एस्तेर “बेन” खिमचंद 20वीं सदी की एक लेखिका थीं, जिनका जन्म गुजरात के एक साधारण परिवार में हुआ था। अपने लेखन के ज़रिए, उन्होंने राज्य में महिलाओं के अधिकारों की वकालत की। उन्होंने लिखा कि अच्छी शिक्षा महिलाओं को उनके परिवारों और समुदायों में सम्मानजनक पदों पर रखने में मदद कर सकती है। एस्तेर ने अपनी प्रतिभा को अपने पास नहीं रखा या अपने फ़ायदे के लिए उसका इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय, उसने अपने आस-पास के लोगों को सशक्त बनाने के लिए उनका इस्तेमाल किया।

पतरस की पत्री पहली सदी के उन मसीहियों को संबोधित है जो शरणार्थियों की तरह एशिया माइनर में बिखरे हुए थे(1 पतरस 1:1)। उसने उन्हें “एक-दूसरे से अधिक प्रेम रखने” और “जो वरदान” उन्हें मिला है उसका उपयोग “एक दूसरे की सेवा” करने में लगाने के लिए प्रेरित किया (पद.8,10)। इन वरदानों का श्रेय लेने के बजाय, पतरस ने उनसे आग्रह किया कि वे अपने आध्यात्मिक वरदानों को “परमेश्वर के अनुग्रह” के रूप में मानें। उसने उन्हें “विश्वासयोग्य भंडारी” बनने के लिए प्रोत्साहित किया जो परिश्रमपूर्वक परमेश्वर के अधिकार में की बातों का प्रबंधन करते हैं l उसने उनसे यह भी आग्रह किया कि वे इस समझ के साथ बोलें कि वे “मानो परमेश्वर के ही वचन” बोल रहे हैं और “[परमेश्वर] की शक्ति से” लोगों की सेवा करें ताकि उनके कार्यों में और उनके द्वारा परमेश्वर की स्तुति हो सके (पद.11)। इस तरह, हम अपने हर काम में परमेश्वर को महिमा देते हैं। एस्तेर और प्रारंभिक कलीसिया की तरह, हमें भी वरदान दिये गए हैं। ये वरदान, हालाँकि हमें सरल लगते हैं, परमेश्वर के राज्य को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। यह भोजन तैयार करना, सवालों के जवाब देना या किसी ज़रूरतमंद के लिए अपना घर खोलना हो सकता है। जब भी हमें बोलने या कार्य करने के लिए कहा जाता है, तो हमें एक-दूसरे की सेवा में और परमेश्वर को महिमा देने के लिए ऐसा करना चाहिए (पद.11)। इस तरह, हमारे पास जो भी वरदान हैं, आइए उनका उपयोग दूसरों को ऊपर उठाने के लिए करें। कैरल मैकवॉन