एक दिन मेरी सहेली ने मुझे तीन सजावटी पटियाँ दिखायी जो उसके बैठक में लगनेवाले थे। “देखिए, पहले से मेरे पास प्रेम है,” शब्द लिखी हुई पटिया दिखाते हुए वह बोली। “विश्वास और आशा क्रम में हैं।”
इसलिए प्रेम पहले आता है, मैंने सोचा। विश्वास और आशा तुरन्त अनुसरण करते हैं!
इसलिए प्रेम पहले आता है। वास्तव में, यह परमेश्वर से आया। पहले यूहन्ना 4:19 ताकीद देता है कि “हम इसलिए प्रेम करते हैं, कि पहले {परमेश्वर ने} हम से प्रेम किया।“ 1 कुरिन्थियों 13 में वर्णित परमेश्वर का प्रेम {विदित “प्रेम का अध्याय“}, यह कहते हुए, “प्रेम कभी टलता नहीं“ वास्तविक प्रेम का चरित्र समझाता है(पद.8)।
विश्वासी के लिए विश्वास और आशा अनिवार्य है। केवल इसलिए क्योंकि हम विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए गए हैं, इसलिए “हम …. अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें“(रोमियों 5:1)। और आशा इब्रानियों 6 में “हमारे प्राण के लिये ऐसा लंगर है जो स्थिर और दृढ़ है“(पद.19)।
एक दिन हमें विश्वास और आशा की जरुरत नहीं होगी। विश्वास दृष्टि बन जाएगी और हमारी आशा सिद्ध हो जाएगी जब हम अपने उद्धारकर्ता को आमने-सामने देखेंगे। किन्तु प्रेम अनन्त है, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से है और परमेश्वर प्रेम है(1 यूहन्ना 4:7-8)। “पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इन में सब से बड़ा प्रेम है“-यह प्रथम और अन्तिम है(1 कुरिं. 13:13)।
