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Articles by टिम गस्तफसन

ख़ामोशी

सहायता ट्रकों के गाँव की टूटी झोपड़ियां हटाते समय चूज़े भागने लगे l नंगे पाँव बच्चे घूरते रहे l बारिश से उजड़ी “सड़क” पर यातायात कम थी l

अचानक, काफिले ने दीवारों से घिरी मेयर का बड़ा मकान देखा जो खाली था l लोगों के पास बुनियादी ज़रूरतें नहीं थीं जबकि वह दूर शहर में आलिशान मकान में रहता था l

ऐसा अन्याय हमें क्रोधित करता है, जिससे परमेश्वर का नबी भी क्रोधित हुआ l व्यापक शोषण देखकर हबक्कूक ने कहा, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा?” (हबक्कूक 1:2) l किन्तु परमेश्वर ने ध्यान  देकर कहा, “हाय उस पर जो पराया धन छीन छीनकर धनवान हो जाता है? ... जो अपने घर के लिए अन्याय के लाभ का लोभी है” (2:6, 9) l न्याय निकट है!

हम दूसरों पर परमेश्वर का न्याय चाहते हैं, किन्तु हबक्कूक की एक मुख्य बात हमें रोकती है : “यहोवा अपने पवित्र मंदिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे” (2:20) l समस्त  पृथ्वी l शोषित और उत्पीड़क l कभी-कभी परमेश्वर की प्रत्यक्ष खामोशी का उचित प्रतिउत्तर ... ख़ामोशी है!

ख़ामोशी क्यों? क्योंकि हम अपनी आत्मिक दरिद्रता नहीं देखते l हम ख़ामोशी में पवित्र परमेश्वर के सामने अपने पाप देख सकेंगे l   

हबक्कूक की तरह हम भी परमेश्वर पर भरोसा सीखें l हम उसके सब मार्ग नहीं जानते, किन्तु जानते हैं कि वह भला है l सब कुछ उसके नियंत्रण और समय में है l  

हमें क्या चाहिए?

एक वृद्ध ने बताया कि उसने अपनी नतिनी से घोड़ा और बग्गी से लेकर चाँद पर चलते हुए मानव की बात की l किन्तु फिर सोचकर बोला, “मैंने कभी नहीं सोचा यह इतनी छोटी होगी l”

जीवन छोटा है, और अनेक अनंतकालिक जीवन हेतु यीशु का अनुसरण करते हैं l यह बुरा नहीं है, किन्तु समझना होगा कि अनंत जीवन है क्या l हमारी इच्छा गलत हैं l हमें कुछ बेहतर चाहिए, और हमारी सोच है कि वह अति निकट है l काश मुझे स्कूल के शीघ्र बाद नौकरी मिल जाती, मेरी शादी हो जाती l मैं सेवा-निवृत हो जाता l काश मैं ... l  और तब एक दिन दादा की आवाज़ प्रतिध्वनित हुई, समय बीत गया l

सच्चाई यह है, अभी  हमारे पास अनंत जीवन है l प्रेरित पौलुस ने लिखा, “जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया (रोमियों 8:2) l शारीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगते हैं (पद.5) l अर्थात्, हमारी इच्छाएँ मसीह के निकट आने से बदल जाती हैं l यह स्वाभाविकता से हमारी सर्वोत्तम इच्छा पूरी करता है l “आत्मा पर मन लगाना जीवन और शांति है” (पद.6) l

यह जीवन का एक सबसे बड़ा झूठ है कि वास्तविक जीवन जीने से पूर्व हमें कहीं और रहना है, कुछ और करना है, किसी और के साथ l यीशु में जीवन पाने के बाद, हम जीवन की संक्षिप्तता के अफ़सोस को उसके संग जीवन के सम्पूर्ण आनंद से अभी और हमेशा के लिए बदल लेते हैं l

एक भी गौरैया नहीं

अपने सम्पूर्ण जीवन में ओजस्वी और अनुशासित, मेरी माँ, अपनी उम्र के कारण इस समय एक मरणासन्न रोगियों के अस्पताल में है l श्वास के लिए तड़पती हुई, उनकी गिरती स्थिति उनकी खिड़की के बाहर लुभावना सुन्दर वसंत के दिन के विपरीत थी  l

संसार में समस्त भावनात्मक तैयारियाँ अलविदा के अटल सत्य के लिए हमें समुचित तौर से तैयार नहीं कर सकती l मृत्यु कितना बड़ा अनादर है!  मुझे ख्याल आया l

मैंने खिड़की के बाहर पक्षियों के दाने के बर्तन को देखा l एक छोटी चिड़िया दाना खाने आई l शीघ्र ही एक परिचित वाक्यांश मैंने याद किया : “तुम्हारे पिता की इच्छा के बिना उनमें से एक भी भूमि पर नहीं गिर सकती” (मत्ती 10:29) l यीशु ने यह आज्ञा यहूदिया के एक मिशन पर अपने चेलों को दी, किन्तु यह सिद्धांत आज हम पर भी लागू है l “तुम गौरैयों से बढ़कर हो” (पद.31) l

मेरी माँ द्रवित होकर ऑंखें खोली l अपने बचपन को याद करके अपनी माँ के लिए हॉलैंड में प्रयुक्त प्रेम शब्द द्वारा बताया, “मुती मर गयी!”

“हाँ,” मेरी पत्नी सहमत थी l “वह यीशु के साथ है l” अनिश्चित, माँ ने आगे कहा l “और जोइस और जिम?” उसने अपनी बहन और भाई के विषय पूछी l “हाँ, वे भी यीशु के साथ हैं l “किन्तु हम भी शीघ्र उनके साथ होंगे!”

“इंतज़ार करना कठिन है,” माँ ने धीरे से कहा l

परमेश्वर का बचाव

कार पर लगे परमेश्वर विरोधी स्टिकर्स ने विश्विविद्यालय व्याख्याता का ध्यान अपनी ओर खींचा l पूर्व में खुद एक नास्तिक, उसने सोचा कि शायद कार-मालिक विश्वासियों को क्रोध दिला रहा था l “क्रोध नास्तिक को अपनी नास्तिकता प्रमाणित करने में मदद करता है,” उसने समझाया l तब उसने चिताया, “अक्सर, नास्तिक अपनी इच्छा पा लेता है l”

अपनी विश्वास यात्रा में, उसने एक मसीही मित्र की दिलचस्पी याद की जिसने उसे मसीह की सच्चाई बतायी l उसके मित्र के “आग्रह भाव में क्रोध नहीं था l” वह उस दिन प्राप्त वास्तविक आदर और शिष्टता भूल नहीं सकता l

विश्वासी दूसरों द्वारा मसीह के अपमान को अनादर मानते हैं l किन्तु यीशु  को वह इन्कार कैसा लगता है? यीशु ने हमेशा धमकियां, और घृणा सही, किन्तु अपने ईश्वरत्व पर शक  नहीं किया l एक बार, एक गाँव के इन्कार करने पर, याकूब और यूहन्ना ने तुरंत विरोध किया, “हे प्रभु, क्या ...  हम आज्ञा दें, कि आकाश से आग गिरकर उन्हें भस्म कर दे?” (लूका 9:54) l यीशु ने “फिरकर उन्हें डांटा” (पद.5) l आखिरकार, “परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दंड की आज्ञा दे, परन्तु ... जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17) l

हम चकित होंगे कि परमेश्वर नहीं चाहता हम उसका बचाव करें l उसकी इच्छा है कि हम उसके प्रतीक  बनें! इसमें समय, मेहनत, संयम, और प्रेम ज़रूरी है l

स्पर्श मात्र

किली पूर्वी अफ्रीका के एक दुरस्त क्षेत्र में एक मेडिकल मिशन पर जाने का अवसर पाकर प्रसन्न थी, किन्तु असहज l उसके पास मेडिकल अनुभव नहीं था l फिर भी, वह बुनियादी देखभाल कर सकती थी l

वहाँ रहते हुए उसकी मुलाकात एक महिला से हुयी जो भयंकर किन्तु साध्य रोग से ग्रस्त थी l उसका विकृत टांग उसको अकेला रखता था, किन्तु किली को कुछ करना ही था l टांग को साफ़ करके पट्टी करते समय, मरीज़ चिल्लाने लगी l चिंतित किली ने पूछा कि वह उसको तकलीफ तो नहीं पहुँचा रही l “नहीं,” उसने उत्तर दिया l “नौ वर्षों में पहली बार किसी ने मुझे छुआ है l”

कुष्ठ एक और बिमारी है जो अपने शिकार को दूसरों से दूर करता है, और प्राचीन यहूदी संस्कृति में इसके प्रसार को रोकने के लिए कठोर मार्गदर्शिकाएं थीं : “उन्हें अकेला रहना था,” व्यवस्था की घोषणा थी l “उसका निवास स्थान छावनी से बाहर हो” (लैव्य. 13:46) l

इसलिए यह असाधारण है कि एक कुष्ठ रोगी यीशु के निकट आकर बोला, “हे प्रभु, यदि तू चाहे, तो मुझे शुद्ध कर सकता है” (मत्ती 8:2) l “यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ, और कहा, “मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा” (पद. 3) l

एक अकेली महिला का रोग ग्रस्त टांग छूकर, किली ने मसीह के भयमुक्त, एक करनेवाला प्रेम प्रदर्शित किया l मात्र एक स्पर्श अंतर लाता है l

देने का उपहार

एक पासवान ने अपनी कलीसिया को बेचैन करनेवाली चुनौती देकर वाक्यांश “वह तुम्हें सब कुछ दे देगा” में जान डाल दी l क्या होगा यदि हम अपने कोट उतारकर ज़रुरतमंदों को दे दें? तत्पश्चात उसने अपना कोट उतारकर कलीसिया के आगे रख दिया l बहुतों ने उसके नमूने का अनुसरण किया l यह सर्दियों के समय हुआ, इसलिए उस दिन घर जाना कम आरामदायक था l किन्तु अनेक ज़रुरतमंदों को उस मौसम ने थोड़ी गर्माहट दी l

जब यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला यहूदिया के निर्जन प्रदेश में फिरता था, उसके पास आनेवाली भीड़ के लिए कड़ी चेतावनी थी l उसने कहा, “हे साँप के बच्चों ... मन फिराव के योग्य फल लाओ” (लूका 3:7-8) l चौंक कर उन्होंने उससे पूछा, “तो हम क्या करें?” उसने एक सलाह के साथ उत्तर दिया : “जिसके पास दो कुरते हों, वह उसके साथ जिसके पास नहीं है बाँट ले और जिसके पास भोजन हो, वह भी ऐसा ही करे” (पद.10-11) l सच्चा पश्चाताप एक उदार हृदय उत्पन्न करता है l

क्योंकि “परमेश्वर हर्ष से देनेवाले से प्रेम करता है,” दान दोष-आधारित अथवा विवशता में न हो (2 कुरिं.9:7) l किन्तु जब हम स्वतंत्रता और उदारता से देते हैं, तो हम देखते हैं कि वास्तव में लेने से देना धन्य है l

कोस्सी की साहस

टोगो के मोनो नदी में बप्तिस्मा का इंतज़ार करते हुए, कोस्सी ने झुककर लकड़ी की एक जीर्ण नक्काशी उठायी l  उसके परिवार पीढ़ियों से उसके उपासक थे l इस समय उन्होंने उसे उस कुरूप वस्तु को उस अवसर के लिए जलाई गयी आग में फेंकते देखा l अब उनकी अच्छी मुर्गियाँ इस देवता के आगे बलि नहीं होंगी l

पाश्चात्य देशों में लोग मूर्तियों को परमेश्वर के स्थान पर पूजी जानेवाली वस्तुओं का   अलंकार समझते हैं l पश्चिम अफ्रीका के टोगो में, मूर्तियाँ वास्तविक ईश्वर हैं जिन्हें बलि देकर शांत करना ज़रूरी है l मूर्तियों को जलाना और बप्तिस्मा एक सच्चे परमेश्वर के प्रति एक नए विश्वासी के स्वामिभक्ति की साहसिक अभिव्यक्ति है l

जैसे आठ वर्षीय राजा योशिय्याह ने एक मूर्तिपूजक और यौनाचार ग्रस्त संस्कृति में शासन संभाला l उसके पिता और दादा यहूदा के सम्पूर्ण अनैतिक इतिहास में सबसे ख़राब थे l तब महायाजक को व्यवस्था की पुस्तक मिली l युवा राजा ने उसके वचन सुनकर उनको माना (2 राजा 22:8-13) l योशिय्याह ने विधर्मियों के वेदियाँ ध्वस्त कर दीं, अशेरा देवी को समर्पित वस्तुएं जला दीं, और विध्यात्मक यौनाचार पर विराम लगाया (अध्याय 23) l इन पद्धतियों के स्थान पर, उसने फसह पर्व लागू किया (23:21-23) l

हम जब भी-जाने या अनजाने में-परमेश्वर के बाहर उत्तर खोजेंगे, हम झूठे ईश्वर का अनुसरण करेंगे l खुद से पूछना बुद्धिमत्ता होगी : हमें कौन सी मूर्तियाँ, वास्तविक अथवा प्रतीकात्मक, आग में फेंकनी हैं?

दो आकृतियाँ

चर्च के बरामदे पर एक स्वाभिमानी दादी दो तस्वीर मित्रों को दिखा रही थी l एक चित्र उसके घर, बुरून्डी में उसकी बेटी का था l और दूसरा उसके नवजात पौत्र का जिसे जन्म देते समय उसकी मृत्यु हो गई l  

एक सहेली ने उन तस्वीरों को देखकर, उनके दुःख को अपना मानते हुए, उस प्रिय दादी के चेहरे को अपने हाथों से थाम लिया l उसने अपने आँसुओं द्वारा केवल यह बोली, “मैं समझती हूँ l मैं समझती हूँ l”

और वह समझती थी l दो महीने पहले उसने एक बेटा खोया था l  

दूसरों का दिलासा विशेष है जिन्होंने हमारे दर्द का अनुभव किया है l वे जानते हैं l  यीशु अपनी गिरफ़्तारी से ठीक पहले, अपने शिष्यों को चिताया, “तुम रोओगे और विलाप करोगे, परन्तु संसार आनंद करेगा  l” किन्तु अगले क्षण उसने उनको संभाला : “तुम्हें शोक होगा, परन्तु तुम्हारा शोक आनंद में बदल जाएगा” (यूहन्ना 16:20) l कुछ ही घंटों में, शिष्य यीशु की गिरफ़्तारी और क्रूसीकरण से उजड़ा हुआ महसूस करेंगे l किन्तु उसे जीवित देखकर उनका बिखरता आनंद तुरंत ही अकल्पनीय आनंद में बदल गया l

यशायाह ने उद्धारकर्ता के विषय नबूवत की, “निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दुखों को उठा लिया” (यशा. 53:4) l हमारा प्रभु दुःख के विषय  जानता ही नहीं, बल्कि सहा है l वह चिंता करता है l एक दिन हमारा दुःख आनंद में बदल जाएगा l

मेरा सर्वस्व

युवा आइज़क वाट ने  अपने चर्च में संगीत का अभाव महसूस कर पिता की चुनौती से गीत लिखा, “जिस क्रूस पर यीशु मरा था” अंग्रेजी भाषा का महानतम गीत अनेक भाषाओं में अनुदित हुआ l

आराधना से भरपूर तीसरा अंतरा हमें क्रूसित यीशु की उपस्थिति में पहुँचा देता है l

देख, उसके सिर, हाथ, पाँव के घाव, यह कैसा दुःख, यह कैसा प्यार!

अनूठा है यह प्रेम-स्वभाव, अनूप यह जग का तारणहार l

वाट अत्यधिक ख़ूबसूरती से क्रूसीकरण का वर्णन इतिहास के सबसे भयंकर क्षण के रूप में करता है l हम क्रूस के निकट खड़े लोगों का साथ देते हैं l देह में चुभी किलों से टंगा परमेश्वर पुत्र श्वास लेने की कोशिश करता है l घंटों के उत्पीड़न बाद, अलौकिक अंधकार छा जाता है l अनंतः, सौभाग्य से सृष्टि का प्रभु अपना मनोव्यथित आत्मा त्याग देता है l धरती डोलती है l मंदिर का मोटा परदा दो भाग हो जाता है l कब्रों से अनेक शव जी उठकर नगर में दिखाई देते हैं (मत्ती 27:51-53) l इस घटना से यीशु को क्रूसित करनेवाले सूबेदार बोल उठता है, “सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था!” (पद.54) l

वाट की कविता पर पोएट्री फाउंडेशन टिप्पणी करती है, “क्रूस समस्त मान्यताओं को पुनः व्यवस्थित करती है और समस्त दिखावे को रद्द करती है l” गीत का अंत इस तरह ही हो सकता था : “हे यीशु प्रिय आप को मैं, समर्पित करता हूँ देह, प्राण l”

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ख़ामोशी

सहायता ट्रकों के गाँव की टूटी झोपड़ियां हटाते समय चूज़े भागने लगे l नंगे पाँव बच्चे घूरते रहे l बारिश से उजड़ी “सड़क” पर यातायात कम थी l

अचानक, काफिले ने दीवारों से घिरी मेयर का बड़ा मकान देखा जो खाली था l लोगों के पास बुनियादी ज़रूरतें नहीं थीं जबकि वह दूर शहर में आलिशान मकान में रहता था l

ऐसा अन्याय हमें क्रोधित करता है, जिससे परमेश्वर का नबी भी क्रोधित हुआ l व्यापक शोषण देखकर हबक्कूक ने कहा, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा?” (हबक्कूक 1:2) l किन्तु परमेश्वर ने ध्यान  देकर कहा, “हाय उस पर जो पराया धन छीन छीनकर धनवान हो जाता है? ... जो अपने घर के लिए अन्याय के लाभ का लोभी है” (2:6, 9) l न्याय निकट है!

हम दूसरों पर परमेश्वर का न्याय चाहते हैं, किन्तु हबक्कूक की एक मुख्य बात हमें रोकती है : “यहोवा अपने पवित्र मंदिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे” (2:20) l समस्त  पृथ्वी l शोषित और उत्पीड़क l कभी-कभी परमेश्वर की प्रत्यक्ष खामोशी का उचित प्रतिउत्तर ... ख़ामोशी है!

ख़ामोशी क्यों? क्योंकि हम अपनी आत्मिक दरिद्रता नहीं देखते l हम ख़ामोशी में पवित्र परमेश्वर के सामने अपने पाप देख सकेंगे l   

हबक्कूक की तरह हम भी परमेश्वर पर भरोसा सीखें l हम उसके सब मार्ग नहीं जानते, किन्तु जानते हैं कि वह भला है l सब कुछ उसके नियंत्रण और समय में है l  

थोड़ा सुख बांटना

एक सहेली ने घर में बने मिट्टी के बर्तन भेजे l आते समय बहुमूल्य चीजें टूट गईं l एक कप के कुछ बड़े टुकड़े, और टुकड़े और मिट्टी की ढेर l

मेरे पति ने टुकड़ों को जोड़ दिया l मैंने इस जुड़े हुए खूबसूरत कप को सजा दिया l इस छिद्रित-जोड़े हुए मिट्टी के बर्तन समान, मेरे दाग़ भी प्रमाण हैं कि परमेश्वर मुझे कठिन समय से निकाला है, फिर भी मैं मजबूती से खड़ी हो सकती हूँ l सुख का वह प्याला याद दिलाता है कि मेरे जीवन में और मेरे जीवन के द्वारा परमेश्वर का काम दूसरों को उनके दुःख में सहायता पहुँचाती है l 

प्रेरित पौलुस परमेश्वर की प्रशंसा करता हैं क्योंकि वह “दया का पिता और सब प्रकार की शांति का परमेश्वर है” (2 कुरिं. 1:3) l प्रभु हमारे आजमाइशों और दुखों का उपयोग हमें अपने समान बनाने के लिए करता है l हमारे दुखों में उसकी सांत्वना से हम दूसरों को बताते हैं कि उसने हमारी ज़रूरतें कैसे पूरी की हैं (पद.4) l

मसीह के दुखों पर विचार करके, हम अपने दुखों में दृढ़ रहकर, भरोसेमंद हैं कि परमेश्वर हमारे अनुभवों से हमें और दूसरों को धीरजवंत धैर हेतु सामर्थी बनाता है (पद.5-7) l पौलुस की तरह, हम सुख पाते हैं कि प्रभु हमारे संघर्षों को अपनी महिमा के लिए उपयोग करता है l हम उसकी सांत्वना के भागीदार होकर पीड़ितों के लिए आश्वासन भरी आशा ला सकते हैं l

मुस्कराने का कारण

कार्यस्थल में उत्साहवर्धक शब्द अर्थपूर्ण होते हैं l कार्यकर्ताओं का परस्पर संवाद ग्राहक की संतुष्टि, कंपनी का लाभ, और सहकर्मी के मुल्यांकन को प्रभावित करता है l अध्ययन अनुसार  सबसे प्रभावशाली कार्य समूहों के सदस्य एक दूसरे को अस्वीकृति, असहमति, अथवा कटाक्ष के बदले छः गुना अधिक समर्थन देते हैं l

पौलुस ने अनुभव से संबंधों और परिणामों को आकार देने में शब्दों के महत्त्व को सीखा l दमिश्क के मार्ग पर मसीह से मुलाकात से पहले, उसके शब्द और कार्य यीशु के अनुयायियों को आतंकित करते थे l किन्तु थिस्सलुनीकियों को पत्री लिखने तक, उसके हृदय में परमेश्वर के काम से वह महान उत्साहित करनेवाला बन गया था l अब वह अपने नमूने से अपने पाठकों को परस्पर उत्साहित करने का आग्रह किया l चापलूसी से सावधान रहते हुए, उसने दूसरों को स्वीकार करने और मसीह की आत्मा को प्रतिबिंबित करना दिखाया l  

इस प्रक्रिया में, पौलुस अपने पाठकों को उत्साहवर्धन का श्रोत बताता है l उसने पाया कि अपने को परमेश्वर को सौंपने से, जो हमसे प्रयाप्त प्रेम करके क्रूस पर मरकर, हमें सुख देने, क्षमा करने और प्रेरित करने, और परस्पर प्रेम भरी चुनौती देने का कारण देता है (1 थिस्स. 5:10-11) l

पौलुस हमें बताता है कि परस्पर उत्साहित करना परस्पर परमेश्वर का धीरज और भलाई का स्वाद चखने का एक मार्ग है l