पिंगली वेंकैया को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मूल डिजाइनर के रूप में श्रेय दिया जाता है। एक दूरदर्शी, जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने से बहुत पहले एक स्वतंत्र देश के रूप में देखा और एक ऐसे ध्वज को देखने का सपना देखा जो भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व करता हो। उन्होंने ए नेशनल फ्लैग फॉर इंडिया नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने विचार के लिए 24 डिज़ाइन पेश किए। इसके बाद वे विजयवाड़ा में महात्मा गांधी से मिले और स्वतंत्रता के क्षितिज पर आने से पहले ही राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी दृढ़ता के कारण, 1947 में भारत की स्वतंत्रता से बहुत पहले, गांधीजी द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधनों के साथ ध्वज को अंतिम रूप दिया गया।

यीशु एक अन्य व्यक्ति की दृढ़ता की बात करते हैं: एक विधवा। लूका 18:1-8 के दृष्टांत में, एक विधवा के हठ ने एक अन्यायी न्यायाधीश को राजी कर लिया, जिसका उसके प्रति न्याय करने का कोई झुकाव नहीं था (पद.5)। इस दृष्टांत में विधवा यीशु के शिष्यों का प्रतिनिधित्व करती है जिनके बारे में यीशु जानते थे कि उन्हें जल्द ही बहुत सताव सहना पड़ेगा (पद.1)। मसीह ने उन्हें बिना आशा छोड़े, ऐसी विपत्ति का सामना करते हुए लगातार प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया, जैसा कि विधवा ने न्यायाधीश से किया था (पद.6)। क्योंकि जहाँ उत्साही और निरंतर प्रार्थना और दृढ़ कार्रवाई होती है, वहाँ परमेश्वर की विश्वासयोग्यता न्याय सुनिश्चित करेगी (पद.8)।

हमारे संसार में सताव और अन्याय बहुत है। हिंसा, घृणा और भ्रष्टाचार के बीच, हमें प्रार्थना में बने रहने के लिए कहा गया है। क्योंकि जब हम बने रहते हैं, तो हमारा स्वर्गीय न्यायाधीश हमें न्याय देने का वादा करता है। जैसा कि यीशु ने हमें सिखाया, आइए प्रार्थना करें, “तेरा राज्य आए, तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 7:10)। जब वह वापस आए तो हम प्रार्थना में विश्वासयोग्य पाए जाएँ (लूका 18:8)। —रेबेका विजयन