मेरे पति और मेरी शादी के बाद, मेरे मामा ने हमें मेरे परिवार का इतिहास बताया। उन्होंने बताया कि भले ही मेरे दादा एक स्कूल के प्रिंसिपल थे, लेकिन उनकी आय उनके सात बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। फिर भी, उन्होंने अपने बड़े बच्चों की उच्च शिक्षा में निवेश किया, जो कॉलेज जाने पर अक्सर अपने चाचा या चाची के साथ रहते थे। जब ये बड़े बच्चे कमाने लगे, तो उन्होंने अपने छोटे भाई-बहनों की शिक्षा का खर्च उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हम एक-दूसरे की मदद करते हैं, याद रखें कि अगर तुम लोगों को किसी चीज़ की ज़रूरत है तो हमारे पास आ सकते हो। साथ ही, जब दूसरों को ज़रूरत हो तो उनकी मदद करने के लिए तैयार रहो।”

अपनी पत्री में, यूहन्ना ने उन लोगों को भी ऐसी ही सलाह दी जिन्हें उसने “बालकों” कहा था। वह लिखता हैं, “हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करे”(पद.18)। वह हमें उस प्रेम की याद दिलाता हैं जो यीशु का हमसे था जब उसने कुछ भी नहीं रोका और हमारे लिए अपना जीवन दे दिया (पद.16)। वास्तव में, यूहन्ना कहता है कि यीशु ने वास्तविक प्रेम को दर्शाया (पद.16)। इस बात को ध्यान में रखते हुए, यूहन्ना ने विश्वासियों को एक दूसरे के साथ अपनी “भौतिक संपत्ति” साझा करने के लिए कहा (पद.17)। क्योंकि यदि कोई विश्वासी “अपने भाई [या बहन] को कंगाल देखकर उस पर तरस खाना न चाहे,” तो यूहन्ना पूछता है, “तो उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?”

संसार हमें बताती है कि अपने संसाधनों को जमा करना समझदारी है। लेकिन बाइबल हमें बताती है कि ये वरदान दूसरों की सेवा करने के लिए दिए गए हैं (1 पतरस 4:10)। यदि हम किसी को ज़रूरत में देखते हैं, चाहे वह रिश्तेदार हो, दोस्त हो, साथी शिष्य हो या अजनबी हो, तो आइए हम उनसे काम और सत्य से प्रेम करें। ऐसा करके, हम दूसरों के सामने परमेश्वर के प्रेम का प्रदर्शन करते हैं जो हमारे अंदर है। —ऍन हरिकीर्तन