Our Authors

सब कुछ देखें

Articles by पो फैंग चिया

पलों को संजोए रखें

सू डाँगपो(Su Dongpo) चीन के सबसे बड़े कवियों और निबंधकारों में से एक थे l निर्वासन में और पूर्णिमा के चाँद को एक टक देखते हुए, उन्होंने यह वर्णन करने के लिए एक कविता लिखी कि वे अपने भाई को कितना याद कर रहे हैं l वे लिखते हैं, “हम आनंद करते और शोक करते हैं, इकठ्ठा होते और अलग होते हैं, जब चाँद बढ़ता और घटता रहता है l बीते समयों से, कुछ भी सम्पूर्ण नहीं रहता l काश हमारे प्रियजन लम्बी आयु पाएं, और हज़ारों मील एक दूसरे से दूर रहने के बावजूद इस खूबसूरत दृश्य को देखते रहें l”

उनकी कविता में सभोपदेशक की पुस्तक की विषय-वस्तु पायी जाती है l लेखक, जो उपदेशक  के रूप में जाना जाता है (1:1), ने ध्यान दिया कि “रोने का समय, और हँसने का भी समय . . . गले लगाने का समय, और गले लगाने से रुकने का भी समय है” (3:4-5) l दो विपरीत गतिविधियों को जोड़कर, उपदेशक, इस कवि की तरह, यह सुझाव देता कि आखिरकार सभी अच्छी चीजों का अंत होगा l

जैसा कि चीनी कवि ने चाँद के बढ़ने और घटने को एक और संकेत के रूप में देखा, कि कुछ भी सम्पूर्ण नहीं है उसी प्रकार उपदेशक ने भी परमेश्वर के संसार में संभावित क्रम के निर्माण में देखा जो उन्होंने बनाया था l परमेश्वर घटनाओं की देख-रेख करता है, और “उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं” (पद.11) l

जीवन अप्रत्याशित हो सकता है और कभी-कभी दर्दनाक अलगाव से भरा हो सकता है, लेकिन हम उत्साहित हो सकते हैं कि सब कुछ परमेश्वर की निगाह में है l हम जीवन का आनंद ले सकते हैं और क्षणों को संजो सकते हैं – अच्छे और बुरे – हमारे प्रिय परमेश्वर हमारे साथ हैं l

बचाव की आवश्यकता में

इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप से करीब 125 किलोमीटर (लगभग 78 मील) की दूरी पर मछली पकड़ने वाली एक झोपड़ी(fishing hut) में एलडी नाम का एक किशोर अकेले काम कर रहा था  जब तेज़ हवाओं ने उसकी झोपड़ी को नाव बाँधने की जगह से उठाकर उसे समुद्र में फेंक दिया l उनतालीस दिनों तक, एलडी समुद्र में बहता रहा l हर बार जब उसने एक जहाज़ देखा, तो उसने नाविकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कोशिश करने के लिए अपने दीपक को चालू कर दिया, पर केवल निराशा मिली l इससे पहले कि वह कुपोषित किशोर बचाया गया लगभग दस जहाज़ उस के पास से निकल गए l

यीशु ने “एक व्यस्थापक” (लूका 10:25) से किसी के विषय जिसे बचाया जाना ज़रूरी था एक दृष्टान्त कहा l दो व्यक्ति – एक पुरोहित(याजक) और एक लेवी(याजकीय गोत्र) ने – अपनी यात्रा के दौरान एक घायल आदमी को देखा l लेकिन उसकी मदद करने की बजाए, दोनों “कतरा कर [चले गए]” (पद.31-32) l हमें इसका कारण नहीं बताया गया है l दोनों ही धार्मिक व्यक्ति थे और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के परमेश्वर के नियम से अवश्य ही परिचित थे (लैव्यव्यवस्था 19:17-18) l शायद उन्होंने सोचा होगा कि यह कुछ अधिक खतरनाक है या शायद वे मृत शरीरों को स्पर्श करने के विषय यहूदी व्यवस्था नहीं तोड़ना चाहते थे, जिससे वे अनुष्ठानिक तौर से अशुद्ध हो जाएँ और मंदिर में सेवा न कर सकें l तुलनात्मक तौर पर, एक सामरी व्यक्ति जो यहूदियों द्वारा तुच्छ समझा जाता था – ने भलमनसी की तरह कार्य किया l उसने उस व्यक्ति को ज़रूरत में देखा और निस्वार्थ भाव से उसकी देखभाल की l

यीशु ने इस आज्ञा के साथ अपने उपदेश को समाप्त किया कि उनके शिष्यों को “भी ऐसा ही” करना है (लूका 10:37) l परमेश्वर हमें दूसरों की मदद करने के लिए प्रेम में जोखिम लेने की इच्छा दे l

आशंका और विश्वास

मैथ्यू एक गंभीर सिरदर्द के साथ जागा और उसने सोचा कि यह एक और माइग्रेन(अधकपारी) है। लेकिन जब वह बिस्तर से बाहर निकला, तो वह फर्श पर गिर गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसे दौरा पड़ा है। चार महीनों के पुनर्वास के बाद, उसने सोचने और बात करने की अपनी क्षमता को पुनः प्राप्त किया लेकिन फिर भी पीड़ा के साथ लंगड़ा कर चलता है। वह अक्सर निराशा के साथ संघर्ष करता है, लेकिन उसे अय्यूब की पुस्तक से बहुत आराम मिलता है।
अय्यूब ने अपने सारी दौलत और अपने बच्चों को रातोंरात खो दिया l खौफनाक खबर के बावजूद, पहले उसने परमेश्वर को आशा से देखा और सब कुछ का श्रोत होने के लिए उसकी प्रशंसा किया। उसने विपत्ति के समय में भी परमेश्वर के प्रभुत्व को स्वीकार किया (अय्यूब 1:21) l हम उसके मजबूत विश्वास पर अचंभित हैं, लेकिन अय्यूब ने निराशा के साथ भी संघर्ष किया। जब उसने अपने स्वास्थ्य को भी खो दिया (2:7), उसने अपने जन्म के दिन को श्राप दिया (3:1)। वह अपने मित्रों और परमेश्वर के साथ अपनी पीड़ा के सम्बन्ध में ईमानदार था। आखिरकार, यद्यपि, इस निश्चय पर पहुंचा कि परमेश्वर की ओर से अच्छा और बुरा दोनों आता है (13:15; 19:25-27)।
हमारे कष्टों में, हम भी निराशा और आशा, संदेह और विशवास के बीच खुद को दुविधा में पड़ा हुआ पाते हैं। परमेश्वर नहीं चाहता की हम कठिनाई के समक्ष निडर हों परन्तु अपने प्रश्नों के साथ उसके निकट जाने के लिए हमें आमंत्रित किया है। हालाँकि हमारा विश्वास कई बार विफल हो सकता है, लेकिन हम परमेश्वर पर हमेशा विश्वासयोग्य रहने पर भरोसा कर सकते हैं।

परमेश्वर के लिए भूखा

यीशु में एक नया विश्वासी बाइबल पढ़ने के लिए बेताब था l यद्यपि, उसने एक विस्फोट में अपनी दृष्टि और दोनों हाथों को खो दिया था l जब उसने एक महिला के बारे में सुना, जिसने अपने होंठों से ब्रेल लिपि को पढ़ती थी, तो उसने ऐसा ही करने की कोशिश की – लेकिन जाना कि उसके होंठों की तंत्रिकाओं के शिरे भी नष्ट हो गए थे l बाद में, वह ख़ुशी से भर गया जब उसे पता चला की वह ब्रेल अक्षरों को अपनी जीभ से महसूस कर सकता है! उसने पवित्रशास्त्र को पढ़ने और आनंद लेने का एक तरीका खोज लिया था l 

आनंद और प्रसन्नता की भावनाएं थीं जो नबी यिर्मयाह ने परमेश्वर के शब्दों को प्राप्त करके अनुभव किया l “जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया,” उसने कहा, “और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनंद का कारण हुए” (यिर्मयाह 15:16) l यहूदा के लोगों के विपरीत जिन्होंने उसके शब्दों का तिरस्कार किया (8:9), यिर्मयाह आज्ञाकारी था और उनमें आनंदित था l उसकी आज्ञाकारिता, हालाँकि, नबी को अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार कर दिया और गलत तरीके से सताया (15:17) l 

हममें से कुछ ने कुछ इसी तरह का अनुभव किया होगा l हमने एक बार ख़ुशी के सस्थ बाइबल पढ़ी, लेकिन परमेश्वर की आज्ञा मानने से दूसरों को दुःख और अस्वीकृति हुयी l यिर्मयाह की तरह हम अपने बरम को परमेश्वर तक पहुंचा सकते हैं l उसने यिर्मयाह को उस वाडे को दोहराते हुए जवाब दिया जो उसने उसे दिया था जब उसने पहली बार उसे नबी कहा था (पद. 19-21; देखें 1:18-19) l परमेश्वर ने उसे याद दिलाया की उसने अपने लोगों को अभी निराश नहीं होने दिया l हमारा भी यही भरोसा हो सकता है l वह वफादार है और हमें कबी नहीं छोड़ेगा l 

हेस्टैक प्रार्थना

सैमुएल मिल्स और उसके चार मित्र अक्सर यीशु का सुसमाचार साझा करने के लिए और लोगों को भेजने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिए इकठ्ठा होते थे l 1806 में एक दिन, अपनी प्रार्थना सभा से लौटने के बाद, वे एक आंधी में फंस गए और भूसा के एक ढेर(Haystack) में शरण लिए l उनकी साप्ताहिक प्रार्थना सभा हेस्टैक प्रार्थना सभा के रूप में प्रसिद्ध हुयी, जो वैश्विक मिशन आन्दोलन में परिणित हुयी l 

आज अमेरिका में विलियम्स कॉलेज में स्थित हेस्टैक प्रार्थना स्मारक याद दिलाता है कि परमेश्वर प्रार्थना के माध्यम से क्या कर सकता है l

हमारे स्वर्गिक पिता को ख़ुशी होती है जब उसके बच्चे एक समान अनुरोध के साथ उसके पास आते हैं l या एक पारिवारिक सभा कि तरह है जहाँ वे एक संयुक्त बोझ साझा करने के उद्देश्य से इकठ्ठा होते हैं l

प्रेरित पौलुस स्वीकार करता है कि गंभीर पीड़ा के समय में परमेश्वर ने दूसरों की प्रार्थनाओं के द्वारा उसकी कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा कैसे मदद की : “वह आगे को भी बचाता रहेगा l तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे” (2 कुरिन्थियों 1:10-11) l परमेश्वर ने संसार में अपने काम को पूरा करने के लिए हमारी परर्थ्नाओं का – विशेषकर हमारी प्रार्थनाओं को एक साथ – उपयोग करने का चुनाव किया है : “तब बहुत लोग धन्यवाद देंगे . . . बहुतों की प्रार्थना के उत्तर [के लिए] l”

आइये हम एक साथ प्रार्थना करें ताकि हम भी परमेश्वर की भलाई में आनंदित हो सकें l हमारा प्रेमी पिता हमारे आने का इंतज़ार कर रहा है ताकि वह हमारे द्वारा उन तरीकों से काम कर सके जो हमारी कल्पना से परे किसी भी चीज़ से बहुत दूर पहुँच सकता है l

अनदेखी सच्चाईयां

डिस्कवर पत्रिका का एक संपादक, स्टीफेन कास, कुछ अदृश्य चीजों का पता लगाने के लिए दृढ़ संकल्प करता है जो उसके दैनिक जीवन के भाग हैं l न्यू यॉर्क शहर में अपने दफ्तर को जाते समय, उसने विचार किया : “यदि मैं रेडियो के तरंगों को देख पाता, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग का ऊपरी भाग (बहुत से रेडियो और टीवी एंटीना के साथ) सम्पूर्ण शहर आलोकित करता हुआ एक बहुरंगी हिलती रौशनी की तरह दिखाई देता l” उसने पहचाना कि वह रेडियो और टीवी संकेतों, वाई-फाई, और बहुत से अदृश्य विद्युत् चुम्बिकीय क्षेत्र से घिरा हुआ है l

एक सुबह के समय एलिशा के सेवक को एक अन्य प्रकार के अदृश्य सत्य के विषय पता चला – अदृश्य आत्मिक संसार l उसने खुद को और अपने स्वामी को आराम की सेना से घिरा हुआ पाया l जहां तक वह देख सकता था, उसे शक्तिशाली घोड़ों पर सवार सैनिक दिखाई दिए (2 राजा 6:15)! सेवक डर गया, परन्तु एलिशा आश्वस्त था क्योंकि उसने स्वर्गदूतों की सेना अपने चारों ओर देखी l उसने कहा, “जो हमारी ओर हैं, वह उन से अधिक हैं, जो उनकी ओर हैं” (पद.16) l तब उसने प्रभु से अपने सेवक की आँखें खोलने को कहीं ताकि वह भी देख सके कि प्रभु ने उनकी सेना को घेर लिया है और सब कुछ उसके नियंत्रण में है (पद.17) l

क्या आप पूर्णतया पराजित और असहाय महसूस करते हैं? याद रखें कि सब परमेश्वर के नियंत्रण में है और वह आपके पक्ष में लड़ता है l वह “अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहां कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें” (भजन 91:11) l

छोटा परन्तु महत्वपूर्ण

वह दिन किसी अन्य दिन के समान ही शुरू हुआ था, परन्तु दुःस्वप्न की तरह समाप्त हुआ l एक धार्मिक आतंकवादी समूह द्वारा एस्तर (उसका वास्तविक नाम नहीं) और कई सौ महिलाओं को उनके आवासीय स्कूल से अपहृत कर लिया गया l एक महीने बाद, एस्तर को छोड़कर जिसने मसीह का इनकार नहीं किया, बाकियों को मुक्त कर दिया गया l जब मेरी सहेली और मैं उसके और दूसरों के विषय पढ़ रहे थे जो अपने विश्वास के कारण सताए जा रहे थे, हमारे हृदय द्रवित हो गए l हम कुछ करना चाहते थे l लेकिन क्या?

जब प्रेरित पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को लिख रहा था, उसने आसिया के प्रदेश की परेशानी को उनसे साझा किया जो वहाँ उसने अनुभव किया था l सताव इतना भयंकर था कि वह और उसके सहकर्मियों ने “जीवन से भी हाथ धो बैठे थे” (2 कुरिन्थियों 1:8) l हालाँकि, विश्वासियों की प्रार्थनाओं ने पौलुस की सहायता की थी (पद.11) l यद्यपि कुरिन्थुस की कलीसिया पौलुस से कई मील दूर थी, उनकी प्रार्थनाएँ सार्थक थीं और परमेश्वर ने उनकी सुन ली l यहाँ इसमें एक अद्भुत रहस्य है : सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमारी प्रार्थनाओं को उपयोग करने का निर्णय करता है l कितना बड़ा सौभाग्य!

आज हम विश्वास की खातिर सताव सह रहे भाई और बहनों को निरंतर प्रार्थना में याद रख सकते हैं l कुछ है जो हम कर सकते हैं l हम अधिकारविहीन, शोषित, पराजित, उत्पीड़ित, और कभी-कभी मसीह में अपने विश्वास के कारण मृत्यु का सामना कर रहे लोगों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं l उनके लिए प्रार्थना करें कि वे परमेश्वर का विश्राम और प्रोत्साहन प्राप्त करें और यीशु के साथ दृढ़ता से खड़े होने के लिए आशा में सामर्थी बनते जाएँ l

परिवर्तन संभव है

शनिवार की दोपहर, हमारी कलीसिया के युवा समूह के कुछ सदस्य एक दूसरे से फिलिप्पियों 2:3-4 पर आधारित कुछ कठिन प्रश्न पूछने के लिए इकठ्ठा हुए l “विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो l हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिंता करे l” कुछ एक कठिन प्रश्न जो शामिल थे : आप कितनी बार दूसरों में रूचि लेते हैं? क्या कोई आपको दीन या घमण्डी कहेगा? क्यों?

जब मैं सुन रही थी, मैं उनके ईमानदार उत्तर से उत्साहित हुयी l ये कीशोर सहमत थे कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना सरल नहीं है, किन्तु इसे परिवर्तित करना कठिन है, अथवा-इस सम्बन्ध में-परिवर्तन की इच्छा l जिस प्रकार खेद के साथ एक किशोर बोला, “स्वार्थ मेरे खून में है l”

दूसरों की सहायता के लिए खुद पर से ध्यान हटाने की इच्छा हमारे अन्दर निवास करनेवाले यीशु की आत्मा द्वारा ही संभव है l इसी कारण से पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को उन बातों पर विचार करने की लिए याद दिलाया जो परमेश्वर ने किया था और उनके लिए संभव बना दिया था l उसने उनको दयालुता से गोद लिया था, उनको अपने प्रेम द्वारा आराम दिया था, और उनकी सहायता के लिए अपनी आत्मा दी थी (फिलिप्पियों 2:1-2) l किस तरह वे-और हम-इस अनुग्रह का प्रतिउत्तर दीनता से कुछ कम के द्वारा दे सकते हैं?

वाकई, हमारे परिवर्तन का कारण परमेश्वर ही है, और केवल वही हमें बदल सकता है l क्योंकि वह हमें “अपना प्रेमपूर्ण उद्देश्य पूरा करने के लिए . . . सद् इच्छा भी उत्पन्न करता और उसके अनुसार कार्य करने का बल भी प्रदान करता है” (पद.13 Hindi C.L.), हम खुद पर कम केन्द्रित होकर दीनता से दूसरों की सेवा कर सकते हैं l

आप क्या त्याग सकते हैं?

“वह कौन सी एक चीज़ है जिसे आप नहीं त्याग सकते हैं?” रेडियो पर एक होस्ट ने पूछा। श्रोताओं ने बहुत ही रोचक जवाब दिए। कुछ ने अपने परिवार बताए, पतियों ने अपनी मृत पत्नी की यादों को बताया। कुछ ने बताया कि वे अपने सपनों, जैसे कि संगीत में प्रसिद्ध होना या माँ बनना, को नहीं छोड़ सकते हैं। हम सभी के पास कुछ न कुछ है जिसे हम प्रतिदिन संजोकर रखते हैं-कोई व्यक्ति, कोई उत्साह, कोई सम्पत्ति-कोई न कोई ऐसी बात जिसे हम त्याग नहीं सकते हैं।

होशे की पुस्तक में, परमेश्वर हमें बताता है कि वह अपने चुने हुए लोग, अपने निज भाग, इस्राएल को कभी नहीं त्यागेगा। इस्राएल के प्रेमी पति के रूप में परमेश्वर ने उसे सबकुछ उपलब्ध करवाया जिसकी उसे आवश्यकता थी: भूमि, भोजन, पानी, वस्त्र और सुरक्षा। फिर भी एक व्यभिचारी पत्नी के रूप में इस्राएल ने परमेश्वर को अस्वीकार किया और अपनी खुशी और सुरक्षा कहीं ओर खोजी। जितना परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आया, वह उतनी ही भटकती चली गई (होशे 11:2)। परन्तु यद्यपि उसने उसे बुरी तरह से आहत किया था, फिर भी वह उसे कभी नहीं त्यागेगा (पद 8)। उसका छुटकारा करने के लिए वह उसे अनुशासित करेगा; उसकी इच्छा उसके साथ सम्बन्ध को फिर से स्थापित करने की थी (पद 11)।

आज, परमेश्वर की समस्त सन्तान उसी आश्वासन को प्राप्त कर सकती है: हमारे लिए उसका प्रेम ऐसा प्रेम है जो हमें कभी जाने नहीं देगा (रोमियों 8:37-39)। यदि हम भटक कर उससे दूर हो गये हैं, तो वह हमारे वापिस लौटने के लिए इच्छा रखता हैl जब परमेश्वर हमें अनुशासित करता है, तो हमे सांत्वना मिल सकती है कि यह उसके हमारे पीछे-पीछे आने का चिह्न है, न कि उसके त्याग दिए जाने का चिह्न। हम उसके निज भाग हैं; वह हमें कभी नहीं त्यागेगा।