परिवार के एक सदस्य को दिसम्बर का किराया चुकाने के लिए सहायता की आवश्यकता थी। उसके परिवार को वह विनती एक बोझ जैसी प्रतीत हुई—विशेष रूप से वर्ष के अन्त में अपने अनापेक्षित खर्चों के कारण। परन्तु उन्होंने अपनी बचत को निकाला और परमेश्वर की उपलब्धता के लिए धन्यवादी हुए—और अपने सम्बन्धी के आभार से भी आशीषित हुए।
उसने उन्हें एक धन्यवाद का कार्ड प्रदान किया जिसपर आभार के शब्द लिखे हुए थे। “तुम लोगों ने यह फिर से किया…भले कार्य करते हुए, इसे ऐसे निपटा दिया जैसे यह कोई बड़ी बात नहीं थी।”
परन्तु परमेश्वर के लिए, दूसरों की सहायता करना एक बड़ी बात है। नबी यशायाह ने इस्राएल राष्ट्र का ध्यान इसी ओर किया। लोग उपवास रख रहे थे परन्तु फिर भी लड़ाई झगड़ा कर रहे थे। इसलिए नबी यशायाह ने कहा: “अन्याय से बनाए हुए दासों, और अन्धेर सहनेवालों का जूआ तोड़कर उनको छुड़ा लेना… अपनी रोटी भूखों को बाँट देना, अनाथ और मारे–मारे फिरते हुओं को अपने घर ले आना, किसी को नंगा देखकर वस्त्र पहिनाना, और अपने जातिभाइयों से अपने को न छिपाना?” (यशायाह 58:6-7)।
यशायाह कहता है कि इस प्रकार का बलिदान परमेश्वर के तेज को बांटता है और यह हमारे टूटे होने को भी चंगा करता है (पद 8)। जिस प्रकार उस परिवार ने अपने सम्बन्धी की सहायता की, उन्होंने अपने खर्चों की और भी देखा, और देखा कि वे पूरे वर्ष किस प्रकार एक उत्तम प्रबन्ध कर सकते थे। उदार होने के लिए यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा थी: “तेरा धर्म तेरे आगे आगे चलेगा, यहोवा का तेज तेरे पीछे रक्षा करते चलेगा।” (पद 8)। अन्त में, अपने सम्बन्धी को देने ने उन्हें और आशिषित किया। और परमेश्वर को? उसने तो पहले ही अपना सबकुछ दे दिया था–सप्रेम।