमारे आने का इंतज़ार कर रहा है ताकि वह हमारे द्वारा उन तरीकों से काम कर सके जो हमारी कल्पना से परे किसी भी चीज़ से बहुत दूर पहुँच सकता है l

अनदेखी सच्चाईयां

डिस्कवर पत्रिका का एक संपादक, स्टीफेन कास, कुछ अदृश्य चीजों का पता लगाने के लिए दृढ़ संकल्प करता है जो उसके दैनिक जीवन के भाग हैं l न्यू यॉर्क शहर में अपने दफ्तर को जाते समय, उसने विचार किया : “यदि मैं रेडियो के तरंगों को देख पाता, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग का ऊपरी भाग (बहुत से रेडियो और टीवी एंटीना के साथ) सम्पूर्ण शहर आलोकित करता हुआ एक बहुरंगी हिलती रौशनी की तरह दिखाई देता l” उसने पहचाना कि वह रेडियो और टीवी संकेतों, वाई-फाई, और बहुत से अदृश्य विद्युत् चुम्बिकीय क्षेत्र से घिरा हुआ है l

एक सुबह के समय एलिशा के सेवक को एक अन्य प्रकार के अदृश्य सत्य के विषय पता चला – अदृश्य आत्मिक संसार l उसने खुद को और अपने स्वामी को आराम की सेना से घिरा हुआ पाया l जहां तक वह देख सकता था, उसे शक्तिशाली घोड़ों पर सवार सैनिक दिखाई दिए (2 राजा 6:15)! सेवक डर गया, परन्तु एलिशा आश्वस्त था क्योंकि उसने स्वर्गदूतों की सेना अपने चारों ओर देखी l उसने कहा, “जो हमारी ओर हैं, वह उन से अधिक हैं, जो उनकी ओर हैं” (पद.16) l तब उसने प्रभु से अपने सेवक की आँखें खोलने को कहीं ताकि वह भी देख सके कि प्रभु ने उनकी सेना को घेर लिया है और सब कुछ उसके नियंत्रण में है (पद.17) l

क्या आप पूर्णतया पराजित और असहाय महसूस करते हैं? याद रखें कि सब परमेश्वर के नियंत्रण में है और वह आपके पक्ष में लड़ता है l वह “अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहां कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें” (भजन 91:11) l

छोटा परन्तु महत्वपूर्ण

वह दिन किसी अन्य दिन के समान ही शुरू हुआ था, परन्तु दुःस्वप्न की तरह समाप्त हुआ l एक धार्मिक आतंकवादी समूह द्वारा एस्तर (उसका वास्तविक नाम नहीं) और कई सौ महिलाओं को उनके आवासीय स्कूल से अपहृत कर लिया गया l एक महीने बाद, एस्तर को छोड़कर जिसने मसीह का इनकार नहीं किया, बाकियों को मुक्त कर दिया गया l जब मेरी सहेली और मैं उसके और दूसरों के विषय पढ़ रहे थे जो अपने विश्वास के कारण सताए जा रहे थे, हमारे हृदय द्रवित हो गए l हम कुछ करना चाहते थे l लेकिन क्या?

जब प्रेरित पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को लिख रहा था, उसने आसिया के प्रदेश की परेशानी को उनसे साझा किया जो वहाँ उसने अनुभव किया था l सताव इतना भयंकर था कि वह और उसके सहकर्मियों ने “जीवन से भी हाथ धो बैठे थे” (2 कुरिन्थियों 1:8) l हालाँकि, विश्वासियों की प्रार्थनाओं ने पौलुस की सहायता की थी (पद.11) l यद्यपि कुरिन्थुस की कलीसिया पौलुस से कई मील दूर थी, उनकी प्रार्थनाएँ सार्थक थीं और परमेश्वर ने उनकी सुन ली l यहाँ इसमें एक अद्भुत रहस्य है : सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमारी प्रार्थनाओं को उपयोग करने का निर्णय करता है l कितना बड़ा सौभाग्य!

आज हम विश्वास की खातिर सताव सह रहे भाई और बहनों को निरंतर प्रार्थना में याद रख सकते हैं l कुछ है जो हम कर सकते हैं l हम अधिकारविहीन, शोषित, पराजित, उत्पीड़ित, और कभी-कभी मसीह में अपने विश्वास के कारण मृत्यु का सामना कर रहे लोगों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं l उनके लिए प्रार्थना करें कि वे परमेश्वर का विश्राम और प्रोत्साहन प्राप्त करें और यीशु के साथ दृढ़ता से खड़े होने के लिए आशा में सामर्थी बनते जाएँ l

परिवर्तन संभव है

शनिवार की दोपहर, हमारी कलीसिया के युवा समूह के कुछ सदस्य एक दूसरे से फिलिप्पियों 2:3-4 पर आधारित कुछ कठिन प्रश्न पूछने के लिए इकठ्ठा हुए l “विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो l हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिंता करे l” कुछ एक कठिन प्रश्न जो शामिल थे : आप कितनी बार दूसरों में रूचि लेते हैं? क्या कोई आपको दीन या घमण्डी कहेगा? क्यों?

जब मैं सुन रही थी, मैं उनके ईमानदार उत्तर से उत्साहित हुयी l ये कीशोर सहमत थे कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना सरल नहीं है, किन्तु इसे परिवर्तित करना कठिन है, अथवा-इस सम्बन्ध में-परिवर्तन की इच्छा l जिस प्रकार खेद के साथ एक किशोर बोला, “स्वार्थ मेरे खून में है l”

दूसरों की सहायता के लिए खुद पर से ध्यान हटाने की इच्छा हमारे अन्दर निवास करनेवाले यीशु की आत्मा द्वारा ही संभव है l इसी कारण से पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को उन बातों पर विचार करने की लिए याद दिलाया जो परमेश्वर ने किया था और उनके लिए संभव बना दिया था l उसने उनको दयालुता से गोद लिया था, उनको अपने प्रेम द्वारा आराम दिया था, और उनकी सहायता के लिए अपनी आत्मा दी थी (फिलिप्पियों 2:1-2) l किस तरह वे-और हम-इस अनुग्रह का प्रतिउत्तर दीनता से कुछ कम के द्वारा दे सकते हैं?

वाकई, हमारे परिवर्तन का कारण परमेश्वर ही है, और केवल वही हमें बदल सकता है l क्योंकि वह हमें “अपना प्रेमपूर्ण उद्देश्य पूरा करने के लिए . . . सद् इच्छा भी उत्पन्न करता और उसके अनुसार कार्य करने का बल भी प्रदान करता है” (पद.13 Hindi C.L.), हम खुद पर कम केन्द्रित होकर दीनता से दूसरों की सेवा कर सकते हैं l

आप क्या त्याग सकते हैं?

“वह कौन सी एक चीज़ है जिसे आप नहीं त्याग सकते हैं?” रेडियो पर एक होस्ट ने पूछा। श्रोताओं ने बहुत ही रोचक जवाब दिए। कुछ ने अपने परिवार बताए, पतियों ने अपनी मृत पत्नी की यादों को बताया। कुछ ने बताया कि वे अपने सपनों, जैसे कि संगीत में प्रसिद्ध होना या माँ बनना, को नहीं छोड़ सकते हैं। हम सभी के पास कुछ न कुछ है जिसे हम प्रतिदिन संजोकर रखते हैं-कोई व्यक्ति, कोई उत्साह, कोई सम्पत्ति-कोई न कोई ऐसी बात जिसे हम त्याग नहीं सकते हैं।

होशे की पुस्तक में, परमेश्वर हमें बताता है कि वह अपने चुने हुए लोग, अपने निज भाग, इस्राएल को कभी नहीं त्यागेगा। इस्राएल के प्रेमी पति के रूप में परमेश्वर ने उसे सबकुछ उपलब्ध करवाया जिसकी उसे आवश्यकता थी: भूमि, भोजन, पानी, वस्त्र और सुरक्षा। फिर भी एक व्यभिचारी पत्नी के रूप में इस्राएल ने परमेश्वर को अस्वीकार किया और अपनी खुशी और सुरक्षा कहीं ओर खोजी। जितना परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आया, वह उतनी ही भटकती चली गई (होशे 11:2)। परन्तु यद्यपि उसने उसे बुरी तरह से आहत किया था, फिर भी वह उसे कभी नहीं त्यागेगा (पद 8)। उसका छुटकारा करने के लिए वह उसे अनुशासित करेगा; उसकी इच्छा उसके साथ सम्बन्ध को फिर से स्थापित करने की थी (पद 11)।

आज, परमेश्वर की समस्त सन्तान उसी आश्वासन को प्राप्त कर सकती है: हमारे लिए उसका प्रेम ऐसा प्रेम है जो हमें कभी जाने नहीं देगा (रोमियों 8:37-39)। यदि हम भटक कर उससे दूर हो गये हैं, तो वह हमारे वापिस लौटने के लिए इच्छा रखता हैl जब परमेश्वर हमें अनुशासित करता है, तो हमे सांत्वना मिल सकती है कि यह उसके हमारे पीछे-पीछे आने का चिह्न है, न कि उसके त्याग दिए जाने का चिह्न। हम उसके निज भाग हैं; वह हमें कभी नहीं त्यागेगा।

नया वर्ष, नयी प्राथमिकताएँ

मैं हमेशा से सेलो बजाना सीखना चाहता थाl लेकिन मुझे कभी भी किसी कक्षा में दाखिला लेने का समय नहीं मिलाl या, शायद यह कहना ज़्यादा सही होगा कि मैंने इसके लिए समय निकाला ही नहींl मैंने सोचा कि शायद मैं स्वर्ग में इस वाद्य यंत्र को बजाने में माहिर हो सकूँगाl इसी दौरान मेरी इच्छा यह रही कि मैं अपना ध्यान उन विशेष तरीकों पर लगाऊं जिनके द्वारा परमेश्वर ने अब मुझे उसकी सेवा करने के लिए बुलाया हैl

जीवन छोटा है और अक्सर हम पर यह दबाव रहता है कि धरती पर जो समय हमें मिला है इससे पहले कि यह हमारे हाथ से फिसले, हम इसका ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाएँl लेकिन वास्तव में इसका अर्थ क्या है? 

राजा सुलेमान ने जीवन के अर्थ पर चिंतन करते हुए दो सुझाव दिएl पहला, हमें यथासम्भव सबसे अर्थपूर्ण ढंग से अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसमें उन अच्छी चीजों का पूरा आनन्द उठाना भी शामिल है जिनका परमेश्वर हमें हमारे जीवन में अनुभव करने देता है, जैसा कि खाने-पीने की चीज़ें (सभोपदेशक 9:7), वस्त्र और इत्र (पद 8), विवाह (9 पद) और परमेश्वर के सब अच्छे उपहार, जिसमें सेलो बजाना सीखना भी हो सकता हैl

उसका दूसरा सुझाव था पूरी शक्ति के साथ परिश्रम करना (पद 10)l जीवन अवसरों से भरपूर है और करने के लिए काम हमेशा होता हैl हमें उन अवसरों का लाभ उठाना है जो परमेश्वर हमें देता है और उसकी बुद्धि को खोजना है कि अपने काम और मज़े की प्राथमिकताएँ इस प्रकार से निर्धारित करें कि उसके द्वारा जो गुण हमें दिए गये हैं वे उसकी सेवा में इस्तेमाल होंl

जीवन प्रभु की ओर से एक अद्भुत उपहार हैl जब हम उसके द्वारा दी जाने वाली प्रतिदिन की आशीषों और उसकी अर्थपूर्ण सेवा, दोनों में प्रसन्न रहते हैं तो हम उसका आदर करते हैंl

लज्जा से आदर तक

यह साल का वह समय है, जब परिवार उत्सव के मौसम को एक साथ मनाने के लिए एकत्र होते हैं l हालाँकि हममें से कुछ लोग कुछ “चिन्ताशील” सम्बन्धियों से मिलने से डरते हैं जिनके प्रश्न अविवाहित या जिनके पास संतान नहीं है को यह महसूस करा देते हैं कि उनके साथ कुछ गड़बड़ है l

इलीशिबा की कल्पना करें, जो कई वर्षों तक विवाहित रहने के बावजूद भी निःसंतान थी l उसकी संस्कृति में, यह परमेश्वर के अपमान के संकेत के रूप में देखा जाता था (देखें 1 शमूएल 1:5-6) और वास्तव में लज्जाजनक समझा जाता था l इसलिए जबकि इलीशिबा धर्मी जीवन व्यतीत करती थी (लूका 1:6), उसके पड़ोसी और सम्बन्धी संभवतः अन्यथा संदेह करते होंगे l  

फिर भी, इलीशिबा और उसके पति ने विश्वासयोग्यता से प्रभु की सेवा करते रहे l उसके बाद, जब वे काफी वृद्ध हो गए, एक आश्चर्यकर्म हुआ l परमेश्वर ने उनकी प्रार्थना सुन ली (पद.13) l वह अपनी कृपा करना पसंद करता है (पद.25) l और यद्यपि वह विलम्ब करता हुआ दिखाई दे, उसका समय हमेशा सही होता है और उसकी बुद्धि हमेशा सिद्ध है l इलीशिबा और उसके पति के लिए, परमेश्वर के पास एक विशेष उपहार था : एक बच्चा जो उद्धारकर्ता का अग्रदूत होगा (यशायाह 40:3-5) l

क्या आप खुद को अयोग्य समझते हैं क्योंकि आपके पास कुछ कमी है – विश्वविद्यालय की डिग्री, पति या पत्नी, एक बच्चा, एक नौकरी, एक घर? इलीशिबा की तरह उसके लिए ईमानदारी से जीवन व्यतीत करते हुए उसके और उसकी योजना के लिए ठहरे रहें l हमारी स्थितियां मायने नहीं रखती हैं, परमेश्वर हममें और हमारे द्वारा कार्य कर रहा है l वह आपके हृदय को जानता है l वह आपकी प्रार्थना सुनता है l 

परमेश्वर का छिपा हुआ हाथ

मेरे एक मित्र को एक अमरीकी मिशनरी जोड़े ने गोद लिया था और उसकी परवरिश घाना में हुयी थी l उसके परिवार के अमरीका लौटने के बाद, उसने कॉलेज की पढ़ाई आरम्भ की किन्तु किसी कारण से उसे छोड़ना पड़ा l बाद में, वह सेना में भर्ती हो गया, जिससे आख़िरकार वह कॉलेज की फीस दे सका और पूरा संसार घूम सका l इस दौरान, परमेश्वर कार्य कर रहा था, और एक विशेष भूमिका के लिए उसे तैयार कर रहा था l आज, वह अंतर्राष्ट्रीय पाठकों के लिए मसीही साहित्य लिखता और सम्पादित करता है l

उसकी पत्नी के जीवन की कहानी भी रुचिकर है l मिर्गी की बीमारी के लिए तेज़ दवाइयां लेने से वह अपने कॉलेज के प्रथम वर्ष में रसायन की परीक्षा में विफल रही l कुछ सावधानीपूर्वक विचारणा के बाद, उसने विज्ञान का अध्ययन छोड़कर अमरीकी संकेत भाषा की पढ़ाई शुरू कर दी जो उसके लिए संभव दिखाई दिया l उस अनुभव पर विचार करते हुए, वह कहती है, “परमेश्वर मेरे जीवन को एक बड़े उद्देश्य की ओर ले जा रहा था l” आज, वह बधिरों तक परमेश्वर का जीवन परिवर्तन करनेवाला वचन पहुंचा रही है l

क्या आपको कभी आश्चर्य होता है कि परमेश्वर आपको कहाँ ले जा रहा है? भजन 139:16 हमारे जीवनों में परमेश्वर के संप्रभु हाथ को स्वीकारता है : “तेरी आँखों ने मेरे बेडौल तत्व को देखा; और मेरे सब . . . दिन . . . तेरी पुस्तक में लिखे हुए थे l” हमें नहीं मालूम परमेश्वर हमारे जीवनों की परिस्थितियों का उपयोग किस प्रकार करेगा, किन्तु हम इस ज्ञान में विश्राम पाते हैं कि परमेश्वर हमारे विषय सब कुछ जानता है और हमारे क़दमों को मार्गदर्शित करता है l उसके संप्रभु हाथ छिपे होने के बावजूद, वह सर्वदा उपस्थित है l

अन्धकार में आशा

एक दन्त कथा के अनुसार, सात चीनी राज्यों के परस्पर लड़ाई और फूट (Warring States perios[475-246BC])के काल में क्यू युआन नमक एक बुद्धिमान और देशभक्त चीनी शासकीय अधिकारी था l ऐसा कहा जाता है कि उसने बारम्बार राजा को आसन्न आक्रमण के विषय चिताया जो उसके देश को नष्ट करने वाला था, किन्तु राजा ने उसकी सलाह को नज़रंदाज़ किया l अंत में, क्यू युआन को निर्वासित कर दिया गया l अपने प्रिय देश को शत्रु के आधीन जाने की खबर सुनकर, जिसकी चेतवानी उसने दी थी, उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया l 
क्यू युआन का जीवन कुछ हद तक नबी यिर्मयाह के जीवन के सदृश था l उसने भी राजाओं की सेवा की जो उसकी चेतावनियों का उपहास करते थे, और उसका देश लूट लिया गया l हालाँकि, जबकि क्यू युआन ने अपनी निराशा से हार मान लिया, यिर्मयाह ने वास्तविक आशा प्राप्त की l अंतर क्यों है?
यिर्मयाह सच्ची आशा देनेवाले प्रभु को जानता था l परमेश्वर ने नबी को निश्चय दिया, “तेरे वंश के लोग अपने देश में लौट आएँगे” (यिर्मयाह 31:17) l यद्यपि यरूशलेम ई.पू. 586 में नाश कर दिया गया, लेकिन बाद में पुनः निर्मित किया गया (देखें नहेम्याह 6:15) l
किसी बिंदु पर, हम अपने को ऐसी स्थितियों में पाते हैं जो हमें निराश कर सकता है l यह एक ख़राब चिकित्सीय रिपोर्ट, अचानक नौकरी का छूटना, परिवार की बर्बादी हो सकता है l किन्तु जब जीवन हमें गिरा दे, हम फिर भी ऊपर देख सकते हैं क्योंकि परमेश्वर सिंहासन पर विराजमान है! उसके हाथों में हमारे दिन हैं, और वह हमें अपने हृदय के निकट रखता है l