यीशु में बने रहना
आग ने बलसोरा बैपटिस्ट चर्च को जलाकर राख कर दिया। आग कम होने के बाद जैसे ही आपातकालीन कर्मचारी और समुदाय के सदस्य एकत्र हुए, वे हवा में धुएं और राख के बीच एक जले हुए क्रॉस को सीधा खड़ा देखकर आश्चर्यचकित रह गए। एक फायरफाइटर ने कहा की, आग ने “ईमारत को अपनी चपेट में ले लिया, लेकिन क्रॉस को नहीं। [यह एक याद दिलाने की बात है] इमारत तो बस, एक इमारत है। पर चर्च एक कलीसिया है।
कलीसिया एक इमारत नहीं है, बल्कि मसीह के क्रूस से एकजुट एक समुदाय है - जो मारा गया, गाढ़ा गया, और फिर से जी उठा। जब यीशु पृथ्वी पर थे, तो उन्होंने पतरस से कहा कि वह अपनी कलीसिया बनाएंगे, और कोई उस पर प्रबल नहीं होगा (मत्ती 16:18)। यीशु दुनिया भर से विश्वासियों को एक समूह में इकट्ठा करेंगे जो अंत तक बनें रहेंगे। इस समुदाय को अत्यंत कठिनाई का सामना करना पड़ेगा, लेकिन वे अंततः बना रहेगा। परमेश्वर उनमें वास करेगा और उन्हें सम्भालेगा (इफिसियों 2:22)।
जब हम स्थानीय चर्च स्थापित करने के लिए संघर्ष करते हैं, जहाँ सिर्फ निष्क्रियता और बड़बड़ाना है , जब इमारतें नष्ट हो जाती हैं, या जब हम दुनिया के अन्य हिस्सों में संघर्ष कर रहे विश्वासियों के बारे में चिंतित होते हैं, तो हम याद रख सकते हैं कि यीशु जीवित हैं, जो सक्रिय रूप से परमेश्वर के लोगों को बने रहने में सक्षम बना रहे हैं। हम उस चर्च का हिस्सा हैं जिसे वह आज बना रहा है। वह हमारे साथ है और हमारे लिए है। उसका क्रॉस कायम है । जेनिफ़र बेन्सन शुल्द

एक अच्छा काम
स्काउट्स मूवमेंट(आन्दोलन), जिसे भारत में “भारत स्काउट्स एंड गाइड्स” के नाम से जाना जाता है, का एक बहुत ही दिलचस्प नारा है, “प्रतिदिन एक अच्छा काम करें।” इसका मतलब यह है कि हर दिन इसके सदस्यों से किसी की मदद करने के लिए कुछ करने की उम्मीद की जाती है। यह दयालुता और मदद का कोई भी छोटा सा भाव हो सकता है जिसका उद्देश्य अपने देश को एक बेहतर जगह बनाना हो। हालाँकि इस बात का कोई वर्णन नहीं है कि वह “अच्छा काम” कैसा दिख सकता है, लेकिन आम तौर पर यह समझा जाता है कि इसका उद्देश् बनाना हैंI
भजन संहिता (90:12) कहता है, “हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएं।” जब कि शुरू में यह बड़े लोगों के लिए सलाह लग सकती है। हालाँकि, इसे करीब से पढ़ने पर, हम समझते हैं कि यह सभी के लिए है, युवा और वृद्ध सभी के लिए। भजन संहिताकार बताता है, कि हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं, और चाहे बल के कारण अस्सी वर्ष भी हो जाएँ (पद.10) l जबकि पहले तो ऐसा लगता है कि वर्षों की संख्या मानव जीवन की लंबी आयु को दर्शाती है, लेकिन करीब से देखने पर हम समझ जाते हैं कि भजन संहिताकार किसी व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा का शाब्दिक अर्थ नहीं ले रहा था, बल्कि वह हमसे यह सुनिश्चित करने के लिए कह रहा था कि पृथ्वी पर हमारे दिन सार्थक हों।
दयालुता के छोटे-छोटे कार्य, विनम्र शिष्टाचार, मदद के भाव और दूसरों के साथ उनकी स्थिति की परवाह किए बिना निष्पक्ष व्यवहार करना हमारे दिनों को सही रीति से जीने के कुछ सरल तरीके हैं। हालाँकि हम कभी भी यह अनुमान नहीं लगा पाएँगे कि हमारे पास पृथ्वी पर कितना समय है, लेकिन हम हर दिन अच्छाई करके जितना संभव हो उतना प्रभाव छोड़ने का संकल्प ले सकते हैं। और जैसे-जैसे हम मसीह में बढ़ते हैं और उसके गुणों को प्रदर्शित करते हैं, हम निश्चित रूप से हर दिन को महत्वपूर्ण बनाएँगे। —नोएल बर्मन

विश्वास के साथ आगे बढ़ना
अतिथि वक्ता ने परमेश्वर पर भरोसा करने और “नदी में कदम रखने” की बुद्धिमत्ता पर बात की। उन्होंने एक पादरी के बारे में बताया जिसने परमेश्वर पर भरोसा किया और अपने देश के नए कानून के बावजूद एक उपदेश में बाइबल की सच्चाइयों को बोलने का फैसला किया। उन्हें नफरत भड़काने के अपराधों का दोषी ठहराया गया और उन्होंने तीस दिन जेल में बिताए। लेकिन उनके मामले की अपील की गई, और अदालत ने फैसला सुनाया कि उन्हें बाइबिल की व्यक्तिगत व्याख्या देने और दूसरों को इसका पालन करने के लिए आग्रह करने का अधिकार है।
वाचा का सन्दूक ले जाने वाले याजकों को भी एक चुनाव करना था - या तो पानी में उतरें या किनारे पर रहें। मिस्र से बच निकलने के बाद इस्राएली चालीस वर्ष तक जंगल में भटकते रहे। अब वे यरदन नदी के तट पर खड़े थे, जिसमें बाढ़ के परिणामस्वरूप पानी खतरनाक रूप से अपने उच्चतम स्तर पर था; नदी पूरी तरह भरी हुई थी । लेकिन उन्होंने वह कदम उठाया, और परमेश्वर ने पानी कम कर दिया: “जैसे ही उनके पाँव पानी के किनारे पर छू गए, और उस समय पानी का बहना बन्द हो गया। पानी और एक ढेर हो गया और दीवार सा उठा रहा।” (यहोशू 3:15-16)।
जब हम अपने जीवन में परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, तो वह हमें आगे बढ़ने का साहस देता है, फिर चाहे वह बाइबल की सच्चाइयों को बोलना हो या अज्ञात क्षेत्र में कदम रखना हो। पादरी के मुकदमे के दौरान, अदालत ने उसके उपदेश द्वारा सुसमाचार सुना। और, यहोशू में, इस्राएलियों ने सुरक्षित रूप से वादा किए गए देश में प्रवेश किया और भविष्य की पीढ़ियों के साथ परमेश्वर की शक्ति के बारे में साझा किया (पद 17; 4:24)।
यदि हम विश्वास के साथ कदम बढ़ाएंगे तो परमेश्वर बाकी सब संभाल लेंगे। एलीसन काईडा

मसीह में सच्चाई से बोलना
एक आदमी झूठ बोलकर अपने ट्रैफिक चलान के भुक्तान से बचने में माहिर था। जब वह अदालत में विभिन्न न्यायाधीशों के सामने पेश होता, तो वो एक ही कहानी सुनाता: “मेरा अपनी दोस्त से झगड़ा हो गया था और वह मेरी जानकारी के बिना मेरी कार ले गई।” इसके अलावा, नौकरी के दौरान दुर्व्यवहार के लिए उसे बार-बार फटकार भी लगाई जाती थी। अभियोजकों ने अंततः उस पर झूठी गवाही देने के चार आरोप लगाए, और शपथ के तहत न्यायाधीशों से कथित तौर पर झूठ बोलने के लिए जालसाजी के पांच मामले और फर्जी पुलिस रिपोर्ट उपलब्ध कराने के मामले भी । इस आदमी के लिए झूठ बोलना जीवन भर की आदत बन गई थी।
इसके विपरीत, प्रेरित पौलुस ने कहा कि सच बोलना यीशु में विश्वासियों के लिए एक महत्वपूर्ण आदत है। उसने इफिसियों को याद दिलाया कि उन्होंने अपने जीवन को मसीह को समर्पित करके अपने पुराने जीवन जीने के तरीके को त्याग दिया है (इफिसियों 2:1-5)। इसलिए अब, जबकि वें एक नई सृष्टि बन गए है तो उन्हें कुछ कामों को अपने जीवन में शामिल करते हुए नया जीवन जीना भी आवश्यक है । ऐसा एक काम जिसे करना छोडना है—वह है –”झूठ को छोडना “- और दूसरा काम जिसे अभ्यास में लाना है- “अपने पड़ोसी से सच बोलना” (4:25)। क्योंकि इससे कलीसिया की एकता सुरक्षित रहती है, इसलिए इफिसियों के लिए था कि उनके शब्द और काम हमेशा “दूसरों के निर्माण (उन्नति) “के लिए हो (पद 29)।
जब पवित्र आत्मा हमारी सहायता करता है (पद 3-4), यीशु में विश्वास करने वाले अपने शब्दों और कामों में सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। तब कलीसिया एकीकृत होगी, और परमेश्वर को इसके द्वारा आदर मिलेगा। मार्विन विलियम्स

“अब” अनुग्रह
मेरी सहेली जेरी को काम से एक छोटा सा ब्रेक मिला था इसलिए हम जल्दी-जल्दी एक फास्ट-फूड रेस्तरां में गए ताकि एक साथ लंच कर सके। रेस्तरां के दरवाज़े पर लगभग हमारे साथ ही साथ, छह युवक अन्दर घुसे। हमें पता था कि हमारे पास बहुत थोड़ा सा समय है इसलिए हम मन ही मन कुड़कुड़ाने लगी क्यूंकि वे दोनों काउंटर पर एक झुण्ड में खड़े थे,यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनमें से प्रत्येक पहले ऑर्डर कर सके। फिर मैंने जैरी को खुद से फुसफुसाते हुए सुना, “अब अनुग्रह दिखाओ ।” निश्चित रूप से, अगर वें हमें पहले जाने देते तो यह अच्छा होता, लेकिन यह कितनी अच्छी याद दिलाने वाली बात थी कि हमें केवल अपनी ही नहीं, पर दूसरों की जरूरतों और इच्छाओं के बारे में भी सोचना है।
बाइबल सिखाती है कि प्रेम धैर्यवान, दयालु और निःस्वार्थ होता है; यह “आसानी से क्रोधित नहीं होता” (1 कुरिन्थियों 13:5)। “यह [प्रेम]अक्सर . . अपने स्वयं के बदले [दूसरों की] भलाई, संतुष्टि और लाभ को प्राथमिकता देता है,’’ टिप्पणीकार मैथ्यू हेनरी ने लिखा। परमेश्वर का प्रेम पहले दूसरों के बारे में सोचता है।
ऐसी दुनिया में जहां हममें से बहुत से लोग आसानी से झुंझलाता जाते हैं, हमारे पास अक्सर परमेश्वर से मदद और अनुग्रह मांगने का अवसर होता है कि हम दूसरों के साथ धैर्यवान और दयालु बनें (पद 4)। नीतिवचन 19:11 आगे कहता है, “जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उस को सोहता है।” यह उस प्रकार का प्रेमपूर्ण कार्य है जो परमेश्वर को सम्मान दिलाता है। और वह इसका उपयोग दूसरों तक अपने प्रेम के विचार लाने के लिए भी कर सकता है।
परमेश्वर की सामर्थ से, आइए अब अनुग्रह दिखाने के हर अवसर का लाभ उठाएँ। ऐनी सीटास