खुली बाहें
सैम्युएल और उसके परिवार के पास “खुली बाहें और खुला घर” वाला दर्शन है। उसका कहना है कि उसके घर में हमेशा लोगों का स्वागत है, “विशेषकर जो लोग परेशानी में हैं।” लाइबीरिया में अपने नौ भाई बहनों के साथ उसके पास इसी प्रकार का घर था जहां उसका पालन पोषण हुआ था। उसके माता-पिता ने हमेशा अपने परिवार में दूसरों का स्वागत किया। वह कहता है, “हम एक समुदाय के रूप में बड़े हुए हैं। हम एक दूसरे से प्यार करते थे। सभी लोग सभी के लिए जिम्मेदार थे। मेरे पिता ने हमें एक दूसरे से प्यार करना, एक दूसरे की देखभाल करना, एक दूसरे की सुरक्षा करना सिखाया।”
जब राजा दाऊद ज़रूरत में था, तब उसने परमेश्वर में इसी प्रकार की देखभाल को प्राप्त किया। 2 शमूएल 22 (और भजन 18) उन्हीं तरीकों के लिए परमेश्वर के लिए अपनी प्रशंसा के गीत रिकॉर्ड करता है जैसे वह उसके सम्पूर्ण जीवन में उसका शरणस्थान रहा था। उसने याद किया, “अपने संकट में मैं ने यहोवा को पुकारा, और अपने परमेश्वर के सम्मुख चिल्लाया। उसने मेरी बात को अपने मंदिर में से सुन लिया, और मेरी दोहाई उसके कानों में पहुँची” (2 शमूएल 22:7) l परमेश्वर ने अनेक बार, उसे राजा शाऊल समेत, उसके शत्रुओं से छुड़ाया था। उसने परमेश्वर को उसका गढ़ और छुटकारा देनेवाला होने के लिए उसकी प्रशंसा की जिसमें उसने शरण लिया था (पद.2-3) l
जबकि हमारी परेशानियां दाऊद की तुलना में छोटी हो सकती हैं, परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी ओर दौड़ कर उस आश्रय को प्राप्त करें जिसकी हम इच्छा करते हैं l उसकी बाहें हमेशा खुली हैं l इसलिए हम “[तेरे] नाम का भजन [गाते हैं]” (पद.50) l
देखभाल
गृह सफाई सेवा की मालकिन, डेबी, निरंतर अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए अधिक ग्राहकों की तलाश करती रहती है l एक बुलावे पर उसने एक महिला से बात की जिसका जबाब था, “मैं अभी इतना कैंसर का रोगी वंचित नहीं होगा l उन्हें मुफ्त गृह सफाई सेवा दी जाएगी l” इसलिए 2005 में उसने एक गैपैसा नहीं दे पाऊंगी; मैं कैंसर का इलाज ले रही हूँ l” उसी समय डेबी ने फैसला किया कि “कोई भी र-लाभकारी संस्था शुरू किया, जहां कंपनियों ने कैंसर से जूझ रही महिलाओं को अपनी सफाई सेवाएँ उपहार स्वरुप प्रदान की l ऐसी ही एक महिला ने तीव्र भरोसा महसूस की जब वह एक साफ़ घर में लौटी l उसने कहा, “पहली बार, मुझे वास्तव में विश्वास था कि मैं कैंसर को हरा सकती थी l”
जब हम चुनौती का सामना कर रहे होते हैं, तो देखभाल और समर्थन की भावना हमें बनाए रखने में मदद कर सकती है l परमेश्वर की उपस्थिति और समर्थन के बारे में जागरूकता विशेष रूप से हमारी भावना को प्रोत्साहित करने के लिए आशा ला सकती है l भजन 46, जो परीक्षाओं के बीच से गुज़र रहे लोगों का पसंदीदा भजन है हमें याद दिलाता है : “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक l चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँ . . . मैं पृथ्वी भर में महान् हूँ l सेनाओं का यहोवा हमारे संग है” (पद.1,10-11) l
अपने आप को परमेश्वर के वादों की याद दिलाना और हमारे साथ उसकी उपस्थिति हमारे दिलों को नवीनीकृत करने में मदद करने का एक साधन हो सकती है और हमें कठिन समय में जाने का साहस और आत्मविश्वास प्रदान कर सकती है l
पूर्ण संतोष
आप जानते होंगे कि यह कैसा है l एक चिकित्सा प्रक्रिया के बाद बिल आते रहते हैं – निश्चेतक से, शल्यचिकित्सक से, लैब से, चिकित्सालय से l रोहन ने आपातकालीन सर्जरी के बाद इसका अनुभव किया l उसने शिकायत की, “हम बीमा के बाद हज़ारों रुपयों के देनदार होते हैं l यदि केवल हम इन बिलों का भुगतान कर सकते हैं, तो जीवन अच्छा होगा और मुझे संतोष होगा! फिलहाल, मुझे ऐसा लग रहा है कि बेतरतीब क्रिकेट की गेंदों से मुझ पर प्रहार हो रहा है, जिसके कारण मुझे पार्क से बाहर जाना पड़ता है l
जीवन उसी प्रकार कभी-कभी हमारे पास आता है l प्रेरित पौलुस निश्चित रूप से हमदर्दी रख सकता था l उसने कहा, “मैं दीन होना भी जानता हूँ,” फिर भी उसने “सब दशाओं में . . तृप्त होना” सीख लिया था (फिलिप्पियों 4:12) l उसका रहस्य? जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ” (पद.13) l जब मैं ख़ास तौर पर असंतुष्ट समय से निकल रहा था, तो मैं एक बधाई पत्र पर इसे पढ़ा : “यदि यह यहाँ नहीं है, तो यह कहाँ है?” यह एक शक्तिशाली अनुस्मारक था कि अगर मैं यहाँ और अभी संतुष्ट नहीं हूँ, तो कौन सी बात मुझे सोचने को विवश करती है कि यदि मैं किसी दूसरी स्थिति में होता तो मैं संतुष्ट होता?
हम यीशु में संतुष्ट होना कैसे सीखते हैं? शायद यह ध्यान देने की बात है l आनंद और अच्छे के लिए आभारी होने के विषय l एक वफादार पिता के बारे में अधिक जानने के लिए l विश्वास और धैर्य में बढ़ने में l यह पहचानने में कि जीवन परमेश्वर के बारे में है और मेरे बारे में नहीं है l उसमें निहित संतुष्टता मुझे सिखाने का आग्रह करना l
अपनापन का स्थान
अपने पहले जीवनसाथी के दुखद मृत्यु के कुछ साल बाद, राहुल और समीरा ने शादी कर ली और अपने दोनों परिवारों को मिला लिया l उन्होंने एक नया घर बनाया और उसका नाम हविला रखा (एक इब्री शब्द जिसका अर्थ है “दर्द में छटपटाना” और “उत्पन्न करना”) l यह दर्द के द्वारा कुछ सुन्दर बनाने का संकेत देता है l इस दंपति का कहना है कि उन्होंने अपने अतीत को भूलने के लिए घर नहीं बनाया, लेकिन “राख से जीवन उत्पन्न करने के लिए, आशा का उत्सव मनाने के लिए l” उनके लिए, “यह अपनापन का स्थान है, जीवन को मनाने की जगह है और जहाँ हम सभी भविष्य के वादे से जुड़ते हैं l”
यह यीशु में हमारे जीवन की एक सुन्दर तस्वीर है l वह हमारे जीवनों को राख से बाहर निकालता है और हमारे लिए अपनापन का स्थान बन जाता है l जब हम उसे ग्रहण करते हैं, तो वह हमारे दिलों में अपना घर बनाता है (इफिसियों 3:17) l परमेश्वर हमें यीशु के द्वारा अपने परिवार में अपनाता है ताकि हम उससे सम्बद्ध हो जाएँ (1:5-6) l यद्यपि हम पीड़ादायक समय से गुज़रते हैं, वह हमारे जीवनों में अच्छे उद्देश्यों को लाने के लिए भी उपयोग करता है l
हमारे पास प्रतिदिन परमेश्वर की समझ में बढ़ने का अवसर है जब हम उसके प्रेम का आनंद लेते हैं और उसके प्रावधानों का आनंद लेते हैं l उसी में, जीवन की पूर्णता है जिसे हमें उसके बिना (3:19) नहीं मिल सकती थी l और हमारे पास उसका वादा है कि यह सम्बन्ध हमेशा के लिए रहेगा l यीशु हमारा अपनापन का स्थान है, हमारे जीवन का उत्सव मनाने का कारण है, और हमेशा के लिए हमारी आशा l
एकमात्र राजा
जब पांच वर्षीय एलिजा अपने पास्टर से यीशु के स्वर्ग छोड़ने और पृथ्वी पर आने के विषय सुन रहा था, उसने गहरी साँस ली जब पास्टर ने प्रार्थना में उसे हमारे पापों के लिए मारे जाने के लिए धन्यवाद दिया l “अरे! वह मर गया?” लड़का चकित होकर बोला l
पृथ्वी पर मसीह के जीवन के आरम्भ से ही, ऐसे लोग थे जो उसे मृत चाहते थे l राजा हेरोदेस के राज्य में बुद्धिमान लोग यरूशलेम आकर पूछने लगे, “यहूदियों का राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है? क्योकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है और उसको प्रणाम करने आए हैं” (मत्ती 2:2) l राजा यह सुनकर भयभीत हुआ कि एक दिन वह यीशु के हाथों अपना पद खो देगा l इसलिए उसने बैतलहम के आसपास के सभी लड़कों को जो दो साल और उससे छोटे थे को मारने के लिए सैनिक भेजे l लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र की रक्षा की और एक स्वर्गदूत भेजकर उसके माता-पिता को वह क्षेत्र छोड़ने के लिए चेतावनी दी l वे वहाँ से चले गए, और वह बचा लिया गया (पद.13-18) l
जब यीशु ने अपनी सेवा पूरी की, उसे संसार के पापों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया l उसके क्रूस पर लगाए गए संकेत पर लिखा था, “यह यहूदियों का राजा यीशु है” यद्यपि मजाक था l फिर भी तीन दिनों के बाद वह कब्र से जी उठकर विजयी हुआ l स्वर्गारोहण के बाद, वह राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु होकर सिंहासन पर बैठ गया (फिलिप्पियों 2:8-11) l
हमारा राजा – तुम्हारे, मेरे, और एलिजा के पापों के लिए मरा l उसे अपने हृदयों में राज्य करने दें l
खूबसूरत फल
सिटी ब्लोस्सम्स(City Blossoms) के संस्थापक रेबेका लेमोस-ओटेरो सुझाव देती हैं, “बच्चों को [एक बगीचा में] कहीं भी बीज फेंकने में सक्षम होना चाहिए और फिर देखना चाहिए कि क्या उगता है l” हालाँकि यह सावधानी से बागवानी करने का नमूना नहीं है, यह उस वास्तविकता को दर्शाता है कि प्रत्येक बीज में जीवन के साथ प्रस्फुटन की क्षमता है l 2004 से, सिटी ब्लोस्सम्स ने कम आय वाले क्षेत्रों में सकूलों और पड़ोस के लिए बगीचे बनाए हैं l बच्चे पोषण के बारे में सीख रहे हैं और बागवानी के माध्यम से नौकरी कौशल प्राप्त कर रहे हैं l रेबेका कहती हैं, “शहरी क्षेत्र में एक सजीव हरा भरा स्थान होना . . . बच्चों के लिए बाहर रहकर कुछ उत्पादक और सुन्दर करने के लिए एक मार्ग बनाता है l”
यीशु ने बीज को बिखेरने के विषय एक कहानी बतायी, जिसमें बोए गए बीज में “सौ गुणा” उत्पादन की क्षमता होती है (लूका 8:8) l वह बीज परमेश्वर का सुसमाचार था जो “अच्छी भूमि” में बोया गया था जिसके बारे में उसने बताया कि वह वे हैं “जो वचन सुनकर भले और उत्तम मन से सम्भाले रहते हैं, और धीरज से फल लाते हैं” (पद.15) l
यीशु ने कहा, “हमारे फलदायी होने का केवल एक ही तरीका है, उसके साथ जुड़े रहना (यूहन्ना 15:4) l जैसा कि हम यीशु द्वारा सिखाए गए हैं और उससे लिपटे रहते हैं, आत्मा हमारे अन्दर “प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम” का उसका फल उत्पन्न करते हैं (गलातियों 5:22-23) l वह दूसरों के जीवन को स्पर्श करने के लिए हमारे द्वारा उत्पादित फल का उपयोग करता है, जो उसके बाद बदल जाते हैं और अपने स्वयं के जीवन से फल उगाते हैं l यह एक सुन्दर जीवन को बनाता है l
यह परमेश्वर के ऊपर है
नैट और शेर्लिन ने न्यूयॉर्क शहर की सैर करते वक्त ओमाकेस(omakase) रेस्टोरेंट में रुककर अपने विश्राम का आनंद लिया l ओमाकेस एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है, “मैं आपके ऊपर छोड़ देता हूँ,” जिसका मतलब है कि ऐसे रेस्टोरेंट में ग्राहक शेफ(रसोइया) को अपना भोजन चुनने देते हैं l भले ही यह इस प्रकार के व्यंजनों को आजमाने का उनका पहला मौका था और यह जोखिम भरा लग रहा था, उन्हें शेफ द्वारा चुना गया और तैयार किया गया भोजन पसंद आया l
यह विचार हमारी प्रार्थना अनुरोधों के साथ परमेश्वर के प्रति हमारे रुख़ को आगे ले जा सकता है : “मैं इसे तुम्हारे ऊपर छोड़ दूंगा l” शिष्यों ने देखा कि यीशु “जंगलों में अलग जाकर प्रार्थना किया करता था” (लूका 5:16), इसलिए एक दिन उन्होंने उससे प्रार्थना करना सिखाने का अनुरोध किया l उसने उन्हें अपनी दैनिक आवश्यकताओं, क्षमा, और प्रलोभनों से बाहर निकलने का मार्ग पूछने के लिए कहा l उसके प्रत्युत्तर का एक भाग आत्मसमर्पण का एक दृष्टिकोण भी सुझाता है : “तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:10) l
हम अपनी ज़रूरतों को परमेश्वर के समक्ष पहुँचा सकते हैं क्योंकि वह सुनना चाहता है कि हमारे हृदय में क्या है – और वह देने में आनंदित होता है l परन्तु मानवीय और परिमित होने के कारण, हम हमेशा यह नहीं जानते हैं कि क्या सर्वोत्तम है, इसलिए यह केवल विनम्र भाव से समर्पण के साथ उससे पूछने में समझदारी है l उत्तर हम उसपर छोड़ सकते हैं, निश्चित रहते हुए कि वह भरोसेमंद है और हमारे लिए सर्वोत्तम का चुनाव करेगा l
मत भूलिएगा!
मेरी भांजी, उसकी चार साल की बेटी केलिन, और मैं ने शनिवार दोपहर का अद्भुत आनंद लिया l हमने बाहर बुलबुले बनाने, प्रिंसेस कलर बुक में रंग भरने, और पीनट मक्खन और जेली सैंडविच खाने का आनंद लिया l जब वे जाने के लिए कार में बैठ गए, कालीन ने खुली खिड़की से प्यार से बोली, “आंटी ऐन, मुझे मत भूलियेगा l” मैं जल्दी से कार की ओर बढ़कर धीरे से फुसफुसाई, “मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती l मैं वादा करती हूँ कि मैं जल्द ही तुमसे मिलूंगी l”
प्रेरितों 1 में, शिष्य देख रहे थे जब यीशु “उनके देखते-देखते” आसमान में उठा लिया गया (पद.9) l मुझे आश्चर्य है कि उन्होंने सोचा होगा कि शायद उनका स्वामी उनको भूल जाएगा l परन्तु उसने अभी तुरंत प्रतिज्ञा की थी कि वह अपना पवित्र आत्मा भेजेगा जो उनके अन्दर निवास करेगा और आनेवाले सताव से पेश आने में उनको समर्थ बनाएगा (पद.8) l और उसने उनको समझाया था कि वह उनके लिए स्थान तैयार करने जा रहा है और वापस आकर उनको ले जाएगा कि वे उसके साथ रहें (यूहन्ना 14:3) l फिर भी वे सोचे होंगे कि उनको कितना समय इंतज़ार करना होगा l शायद वे कहना चाहते है, “यीशु, आप हमें भूलियेगा नहीं!”
हम जो यीशु में विश्वास किये हैं, वह पवित्र आत्मा के द्वारा हममें निवास करता है l इसके बाद भी हम सोचते हैं वह कब लौटेगा और हमें और अपनी सृष्टि को पूरी रीति से पुनः स्थापित करेगा l परन्तु यह अवश्य होगा – वह हमें भूलेगा नहीं l “इस कारण एक दूसरे को शांति दो और एक दूसरे की उन्नति का कारण बनो” ( 1 थिस्सलुनीकियों 5:10-11) l
अवश्य
शर्ली एक लम्बे दिन के पश्चात् अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गयी l उसने खिड़की के बाहर उससे भी वृद्ध पति-पत्नी को एक बाड़े को खींचते हुए देखा जो एक अहाते में पड़ा था और जिसपर लिखा था “मुफ्त है l” शर्ली अपने पति के साथ उनकी मदद करने दौड़ गयी l चारों ने मिलकर मेहनत की और बाड़े के एक हिस्से को एक ठेले में लादकर शहर के सड़क से होते हुए उस दम्पति के घर के निकट ले आये – पूरे समय हँसते हुए कि वे तमाशा बन गए थे l जब वे बाड़े के दूसरे हिस्से को लेने गए, उस महिला ने शर्ली से पुछा, “तुम्हें मेरी सहेली बनना चाहिए?” “हाँ, अवश्य,” उसने उत्तर दिया l शर्ली को बाद में पता चला कि उसकी नयी वियतनामी सहेली थोड़ी अंग्रेजी जानती थी और अकेली थी क्योंकि उसके व्यस्क बच्चे उनसे बहुत दूर रहने चले गए थे l
लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में, परमेश्वर ने इस्राएलियों को याद दिलाया कि वे परदेशी होने का अनुभव जानते थे (19:34) और दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए (पद.9-18) l परमेश्वर ने उनको अपना राष्ट्र बनाने के लिए अलग किया था, और इसके बदले में उन्हें अपने “पड़ोसियों” से अपने समान प्रेम करके उन्हें आशीष देना था l परमेश्वर की ओर से सभी राष्ट्रों के लिए महानतम आशीष, यीशु ने, बाद में अपने पिता के शब्दों को दोहराया और उनको हम तक पहुँचाया : “तू परमेश्वर अपने प्रभु से . . . और . . . अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख” (मत्ती 22:37-39) l
हमारे अन्दर मसीह की आत्मा के निवास करने के द्वारा, हम परमेश्वर से और दूसरों से प्रेम कर सकते हैं क्योंकि उसने पहले हमसे प्रेम किया है (गलातियों 5:22-23; 1 युहन्ना 4:19) l क्या हम शर्ली के साथ कह सकते हैं, “हाँ, अवश्य”?