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Articles by टिम गस्तफसन

दो आकृतियाँ

चर्च के बरामदे पर एक स्वाभिमानी दादी दो तस्वीर मित्रों को दिखा रही थी l एक चित्र उसके घर, बुरून्डी में उसकी बेटी का था l और दूसरा उसके नवजात पौत्र का जिसे जन्म देते समय उसकी मृत्यु हो गई l  

एक सहेली ने उन तस्वीरों को देखकर, उनके दुःख को अपना मानते हुए, उस प्रिय दादी के चेहरे को अपने हाथों से थाम लिया l उसने अपने आँसुओं द्वारा केवल यह बोली, “मैं समझती हूँ l मैं समझती हूँ l”

और वह समझती थी l दो महीने पहले उसने एक बेटा खोया था l  

दूसरों का दिलासा विशेष है जिन्होंने हमारे दर्द का अनुभव किया है l वे जानते हैं l  यीशु अपनी गिरफ़्तारी से ठीक पहले, अपने शिष्यों को चिताया, “तुम रोओगे और विलाप करोगे, परन्तु संसार आनंद करेगा  l” किन्तु अगले क्षण उसने उनको संभाला : “तुम्हें शोक होगा, परन्तु तुम्हारा शोक आनंद में बदल जाएगा” (यूहन्ना 16:20) l कुछ ही घंटों में, शिष्य यीशु की गिरफ़्तारी और क्रूसीकरण से उजड़ा हुआ महसूस करेंगे l किन्तु उसे जीवित देखकर उनका बिखरता आनंद तुरंत ही अकल्पनीय आनंद में बदल गया l

यशायाह ने उद्धारकर्ता के विषय नबूवत की, “निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दुखों को उठा लिया” (यशा. 53:4) l हमारा प्रभु दुःख के विषय  जानता ही नहीं, बल्कि सहा है l वह चिंता करता है l एक दिन हमारा दुःख आनंद में बदल जाएगा l

मेरा सर्वस्व

युवा आइज़क वाट ने  अपने चर्च में संगीत का अभाव महसूस कर पिता की चुनौती से गीत लिखा, “जिस क्रूस पर यीशु मरा था” अंग्रेजी भाषा का महानतम गीत अनेक भाषाओं में अनुदित हुआ l

आराधना से भरपूर तीसरा अंतरा हमें क्रूसित यीशु की उपस्थिति में पहुँचा देता है l

देख, उसके सिर, हाथ, पाँव के घाव, यह कैसा दुःख, यह कैसा प्यार!

अनूठा है यह प्रेम-स्वभाव, अनूप यह जग का तारणहार l

वाट अत्यधिक ख़ूबसूरती से क्रूसीकरण का वर्णन इतिहास के सबसे भयंकर क्षण के रूप में करता है l हम क्रूस के निकट खड़े लोगों का साथ देते हैं l देह में चुभी किलों से टंगा परमेश्वर पुत्र श्वास लेने की कोशिश करता है l घंटों के उत्पीड़न बाद, अलौकिक अंधकार छा जाता है l अनंतः, सौभाग्य से सृष्टि का प्रभु अपना मनोव्यथित आत्मा त्याग देता है l धरती डोलती है l मंदिर का मोटा परदा दो भाग हो जाता है l कब्रों से अनेक शव जी उठकर नगर में दिखाई देते हैं (मत्ती 27:51-53) l इस घटना से यीशु को क्रूसित करनेवाले सूबेदार बोल उठता है, “सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था!” (पद.54) l

वाट की कविता पर पोएट्री फाउंडेशन टिप्पणी करती है, “क्रूस समस्त मान्यताओं को पुनः व्यवस्थित करती है और समस्त दिखावे को रद्द करती है l” गीत का अंत इस तरह ही हो सकता था : “हे यीशु प्रिय आप को मैं, समर्पित करता हूँ देह, प्राण l”

छोटी झूठ और बिलौटे

माँ ने चार वर्षीय एलियास को नवजात बिलौटों के पास से भागते हुए देखा l क्योंकि उसे छूने को मना किया था l पूछने पर एलियास झूठ बोला l

माँ के फिर पूछने पर कि क्या वे मुलायम थे?

उसने कहा, “हाँ और काला वाला म्याऊँ करता है l”

हम बच्चे के ऐसे झूठ पर हँसते हैं l किन्तु यह अनाज्ञाकारिता मानव स्थिति है l चार वर्षीय बच्चे को कोई झूठ बोलना नहीं सिखाता l “दाऊद अपने आदर्श पापस्वीकार में लिखता है, “मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, “[हाँ] पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा” (भजन 51:5) l प्रेरित पौलुस ने कहा, जब आदम ने पाप किया, पाप [संसार] में प्रवेश किया l उसके पाप से ... मृत्यु फ़ैल गई, ... क्योंकि सबने पाप किया” (रोमि. 5:12 NLT) l यह निराजनक खबर सब पर लागू है l

किन्तु आशा बहुत है! “पौलुस लिखता है, “[व्यवस्था] इसलिए दी गई जिससे सब देख सकें कि वे ... कितने असफल रहे हैं l परन्तु जितना अधिक हम अपनी पापमय अवस्था को देखते हैं, उतना ही अधिक हम परमेश्वर के अपार अनुग्रह पर ध्यान करते हैं” (रोमि.5:20 NLT) l

परमेश्वर हमारी गलती करने के लिए ठहरता नहीं कि वह हम पर झपट्टा मारे l वह अनुग्रह, क्षमा, और पुनःस्थापन करता है l हमें केवल जाने कि हमारे पाप सुन्दर और बहाने के योग्य नहीं और हमें विश्वास और पश्चाताप में उसके निकट आना है l

सन्देह की मृत्यु

हम उसे संदेही थोमा कहते हैं (देखें यूहन्ना 20:24-29), किन्तु यह नाम बिल्कुल ठीक नहीं है l आख़िरकार, हममें से कितने विश्वास किये होते कि हमारा मृतक अगुआ पुनरुथित हुआ है? हम उसे “साहसी थोमा” भी पुकार सकते हैं l आखिरकार, यीशु के अपनी मृत्यु की ओर उद्देश्यपूर्ण ढंग से बढ़ते समय, थोमा ने प्रभावशाली साहस दर्शाया l

लाजर की मृत्यु के बाद, यीशु ने कहा था, “आओ, हम फिर यहूदिया को चलें” (यूहन्ना 11:7), शिष्यों ने जिसका विरोध किया l “हे रबी,” उन्होंने कहा, “अभी तो यहूदी तुझ पर पथराव करना चाहते थे, और क्या तू फिर भी वहीं जाता है?” (पद.8) l थोमा ने ही बोला था, “आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें” (पद. 16) l

थोमा का विचार उसके कार्य से उत्तम था l यीशु की गिरफ़्तारी पश्चात, पतरस और यूहन्ना को छोड़कर जो मसीह के संग महायाजक के आंगन तक गए, थोमा बाकी के साथ भाग गया (मत्ती 26:56) l केवल यूहन्ना ही यीशु के संग क्रूस तक गया l

लाजर को जीवित देखकर भी (यूहन्ना 11:38-44), थोमा क्रूसित प्रभु की मृत्युंजय पर विश्वास नहीं किया l मानवीय-संदेही थोमा-पुनरुथित यीशु को देखने के बाद ही विश्वास करके बोला, “हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर” (यूहन्ना 20:28) l संदेही को यीशु ने निश्चय दिया और हमें अपार सुख l “तू ने मुझे देखा था, क्या इसलिए विश्वास किया है? धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया?” (पद. 29) l

अवसर क्या है?

चार-वर्षीय आशेर का मुस्कराता चेहरा उसके पसंदीदा टोपीवाली व्यायाम-कमीज़ से झाँका l मुलायम जबड़ों वाली घड़ियाल के सिर वाली  उसकी कमीज़ मानो उसके सिर को निगलने वाली थी! उसकी माँ निराश हुई l वह एक परिवार को प्रभावित करना चाहती थी जिनसे वह हाल में नहीं मिली थी l

“अरे, हौन,” वह बोली, “इस अवसर के लिए यह ठीक नहीं है l”

“बिल्कुल है !” आशेर ख़ुशी से बोला l

“हूँ ..., और वह कौन सा अवसर हो सकता है?” उसने पुछा l आशेर बोला, “तुम जानती हो l जीवन!” उसे कमीज़ पहनना होगा l

यह बच्चा सभोपदेशक 3:12 का सत्य जानता है – “मनुष्यों के लिए आनंद करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाय, और कुछ भी अच्छा नहीं l” सभोपदेशक निराशा और अक्सर ग़लतफ़हमी उत्पन्न कर सकता है क्योंकि यह परमेश्वर की नहीं किन्तु मानवीय दृष्टिकोण है l लेखक, राजा सुलेमान, पूछता है, “काम करनेवाले को अपने परिश्रम से क्या लाभ होता है? (पद.9) l फिर भी आशा दिखती है l वह यह भी लिखता है : “और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे” (पद.13) l

हम ऐसे परमेश्वर के सेवक हैं जो आनंद हेतु हमें अच्छी वस्तुएं देता है l जो कुछ वह करता है “सदा स्थिर रहेगा” (पद. 14) l उसको पहचानकर और उसकी प्रेमी आज्ञाएँ मानने पर  वह हमारे जीवनों को उद्देश्यपूर्ण, अर्थपूर्ण, और आनंदित  बनाता है l

सम्पूर्ण मानव

अंग्रेज लेखक एवालिन वॉ के लिखने से उसकी चारित्रिक गलतियाँ अधिक स्पष्ट हो जाती थीं l वह उपन्यासकार मसीही होकर भी, संघर्ष करता रहा l किसी स्त्री ने पूछा, “श्री वॉ, आपका व्यवहार बदला नहीं, फिर भी खुद को मसीही कहते हैं?” उसने उत्तर दिया, “महोदया, आपके अनुसार मैं बुरा हो सकता हूँ l किन्तु मेरी माने, यह मेरा धर्म ही है, नहीं तो मैं मानव भी नहीं होता l

वॉ आन्तरिक युद्ध लड़ रहा था जो पौलुस कहता है : “इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते” (रोमियों 7:18) l “मैं शारीरिक और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ” (पद.14) l “मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ l परन्तु .... मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” (पद.22-24) l और उसके बाद उल्लसित उत्तर : “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो” (पद.25) l

जब हम मसीह में विश्वास करके, अपनी गलतियाँ और उद्धारकर्ता की ज़रूरत महसूस करते हैं, हम तुरंत नयी सृष्टि बन जाते हैं l किन्तु हमारी आत्मिक यात्रा अभी लम्बी है l प्रेरित यूहन्ना अनुसार : “अब हम परमेश्वर की संतान हैं, और अभी तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे l ... जब वह प्रगट होगा तो हम उसके समान होंगे, क्योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (1 यूहन्ना 3:2) l

गुणित प्रेम

जब केरेन के चर्च की एक महिला के विषय पता चला कि उसे ALS(amyotrophic lateral sclerosis या Lou Gehrig) नामक जानलेवा बीमारी हो गई है, स्थिति अच्छी नहीं थी l यह क्रूर बीमारी तंत्रिकाओं और मांशपेशियों को प्रभावित करके रोगी को लकवाग्रस्त कर देता है l पारिवारिक बीमा से घर में इलाज संभव नहीं था और उसका पति नर्सिंग होम में इलाज करने की कल्पना भी नहीं कर सकता था l

नर्स होने के कारण केरेन उस महिला की सेवा करने उसके घर जाने लगी l किन्तु जल्द ही वह समझ गई कि अपने मित्र की सेवा करते हुए वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर पा रही थी, इसलिए उसने चर्च में दूसरों को सेवा भाव सीखना आरंभ कर दी l अगले सात वर्षों में  बीमारी के बढ़ने पर केरेन ने अपने अलावा इकतीस स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जिन्होंने उस परिवार को प्रेम, प्रार्थना, और व्यावहारिक सहायता दी l

“जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है [उसे] अपने भाई [और बहन] से भी प्रेम [रखना होगा],” प्रेरित यूहन्ना ने कहा (1 यूहन्ना 4:21) l केरेन उस प्रकार के प्रेम का एक दीप्त उदाहरण देती है l वह कुशल, प्रेमी, और एक चर्च परिवार को एक दुखित मित्र की सेवा हेतु प्रेरित करने वाली थी l एक ज़रूरतमन्द व्यक्ति के लिए उसका प्रेम गुणित व्यावहारिक प्रेम बन गया l

एक व्यक्तिगत कहानी

न्यू यॉर्क चर्च के बाहर क्रिसमस झाँकी के पास चरनी में एक नवजात बालक को कोई छोड़कर चला गया l किसी परेशान युवा माँ ने उसे गर्म कपड़ो में लपेटकर ऐसे स्थान पर रख दिया था जहाँ वह दिखाई दे जाए l यदि हम उसका न्याय करन चाहते हैं, इसके बदले हम धन्यवाद दें कि इस शिशु को अब जीवन मिल सकता है l

यह मेरे लिए व्यक्तिगत है l खुद एक दत्तक संतान होकर, मैं अपने जन्म के विषय अज्ञान हूँ l किन्तु मैं कभी परित्यक्त महसूस नहीं किया l मैं इतना जानता हूँ, मेरी दो माताएं हैं जो मुझे जीवित चाहती थीं l एक ने  मुझे जन्म दिया, और दूसरे ने अपना जीवन मुझमें  निवेश किया l

हम निर्गमन में एक परेशान प्रेमी माँ को देखते हैं l फिरौंन ने सभी यहूदी लड़कों को मारने की आज्ञा दी थी (1:22) l मूसा की माँ ने उसको जब तक छिपा सकी छिपाया l मूसा के तीन माह का होने पर उसने उसे एक सुरक्षित टोकरी में रखकर नील नदी में छोड़ दिया l यदि योजना राजकुमारी द्वारा बच्चे को बचाना थी, फिरौंन के महल में परवरिश थी, और आख़िरकार लोगों को दासत्व से छुड़ाना थी, यह बिलकुल पूरी हुई l

जब एक परेशान माँ अपने बच्चे को एक मौका देती है, परमेश्वर वहाँ से उसे उठा लेता है l उसकी ऐसी आदत है-अत्यधिक अकल्पनीय रचनात्मक तरीकों से l

धन

अपनी जीविका के आरंभिक काल में मैंने अपनी नौकरी को उद्देश्य/मिशन माना, जिससे एक और कंपनी ने मेरे समक्ष खासा अच्छा वेतन वाला पद पेश किया l  इससे अवश्य ही परिवार लाभान्वित होता l किन्तु मैं एक नयी नौकरी नहीं तलाश रहा था, मैं वर्तमान कार्य से प्रेम करता था, जो एक बुलाहट बनती जा रही थी l

किन्तु वह पैसा . . .

शरीर से दुर्बल मेरे 70 वर्षीय पिता ने सटीक एवं स्पष्ट उत्तर दिया : “पैसे के विषय सोचों भी नहीं l तुम क्या करोगे?”

मैंने तुरंत निर्णय कर लिया l मेरे पसंदीदा कार्य को छोड़ने का कारण केवल पैसा होता! पिताजी, धन्यवाद l

यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश की शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा पैसा और उसके प्रति हमारे लगाव पर केंद्रित किया l उसने हमसे धन इकट्ठा करने की बजाए “हमारी प्रतिदिन की रोटी” मांगने को कहा (मत्ती 6:11) l पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करने की चेतावनी देकर पक्षियों और फूलों द्वारा बताया कि परमेश्वर अपनी सृष्टि की बहुत चिंता करता है (पद.19-31) l “पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो,” यीशु ने कहा, “तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएंगी” (पद.33) l

पैसा महत्वपूर्ण है l किन्तु हमारी निर्णय प्रक्रिया इसके ऊपर हो l कठिन समय और बड़े निर्णय अपने विश्वास को नए तरीकों से बढ़ाने के अवसर हैं. हमारा स्वर्गक पिता हमारी चिंता करता है l

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आप नहीं हैं

दाऊद ने योजना बनायी, फर्नीचर अभिकल्पित किया, सामग्री इकट्ठा किया, समस्त प्रबंध किया (देखें 1 इतिहास 28:11-19) l किन्तु यरूशलेम का प्रथम मंदिर दाऊद का नहीं, सुलेमान का मंदिर कहलाता है l

क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, “तू घर बनवाने न पाएगा” (1 इतिहास 17:4) l परमेश्वर दाऊद के पुत्र सुलेमान को मंदिर बनाने के लिए चुना था, इस इनकार का प्रतिउत्तर अनुकरणीय था l वह परमेश्वर के कार्य पर केन्द्रित रहा (पद.16-25) l उसकी आत्मा धन्वादित थी l उसने सम्पूर्ण प्रयास किया और मंदिर बनाने में योग्य लोगों से सुलेमान की मदद करवायी (देखें 1 इतिहास 22) l

बाइबिल टीकाकार जे. जी, मेक्कोन्विल ने लिखा : “अक्सर हमें स्वीकार करना होगा कि मसीही सेवा के रूप में जो कार्य हम करना पसंद करेंगे, वो नहीं है जिसके लिए हम योग्य हैं, और जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाया है l यह दाऊद की तरह हो सकता है, कार्य का आरंभ, जो भविष्य में और भी भव्य होगा l

दाऊद ने अपनी नहीं, परमेश्वर की महिमा खोजी l उसने परमेश्वर के मंदिर के लिए विश्वासयोग्यता से सब कुछ किया, उसके लिए एक मजबूत नींव डाला जो उसके बाद कार्य को संपन्न करनेवाला था l काश हम भी, उसी तरह, परमेश्वर का चुना हुआ कार्य धन्यवादी हृदय से करें! जाहिर है कि हमारा प्रेमी परमेश्वर  “अधिक भव्य” ही करेगा l

उसका अद्भुत चेहरा

मेरा चार वर्षीय बेटा जिज्ञासु है और निरंतर बातें करता है l मुझे उससे बातें करना पसंद है, किन्तु वह अपनी पीठ मेरी ओर करके बातें करने की खेदजनक आदत बना ली है l मैं अक्सर कहती हूँ, “मैं तुम्हारी सुन नहीं सकती-कृपया मेरी ओर देखकर बातें करो l”

कभी-कभी परमेश्वर हमसे भी यही कहता है-इसलिए नहीं कि वह सुन नहीं सकता, किन्तु हम वास्तव में “उसे देखे बिना” उससे बातचीत करना चाहते हैं l हम प्रार्थना करते समय अपने प्रश्नों में उलझकर और स्वकेन्द्रित रहकर, भूल जाते हैं किससे प्रार्थना कर रहे हैं l मेरे बेटे की तरह, हम उसकी ओर केन्द्रित हुए बिना प्रश्न करते हैं जिससे हम बातचीत कर रहे हैं l

हम, परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया है, के विषय खुद को याद दिलाकर अपने अनेक चिंताओं को संबोधित कर सकते हैं l केवल पुनः केन्द्रित होकर, ही हम उसके चरित्र को जानकर सुख पाते हैं : कि वह प्रेमी, क्षमाशील, प्रभु, और अनुग्रहकारी है l

भजनकार का विश्वास था कि हम परमेश्वर का मुख निरंतर निहारें (भजन 105:4) l  दाऊद द्वारा अगुओं को उपासना और प्रार्थना के लिए नियुक्ति पर, उसने लोगों को परमेश्वर के चरित्र की प्रशंसा करने और उसके पूर्व विश्वासयोग्यता की चर्चा करने को उत्साहित किया (1 इतिहास 16:8-27) l

परमेश्वर का खूबसूरत चेहरा निहारने पर, हम सामर्थ्य और सुख पाते हैं जो हमें हमारे अनुत्तरित प्रश्नों के मध्य भी संभालता हैं l

सुख का पलना

मेरी सहेली ने मुझे अपने चार दिन की बेटी को गोद में लेने का सौभाग्य दिया l बच्चावह मेरे गोद में आने के बाद ही हलचल करने लगा l मैंने उसे दुलारा, अपने गाल उसके सिर से लगाया, और उसे चुप करने के लिए हिलाते हुए एक गीत गुनगुनाने लगी l इन प्रयासों के साथ, दस वर्षों के अपने लालन-पालन अनुभव के बाद भी, मैं उसे शांत न कर सकी l मैंने उसे उसकी अधीर माँ के बाहों में डालने तक वह अत्यंत परेशान रही l तुरन ही वह शांत हो गई; उसका रोना बंद हो गया और उसकी बेचैनी उसके भरोसेमंद सुरक्षा में तब्दील हो गई l  मेरी सहेली अपनी बेटी को गोद लेना और उसकी परेशानी दूर करना जानती थी l

परमेश्वर अपने बच्चों को माता की तरह सुख देता है : कोमल, भरोसेमंद, और बच्चे को शांत करने में चिन्ताशील l हमारे थकित अथवा परेशान होने पर, वह हमें अपनी बाहों में उठाता है l हमारा पिता और सृष्टिकर्ता होकर, वह हमें निकटता से जानता है l “जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शांति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है” (यशा. 26:3) l

जब हमें संसार का भारी बोझ दबाए, हम इस ज्ञान में सुख पाते हैं कि वह प्रेमी अभिभावक की तरह हमें अर्थात् अपने बच्चों को सुरक्षित रखता और उनके लिए लड़ता है l