Month: नवम्बर 2025

राजा के साथ चलना- दिन 10

यूहन्ना 14:15-21 

15 “यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे l 16 मैं पिता से विनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे l 17 अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते…

राजा के साथ चलना- दिन 1

मत्ती 2:13-15  

13 उनके चले जाने के बाद प्रभु के एक दूत ने स्वप्न में युसूफ को दिखाई देकर कहा, “उठ, उस बालक को और उसकी माता को लेकर मिस्र देश को भाग जा; और जब तक मैं तुझ से न कहूँ, तब तक वहीँ रहना; क्योंकि हेरोदेश इस बालक को ढूँढ़ने पर है कि उसे मरवा डाले l”

14 तब वह…

राजा के साथ चलना [Walking with the King '25]

मैं तुम्हारे बीच चला फिरा करूँगा, और तुम्हारा परमेश्वर बना रहूँगा, और तुम मेरी प्रजा बने रहोगे l लैव्यव्यवस्था 26:12

डरावने यह कल्पना कीजिए। परमेश्वर, देह में लिपटे हुए, ऐसे साधारण स्थानों में जन्मे और पले-बढ़े जहाँ कोई भी उन्हें पा सकता था। वे ऐसे जीवन में बढ़े जहाँ किसी भी गली-चौराहे या मिट्टी की सड़क पर उनसे मुलाक़ात हो सकती…

करुणा का कौशल

चौदहवीं शताब्दी में सिएना की कैथरीन ने लिखा, "तुम्हारे पैर में एक कांटा घुस गया है - इसीलिए तुम रात में कभी-कभी रोते हो।" उन्होंने आगे कहा, “इस दुनिया में कुछ लोग हैं जो इसे बाहर निकाल सकते हैं। जो कौशल उन्हें चाहिए वह उन्होंने परमेश्वर से सीखा है।'' कैथरीन ने उस "कौशल" को विकसित करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और दूसरों के दुःख दर्द में उनके प्रति सहानुभूति और करुणा की उल्लेखनीय क्षमता के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।

 दर्द की वह छवि जो मेरे साथ रहती है, वह एक गहरे धंसे हुए कांटे के रूप में है जिसे निकालने के लिए करुणा और कौशल की आवश्यकता होती है। यह इस बात का स्पष्ट अनुस्मारक है कि हम कितने पेचीदा (जटिल) और घायल हैं, और हमें दूसरों और स्वयं के प्रति सच्ची करुणा विकसित करने के लिए और अधिक गहराई तक जाने की आवश्यकता है।

 या, जैसा कि प्रेरित पौलुस ने इसका वर्णन किया है, यह एक ऐसी छवि है जो हमें याद दिलाती है कि यीशु की तरह दूसरों से प्यार करने के लिए अच्छे इरादों और शुभकामनाओं से कहीं अधिक की आवश्यकता होती है - इसके लिए " एक दूसरे से स्‍नेह रखो" (रोमियों 12:10), आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो (पद 12)। न केवल "आनन्द करनेवालों के साथ आनन्द" करना है बल्कि "रोनेवालों के साथ [रोने]" की भी इच्छा होनी चाहिए (पद 15)। इसके लिए हमें अपना सब कुछ देना होगा।

 इस टूटी हुई दुनिया में, हममें से कोई भी घायल हुए बिना नहीं बचता है—चोट और घाव हममें से प्रत्येक के मन में गहराई से समाए हुए हैं। परन्तु वह प्रेम और भी गहरा है जो हम मसीह में पाते हैं; इतना कोमल प्रेम कि करुणा के मरहम से उन कांटों को बाहर निकाल सकता है, मित्र और शत्रु दोनों को गले लगाने के लिए तैयार है (पद 14) ताकि एक साथ चंगा हो सकें।

—-मोनिका ला रोज़

 

परमेश्वर के लिए सेवा करना

 

जब सितंबर 2022 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ का निधन हुआ, तो उनके अंतिम संस्कार के जुलूस में मार्च करने के लिए हजारों सैनिकों को तैनात किया गया था। बड़ी भीड़ में उनकी व्यक्तिगत भूमिकाएँ लगभग अदृश्य रही होंगी, लेकिन कई लोगों ने इसे सबसे बड़ा सम्मान माना। एक सैनिक ने कहा कि यह "महारानी के लिए अपना अंतिम कर्तव्य निभाने का अवसर था।" उसके लिए, यह महत्वपूर्ण नहीं था कि उसने क्या किया, बल्कि यह महत्वपूर्ण था कि वह किसके लिए कर रहा था।

तम्बू के साज-सामान की देखभाल करने के लिए नियुक्त लेवियों का उद्देश्य भी ऐसा ही था। याजकों के विपरीत, गेर्शोनियों, कोहातियों और मरारियों को सामान्य से लगने वाले काम सौंपे गए थे: फर्नीचर, दीवट, पर्दे, खंभे, तंबू की खूंटियाँ और रस्सियाँ साफ करना (गिनती 3:25-26, 28, 31, 36-37)। फिर भी उनके काम विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा सौंपे गए थे, जो “तम्बू का काम करना” (वचन 8) था, और बाइबल में भावी पीढ़ियों के लिए दर्ज किए गए हैं।

 यह कितना उत्साहजनक विचार है! आज, हममें से कई लोग काम पर, घर पर या चर्च में जो करते हैं, वह दुनिया के लिए महत्वहीन लग सकता है, जो उपाधियों और वेतन को महत्व देता है। लेकिन परमेश्वर इसे अलग तरह से देखता है। अगर हम उसके लिए काम करते हैं और उसकी सेवा करते हैं—उत्कृष्टता की तलाश करते हैं और उसके सम्मान के लिए ऐसा करते हैं, यहाँ तक कि सबसे छोटे काम में भी—तो हमारा काम महत्वपूर्ण है क्योंकि हम अपने महान परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं।

— लेस्ली कोह

मैं कौन हूँ?

स्थानीय सेवकाई  के लिए नेतृत्व दल के सदस्य के रूप में, मेरा काम दूसरों को सामूहिक चर्चा के अगुओं के रूप में हमारे साथ शामिल होने के लिए आमंत्रित करना था। मेरे निमंत्रण में समय की प्रतिबद्धता की आवश्यकता बताई गई थी और अगुओं  को बैठकों में और नियमित फ़ोन कॉल के दौरान अपने छोटे समूह के प्रतिभागियों से जुड़ने के तरीकों की रूपरेखा दी गई थी। मैं अक्सर अन्य लोगों पर दबाव डालने से हिचकिचाता था, क्योंकि मैं जानता था कि अगुआ बनने के लिए उन्हें कितना त्याग करना होगा। और फिर भी कभी-कभी उनका जवाब मुझे पूरी तरह से अभिभूत कर देता था: "मुझे सम्मानित महसूस होगा।" अस्वीकार करने के लिए वैध कारणों का हवाला देने के बजाय, उन्होंने अपने जीवन में किए गए सभी कार्यों के लिए परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता का वर्णन किया और बदले में देने के लिए उत्सुक होने का कारण बताया।    

 जब परमेश्वर के लिए मंदिर बनाने के लिए संसाधन देने का समय आया, तो दाऊद ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी: “मैं कौन हूँ, और मेरी प्रजा कौन है, कि कि हम को इस रीति से अपनी इच्छा से तुझे भेंट देने की शक्ति मिले? ?” (1 इतिहास 29:14)। दाऊद की उदारता उसके और इस्राएल के लोगों के जीवन में परमेश्वर की भागीदारी के लिए कृतज्ञता से प्रेरित थी। उसकी प्रतिक्रिया उसकी विनम्रता और “विदेशियों और अजनबियों” के प्रति उसकी भलाई की स्वीकृति की बात करती है ( (पद 15)।

 परमेश्वर के कार्य के लिए हमारा देना—चाहे समय, प्रतिभा, या धन के रूप में—उसके प्रति हमारी कृतज्ञता को दर्शाता है जिसने हमें शुरू में दिया था। हमारे पास जो कुछ भी है वह उसके हाथ से आता है (  (पद 14); जवाब में, हम उसे कृतज्ञतापूर्वक दे सकते हैं।

 — कर्स्टन होल्म्बर्ग