एक व्यक्ति ने अदालत में परमेश्वर के विरुद्ध रोकने वाला मुकद्दमा दायर किया l उसने दावा किया कि परमेश्वर उसके प्रति “विशेष रूप से निर्दयी” था और उसने “गंभीर रूप से नकारात्मक रवैया” दर्शाया था l पीठासीन न्यायाधीश ने यह करते हुए मुक़दमा ख़ारिज कर दिया कि उस व्यक्ति को अदालत की नहीं बल्कि अपने मानसिक स्वास्थ में सहायता की ज़रूरत है l एक सच्ची कहानी: हास्यप्रद, लेकिन दुखद भी l
लेकिन क्या हम इतने भिन्न हैं? क्या हम कभी-कभी यह नहीं कहना चाहते, “हे परमेश्वर, कृपया ठहरिये, मैंने बहुत सह लिया!” अय्यूब ने कहा l उसने परमेश्वर को न्यायिक प्रक्रिया में डाल दिया l अकथनीय व्यक्तिगत त्रासदियों को सहने के बाद, अय्यूब कहता है, “मेरी अभिलाषा परमेश्वर से वाद-विवाद करने की है”(अय्यूब 13:3) और “उससे मुकद्दमा [लड़ने]” की कल्पना करता है(9:3) l वह एक रोकने वाला आदेश भी देता है: “अपनी ताड़ना मुझ से दूर कर ले, और अपने भय से मुझे भयभीत न कर”(13:21) l अय्यूब का अभियोजन पक्ष का तर्क उसकी स्वयं की बेगुनाही नहीं थी, बल्कि जिसे वह परमेश्वर की अनुचित कठोरता के रूप में देखता है: “क्या तुझे अंधेर करना . . . भला लगता है?”(10:3) l
कभी-कभी हमें लगता है कि परमेश्वर अन्यायी है l सच तो यह है कि अय्यूब की कहानी जटिल है और आसान उत्तर नहीं देती l परमेश्वर अंत में अय्यूब की भौतिक सम्पति को बहाल करता है, लेकिन हमारे लिए हमेशा उसकी योजना ऐसी नहीं होती है l शायद हमें अय्यूब की अंतिम स्वीकारोक्ति में कुछ निर्णय मिलता है: “मैं ने तो जो नहीं समझता था वही कहा, अर्थात् जो बातें मेरे लिए अधिक कठिन और मेरी समझ से बाहर थीं जिनको मैं जानता भी नहीं था”(42:3) l मुद्दा यह है कि परमेश्वर के पास ऐसे कारण हैं जिनकी बारे में हम कुछ नहीं जानते हैं, और उसमें अद्भुत आशा है l केनेथ पीटरसन
किन अवसरों ने आपको “परमेश्वर से मुकद्दमा लड़ने के लिए प्रेरित किया है?
आपके लिए उससे कठिन प्रश्न पूछना क्यों ठीक है?
प्रिय परमेश्वर, मुझे कभी-कभी इस बात पर क्रोध आता है कि मुझे क्या सहना पड़ा है l
कृपया अपनी शिकायतें आपके पास लाने में मेरी मदद करें l
