मोहनदास के. गांधी ने अन्य लोगों के साथ मिलकर 200 साल से ज़्यादा पुराने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाई थी। अपनी आत्मकथा, सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी में गांधी लिखते हैं, “पहाड़ी उपदेश” सीधे मेरे हृदय में उतर गया… ‘परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर देl यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुर्ता लेना चाहे, तो उसे दोहर भी ले लेने दे,’ ये पद मुझे बहुत ज़्यादा खुशी देते हैं।” यीशु के शब्दों ने गांधी को निष्क्रिय विरोध या अहिंसा के ज़रिए औपनिवेशिक शासन के खिलाफ़ प्रोत्साहित किया।

यीशु ने सिर्फ़ अहिंसा ही नहीं सिखाई। उसने प्रेम सिखाया जो एक सकारात्मक क्रिया है जो निष्क्रिय प्रतिरोध से कहीं बढ़कर है। अपने जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के ज़रिए उसने दिखाया कि हिंसा कभी भी एक विकल्प नहीं है। यीशु, हालांकि निर्दोष था, उस पर झूठा आरोप लगाया गया था। फिर भी, हमारे प्रति अपने प्यार के कारण, वह चुप रहा और खुद को मृत्युदंड के शर्मनाक रूप में जाने दिया (पद.7-8)। यीशु ने भयंकर घृणा और क्रोध से परे देखा, और उसने पीड़ा सही क्योंकि वह जानता था कि यह मानव जाति को पाप से बचाने का एकमात्र तरीका था। यीशु के प्रेम के बलिदान ने हमें पाप से मुक्त किया।

शांति की तलाश करना——प्रेम का उल्लेख न करना——कभी-कभी व्यर्थ लग सकता है, खासकर जब लोग क्रोध, घृणा या यहां तक कि हिंसा से भरे शब्दों या कार्यों के साथ हमारे खिलाफ आते हैं। लेकिन जब हम पर अत्याचार किया जाता है, तो हमें अपने गुरु/स्वामी का अनुकरण करना चाहिए, जिसने शांति के मार्ग पर चलकर, प्रेम का प्रदर्शन किया और धैर्यपूर्वक पीड़ा सही l हमारे कार्यों, शब्दों और यहां तक कि हमारे इरादों को भी उन्हें प्रतिबिंबित करना चाहिए ताकि हमारे द्वारा, वह रूपांतरण और चंगाई ला सकें। मिनी अब्राहम