
वह धार्मिक शहर
नए साल 2000 के पूर्वसंध्या पर, डेट्रॉइट में अधिकारियों ने सावधानीपूर्वक एक सौ साल पुराना टाइम कैप्सूल(Time Capsule-ऐतिहासिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखनेवाला एक पात्र जो भविष्य में कभी खोला जा सकेगा) खोला। तांबे के बक्से के अंदर शहर के कुछ नेताओं की उम्मीद भरी भविष्यवाणियाँ थीं, जिन्होंने समृद्धि के सपने व्यक्त किए थे। हालाँकि, मेयर के संदेश ने एक अलग दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने लिखा, "हमें एक ऐसी आशा व्यक्त करने की अनुमति दी जाए जो बाकी सभी से बेहतर हो... [ताकि] आप महसूस कर सकें कि एक राष्ट्र, लोगों और शहर के रूप में आप धार्मिकता में बढ़े हैं, क्योंकि यही वह है जो एक राष्ट्र को ऊंचा उठाता है।"
सफलता, खुशी या शांति से अधिक, मेयर की इच्छा थी कि भावी नागरिक वास्तव में न्यायपूर्ण और ईमानदार होने के अर्थ में विकसित हों। शायद उसने अपना संकेत यीशु से लिया, जिन्होंने उन लोगों को आशीषित किया जो उसकी धार्मिकता के प्यासे हैं (मत्ती 5:6)। लेकिन जब हम परमेश्वर के आदर्श मानक पर विचार करते हैं तो निराश होना आसान होता है।
परमेश्वर की प्रशंसा हो कि हमें बढ़ने के लिए स्वयं के प्रयास पर निर्भर होना नहीं पड़ता। इब्रानियों के लेखक ने इसे इस प्रकार कहा : “अब शान्तिदाता परमेश्वर . . . हर एक भली बात में सिद्ध करे, जिससे तुम उसकी इच्छा पूरी करो, और जो कुछ उसको भाता है, उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में पूरा करे” (इब्रानियों 13:20-21)। हम जो मसीह में हैं, उसी क्षण उसके लहू से पवित्र हो जाते हैं जिस क्षण हम उस पर विश्वास करते हैं (पद.12), लेकिन वह जीवन भर हमारे दिलों में धार्मिकता का फल सक्रिय रूप से उगाता है। हम यात्रा में अक्सर लड़खड़ाते है फिर भी हम “आनेवाले नगर” की प्रतीक्षा कर रहे हैं जहाँ परमेश्वर की धार्मिकता राज करेगी (पद.14)।
—करेन पिम्पो
व्याकुल आत्माएं, सत्य प्रार्थनाएं
जनवरी 1957 में उनके घर पर बम विस्फोट होने से तीन दिन पहले, डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के साथ एक ऐसी घटना हुई जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए यादगार बना दिया। एक धमकी भरा फ़ोन कॉल आने के बाद, किंग ने खुद को नागरिक अधिकार आंदोलन से बाहर निकलने की रणनीति पर विचार करते हुए पाया। फिर उन्होंने अपनी आत्मा से प्रार्थना करना शुरू कर दिया — "मैं यहाँ उस बात के लिए खड़ा हूँ जो मुझे सही लगता है। लेकिन अब मुझे डर लग रहा है। मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। मैं उस बिंदु पर आ गया हूँ जहाँ मैं इसका सामना अकेले नहीं कर सकता।" उनकी प्रार्थना के बाद, एक शांत आश्वासन मिला । किंग ने कहा, "लगभग तुरंत ही मेरा डर दूर होने लगा। मेरी अनिश्चितता गायब हो गई। मैं किसी भी चीज़ का सामना करने के लिए तैयार था।"
यूहन्ना 12 में, यीशु ने कहा, "अब मेरा जी व्याकुल है" (पद.27)। वह अपने आंतरिक स्वभाव के प्रति पारदर्शी रूप से ईमानदार था; फिर भी वह अपनी प्रार्थना में परमेश्वर-केंद्रित था। “हे पिता, अपने नाम की महिमा कर” (पद.28)। यीशु की प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण था।
जब हम अपने सामने परमेश्वर का सम्मान करने या न करने का विकल्प पाते हैं तो भय और असुविधा का पीड़ा महसूस करना हमारे लिए कितना मानवीय है; जब बुद्धि के लिए रिश्तों, आदतों या अन्य पैटर्न/स्वरूप (अच्छे या बुरे) के बारे में कठोर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमें किस चीज़ का सामना करना पड़ा है, जब हम साहसपूर्वक परमेश्वर से प्रार्थना करते है, वह हमें हमारे और डर और असहजता पर काबू पाने और वह करने के लिए सामर्थ्य देगा जो उसको महिमा देता है—हमारी भलाई और दूसरों की भलाई के लिए।
—आर्थर जैक्सन
जीवन का मुकुट
बारह वर्षीय लीएडियानेज़ रोड्रिग्ज-एस्पाडा चिंतित थी कि उसे 5 किमी (3 मील से थोड़ा अधिक) दौड़ में देर हो जाएगी। उसकी उत्सुकता ने उसे अपने प्रारंभ समय से पंद्रह मिनट पहले हाफ-मैराथन (13 मील से अधिक!) के प्रतिभागियों के धावकों के साथ दौड़ शुरू करने को प्रेरित किया । लीएडियानेज़ अन्य धावकों की गति में गई और एक पैर दूसरे के सामने रखते गई। चार मील पर, जब समापन रेखा कहीं दिखाई नहीं दी, तब उसे एहसास हुआ कि वह एक लंबी और अधिक कठिन दौड़ में थी। बाहर निकलने के बजाय, वह बस दौड़ती रही। आकस्मिक हाफ मैराथन धावक ने अपने 13.1 मील का दौड़ पूरा किया और 2,111 धावको में से 1,885वें स्थान पर रही। अब यह है अटलता (कठिनाइयों के बावजूद कुछ करने का निरंतर प्रयास)!
यीशु में पहली सदी के कई विश्वासी सताव सहते हुए, मसीह की दौड़ से बाहर होना चाहते थे, लेकिन याकूब ने उन्हें दौड़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। यदि उन्होंने धैर्य पूर्वक परीक्षा सहा, तो परमेश्वर उन्हें दोगुना इनाम देने का वादा किया (याकूब 1:4, 12)। पहला, “धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे” (पद.4)। दूसरा, परमेश्वर उन्हें "जीवन का वह मुकुट" देगा—पृथ्वी पर यीशु में जीवन और आने वाले जीवन में उसकी उपस्थिति में रहने का वादा (पद.12) ।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि मसीही दौड़ वह नहीं है जिसके लिए हमने साइन अप (शामिल होने के लिए सहमत होना) किया था - यह हमारी अपेक्षा से अधिक लंबी और कठिन है। लेकिन जब परमेश्वर हमें वह प्रदान करता है जिसकी हमें आवश्यकता है, तो हम अटल रह सकते हैं और दौड़ते रह सकते हैं।
—मार्विन विलियम्स
दूसरों की जरूरतों को पूरा करना
फिलिप के पिता गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित थे और सड़कों पर रहने के लिए घर छोड़ कर चले गए थे। सिंडी और उनके छोटे बेटे फिलिप ने एक दिन उनकी तलाश में बिताया, जिसके बाद फिलिप को अपने पिता की सेहत की चिंता हुई। उसने अपनी माँ से पूछा कि क्या उसके पिता और अन्य बेघर लोग ठण्ड से सुरक्षित हैं। वे खुद को कैसे गर्म और आरामदायक रखते हैं। जवाब में, उन्होंने अपने क्षेत्र में बेघर लोगों को कंबल और ठंड के मौसम के कपड़े इकट्ठा करने और वितरित करने का प्रयास शुरू किया। एक दशक से अधिक समय से, सिंडी ने इसे अपने जीवन का कार्य माना है, सोने के लिए गर्म जगह के नहीं होने की कठिनाई के प्रति जागृत होने का श्रेय अपने बेटे और परमेश्वर में अपने गहरे विश्वास को देती है।
बाइबल ने हमें लंबे समय से दूसरों की ज़रूरतों पर ध्यान देना सिखाया है। निर्गमन की पुस्तक में, मूसा ने उन लोगों के साथ हमारी बातचीत का मार्गदर्शन करने के लिए सिद्धांतों का एक संग्रह दर्ज किया है जिनके पास भरपूर संसाधनों की कमी है। जब हम किसी दूसरे की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रेरित होते हैं, तो हमें "इसे एक व्यापारिक सौदे की तरह नहीं समझना चाहिए" और इससे कोई लाभ या मुनाफा नहीं कमाना चाहिए (निर्गमन 22:25)। यदि किसी का वस्त्र बन्धक के रूप में लिया गया था, तो उसे सूर्यास्त तक वापस करना था “क्योंकि वह उसका एक ही ओढ़ना है, उसकी देह का वही अकेला वस्त्र होगा; फिर वह किसे ओढ़कर सोएगा?” (पद.27)।
आइए परमेश्वर से कहे कि वह हमारे आँखों और दिल को खोले ताकि हम यह देख सकें कि पीड़ित लोगों का दर्द कैसे कम कर सकते हैं। चाहे हम कई लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना चाहते हों—जैसा कि सिंडी और फिलिप्प ने किया है—या किसी एक व्यक्ति का, उनका सम्मान और देखभाल करके हम उनका सम्मान करते हैं।
—कर्स्टन होम्बर्ग