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Articles by विन्न कॉलियर

एक खुला, उदार हृदय

विकी की पुरानी बाइक के खराब होने के बाद उसकी मरम्मत के लिए कोई विकल्प नहीं होने के बाद, उसने दूसरी के लिए पैसे जुटाने शुरू कर दिए । रेस्तरां का नियमित ग्राहक क्रिस, जहां विकी ड्राइव-थ्रू विंडो/take-away counter) पर काम करती है, ने एक दिन उसको कहते सुना  कि उसे एक बाइक की जरूरत है । "मैं इसके बारे में सोचना बंद नहीं कर सका," क्रिस ने कहा । "मुझे कुछ करना [ही] था ।" इसलिए उसने अपने बेटे की उपयोग की हुई बाइक खरीदी (उसके बेटे ने इसे सिर्फ बिक्री के लिए रखा था), उसे चमकाया और विकी को चाबी दे दी । विक्की चौंक गयी । “कौन . . . ऐसा करता है?” वह विस्मय और कृतज्ञता में पूछी l

पवित्रशास्त्र हमें खुले हाथों के साथ जीने के लिए कहता है, स्वतंत्र रूप से जैसे हम दे सकते हैं - जो कि जरूरतमंद लोगों के लिए वास्तव में सर्वोत्तम है । जैसा कि तीमुथियुस कहता है : “धनवानों आज्ञा दे कि वे . . . भले कामों में धनी बनें” (1 तीमुथियुस 6:17-18) । हम यहाँ या वहाँ केवल एक कृपालु कार्य नहीं करते हैं, बल्कि देने की एक उत्साही भावना को जीते हैं । उदार हृदय हमारे जीवन का सामान्य तरीका है । हमसे कहा गया है, “उदार और सहायता देने में तत्पर हों” (पद.18) l

जब हम खुले, उदार दिल के साथ जीते हैं, हमें डरना नहीं है कि हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं होंगी l इसके बजाय, बाइबल हमें बताती है कि हमारी दयालु उदारता में, हम "[सच्चे] जीवन को वश में कर रहे हैं (पद.19) । परमेश्वर के साथ, वास्तविक जीवन का मतलब है कि हमारे पास जो कुछ भी है उस पर अपनी पकड़ ढीली करना और दूसरों को स्वतंत्र रूप से देना ।

घर वापसी

अमेरिका में एक सैन्यकर्मी वाल्टर डिक्सन के पास युद्ध में भाग लेने से पहले पांच दिन का प्रमोदकाल/हनीमून था । एक साल से भी कम समय में, सैनिकों ने उसका जैकेट युद्ध के मैदान में पाया, जिसमें उसकी पत्नी की चिट्ठियाँ थीं । सैन्य अधिकारियों ने उसकी युवा पत्नी को सूचित किया कि उसके पति कार्रवाई में मारे गए हैं । असल में, वह जीवित था और अगले 2.5 साल युद्ध बंदी के रूप में बिताया । हर घंटे, उसने घर जाने की साजिश रची l वह पांच बार बच निकला लेकिन पुनः गिरफ्तार कर लिया गया l अंत में, वह रिहा कर दिया गया । आप ताज्जुब की कल्पना कर सकते हैं जब वह घर लौटा!

परमेश्वर के लोगों को पता था कि गिरफ्तार होना, दूर ले जाया जाना, और घर की चाह क्या होती है । परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह के कारण, वे निर्वासित थे । वे हर सुबह लौटने के लिए तरस रहे थे, लेकिन उनके पास खुद को बचाने का कोई रास्ता नहीं था । शुक्र है, परमेश्वर ने वादा किया कि वह उन्हें भुलाया नहीं है l “मुझे उन पर दया आई है, इस कारण मैं उन्हें लौटा [लाऊंगा]” (जकर्याह 10: 6) । वह घर लौटने की उनकी अनवरत पीड़ा को समाप्त करेगा, उनके आग्रह के कारण नहीं, बल्कि अपनी दया के कारण : “मैं सीटी बजाकर उनको इकठ्ठा करूँगा . . [और] वह लौट आएँगे” (पद.8-9) ।

निर्वासन की हमारी भावना हमारे बुरे फैसलों या हमारे नियंत्रण से परे कठिनाइयों के कारण आ सकती है । किसी भी तरह से, परमेश्वर ने हमें भुलाया नहीं है । वह हमारी इच्छा जानता है और हमें बुलाएगा । और यदि हम उत्तर देंगे, तो हम खुद को उसकी ओर लौटते हुए पाएंगे – घर लौटते हुए l

परमेश्वर हमें थामता है

दक्षिण अफ्रीका का एक व्यक्ति जिसका नाम फ्रेडीब्लोम है, 2018 में 114 वर्ष का हो गया, जिसे सबसे वृद्ध जीवित व्यक्ति के रूप में मान्यता मिली । 1904 में जन्मे, वह दोनों विश्व युद्ध, रंगभेद और आर्थिक मंदी में जीवित था । जब उसकी लंबी उम्र का रहस्य पूछा गया, तो उसने केवल अपने कंधे उचकाए l हम में से कई लोगों की तरह, उसने हमेशा उन खाद्य पदार्थों और प्रथाओं को नहीं चुना जो तंदुरुस्ती बढाते हैं l हालाँकि, वह अपने उल्लेखनीय स्वास्थ्य के लिए एक कारण अवश्य प्रस्तुत करता है : “केवल एक ही चीज़ है, और वह [परमेश्वर] है । उसके पास सारी शक्ति है . . . वह मुझे थामता है l”

यह उन शब्दों के समान है जो परमेश्वर ने इस्राएल से कहे थे, जब वह राष्ट्र भयंकर दुश्मनों के उत्पीड़न के तहत कुम्हला गया । परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की, “मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूँगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे संभाले रहूँगा” (यशायाह 41:10) l कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी स्थिति कितनी निराशाजनक थी, कितनी मुश्किल कठिनाई है कि क्या वे कभी राहत पाएंगे, परमेश्वर ने अपने लोगों को आश्वासन दिया कि वे उसकी कोमल देखभाल में थामे गए थे । “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ,” उसने दृढ़ता से कहा l “इधर उधर मत ताक, क्योकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ” (पद.10) l

कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमें कितने साल दिए गए हैं, जीवन की कठिनाइयां हमारे दरवाजे पर दस्तक देंगी । एक परेशान विवाह । परिवार को त्यागने वाला बच्चा । चिकित्सक से भयभीत करनेवाला समाचार प्राप्त करना । यहां तक ​​कि सताव भी । हालाँकि, हमारा परमेश्वर हमारे पास पहुँचता है और हमें दृढ़ता से थामता है । वह हमें अपने मजबूत, कोमल बाहों में समेट कर थामता है l

मिलकर दुःख उठाना

2013 में, ब्रिटिश शाही नौसैनिक दिग्गज सत्तर वर्षीय जेम्स मैककोनेल का निधन हो गया l  मैककोनेल का कोई परिवार नहीं था, और उनके वृद्धाश्रम के कर्मचारियों को डर था कि कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होगा l मैककोनेल की यादगार(memorial) सेवा को संचालित करने के लिए नियुक्त किए गए एक व्यक्ति ने एक फेसबुक संदेश पोस्ट किया : “इस दिन और इस उम्र में यह काफी दुखद है कि किसी को भी इस दुनिया को छोड़ना है जिनकी मृत्यु पर कोई शोक करने वाला नहीं है, लेकिन यह व्यक्ति एक परिवार था . . . यदि आप इसके अंतिम संस्कार में अपना सम्मान देने के लिए उपस्थित हो सकते हैं जो पूर्व नौसैनिक था तो कृपया ज़रूर उपस्थित हों l” दो सौ शाही सैनिक उपस्थित हुए!

इन ब्रिटिश हमवतन लोगों ने एक बाइबिल सत्य दिखाया : “देह में एक हो अंग नहीं परन्तु बहुत से हैं,” पौलुस कहता है (1 कुरिन्थियों 12:14) l हम अकेले नहीं हैं l ठीक इसके विपरीत : हम यीशु में बंधे हुए हैं l पवित्रशास्त्र जैविक अंतरसंबंध का खुलासा करता है : यदि एक अंग दुःख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुःख पाते हैं” (पद.26) l यीशु के विश्वासियों के रूप में, परमेश्वर के नए परिवार के सदस्य, हम मिलकर पीड़ा में, दुःख में, उन अँधेरे स्थानों में, जहाँ हम अकेले जाने से डरेंगे, ओर बढ़ते हैं l लेकिन शुक्र है कि हम अकेले नहीं जाते l

शायद दुख का सबसे बुरा हिस्सा वह है जब हम महसूस करते हैं कि हम अकेले ही अंधेरे में डूब रहे हैं l हालाँकि, परमेश्वर एक नया समुदाय बनाता है जो मिलकर दुःख उठता है l एक नया समुदाय जहां किसी को अंधेरे में नहीं छोड़ा जाना चाहिए l

युद्ध समाप्त हो चूका है l वास्तव में l

द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद उनतीस वर्षों तक, एक जापानी सैनिक, हीरू ओनोडा जंगल में छिपा रहा, और यह विशवास करने से इनकार कर दिया कि उसके देश ने आत्मसमर्पण कर दिया था l जापानी सैन्य अगुओं ने उसे अमेरिकी और ब्रिटिश सेना की जासूसी करने के आदेश के साथ फिलिपीन्स के एक दूरदराज़ के द्वीप पर भेज दिया था l शांति संधि पर हस्ताक्षर  किये जाने के लम्बे समय बाद और शत्रुता समाप्त होने के बाद भी, बह जंगल में रहा l 1974 में, उसके कमांडिंग ऑफिसर को उसे खोजने और उसे भरोसा दिलाने के लिए कि युद्ध समाप्त हो चूका है उस द्वीप तक यात्रा करनी पड़ी l

तीन दशकों तक, यह व्यक्ति दरिद्र, अलग-थलग जीवन जीया, क्योंकि उसने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था – विश्वास करने से इनकार कर दिया था कि संघर्ष ख़त्म हो चुका था l हम भी उसी प्रकार की गलती कर सकते हैं l पौलुस इस आश्चर्यजनक सत्य की घोषणा करता है कि “हम सब जिन्होंने मसीह यीशु का बप्तिस्मा लिया, उसकी मृत्यु का बप्तिस्मा लिया” (रोमियों 6:3) l क्रूस पर, एक शक्तिशाली, रहस्मय तरीके से, यीशु ने शैतान के झूठ को, मौत के आतंक को और पाप की कठोर पकड़ को मौत के घाट उतार दिया l हालाँकि, हम “पाप के लिए तो [मरे हुए], और “परमेश्वर के लिए जीवित” थे (पद.11), हम अक्सर ऐसे जीवित रहते हैं जैसे कि बुराई अभी भी शक्ति रखती है l हम परीक्षा के सामने हार मान जाते हैं, पाप के बहकावे में आकर परास्त हो जाते हैं l हम झूठ सुनते हैं, यीशु पर भरोसा करने में असफल होते हैं l लेकिन हमें हार नहीं माननी है l हमें झूठे कथा में नहीं जीना है l परमेश्वर के अनुग्रह से हम मसीह की जीत की सच्ची कहानी को अपना सकते हैं l

जबकि हम अभी भी पाप के साथ कुश्ती कर रहे हैं, छुटकारा तब मिलता है जब हम समझते हैं कि यीशु ने पहले ही लड़ाई जीत ली है l हम उस सच्चाई को उसकी शक्ति में जी सकते हैं l

मिटानेवाला, व्यापक अनुग्रह

एलेक्सा, एमेज़ोन की आवाज़ नियंत्रित डिवाइस में एक दिलचस्प विशेषता है : यह आपके द्वारा कहे गए सभी चीजों को मिटा सकता है l आपने एलेक्सा को जो भी करने के लिए कहा है, जो भी जानकारी आपने एलेक्सा को वापस लाने के लिए कहा है, एक सरल वाक्य (आज मैंने जो कुछ कहा था उसे हटा दो”) सब साफ़ कर देता है, जैसे कि यह कभी नहीं हुआ l यह बहुत बुरा है कि हमारे जीवन के बाकी हिस्सों में यह क्षमता नहीं है l हर गलत शब्द, हर घृणित कार्य, हर पल जो हम चाहते हैं कि हम मिटा सकते – हम सिर्फ कमांड बोलते, और पूरी गड़बड़ी गायब हो जाती l

हालाँकि, अच्छी खबर है l परमेश्वर हम में से प्रत्येक को एक साफ़ आरम्भ प्रदान करता है l केवल, वह हमारी गलतियों या बुरे व्यवहार को हटाने की तुलना में कहीं अधिक दूर तक जाता है l परमेश्वर हमें छुटकारा देता है, एक गहरी चंगाई जो हमें बदल देती है और हमें नया बनाती है l “मेरी ओर फिर लौट आ,” वह कहता है, “मैं ने तुझे छुड़ा लिया है” (यशायाह 44:22) l भले ही इस्राएल ने विरोध किया और उसकी अवहेलना की, परमेश्वर ने उन पर अत्यधिक दया की l उसने “[उनके] अपराधों को काली घटा के समान और [उनके] पापों को बादल के समान मिटा दिया” (पद.22 l उसने उनकी सारी लज्जा और विफलताओं को इकठ्ठा किया और उनको अपने मिटानेवाले व्यापक अनुग्रह से धो दिया l

परमेश्वर हमारे पाप और गलतियों के साथ भी ऐसा ही करेगा l ऐसी कोई गलती नहीं जो वह ठीक नहीं कर सकता, कोई घाव नहीं जो वह चंगा नहीं कर सकता l परमेश्वर की करुणा चंगा करती है और हमारी आत्मा में सबसे पीड़ादायक स्थानों को छुटकारा देती है – वे भी जिनको हमने बहुत समय से छिपा के रखा है l उसकी करुणा हमारे समस्त दोष को हटा देती है, हर एक खेद को धो देती है l

वास्तव में दीन, वास्तव में महान

जैसे ही अमेरिकी क्रांति ने इंग्लैंड के असंभव समर्पण के साथ समाप्त हुआ, कई नेताओं और सेना के नेताओं ने जनरल जॉर्ज वाशिंगटन को एक नया शासक बनाने का प्रयास किया l दुनिया देखती रही, और सोचती रही कि क्या वाशिंगटन स्वतंत्रता और छुटकारे के अपने आदर्श से चिपका रहेगा जब सम्पूर्ण शक्ति उसकी मुट्ठी में थी l इंग्लैंड के किंग जॉर्ज ने हालाँकि एक और वास्तविकता देखी l वह आश्वस्त था कि यदि वाशिंगटन ने शक्ति खींचाव का विरोध करेगा  और अपने वर्जिनिया फार्म(राष्ट्रपतियों का निवास) में लौट जाएगा, तो वह “संसार का सबसे बड़ा आदमी” होगा l राजा यह जानता था कि सत्ता के प्रति आकर्षण के विरोध की महानता का सबूत सच्ची श्रेष्ठता और गौरव का प्रतिक है l

पौलुस इस सच्चाई को जानता था और हमें मसीह के विनम्रता के तरीके का दीनता से अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया l यीशु “परमेश्वर के स्वरुप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा” (फिलिप्पियों 2:6) l इसके बदले, उसने अपनी सामर्थ्य को समर्पित किया, एक “दास” बन गया और “यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु . . . भी सह ली” (पद.7-8) l जिसके पास समस्त सामर्थ्य थी उसने प्रेम की खातिर उसके हर एक अंश को समर्पित कर दिया l

और फिर भी, अंतिम परिवर्तन में, परमेश्वर ने मसीह को एक अपराधी के क्रूस से आगे “अति महान भी किया” (पद.9) l यीशु, जो हमारी प्रशंसा की मांग कर सकता था या हमें आज्ञाकारी होने को विवश कर सकता था, ने एक विस्मयकारी कार्य में होकर हमारी आराधना और भक्ति को लिया l परम विनम्रता के द्वारा, यीशु ने सच्ची महानता का प्रदर्शन करके, संसार को उलट दिया l  

असंभव क्षमा

लिबरेटर्स(छुड़ानेवाले) ने देखा कि रेवेन्सब्रुक यातना शिवर(Ravensbruck concentration camp) के खंडहरों में यह प्रार्थना मुड़ी हुई पड़ी थी जहां लगभग 50,000 महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया था : हे प्रभु, केवल नेक इच्छा रखनेवाले पुरुष और महिलाओं को ही नहीं बल्कि बैर रखने वालों को भी याद रखें l परन्तु उस दुःख को याद न करें जो उन्होंने हमें दिए हैं l उन परिणामों को धन्यवाद स्वरुप याद रखें जो हम इस दुःख के द्वारा लाए हैं – हमारी भाईबंदी, हमारी ईमानदारी, हमारी नम्रता, हमारा साहस, हमारी उदारता, हृदय की महानता जो इस दुःख से विकसित हुई है। और जब उनका न्याय होता है, हमारे द्वारा लाए हुए वे परिणाम उनको क्षमा प्रदान करें ।
जिस आतंकित/पीड़ित महिला ने इस प्रार्थना को लिखी है, मैं उसके भय और पीड़ा की कल्पना नहीं कर सकता हूँ। मैं कल्पना नहीं कर सकता कि उसे इन शब्दों को लिखने के लिए किस तरह का अकथनीय अनुग्रह की आवश्यकता पड़ी होगी। उसने सोचने से बाहर किया : उसने अपने पीड़ित करनेवालों के लिए परमेश्वर से क्षमा मांगी।
यह प्रार्थना मसीह की प्रार्थना को प्रतिध्वनित करती है। गलत तरीके से आरोपी बनाए जाने के बाद, लोगों के सामने उनका मज़ाक उड़ाया, पीटा गया, अपमानित किया गया। यीशु “[दो] कुकर्मियों” के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया (लूका 23:33)। विकृत शरीर के साथ खुरदरे क्रूस पर लटका हुआ और सांस लेने के लिए हाफ्ते। मैं उम्मीद करता कि यीशु अपने सताने वालों पर न्याय सुनाता, प्रतिशोध या दिव्य न्याय मांगता। हालाँकि, यीशु ने प्रत्येक मानाव आवेग का विरोध करते हुए प्रार्थना की : हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (पद.34) l
वह क्षमा जो यीशु प्रदान करता है असंभव दिखाई देता है, लेकिन वह इसे हमें देता है l अपने दिव्य अनुग्रह में असंभव क्षमा मुफ्त में बहता है l

जल में होकर

फिल्म द फ्री स्टेट ऑफ़ जोंस, यू.एस. गृह युद्ध की कहानी बताती है जिसमें न्यूटन नाईट और कुछ संग-सदस्य और गुलाम जिन्होंने संयक्त सेना की मदद की थी और फिर युद्ध के बाद गुलामों के मालिकों का विरोध किया l कई लोग नाईट को नायक संबोधित करते हैं, परन्तु दो गुलामों ने उसके सेना त्याग के बाद पहले उसके जीवन को बचाया था l उन्होंने उसे बहुत अन्दर एक एकांत दलदली भूमि में ले गए और उसके घायल टांग की देखभाल की जिसे वह सहन कर रहा था जब वह मित्र सेना से भाग रहा था l यदि वे उसे छोड़ दिए होते, तो वह मर गया होता l 

यहूदा के लोग घायल और हताश थे, और असहाय महसूस कर रहे थे l अश्शूर ने इस्राएल पर जीत हासिल की थी, और यशायाह ने नबूवत की थी कि एक दिन वे (यहूदा) एक दुश्मन अर्थात् बेबीलोन से पराजित होंगे l यहूदा को एक ऐसे परमेश्वर की ज़रूरत थी जो मदद कर सकता था, जो बचा सकता था और जो उनको नहीं त्यागेगा l कल्पना कीजिए, तब, उस बढ़ती उम्मीद की जब लोग परमेश्वर के आश्वासन को सुने, : “मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ” (यशायाह 43:5) l उन्हें जिस भी विपत्ति का सामना करना पड़ता या परेशानी झेलनी पड़ती, वह उनके साथ साथ रहने वाला था l वह उनके साथ “जल में होकर” जानेवाला था, सुरक्षा की ओर उनका मार्गदर्शन करने वाला था (पद.2) l वह उनके साथ “आग में” चलने वाला था, झुलसा देनेवाली लपटों में भी मदद करने वाला था (पद.2) l 

सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में, परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहने, हमारी देखभाल करने, हमारा मार्गदर्शन करने, और कभी नहीं त्यागने का वादा करता है – चाहे जीवन में या मृत्यु में l जब आप खुद को कठिन स्थानों में पाते हैं तब भी, परमेश्वर आपके साथ है l वह आपको जल में होकर निकलने में मदद करेगा l